Wednesday, July 5, 2017

7जुलाई जन्मदिवस पर प्रणाम
सभ्यों की जुबान में हो गया लफंगा
सांस लेता हूं तो जख्मों को हवा लगती है / जिन्दगी तू ही बता, तू मेरी क्या लगती है ? / ये सवाल जिन्दगी की ६९वीं सीढ़ी पर कदम रखते हुए भी जस का तस है | ऐसा नहीं है कि गुजरे ६८ बरसों में निराशा की गलियों में भटकता रहा , न कतई नहीं | दोस्तों का काफ़िला , अक्षरों का मेला और राम की लीला मिलजुल कर झंझावतों में तर्क के साथ सुविधा का यज्ञ कैसे किया जाए सिखाता रहा | सवाल यूं ही नहीं है बल्कि ७ जुलाई जब भी आती है , मेरी आत्मा बेचैन हो जाती है | ये तारीख बरसते-गरजते अषाढ़ में पड़ती है | आसमान जार-जार रोने लगता है , नदियाँ बौरा जाती हैं ,ताल-तलैया पूरी तरह जवान हो जाती हैं , नाले-नालियां तक हदें तोड़ कर हौलदिली पैदा करने लगते हैं | घनघोर गरज-तड़क के बीच मेघ और माटी के मिलन का संगीत चारो तरफ गूंज रहा होता है , ऐसे में मै अम्मा की गोद में आया | न कोई गोला दगा , न किसी ने शंख फूंका | बस धुंवाती कोठरी से आंगन और आंगन से रसोई तक भीजती दादी , नाउन बुआ | अम्मा शायद आषाढ़ के तेवर से घबरा कर मुझे रोता-धोता छोड़ कर बैकुंठ सिधार गईं | दादी ने अपने स्तनों से लगा गाय का दूध पिला कर घुटनों के बल चलना सिखाया ही था कि विमाता को भाई-बंदी की रंजिश ने जिन्दा जला दिया | तिसपर गजब ये की पिता भी बीच सड़क पर मारे गये | गोया दादी के पल्लू में बंधा अधन्ना (दो पैसा ) जिन्दगी की रफ्तार बन गया | चुनांचे बचपन एक गाली बन गया | चाचा-चाची के लिए लिए पिल्ला तो नाते-पडोस के लिए अनाथ | ‘ अपना तो मर गये हमये खातिर इ पिल्ले छोड़ गए |’ या ‘ हाय लड्डू अस लरिका अनाथ हुइगे |’ हरामी कोई नहीं कहता लेकिन कमीना , कमबख्त , साले , दाढ़ीजार जैसी तमाम इज्जतदार गालियों के बीच उम्र और कद दोनों बढ़ता गया | उसी के साथ ‘चोर’ संज्ञा भी जुड़ गई | बड़ी उम्र के युवाओं की ललचाई नजरों में यौन खुराक दिखने लगा | जैसे तैसे स्कूल से ऑक्सफोर्ड ( केकेसी ) जा पहुंचा | यहीं से सभ्यों की जुबान में लफंगा हो गया | मेरी मानिये तो संघर्षों के कुरुक्षेत्र में ‘राम’ हो गया और अभावों के बीहड़ों ने एक जिद , एक जूनून की लाठी थमा दी | कुछ यूँ कह सकते हैं ‘ टूटी हुई मुंडेर पर छोटा सा एक चिराग / मौसम से कह रहा है , आंधी चला के देख |’   
बस ऐसी ही जिद ने गुरु विश्वामित्र ( गुरुवर आचार्य पं. दुलारेलाल भार्गव ) से मिला दिया फिर तो हिन्दी साहित्य के ऋषियों , मनीषियों की चरणरज मिलती गई और रोटी के रूठने का आतंकवाद अक्षरों के जिहाद से हार गया | माता भवानी ने कर्ण से , अर्जुन से और परशुराम से भी आशीर्वाद दिलाया | जिन्दगी लम्बे-लम्बे डग भरती गई माँ सरस्वती दुलराती गईं लेकिन अम्मा को दीवार पर तस्वीर में टंगा देख सारा वजूद सुन्न हो जाता है | सच कहूं तो पीड़ा के कौमार्य को सहेजना आसान नहीं होता |
जन्मदिन पर बधाई देना औपचारिक हो सकता है , लेकिन अपने जन्मदिन पर अपनी ही पीठ ठोंकना , अपनी तमाम नाकामियों और लाचारियों पर हंसकर अपने को ताकतवर बनाना है | कुछ ऐसा ही यजुर्वेद में भी पढ़ा है ,’ हे मानव , स्वयं अपने शरीर को समर्थ कर , स्वयं सफल कर , स्वयं यज्ञ कर , तेरा महत्व किसी दूसरे से नहीं प्राप्त किया जा सकता |’ नहीं जानता ६९ की उम्र में मेरी अज्ञानता , मेरी सुन्नता मेरी तस्वीर वाली माता से ऊर्जा की अभिलाषी है या आशीर्वाद की लेकिन इतना अवश्य जानता हूं कि माँ सिर्फ माँ होती है , माँ प्रणाम | और आप सब तो मेरे गुरू हैं , मेरे ईश्वर हैं आपको प्रणाम |  


