Sunday, February 6, 2011

लखनऊवों की इबादत है, लखनