Tuesday, April 11, 2017

गाय , गंगा , गरीबी और राम मंदिर...तो ठीक मगर ठंडे चूल्हों पर ख़ामोशी ?
अख़बार के इस टुकड़े को संपादकीय कहकर पुकारा जाता है | इसके माथे पर कलम लिखा है | मै हर पखवारे इसे प्रणाम करता हूं , फिर अक्षरों को संजीदा शक्ल देकर आदमी के सामने लता हूँ , मगर कहीं कोई फुसफुसाहट नहीं होती | इसके बाद भी हर बार, लगातार लिखता जाता हूं | इस आशा में कि शायद लहूलुहान आदमी आदमियत की अदालत में हाज़िर होकर अपनी पेशाब करके सो जाने की समाजवादी आदत का माफीनामा दे देगा | ऐसा नहीं है की मैं (पत्रकार बिरादरी सहित) कोई पाक दामन हूं , खबरों के व्यापारी , शब्दों के सौदागर , सत्ता के चाटुकार , अश्लीलता के प्रचारक और दलाल जैसे न जाने कितने आरोप हैं | वह भी इसलिए कि मेरी सचबयानी उनके लिए किसी विस्फोट से कम नहीं | मैं क्या करूं जब गाय , गंगा और गरीबी के बाद राम मंदिर , तीन तलाक , सूर्य नमस्कार व नमाज़ जैसे भावनात्मक मुहावरे वोटों के गटर में डूबने-उतराने लगते हैं | कानून के नाम पर सरेआम धमकी और टेलीविजन के पर्दे पर महज एक ही जमात के चेहरे राजनीति के चमकते ध्रुवतारे चाणक्य को खम ठोंक कर झुठलाते दिखाई देते हैं | कहने को सरकार नई लेकिन चेहरे वही पुराने , जो कल के लुटेरों के अज़ीज़ थे | मैं क्या करूं जब झूठे आंकड़ों की लोरियां बेचैन कर देती हैं | वायदों की फेहरिस्त इतनी लंबी कि उसे पूरा करने कराने की हठ को मथने में थके और थुलथुलाए सरकारी कारिंदे वातानुकूलित कमरों में भी पसीना पसीना होते हुए भी सच को झूठ के कालीन के नीचे दबाने की फ़िराक में हलकान हैं | सच यह है कि ताजा ताजा गई ३१ मार्च तक उत्तर प्रदेश सरकार ५ लाख करोड़ से अधिक की कर्जदार है | अकेले किसानों की कर्जमाफी पर ९० हजार करोड़ लगभग का बोझ पड़ेगा , लैपटाप, मेट्रो व अगली तमाम योजनाओं के आलावा सातवां वेतन , पेंशन का भी खर्च सामने है | तिस पर केंद्र सरकार ने मदद के नाम पर अंगूठा दिखाना शुरू कर दिया | शायद यही वजह है कि सरकार शपथ लेने के १५ दिनों बाद भी अपनी पार्टी की विजय के जश्न के साथ झाड़ू लगाने , फोटो खिचाने और मुख़्तार अंसारी , अतीक अहमद की जेल बदली में अधिक दिलचस्पी दिखा रही है | जबकि जेलों की सुरक्षा का आइना फर्रुखाबाद जिला जेल में हुवा बंदियों का उपद्रव दिखा गया | १०९० के बाद एंटी रोमियो स्क्वायड की पुलिस टीम पूरी वफादारी के साथ युवाओं पर अपने हाथ साफ करने के साथ फोटो खिंचाने का खास खयाल रख रही है | गोश्त बंदी , शराब बंदी का हल्ला और योग पढ़ाने पर माथा पच्ची | उधर उपद्रवी, शोहदे , अपराधी , फसादी , आतंकी भी अपने सुर्ख़ियों में रहने से बाज नहीं आ रहे | हौसले का आलम ये कि बेजुबान जानवर की हत्या के साथ भाजपा विधायक के घर पर पत्थरबाजी व फसाद अलग, तिस पर तुर्रा ये कि उप्र में दंगे नहीं होने देंगे !
बेहद तकलीफ के साथ लिखना पड़ रहा है रोटी को पत्थर में बदलने से विकास नहीं हो सकता | गाय को गुड़ खिलाकर सूबे के लगभग २.५ करोड़ कुपोषित बच्चों और हर दूसरी एनीमिया ग्रस्त किशोरी को स्वस्थ नहीं किया जा सकता न ही हंगरइंडेक्स में दर्ज आंकड़ों को झुठलाया जा सकता है | भाजपा के नेता ही हल्ला मचाया करते थे कि देश में लाखों टन अनाज सड़ रहा है सरकार गरीबों में इसे बाँट क्यों नहीं देती , अब खुद पहल क्यों नहीं करती ? वह भी तब जब देश व प्रदेश में भाजपा की ही सरकारें हैं | इसके आलावा ‘मन की बात’ में प्रधानमन्त्री जूठन पर चिंता जताते हैं लेकिन सड़ रहे अनाज पर कोई बात क्यों नहीं करते ? और तो और अपवंचित बच्चों के लिए कहीं भी शेल्टर होम हैं न ही स्ट्रीट चिल्ड्रेन की चिंता , बल श्रम व प्राथमिक शिक्षा पर कोई पहल नहीं ? पीने के शुद्ध पानी के इंतजाम , संक्रामक रोगों के रोकथाम पर कोई बयान  नहीं ? राजधानी को साफ सुथरा रखने और गली-कूचों से कचरा उठाने में गजब का भ्रष्टाचार चीन तक की कंपनी को कचरा उठाने की दावत ऐसे में पूरे सूबे की हालत का अंदाज़ा लगाया जा सकता है | बिजली २४ घंटे देने का बयान हर दूसरे दिन  अख़बारों में छपता है मगर भीषण गर्मी में सूबे के ६५ जिलों में औसतन १२-१६ घंटे बिजली फरार रहती है ? महंगाई , रोजगार,किसान की बात पर मंथन के बाद काम होगा, लेकिन डराने धमकाने के पहले यह अच्छी तरह जान लें कि आदमी के घर में चूल्हा आज जलेगा ?