Monday, July 3, 2017

यूपी में रेप-मर्डर एटीएम...

लखनऊ। गुंडों की छाती रौंदकर आने वाली सर्वजन सरकार और उसकी दलित मुखिया की आमद के महज सौ दिनों बाद से ही सूबे के जन जीवन को हिंसा के खूनी पंजों ने लहूलुहान करना शुरू कर दिया था। आज पन्द्रह सौ दिनों बाद हालात इतने बदतर हो गये हैं कि हर आठ घंटे में एक हत्या और एक औरत की आबरू लुटने जैसी पारिश्वकता हो रही है। छोटी से छोटी बात को भी ताकत से निपटाने की खबरें दहशत पैदा कर रही हैं। कहीं दहेज के लिए कहीं मौज-मस्ती के लिए, कहीं जमीन के एक छोटे से टुकड़े के लिए, कहीं झूठे स्वाभिमान के लिए, तो कहीं सरकारी पैसों की लूट के लिए बेखौफ एक दूसरे का खून बहाया जा रहा हैं। हद तो यह है कि पुलिस की हवालात और हजारों सुरक्षाकर्मियों से घिरी जेलों में लोग मरे जाते हैं। सच तो यह है कि हिंसक वारदातों को बेखटके वक़्त-बे-वक़्त अंजाम देने के लिए दुर्दान्तों ने बाकायदा ‘क्राइम एटीएम’ लगा दिया है, तभी तो अकेले राजधानी में तीस दिन में 26 हत्याएं और दर्जन भर से अधिक औरतें बेइज्जत हो जाती हैं। दलितों, महिलाओं को सम्मान दिलाने का नारा बुलंद करने वाली सरकार को उप्र के राजसिंहासन पर बैठानेवाले मतदाताओं ने कम से कम ऐसा सपना नहीं देखा था कि आदमी की पीड़ा से चीखने वालों को पुलिस की लाठियों से पिटवाया जाएगा। विपखी दलों के संवैधानिक अधिकारों को पुलिसिया हिंसा का शिकार होना पड़ेगा। आखिर महात्मा बुद्ध और अंबेडकर को सरमाथे लगाने वालों की अगुवई में इस सूबे को हिंसा की अंधेरी सुरंग में कौन धकेल रहा हैं?
    डॉक्टरों, इंजीनियरों की हत्याओं की ‘हैट्रिक’ बनानेवाले हाथ कौन जाने कब किसका गला घोंटने को सामने आ जाएं, कोई नहीं जानता। यह कैसा विकास है, जहां हिंसा फुफकार रही है? आखिर इससे निबटने के लिए सरकार झूठे, मनगंढ़त बयानों के अलावा दरहकीकत क्या करने जा रही है? ये सवाल जितने जरूरी है, उतने ही कठिन भी। क्योंकि यह चुनावी वर्ष है और सूबे का 17 करोड़ मतदाता सरकार के जवाब के बाद ही अगली सरकार के लिए फैसलाकुन होगा।

