Thursday, October 7, 2010

खटमलों के लिए भी कंडोम?


लखनऊ। चाॅकलेट बेचने या कंडोम की उपयोगिता बताने के प्रचार का तरीका अपनाने वाले बाजार ने बीमारियों का खौफ पैदा करने के लिए भी उसी तकनीकी को अपना लिया है। इसके नतीजे बेहद खतरनाक हो रहे हैं। आम आदमी उन बीमारियों से भी डरा-सहमा रहता है, जो पूरी तरह इलाज के बाद ठीक हो जाती हैं।
 पिछले दिनों लखनऊ में टी.बी. की बीमारी पर एक कार्यशाला हुई थी। उसमें मौजूद लखनऊ चिकित्सा विश्वविद्यालय में पल्मोनरी विभाग के प्रो0 सूर्यकान्त ने जहां टी.बी. को उचित इलाज से ठीक होनेवाली बीमारी बताया वहीं, उन्होंने बताया दरअसल पश्चिमी देशों में यह बीमारी इधर काफी जोर पकड़ रही हैं, इसके कारण निवारण पर भी विशेष जोर दिया जा रहा है।
 डाॅ. सूर्यकान्त की बात की ताईद करती हुई एक खबर पिछले दिनों अखबारों में छपी ‘खटमल दुनिया के लिए खतरा।’ यह खटमल विकसित देशों में बड़ी समस्या बन गये हैं। अमेरिका के न्यूयार्क शहर मंे खटमलों के खौफ से कई सिनेमाघरों, दुकानों, कार्यालयों को बंद कर दिया गया है। इस शहर ने इससे निपटने के लिए कानून तक बना डाला है। ब्रिटेन में कई होटलों के मालिक खटमलों से बेहद परेशान है, उनका व्यवसाय बंदी के कगार पर है। उन्हांेने खटमल तलाशने के लिए स्निफर कुत्ते पाले हैं।
 दरअसल पिछले दस सालों से खटमलों ने विकसित देशों में फिर से अपनी फौज खड़ी कर ली है। अमेरिकी संस्था युनिवर्सिटी आॅफ केंटकी व नेशनल पेस्ट मैनेजमंेट एसोसिएशन (एनपीएमए) के सर्वेक्षण के मुताबिक दुनिया खटमलों की तादाद के कारण महामारी के कगार पर खड़ी है। खटमलों की बढ़ती तादाद के लिए पर्यावरण में बदलाव, कीटनाशकों का बेअसर होना व अंतर्राष्ट्रीय यात्राओं में बढ़ोत्तरी को जिम्मेदार मान रहे हैं विशेषज्ञ वैज्ञानिक।
 गौरतलब है भारत, नेपाल, पाकिस्तान, बांग्लादेश, चीन, लंका जैसे विकासशील देश लगभग तीस वर्ष पहले खटमलों की समस्या से बेहद परेशान थे। उस समय किसी विकसित देश ने इससे छुटकारा पाने के लिए कोई आवाज नहीं उठाई। इसी तरह लगभग 50-60 वर्ष पहले प्लेग ने महामारी का रूप ले रखा था जो ब्रिटिश नागरिकों के जरिये भारत में आई थी। उस समय जन भागीदारी के जरिए चूहों को मारने का अभियान चलाया गया था। एक चूहा मारकर नगर पालिका के स्वास्थ्य अद्दिकारी आदि के पास जमा करने वाले को चारआने ईनाम में दिये जाते थे। लब्बो-लुआब यह कि जन भागीदारी से किसी भी बीमारी पर काबू पाया जा सकता है और यह भी सच है कि विकसित देश विकासशील देश के नागरिकों को कीड़े-मकोड़ों से अधिक नहीं समझते। अब सवाल यह है कि खटमलों की बढ़ती हुई जनसंख्या की समस्या से निजात पाने के लिए भी पश्चिम के वैज्ञानिक खटमलों के लिए किसी ‘कंडोम’ की तलाश करेंगे या जहरीले कीटनाशक की?


9 comments:

  1. आपका लेख अच्छा लगा।आभार!

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  2. हिंदी ब्लाग लेखन के लिए स्वागत और बधाई
    कृपया अन्य ब्लॉगों को भी पढें और अपने बहुमूल्य विचार व्यक्त करने का कष्ट करें

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  3. ब्लाग जगत की दुनिया में आपका स्वागत है। आप बहुत ही अच्छा लिख रहे है। इसी तरह लिखते रहिए और अपने ब्लॉग को आसमान की उचाईयों तक पहुंचाईये मेरी यही शुभकामनाएं है आपके साथ
    ‘‘ आदत यही बनानी है ज्यादा से ज्यादा(ब्लागों) लोगों तक ट्प्पिणीया अपनी पहुचानी है।’’
    हमारे ब्लॉग पर आपका स्वागत है।

    मालीगांव
    साया
    लक्ष्य

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    कृपया अपने ब्लॉग पर से वर्ड वैरिफ़िकेशन हटा देवे इससे टिप्पणी करने में दिक्कत और परेशानी होती है।

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  4. आपका लेख अच्छा लगा।धन्यवाद!

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  5. घर से निकलो तो ज़माने से छुपा कर निकलो ,
    आहट हो ना ज़रा भी पावँ दबा कर निकलो.

    लौट आयें ये खुदा फिर से वापस घर में
    कही चलने से पहले अब ये दुआ कर निकलो .

    राहें मकतल बनी हैं , तू बेकफ़न न रह जाए
    इसलिए हाथ पे पता घर का लिखा कर निकलो .

    अपने ही खून के हाथों में हैं खंज़र इसलिए
    रोएगा कौन तुझ पे ,खुद को रूला कर निकलो .

    ये दौर खून का हैं हवाओं में बह रहे नश्तर
    घर के हर शख्स को सीने से लगा कर निकलो

    कवि दीपक शर्मा

    http://www.kavideepaksharma.com

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  6. इस नए सुंदर से चिट्ठे के साथ हिंदी ब्‍लॉग जगत में आपका स्‍वागत है .. नियमित लेखन के लिए शुभकामनाएं !!

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