टीवी चैनल से लेकर हर अख़बार में , भाजपा के कद्दावर नेताओं की जुबान पर सिर्फ मिशन २०१९ और राम मंदिर सुर्खरू  हो रहे हैं ? हर कोई राम मंदिर बनाने की जल्दी में है कोई कानून बनाने की धमकी दे रहा है तो कोई अदालत की बात दोहरा रहा है | संत से लेकर नेता तक भूल गये की इसी लखनऊ में केन्द्रीय मंत्री मुख़्तार अब्बास नकवी ८ महिने पहले कह गये थे कि भाजपा के लिए राम मंदिर न कभी चुनावी मुद्दा था न है और न कभी रहेगा | फिर पहले चुनावों में बनाये गये मुद्दों और वायदों की जल्दी क्यों नहीं ? उससे भी बड़ी बात ‘सरकार बनती है बहुमत से और चलती आम सहमती से है’ जुम्ला याद  रखना होगा | बहरहाल प्रजातंत्र की परिभाषा वन्देमातरम् या भारत माता की जयघोष से बदलने का प्रयास बंद करके विकास की ओर मजबूत कदम बढ़ाने ही होंगे |                
ई वो मशीन है जिसका भरोसा.... !        - प्रियंका वरमा माहेश्वरी

चुनाव बीत चुका है और भाजपा की सरकार चार प्रदेशो में काबिज हो चुकी है। चुनाव में हार का सामना करने वाले नेताओं ने....मायावती, अखिलेश, केजरीवाल और हरीश रावत ने ईवीएम  को अब मुद्दा बना लिया है और इसमें छेड़छाड़ होने की संभावना व्यक्त की है। तकनीक और उससे जुड़ी समस्याओं को जब राजनीतिक प्रतिद्वंदिता से जोड़कर देखा जाता है तो समस्या सुलझने के बजाय उलझ जाती है। ईवीएम को संदेह के घेरे में खड़ा किया जा रहा है और उसकी विश्वसनीयता पर शक किया जा रहा है और माकूल जवाब मांगा जा रहा है। केजरीवाल ने तो दिल्ली में होने वाले एमसीडी चुनावों में ईवीएम की जगह बैलेट पेपर की मांग कर दी है। वहीं राज्यसभा में पूरे विपक्ष ने एक स्वर से आरोप लगाये और इसकी जाँच के लिए आयोग या समिति बनाने की मांग की , बसपा की मायावती ने उ.प्र . के चुनाव रद्द करने की मांग कर डाली तो कांग्रेस के गुलामनबी आजाद ने, जब भाजपा की ओर से पंजाब में कांग्रेस की जीत पर सवाल उछाला गया तो आजाद ने कहा की हम पंजाब में दोबारा चुनाव कराने को तैयार हैं आप उ.प्र. में दोबारा चुनाव कराएं | इसके अलावा मध्य प्रदेश में मशीन ट्रायल के समय मुख्य निर्वाचन अधिकारी द्वारा अलग अलग बटन दबाने के बाद भी वीवीपीएटी मशीन से केवल भाजपा के निशान कमल की पर्ची ही निकली जिसे कांग्रेस समेत कई दलों ने पर्याप्त सुबूत माना और आयोग में शिकायत दर्ज करा दी | इस पर आयोग ने भिंड निर्वाचन अधिकारी से रिपोर्ट मांगी है |
गौरतलब है कि चुनावों के दौरान ईवीएम में छेड़छाड़ के मामले पहले भी देखे जा चुके हैं वर्ष 2009 के आम चुनाव में बीजेपी के वरिष्ठ लालकृष्ण आडवानी ने ईवीएम पर संदेह प्रकट किया था और मतपत्रों की पुरानी व्यवस्था की मांग की थी। कुछ दिन पहले महाराष्ट्र नगरपालिका चुनाव में ईवीएम से छेड़छाड़ का मामला सामने आया था। नासिक, पुणे और यरवदा आदि निर्वाचन क्षेत्रों में भी ईवीएम से छेड़छाड़ की बात सामने आयी है और शिकायत भी दर्ज कराई गई है। अब सवाल उठता है कि टेपरिंग - प्रूफ कहलाने वाली ईवीएम में किसी प्रकार की छेड़छाड़ की संभावना हो सकती है क्या? ध्यान दे कि 2010 में अमेरिका के मिशिगन विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने दावा किया कि वो भारत की ईवीएम मशीनों को हैक कर सकते हैं। शोधकर्ताओं ने घर पर बनाई एक मशीन और मोबाइल फोन की मदद से ईवीएम में दर्ज नतीजों को बदलने की क्षमता का प्रदर्शन किया था लेकिन उस वक्त चुनाव आयुक्त टी एस कृष्णमूर्ति ने इस दावे को यह कह कर खारिज कर दिया कि भारत की ईवीएम मशीनों में इतने पुख्ता सुरक्षा प्रबंध किये गये हैं कि उनके साथ कोई छेड़छाड़ नही की जा सकती है। यही नही..अदालतों में भी यह आरोप साबित नही हुए और सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले को खारिज कर दिया था।
आज बीजेपी यूपी, उत्तराखंड, मणिपुर में हुई जीत से खुश है लेकिन अतीत में इसी ईवीएम के खिलाफ आंदोलन चला चुकी है। 2010 में बीजेपी नेता किरीट सोमैया और देवेन्द्र फड़नवीस ने "एंटी - ईवीएम" कहे गए आंदोलन में शिरकत की थी और जिसमें हैदराबाद के इंजीनियर हरी प्रसाद ने यह दिखाया था कि कैसे विभिन्न चरणों में ईवीएम में दर्ज नतीजों को हैक करके फेरबदल किया जा सकता है। और तो और भाजपा नेता जी वी एल नरसिम्हा राव ने एक किताब तक लिख डाली है – ‘ लोकतंत्र खतरे में : क्या हम अपने ईवीएम पर भरोसा कर सकते हैं ‘ |इस पुस्तक की प्रस्तावना में लालकृष्ण आडवाणी ने ईवीएम की भरपूर आलोचना की है | उनके अलावा कई बड़े भाजपा नेताओं ने भी आसमान सर पर उठा लिया था | इन बातों को मद्देनजर रखते हुए राजनीति और दलगत हितों से दूर रहकर सोचना होगा कि क्या वाकई में साइबर हैकिंग बड़ी समस्या है और वह लोकतंत्र में आम जनता की आस्था को डिगा सकती है ?