Monday, June 12, 2017

गाय के नाम पर राजनीति क्यों ?-प्रियंका वरमा महेश्वरी

 'गाय हमारी माता है इसका दूध हमको भाता है' यह सिर्फ एक स्लोगन नहीं है बल्कि अगर सही मायने में देखे तो गे हमारे लिए बहुत उपयोगी है।  हर तरह से दूध से बने प्रोडक्ट पर नजर डाल सकते है आप।  एक नजरिया और भी गाय हमारी संस्कृति भी हैं और हम उसे पूजते भी है लेकिन इस माता की क्या दशा है इस ओर किसी का भी ध्यान नहीं जाता है | हाँ , उस पर राजनीति जरूर की जा सकती है। सत्ता की राजनीति आज नफरत की राजनीति में बदल चुकी है और सभी सीमाएं ख़त्म होती जा रही हैं।
राजस्थान हाइकोर्ट का गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित करने की बात और गोवध पर आजीवन कारावास की सजा की बात हो रही है। इससे पहले 2011 में मोदी जी जब गुजरात में मुख्यमंत्री थे तब गुजरात में बीफ की बिक्री पर पूरी तरह से पाबन्दी लगा दी गई थी लेकिन उनकी दशाओं और व्यवस्थाओं में ज्यादा कुछ सुधार नहीं हुआ।
गोरक्षा के नाम पर जो हल्ला-गुल्ला चल रहा है वो शर्मनाक है।  सरेआम बछड़े को काटना और खाना गिरी हुई मानसिकता को दर्शाता है।  गोरक्षा के नाम जो गुंडई हो रही है उसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। हरियाणा में गोरक्षा के नाम पर पर हुई गुंडागर्दी और गोतस्करों के पकड़े जाने पर उन्हें गोबर खिलाना, अलवर में घटी घटना गोरक्षकों द्वारा मारपीट और पहलूखां की मौत।  इसी तरह की और भी कई घटनाएं मानवता को भी शर्मिंदा करती है। 
सवाल मांसाहार होने या न होने का नही है मांसाहारी लोग अभी ही हो गए हैं ऐसा भी नही है काफी समय से है... बस एक मसला भड़का और उसे हवा दे दी गई। मुस्लिम, ईसाई और कहूं तो बहुत सारे हिन्दू भी मांस खाते हैं..कुछ जगहें ऐसी भी हैं जहां लोगो के खानपान का हिस्सा है मांस...यानि रूटीन में शामिल। ये तय करना कि कौन क्या खायेगा...थोड़ा अजीब लगता है। गाय हमारी माता है या गौ प्रेम इतना अधिक दिखने लगा है कि यदि इन पर ध्यान न दिया गया तो ये प्रजाति खत्म हो जायेगी।
गोवध निंदनीय है...सरासर है..। केंद्र सरकार ने नियम भी बना दिया और केरल सरकार विरोध भी कर रही है इसका और कांग्रेस ने भाजपा को एक नया एजेंडा दे दिया है इस मसले पर...। लेकिन मेरा सवाल है कि गायों की दशा में सुधार की ओर सरकार क्या प्रयास कर रही है? गाय पालना और उनसे आजीविका चलाना किसानों या गौपालकों का मुख्य साधन है लेकिन यही गाय या भैंस जब अनुपयोगी हो जाती हैं तब इन्हें कटने या बेसहारा छोड़ दिया जाता है जो इधर उधर भटकते रहती हैं...सरकार का ध्यान इस ओर क्यों नहीं जाता , नहीं उनके लिए अलग से गौशालाएं बनाई जाती हैं ? गर्मी की वजह से गायें मर रही हैं ( मध्यप्रदेश... टीकमगढ़ गांव) उस ओर कोई प्रयास क्यों नही...? जगह जगह कुकुरमुत्ते की तरह उग आये "गौसेवक समिति" का ध्यान क्यों नही जा रहा ? वैध स्लाटर हाउस चल रहे हैं...सरकार का विदेशों में मांस बेचने का बड़ा व्यापार हैं...फिर बंद मतलब सब बंद..। क्या लोगों की भावनाओं को छेड़कर सांम्प्रदायिकता फैलाना उद्देश्य है और सरकार का नया कानून सभी दिशाओं में कारगर होगा।
गोरक्षा के लिए जितनी हाय तौबा गोरक्षक मचा रहे है क्या उनका जरा भी ध्यान गायों की बिगड़ी दशा पर गया है ? राजस्थान की सबसे बड़ी गोशाला में करीब 8 हज़ार गाये हैं , 10 दिन में 100 गए मर गई।  कम चारा और पानी न मिलने से हुई मौत।  यह आंकड़ा पिछले साल का है. इनकी देख रेख के लिए 200 मजदूर थे जो तनख्वाह न मिलने के कारण भाग गए।  एक गौशाला में तीन महीने में 15 से ज्यादा गाय मरी।  सूत्रों के मुताबिक गौशाला में करीब 550 गायें है जिनमे महज 67 दूध देने वाली गाय है।  67 दूध देने वाली गायों को 200 किलो चूनी दी जाती है।  बाकि की गायों को 100 किलो चूनी में ही निपटा दिया जाता है।  जो गाय दूध नहीं देती है उन्हें कभी - कभी 5 - 5 घंटे खाने को कुछ नहीं मिलता है सिर्फ पानी पीकर पेट भरती है अपना। बेशक भाजपा के सभी मुख्यमंत्री गौभक्त है लेकिन बदइंतजामी और लापरवाही की वजह से गायों की दुर्दशा और मृत्यु हो रही है ?

शाहजहांपुर में गायों के शव को टैक्टर से बांध कर घसीटा जाता है क्योकि 'गोसदन' के पास दूसरा कोई इंतजाम नहीं है। कुपोषण की शिकार और बीमार गाये मर रही है और तो और ठीक से पानी तक का इंतजाम नहीं है।   ये हमारी गौमाता का हाल है अगर गौरक्षकों को अपना प्रेम दिखाना है तो उनकी गौशालाओं की ओर और अव्यवस्थाओं की ओर ध्यान देना होगा।  गायों का राजनितिक मुद्दे बनाना बंद करना होगा।  

Saturday, June 10, 2017

प्याज रुलाएगा


लखनऊ | किसानों के उग्र आन्दोलन के चलते महाराष्ट्र,मध्यप्रदेश से होकर गुजरने वाले ट्रकों के पहिये जाम हो गये हैं | गौरतलब है कि पिछले एक हफ्ते से महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश में किसानों ने कर्जमाफी,फसलों के उचित मूल्य जैसी कई मांगों को लेकर आन्दोलन छेड़ रखा है जिसके चलते मुम्बई,इंदौर समेत करीब ३० जिलों में दूध सब्जी जैसी जरूरी चीजों की किल्लत हो रही है | यही हालात लखनऊ की मंडियों में भी बनने लगे हैं , लखनऊ के ट्रांसपोर्टरों के मुताबिक ७ जून से  नासिक,इंदौर,झांसी होकर आने वाले ट्रकों में एक भी ट्रक ल्क्नु नहीं आया है |जबकि आम तौर से १०० ट्रक रोज आते हैं | इनी ट्रकों से प्याज,दलहन,दवाइयां लैसी तमाम रोजमर्रा के सामान आते है | दुबग्गा मंडी में प्याज का स्टाक घट रहा है , आढ़तियों का मानना है अगर हालात ऐसे ही रहे तो प्याज के भाव चढ़ेंगे | रमजान के महीनों में प्याज की खपत अमूमन बढ़ जाती है | जीएसटी के चलते भी स्टाक निकला जा रहा है क्योंकि नये टैक्स १ जुलाई से लगने हैं | प्याज के बड़े कारोबारियों का कहना है रमजान में प्याज आंसू लाने वाला है |

बतादें यही हाल दलहन मंडी का भी है वहां भी माल की आवक रुकी है इसलिए दलों में भारी उचल आने की सम्भावना है | दलों का गणित सरकार ने बिगाड़ा है , अपने देश में दलों की उम्दा फसल होने के बाद भी सरकार ने विदेशों से ५० लाख टन दालों का आयात किया और स्वदेशी दालों का समर्थन मूल्य बेहद कम घोषित किया | मंडियों में समर्थन मूल्य से भी कम दामों में दालें बिक रही हैं जिससे परेशान होकर किसान सड़क पर उतर आया है और सरकार उन्हें लाठी-गोली की सौगात के साथ राजनैतिक षड्यंत्र में फंसा रही है और उनके अंध भक्त झूठ का परचम लहरा रहे हैं | इस सब में दुखद ये है कि पिछले ७ दिनों में १४ किसानों की मौत हो चुकी है |

महंगाई बोले तो जेब कटी......!