ईवीएम के सुरक्षा प्रबंधों को ध्यान में रखते हुए समय - समय पर इसमें बदलाव किये गये हैं। जैसे .. पहले एक ही तरह की ईवीएम मशीन होती थी उसमें दोबारा वोटों की गिनती नही हो सकती थी। फिर दूसरा प्रकार लाया गया जिसमें दूसरी बार वोटों की गिनती संभव थी। साइबर हैकिंग की समस्या को देखते हुए ईवीएम को एक फुलप्रूफ इंतजाम मानना भूल हो सकती है वो भी तब जब लोकतंत्र का सारा दारोमदार चुनावी व्यवस्था पर टिका हो लेकिन हम किसी पार्टी को शक के दायरे में नही ला सकते हैं क्योंकि जरूरी नही है कि हैकर पार्टी विशेष का समर्थक हो। इसलिए संदेह के बजाय इस मुद्दे को गंभीरतापूर्वक लेकर मिल बैठ कर विचार विमर्श करना चाहिये और इससे छुटकारा पाने का मजबूत विकल्प ढूंढना चाहिये।

इससे भी बड़ी बात है ईवीएम को और अधिक भरोसेमंद बनाने के लिए ईवीएम मशीन के साथ वोट का प्रिंट आउट यानी वीवीपीएटी तकनीक लागू करने का आदेश उच्चतम न्यायालय ने दिया जिसकी खानापूर्ति में कई जगह जिला प्रशासन ने उम्मीदवारों के सामने इसका प्रदर्शन भी किया लेकिन वह अधिकांश जगह नहीं लगाई गई | बताते हैं की इसमें भी खामियां हैं , कुल मिलाकर इसे महज विपक्ष का प्रलाप मानकर टालना न्यायसंगत नहीं होगा | मजे की बात है दुनिया के ब्रिटेन , जर्मनी , फ़्रांस , जापान , इटली , नीदरलैंड , सिंगापुर , डेनमार्क , आयरलैंड में ईवीएम का इस्तेमाल नहीं होता | कंम्प्यूटर विज्ञानियों के अलग – अलग मत हैं अधिकतर मानते हैं कि भारतीय मशीनों में आसानी से बदलाव किया जा सकता है | यहाँ बताते चलें कि ईवीएम मशीन का निर्माण इलेक्ट्रॉनिक्स कारपोरेशन ऑफ़ इंडिया ( परमाणु ऊर्जा विभाग का एक उद्यम ) व भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड ( रक्षा विभाग के अधीन ) करते हैं और इसमें इस्तेमाल होने वाली चिप का साफ्टवेयर भी यहीं विकसित किया जाता है ऐसे में इनकी विश्वसनियता पर संदेह करना उचित नहीं होगा | हालांकि कई सियासी दल अदालत की शरण में चले गये हैं सो फैसले का इंतजार लाजिमी है |
चुनव आयोग ने हर बार ईवीएम की सुरक्षा को लेकर साफ – साफ कहा है की यह पूर्णतय: भरोसेमंद है | बावजूद इसके लोगों का विश्वास डिगता दिख रहा है , सोशल मिडिया पर नकारात्मक प्रचार भी भ्रम फैला रहा है और कई तरह के वीडियो भी मतदाताओं का भरोसा तोड़ने में कामयाब हो रहे हैं | इस बीच चुनाव आयोग के पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एस वाई कुरैशी का बयान आया है , ‘ चुनाव प्रणाली में लोगों का विश्वास और भरोसा सर्वोपरि है | ईवीएम के नाम पर इसे खंडित करने की अनुमति किसी को नहीं दी जानी चाहिए | ‘ बेशक यही बात लोग और मीडिया भी कह रहे हैं , इसे यह कह कर हवा में नहीं उड़ाया जा सकता कि कांग्रेस जीती थी या सपा , बसपा जीती थी तब ईवीएम ठीक थी और अब भाजपा जीती तो घालमेल हो गया | भाजपा के मुखिया से लेकर प्रधानमन्त्री तक पारदर्शिता और ईमानदारी के प्रति प्रतिबद्ध हैं तो परम्परा के प्रमाण- पत्र की अवश्यकता क्यों ? उससे भी अहम बात है कि भाजपा चुनाव सुधार की प्रबल हिमायती है और उसने इस ओर कदम भी बढ़ाया है उसे ईवीएम पर खुली बहस करानी चाहिए और विरोध में उठ रहे सवालों के जवाब में जाँच बिठा देनी चाहिए | कुछ ऐसा ही कर्नाटक की सूचना एवं प्रौद्योगिकी मंत्री प्रियंका खड्गे ने ट्विटर पर सुझाया है,’ईवीएम के साथ छेड़  छाड़ को लेकर अटकलों का बाज़ार गरम है इसलिए निर्वाचन आयोग को बेंगलूरू के स्टार्टअप को यह इजाजत देनी चाहिए कि वे ईवीएम के साथ छेड़छाड़ का प्रयास करके यह जांचे कि यह संभव है या नहीं |’ इससे इतर सरकार को और चुनाव आयोग को आधार कार्ड से मतदान कराने पर सोंचना चाहिए  |यहाँ ये बताना भी प्रासंगिक होगा कि हाल ही में विश्व बैंक के मुख्य अर्थशास्त्री पॉल रोमोर ने भी आधार योजना की तारीफ करते हुए इसे ‘ दुनिया की सबसे बेहतर पहचान-पत्र योजना ‘ बताया है |  

सरकारी आंकड़े बताते हैं की देश में आधार कार्ड की संख्या सौ करोड़ पार कर चुकी है और बैंक से लेकर आयकर , गैस , मातृत्व लाभ योजना , आंगनवाड़ी सहित सभी योजनाओं में आधार जरूरी कर दिया गया है तो इसी आधार को मतदान में क्यों नहीं इस्तेमाल किया जा सकता ? सबसे बड़ी बात है कि आदमी की पहली और अहम जरूरत  पैसा है जिसे बैंकों से निकालने के लिए एटीएम कार्ड और कैशलेश के लिए ऑनलाईन इंतजाम तो आधार से ऑनलाईन मतदान क्यों नहीं ? इसमें मतदाता की अँगुलियों के निशान जब तक मेल नहीं खाएंगे तब तक मतदान हो ही नहीं सकेगा और हैकिंग का कोई खतरा भी नहीं होगा | इस पर बहस होनी चाहिए | 

Thursday, March 10, 2016

सेहत बिगाड़ता यौन ‘ब्रेकफास्ट’....!

लखनऊ। यौनाचार और यौन पवित्रता पर बात करना भारतीय समाज अश्लीलता मानता आया है। आज जब यौन उदारता का माहौल टेलीविजन/सिनेमा के पर्दे से लेकर सार्वजनिक क्षेत्रों में दिखने लगा है, तब इससे जुड़ा बाजार खड़ा होना स्वाभाविक है। इसके साथ ही यौन सेहत के प्रति चिंतित होना भी लाजिमी है। यहीं मातृत्व के प्रति भयमिश्रित गंभीरता के साथ ‘नारी पवित्रता’ की सोंच का डर भी वाजिब है।
    विश्व स्वास्थ्य संगठन, यूनिसेफ, एआईटीआई, आईकोग-2016 समेत कई संस्थाओं की रिपोर्ट बताती हैं कि यौन समस्याओं को लेकर भारतीय बेहद चिंतित है। इसकी पुष्टि स्मार्टफोन के एप ‘लिबरेट’ के विशेषज्ञों ने एक साल में की गई 5 करोड़ बातचीत के आधार पर की है। इन रिपोर्टाें के अनुसार देश के चार महानगरों व बेंगलुरू में औसतन 32 फीसदी लोग यौन समस्याओं से पीडि़त हैं। इनमें 48 फीसदी पुरूष व 43 फीसदी महिलाएं हैं। 30 फीसदी विवाहित जोड़े अपने यौन संबंधों को लेकर असंतुष्ट हैं। इनमें 15 फीसदी से अधिक यौन संक्रमित हैं। 35 फीसदी पुरूष यौन इच्छा व शुक्राणुओं के उत्पादन में कमी से पीडि़त हैं। 40 फीसदी महिलाओं को प्राकृतिक रूप से गर्भधारण करने में दिक्कतें आ रही हैं। 59 फीसदी महिलाएं खून की कमी का शिकार हैं। 40 फीसदी से अधिक महिलाएं योनि संक्रमण से ग्रस्त हैं। यही वजह है गुप्तरोग विशेषज्ञों, शफाखानों व दवा बाजार के बेतहाशा बढ़ने के और इसका एक कारण खुला यौनाचार भी बताया जाता है।
    टेलीविजन के पर्दे पर गर्भनिरोधक गोलियों, क्रीम व कंडोम के विज्ञापनों ने युवतियों को जहां बरगलाया है, वहीं यौन संबंधों को लेकर खुला विद्रोह करने वाले ‘कैंडल मार्च’ के साथ उच्च मध्यम वर्गीय समाज में ‘गर्ल फ्रेंड, ब्यायफ्रेंड’ व अपने शहर/कस्बे/गांव से दूर बड़े काॅलेजों में पढ़ने जाने के ‘स्टेटस’ ने भी काफी हद तक औरत की ‘पवित्रता’ को नष्ट किया है। इसके मातृत्व को संकट में डाला है। भले ही नारीवादी संगठन इस रोक-टोक को पुरूषवादी सोंच