-प्रियंका वरमा महेश्वरी
 'मंहगाई' ये शब्द सुनते ही आदमी अपनी जेब पर हाथ रखने लगता है मानों जेब कटने वाली है । महंगाई बढ़ते ही आदमी का बजट डांवाडोल होने लगता है. हालाँकि महंगाई बढ़ाने में काफी हद तक सरकार ही जिम्मेदार है | सरकार अपने कर्मचारियों का वेतन भत्ता बढ़ाती है और वेतन भत्ता बढ़ते ही महंगाई भी बढ़ जाती है. अगर वेतन भत्ता न बढ़ाया जाये तो काफी हद तक महंगाई पर काबू पाया जा सकता है.
अक्सर मौसम की मार से फसलों की बर्बादी हो जाती है जिसकी वजह से फल, सब्जियों की कीमते आसमान छूने लगती है. अभी तमिलनाडु कृषि संकट से गुजर रहा है. नोटबंदी, वर्षा और तूफ़ान के प्रभाव ने उसे काफी प्रभावित किया है।  पिछले साल भी ख़राब मानसून की वजह से दाल की फसल ख़राब हो गई लिहाजा दाल के दाम बढ़ गए। २०० ग्राम दाल के साथ 1 किलो लकड़ी पैदा होती है और भारत जैसा देश दाल के मामले में आयत पर निर्भर नहीं रह सकता है. लिहाजा उत्पादन बढ़ाना ही एकमात्र उपाय है. पिछले साल टमाटर की कीमतों में काफी उछाल आया था. फल और सब्जी की कीमतों में भी काफी वृद्धि हो गई थी. पिछले साल सरकार 120 रूपये किलो में दाल बेचने को तैयार थी लेकिन राज्य सरकारों ने दिलचस्पी नहीं दिखाई और एक साल में 3 प्रतिशत महंगाई बढ़ गई |
इस बीच में पतंजलि एक नए ब्रांड के रूप में उभर कर आ रहा है. चीजों की कीमत और गुडवत्ता को देखते हुए कई कंपनियों को अपनी चीजों की कीमतों को काम करना पड़ा. पिछले साल एफएमसीजी  ने रोजमर्रा की चीजों में करीब 6 फीसदी तक कमी की | नोटबंदी हुए अब काफी समय बीत गया है लेकिन अर्थव्यवस्था नहीं सुधरी है. अभी भी कुछ जगहों पर एटीएम में कैश की किल्लत है सरकार ने पिछले साल नवम्बर में 500 और 1000 के नोटों पर पाबन्दी लगाई थी, 86 फीसदी नकदी बाजार से हटा ली गई थी और एटीएम नकदी की समस्या से जूझने लगे थे, बाद में ये समस्या कम हो गई थी लेकिन अब ये समस्या फिर से सर उठाने लगीं है, कैश लॉजिस्टिक असोसिएशन का मानना है कि महीने के शुरुआत में जब लोगो का वेतन आता है, तब एटीएम में पर्याप्त पैसे भरे जाते है पर. बाद में आपूर्ति काम कर दी जाती है, एसोसिएशन के मुताबिक बैंक अपनी शाखाओं में आने वाले ग्राहकों के लिए नकदी कम न पड़े इसलिए बैंक अपने एटीएम में कैश डाल रही है.
अब सीजन शादियों का है जहाँ पैसों की खपत ज्यादा होती है और बैंकों में नोटों की किल्लत की वजह से लोगों को दिक्कत का सामना करना पड़ रहा है।  बैंकों का कहना है की रिजर्व बैंक की तरफ से पर्याप्त नकदी नहीं मिलने के कारण ये स्थिति पैदा हुई है. रिजर्व  बैंक की कानपुर शाखा से पिछले 15 सैलून से करेंसी चेस्ट्स में नकदी आपूर्ति नहीं के बराबर है. जबसे यह खबर फैली लोगों ने नकदी निकलना शुरू कर दिया है और जमा करने वाले एक चौथाई रह गए हैं. सबसे ज्यादा समस्या ग्रामीण शाखाओं में है. गोरख्पुर के एक गांव की एसबीआई शाखा में काम करने वाले अधिकारी का कहना है कि 15 दिन बाद उनके यहाँ 30 लाख रुपये की नकदी आई और यह कहा गया की अगले 15 दिन तक इसी से काम चलाओ. जिनके यहाँ शादियाँ है उन्हें ऐसे में नोट चाहिए। ३० लाख से क्या होगा ? यहाँ तो एक दिन में 10 लाख रुपये चाहिए शहरी शाखाओं में नकदी और निकासी दोनों होती है लेकिन ग्रामीण शाखाओं में सिर्फ निकासी होती है. नकदी की किल्लत की वजह से नोटेबंदी जैसे हालात फिर से उत्पन्न हो गए है.