कहकर हल्ला मचायें। हालात यहां तक हैं कि युवतियां  विवाह पूर्व यौनाचार गुनाह नहीं ‘ब्रेकफास्ट इंज्वाय’ मानती हैं। इसके साथ ही विवाह की पवित्रता का भय उन्हें ‘कौमार्य’ बरकरार रखने के लिए बाध्य करता है। इसके लिए वे सर्जरी का सहारा ले रहीं हैं, जो महज 20-25 मिनट में निपट जाती है। आॅपरेशन के बाद कौमार्य पूर्ववत हो जाता है। इसे शादीशुदा महिलाओं में भी देखा जाने लगा है। इतना ही नहीं हाल ही में एचआइवी संक्रमण से बचने के नाम पर एक सुपर कंडोम इजाद किया गया है।
    जानकारी के मुताबिक टेक्सास के ए एण्ड एम यूनिवर्सिटी की प्रोफेसर महुआ चैधरी और उनकी टीम ने इस नाॅन-लैटेक्स कंडोम का विकास किया है। इस कंडोम को इलास्टिक पोलिमर से बनाया गया है जिसे हाइड्रोजेल कहा जाता है। इसमें पौधों से लिए गए एंडीआॅक्सिडेंट को शामिल किया गया है। इस एंटीआॅक्सिडंेट में एचआईवी से लड़ने का विशेष गुण होता है, जो कंडोम फट जाने पर भी एचआईवी वायरस को मार देता है। यह केवल कंडोम नहीं है बल्कि एचआईवी संक्रमण के रोकथाम की दिशा में एक क्रांति साबित हो सकता है।
    यहां बताते चलें कि पुरूष/महिला कंडोम, गर्भ निरोधक गोलियां, लैटेक्स कैप्स, इंजेक्शन, आइयूएस, आइयूडी जैसे उत्पाद पहले से ही चलन में हैं, जो गर्भधारण करने की रोकथाम में सक्षम हैं। बावजूद इसके 25-29 वर्षीय युवतियों के गर्भधारण करने का औसत 47 फीसदी शहरों में व 43 फीसदी गांवों में है। वहीं 20-24 वर्षीय युवतियों में 53 फीसदी के आस-पास है। यह आंकड़े सामान्य जन्म दर (जीएफआर) पर आधारित हैं। जबकि आये दिन गर्भपात से लेकर कचरों तक में भू्रण से लेकर नवजात बच्चों तक के पाये जाने की खबरें आती रहती हैं।
    सूबे में मातृत्व सप्ताह के दौरान करीब 14 लाख गर्भवती महिलाओं में एक लाख हाई रिस्क गर्भवती महिलाएं मिली हैं, इनका सुरक्षित प्रसव कराना भी बड़ी चुनौती है। इसी तरह हाल ही में 25 साल से 35 साल की शादी शुदा महिलाओं के बीच कई शहरों में किए गए एक सर्वे में यह बात सामने आई है कि 93 प्रतिशत महिलाएं सबसे अच्छी, निजी साफ सफाई के तरीके नहीं अपनाती हैं। सर्वे में शामिल हर दूसरी महिला निजी साफ सफाई और उससे जुड़ी दिक्कतों की जानकारी अपने पति से साझा नहीं करतीं। इनमें ज्यादतर इन परेशानियों से निजात पाने के लिए इंटरनेट का सहारा लेती है।
    सर्वे में दिल्ली, मुंबई और बेंगलुरू से शामिल हुई लगभग 1500 महिलाओं में से 40 प्रतिशत योनि संक्रमण से ग्रस्त थीं पर इनमें से 60 प्रतिशत को लगता है कि इसके लिए मेडिकल चेक-अप की कोई जरूरत नहीं है। सर्वे में भाग लेने वाली मुबंई की 90 प्रतिशत महिलाओं ने बताया कि उनकी रोज की जिंदगी योनि संबंधित दिक्कतें, जैसे- सूखापन और जलन से बुरी तरह प्रभावित है। जवाब देने वाली हर चैथी महिला ने बताया कि इस दिक्कत की वजह से उन्हें बहुत परेशानियों का सामना करना पड़ाता है।
    10 में से चार का वजेंटिस नाम की बीमारी की से भी पाला पड़ा है। इस बीमारी में योनि में बहुत तेज जलन होती है। ऐसे मामले मुंबई में सबसे ज्यादा 44 प्रतिशत, फिर दिल्ली में 42 प्रतिशत और बेंगलुरु में 36 प्रतिशत हैं। बड़े शहरों में रहने वाली 25 प्रतिशत महिलाएं असामान्य प्रवाह की समस्या से ग्रस्त हैं। ऐसा इनके साथ महीने में एक बार होता है।
दैहिक आनंद या शोषण!
मुंबई। फिल्मी सितारों में लिव-इन-रिलेशन आम चलन है। रोज किसी न किसी सितारे का किस्सा अखबारों की सुर्खियां पाता है। अभी हाल ही में कंगना-हिृतिक को लेकर काफी हंगामा मचा था, तब कंगना ने ‘सिली एक्स पार्टनर’ पर खूब तंज कसे।
    सलमान खान के साथ रोज किसी न किसी अभिनेत्री का चटखारेदार किस्सा सोशल मीडिया पर रहता है। विराट कोहली-अनुष्का शर्मा, रणवीर कपूर-कैटरीना कैफ/दीपिका पादुकोण, विपाशा बसु-जाॅन अब्राहम/डीनो मारियो, जैकलीन फर्नाडीस-साजिद के ताजा ब्रेकअप की खबरों के साथ कछ पुराने पन्ने पलट लेते हैं, जिनमें बाकायद बलात्कार के मुकदमे लिखाये गये।
    ताजा मामला प्रीति जिन्टा और नेस वाडिया का है, जिसमें प्रीति ने पुलिस में यौन हिंसा की शिकायत दर्ज कराई थी। सर्वाधिक हल्ला-गुल्ला तब मचा था जब टीवी एंकर/अभिनेत्री/माॅडल प्रीति जैने ने निर्माता-निर्देशक मधुकर भंडारकर पर बलात्कार की शिकायत पुलिस में दर्ज कराई थी। इसके अलावा छेड़छाड़ और दैहिक सुख की मांग के आरोप तो सोनाली बेन्द्रे, ममता कुलकर्णी, सुष्मिता सेन, मनीषा कोइराला, महिमा चैधरी, युक्तामुखी सहित पाॅप गायिक अलीशा चिनाय तक ने लगाये थे। गायक अंकित तिवारी के खिलाफ भी बलात्कार की शिकायत पुलिस में दर्ज है। और तो और सोनू निगम जैसे गायक ने अपने यौन शोषण  के प्रयास का स्वयं खुलासा किया था। फिल्मी दुनिया में दैहिक आनंद और शोषण के किस्से आम हैं।
एजेन्ट आॅफ इश्क
अभी-अभी गुजरे ‘वेलेंटाइन डे’ के दिन मुंबई के रूइया काॅलेज में ‘एजेन्ट आॅफ इश्क’ वीडियों को युवाओं ने मजे लेकर देखा। यह वीडियो मंुबई के पारोदेवी पिक्चर्स का है, इसमें काम-कला-शिक्षा पर डिजिटल दृश्य हैं। मशहूर ‘कंडोम मुन्ना’ का गाना भी है। चुंबन, अंतरंग संबंधों से लेकर सेक्स की तमाम बारीकियों पर चर्चा की गई है। यह ट्विटर पर भी चर्चित रहा है। हालांकि इसे ‘रोज डे’ का वीडियों कहा गया। इस वीडियों की निर्मात पारोदेवी के मुताबिक, ‘यह एक नार्मल सेक्स के बारे शिक्षित करने का प्रयास भर है।’
हाॅट एण्ड सेक्सी
आज युवतियां सेक्सी या क्यूट कम्पटीशन में भाग लेने के साथ-साथ शादी-विवाह के बाजार में ‘परफैक्ट वेडिंग मैटीरियल’ की तरह पेश की जा रही हैं। उनमें कपड़े, जेवरात, फैशन, मेकअप के साथ हाॅट एण्ड सेक्सी के लेबल के प्रति ललक पैदा की जा रही है। इसमें सबसे गरम भूमिका सोशल मीडिया निभा रहा है।
रोमांस को तरसते शादीशुदा
लखनऊ। देश में एक-चैथाई शादीशुदा दंपति एकांत में वक्त गुजारने को तरस रहे हैं। परिवार में इनके पास अपना अलग कमरा तक नहीं है। दूरदराज की बात तो छोडि़ये। लखनऊ में ही 20 फीसदी दंपति ऐसे हैं जिसके पास अपना अलग कमरा नहीं है। आवासीय स्थिति तथा सुख-सुविधाआंे के बारे में नेशनल सेम्पल सर्वे आर्गनाइजेशन यानी एनएसएसओ की रिपोर्ट के मुताबिक शहरी और ग्रामीण क्षेत्र में 75 फीसदी शादीशुदा दंपतियों के पास ही अपना कमरा है। रिपोर्ट के मुताबिक दंपतियों के लिए अलग कमरे की उपलब्धता परिवार के जीवन स्तर में बढ़ोतरी से जुड़ी हुई है।

गंगा-स्नान के नाम पर रेल में वसूली?

इलाहाबाद। माघ मेला में जाने वाले श्रद्धालुओं की जेब हर कदम पर कटती है। इसके अलावा हर यात्री जो रेल से इलाहाबाद से कहीं भी जाने की यात्रा करते हैं, उन्हें मेलाकर देना होता है। यह मेलाकर साधारण (जनरल) टिकट पर दस रुपये, स्लीपर श्रेणी पर पांच रुपया और वातानुकूलित श्रेणी पर पन्द्रह रूपया वसूल किया जाता है। यह वसूली 14 जनवरी से मेला समाप्ति (एक महिने से अधिक) तक जारी रहती है। गौरतलब है मेला क्षेत्र में हर वस्तु का पैसा श्रद्धालुओं को देना होता है। तम्बूघर में रहने, पीने के पानी, बिजली, शौचालय से लेकर नहाने तक हर जगह पैसा देना होता है। जबकि उप्र सरकार की ओर से माघ मेला का अलग से बजट होता है, जो इस वर्ष 28 करोड़ का है।
    रेलवे द्वारा मेलाकर वसूली को 14 जनवरी से टिकट के साथ जोड़ लिया जाता है। यदि आपने 14 जनवरी से 12 फरवरी (माघ पूर्णिमा) तक के लिए 12-13 जनवरी या इससे पहले किसी श्रेणी में आरक्षण करा रक्खा है, तो टीसी टिकट चेक करते समय आरक्षण चार्ट में आपके नाम के आगे मेलाकर लिखी रकम की वसूली करता है। इसकी बाकायदा रसीद दी जाती है। इसके लिए पिछले बरस तक एसएमएस तक किये जाते रहे हैं, ऐसा त्रिवेणी एक्सप्रेस के एसी कोच के टीसी ने नाम न छापने की शर्त पर प्रियंका संवाददाता को स्वयं बताया। उसने यात्रियों से अधिक अपनी परेशानी बयान की, ‘यात्रियों से पांच/पन्द्रह रूपये मांगने पर पहले तो कई तरह के सवालों का सामना करते हुए झिकझिक करनी पड़ती है। कई लोग तो झगड़ पड़ते हैं। जब पैसे देते हैं तो कोई पांच सौ रू0 का नोट देता है, तो कोई हजार का या सौ रूपये का, ऐसे में बाकी पैसे लौटाना टेढ़ी खीर साबित होता है।’