अगर बैंक व्यवस्था पर नजर घुमाये तो बैंक अपना एनपीए छुपा रही है. भारतीय रिज़र्व बैंक ने बैंकों को साफ़ - साफ़ आदेश दिया कि वे अपनी कर्ज वाली सम्पत्तियों की गुणवत्ता का पूरा खुलासा करे लेकिन निजी बैंकों ने इसकी अनदेखी की और अपनी फंसी सम्पत्तियों को छुपाया । वित्त वर्ष 2015 - 16 की तीसरी और चौथी तिमाही के लिए केंद्रीय बैंक ने परिसम्पत्तियों की गुणवत्ता समीक्षा की तो पता चला की देश का बैंकिंग उद्योग अपनी करीब आधी से ज्यादा कर्जदार सम्पत्तियों को छिपा रहा है. ये छिपी सम्पत्तियाँ अब नज़र आने लगी है, कारण केंद्रीय बैंक के नियम है. उन्होंने फंसे हुए कर्जों को अनिवार्य रूप से बताने का निर्देश दिया है. विश्लेषकों के अनुसार बैंकों के आकड़े चौथी और तिमाही में होने के कारण अब अगले साल हे आ पाएंगे।  यह रवैया सिर्फ एक बैंक तक हे नहीं सीमित है।  2016 में एक्सिस बैंक का एनपीए 4.5 फीसद था [बैंक ने 1.7 बताया] जबकि आईसीआईसीआई बैंक का एनपीए 7 फीसद था जो उसके बताई संख्या 5 . 85 फीसद से ज्यादा था हालाँकि इन दोनों बैंकों ने रिपोर्ट जारी नहीं की है। यस बैंक ने एक बयान में कहा है कि वित्त वर्ष 2016 - 17 में बैंक के उपायों के बाद एनपीए में कमी आई है और इस साल 31 मार्च तक यह 1039.9 करोड़ रुपये रह गया।  इसमें से भी एक बड़े कर्जदार के 911. 5 करोड़ रुपये कइ ऋण शामिल हैं और जल्दी ही इसे वसूल कर लिया जायेगा। रिजर्व बैंक की समीक्षा के अनुसार फॅसे कर्ज की रकम 4,930 करोड़ है जबकि वास्तव में उसने 750 करोड़ रुपये ही बताये है।  उसका सीधा असर शेयरों पर दिखाई दिया, उनमे गिरावट आ गई।
अब बैंकों की व्यवस्था पर बात कर रहे है तो आपके पैन कार्ड भी अछूते नहीं हैं केंद्र सरकार हरेक स्थाई खाता संख्या की लोकेशनिंग कर रही है यानि आपका पैन किस जगह पर  सक्रिय है यह सरकार को देश के डिजिटल नक़्शे पर दिखाई देगा। ऐसा माना जा रहा है कि इससे सरकार को कर वसूली सम्बन्धी विभिन्न मसलों पर विश्लेषण करने में मदद मिलेगी और काला धन कहाँ पैदा हो रहा है यह पता लगा सकेगा ।
अब 1 जून से SBI नए नियम लागू कर चुकी है।  अब हर ट्रान्जेस्शन पर मोबाइल वॉलेट एप्प  से करने पर  25 रुपये टैक्स लगाएगी। सेविंग अकाउंट वालों को भी 8 मेट्रो सिटी को फ्री और 10 नॉन मेट्रो सिटी को।  इसी तरह 8 में से 5 एसबीआई के एटीएम इस्तेमाल कर सकते है और तीन अन्य किसी के एटीएम से।  नेट बैंकिंग में भी आपको कैश निकलने पर 1 लाख रुपये तक में 5 रुपये + सर्विस टैक्स लगेगा। 1 से 2 लाख रुपये में 15 रुपये + सर्विस टैक्स लगेगा।  2 से 5 लाख के बीच 25 रुपये + सर्विस टैक्स लगेगा।   

अभी सिर्फ SBI ने नए नियम लागू किये हैं ज्यादा समय नहीं जब अन्य बैंक भी नियम बनाने लगे।  आम आदमी पर बोझ बढ़ता ही जा रहा है। व्यवस्थाओं में सुधार जरूरी है क्योकि बैंकों की अव्यवस्था के चलते आम आदमी और आम जीवन दोनों ही प्रभावित होते जा रहे है। साफ़-साफ़ बोले तो बैंकों में पैसा रखो न रखो , बैंकों से पैसा निकालो न निकालो टैक्स चुकाना ही होगा यानी हर हाल में जेब कटनी ही है |