    सवाल यह है कि मेलाकर के नाम पर रेल यात्रियों से हो रही करोड़ों की वसूली का औचित्य क्या है? या गंगा स्नान करने वालों के नाम पर यह कर वसूला जा रहा है? इसे कहां और विकास के किस मद में खर्च किया जा रहा हैं? क्या यह रकम उप्र सरकार को रेल मंत्रालय अनुदान के रूप में देता है? या इससे इलाहाबाद रेलवे स्टेशन पर कोई सुविधाएं बढ़ाई जा रही हैं? हालांकि इनमें से एक का भी जवाब तलाशा जाये तो शायद ही कोई सकारात्मक उत्तर मिले। इलाहाबाद रेलवे स्टेशन पर प्लेटफार्म की कमी के कारण तमाम गाडि़यां घंटों देरी से आती-जाती हैं। रेलों के जनरल/स्लीपर कोचों में बिजली, पानी, शौचालय का अधिकतर अभाव रहता है। गंदे व टूटे शौचालय आम है। पीने के पानी का तो सवाल ही नहीं पैदा होता, हाथ धोना भी मुश्किल होता है। लंबे सफर के यात्रियों को खाने के लिए बड़ी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है।
    गुणवत्ता तो खराब है ही, उसकी शिकायत भी सुनने वाला कोई नहीं। जबकि लगभग 12 लाख यात्री रेलवे स्टेशनों व गाडि़यों में खाना खरीद कर खाते हैं। पंखे खराब तो एसी फेल या ब्लोअर काम नहीं कर रहा। उस पर लेट लतीफी का उबाऊ ठहराव, जो लूट के खास दावतनामे होते हैं। चलती ट्रेनों में बदमाश और पुलिस दोनों ही यात्रियों को लूटते हैं। महिला यात्रियांे के लिए तो सुरक्षा के नाम पर खुली शोहदई देखी जा सकती है। 31 दिसम्बर 2015 तक अकेले लखनऊ मण्डल में छेड़छाड़ के पांच व बलात्कार के दो मामले दर्ज किये गये हैं। सूत्रों की माने तो कई बार महिलाएं शिकायत दर्ज कराने से पीछे हट जाती हैं।
    रेल के एसी किराये में पहले ही बढ़ोत्तरी हो चुकी है। पिछले साल नवंबर से स्वच्छ भारत उपकर के नाम पर 0.5 फीसदी का उपकार भी यात्रियों पर थोप दिया गया है। इसी तरह आरक्षित टिकटों की वापसी पर दोगुना शुल्क लगाया गया है। टेªन के छूटने  के चार घंटे पहले तक ही यह सुविधा है।
    गौरतलब है रेलवे हर साल 900 करोड़ टिकट बेचता है जिनमें 25 फीसदी रदद होते हैं। ऐसे ही तत्काल टिकटों पर 33 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी कर दी है। आरक्षित कागज के टिकट पर 40 रू0 अधिक वसूलने की तैयारी है। इसी दौरान आधे टिकट (बच्चों के लिए) की यात्रा खत्म कर दी गयी। बावजूद इसके रेलवे दावा करता है कि रेलयात्रा 1 किलो दाल या 1 किलो सेब से सस्ती है। उसने इसका बाकायदा एक चार्ट भी पिछले दिनों जारी किया है। इसके अलावा रेलमंत्री चीन बार्डर तक रेल ले जाने, तो प्रधानमंत्री जापान से उधारी के बूते बुलेट ट्रेन मुंबई से अहमदाबाद तक चलाने पर वाजिद है। जबकि बुनियादी सुविधाओं का रेल ढांचा लगातार चरमरा रहा है।
    सरकार के पास योजनाएं। घोषणाएं बहुतेरी हैं और इन्हीं के पीछे रेलवे के तमाम हिस्सों को निजी काॅरपोरेट कंपनियों को सौंपने की तैयारी भी है। हालांकि एक भी योजना या घोषणा परवान चढ़ती नहीं दिखती। होली के हल्ले और गरमी के थपेड़ों को झेलने के लिए हर साल योजनाएं बनती हैं, घोषणांए होती हैं, इस साल भी बैठकें जारी हैं, लेकिन रेलवे सिर्फ और सिर्फ फेल होता आया है। और तो और हर रविवार लखनऊ रेलवे स्टेशन का भीड़ भरा नजारा और नर्वस रेलकर्मियांे का चेहरा देखने लायक होता है। सच यह है कि रेलवे मुफ्तखोरों का मुलायम निवाला बनकर रह गया है।

ये हैं नये ‘गब्बर’...?

लखनऊ। इंसाफ बेहद महंगा और अराजक हो गया है? यह महज सवाल भर नहीं है; बल्कि गम्भीरता से इस पर बहस होनी चाहिए। हर कोई अपने लिए विशेष सुविधा चाहता है। अपनी बात मनवाना चाहता है। अपने को सर्वोपरि या वीआईपी जनवाना चाहता है। उसके लिए हिंसा का सहारा लेना कहां तक जायज है? फिर सवाल दर सवाल? इसलिए, इंसाफ के देवता जब मामूली गुंडों की तरह नंगी सड़क पर हथियार लेकर आम लोगों को मारे-पीटें, उनको देखकर बच्चे, महिलाएं रोने-चीखने लगें, बीमार लोग उनकी दहशत में एम्बुलेंस के भीतर अपनी जान गंवा दें या अस्पताल तक पहुंचते-पहुंचते मौत के मुंह में समा जायें और पुलिस महज तमाशबीन रहे तो भी सवाल करन का हक किसी को नहीं है?
    पिछले महीने नाका में वकील श्रवण कुमार की हत्या को लेकर वकील समुदाय ने जो तांडव किया उसमंे दो जिन्दा इंसानों की मौत हो गई, पचासों लोग घायल हुए, पत्रकारों की पिटाई के साथ उनके उपकरण तोड़ दिये गये। पुलिसवाले घायल हुए। सैकड़ों वाहन तोड़े व फूंके गये। बच्चे, बुजुर्ग व युवतियों के रोने-चीखने पर खदेड़ दिया गया। वकील साहबान सरेआम डंडा, लोहे के सरिया और पिस्तौल लहराते तोड़-फोड़ करते टीवी पर दिखाये गये, अखबारों में छापे गये। सारा माहौल सहम गया। लखनऊ कराह उठा। कानून गूंगा हो गया, इतना तांडव फिर फिर भी सवाल पूछा गया, किसके आदेश से पुलिस न्यायाय परिसर में घुसी, आंसू गैस के गोले छोड़े और लाठी चार्ज कियाा? पुलिस किसलिये हैं? पुलिस की चेतावनी कोई मानेगा नहीं और पढ़े-लिखे वकील साहबान खुली सड़क पर सरकरी गैर सरकारी संपत्ति की फूंकते रहेंगे, बच्चों, महिलाओं, बुजुर्गाें और नागरिकों की हत्या पर अमादा रहेंगे? फिर भी कोई आवाज नहीं उठे, कोई सुरक्षात्मक लाठी नहीं उठे? वकीलों द्वारा की गई हिंसा महज अपराध है? उससे भी बड़ी बात, यह कोई पहली घटना नहीं है। इससे पहले वकीलों ने व्यापारी नेता बनवारी लाल कंछल को पीटते-पीटते सड़क पर उन्हें नंगा कर दिया? पिछले बरस अपने साथी वकील निखलेन्द्र की हत्या को लेकर वकील समुदाय ने हिंसक तांडव में लखनऊ को खासा नुकसान पहुंचाया? इलाहाबाद में दरोगा शैलेन्द्र की वकीलों द्वारा पिटाई के दौरान दरोगा द्वारा बचाव में चलाई गोली से एक वकील नवी अहमद की मौत के बाद भीषण उपद्रव हुआ, ऐसा ही जेएनयू अध्यक्ष कन्हैया की पिटाई के दौरान वकीलों ने दिल्ली में किया। इसके साथ ही कार्य बहिष्कार/हड़ताल का भयादोहन (ब्लैकमेल) अलग से किया गया? इससे पहले की तमाम हिंसात्मक घटनाओं में तहसील बदले जाने के समय वकीलों द्वारा हिंसक वारदातें की गईं। इन मामलों में क्या कदम उठाये गये और जो उठाये गये उनसे क्या वकीलों के आचरण मंे सुधार आया?
    यहां बताते चलें कि छः साल पहले उच्च न्यायालय ने उच्चतम न्यायालय के सेवानिवृत न्यायाधीश की अध्यक्षता में एक जांच कमेटी का गठन किया था। इसके अलावा सीबीआई जांच सहित अन्य जांच एजेंसियों को वकीलों के कारनामों की जांच के लिए छूट दी थी। उसी दौरान 11 मुकदमें सीबीआई को सौंपे गये थे। इन छः सालों में 60 वकीलों के खिलाफ मुकदमें दर्ज हुए, उनमें एक में भी अब तक कोई फैसलाकुन कार्रवाई नहीं हुई? यह देरी हौसला बढ़ाने में सहायक होती रही है। कई बार पुलिस खुद पिट चुकी है और उनको सियासी दबावों के चलते पिटते रहने को मजबूर होना पड़ा। पत्रकारों को दसियों बार वकीलों की पिटाई का सामना करना पड़ा, दिल्ली में जेएनयू मामले में वकीलों द्वारा पिटे पत्रकारों ने अपने साथियों के साथ बाकायदा मोर्चा निकाला। लखनऊ में भी पत्रकारों ने विरोध जताया।
    ‘ऐसा लगता है कि जिला न्यायालय परिसर में कानून-व्यवसथा की स्थिति दिनों-दिन बदतर होती जा रही है। ऐसे में मामले की जांच केन्द्रीय एजेंसी से कराने के अलावा कोई विकल्प शेष नहीं है- हाईकोर्ट।’ यह टिप्पणी तब की गई थी, जब 243 वकीलों (लखनऊ जिला कचेहरी) के खिलाफ 330 मुकदमें दर्ज थे, 5 हत्या व 3 अपहरण के, 53 जमीन हथियाने के और 75 हिंसक घटनाओं के थे। इनमें क्या हुआ? इस बार भी वकीलों द्वारा की गई हिंसा के बाद उच्चन्यायालय के हस्तक्षेप के बाद ही वकीलों ने हड़ताल वापस ली।
    मजे की बात है विधानसभा के भीतर और प्रेस के सामने हलक फाड़कर समूचा विपक्ष कानून-व्यवस्था को लेकर हंगामा करता है, सपा सरकार को नाकरा बताते नहीं थकता। वही विपक्ष वकीलों द्वारा की जाने वाली गुंडई पर खानापूरी भर करता रहता है? और देखिये वकीलों का तर्क कि देश में 19 लाख वकील हैं जिनसे सबसे अधिक राजस्व प्राप्त होता है फिर भी उन्हें कोई सुविधा नहीं? शायद सियासी दल इन वोटों के लालच में ‘हिंसा’ को जायज मानते हैं? अगर ऐसा है तो बाकी का 86 करोड़ वोटर क्या इन मुट्ठी भर वकीलों को ‘नया गब्बर’ मानकर डरा-सहमा रहे?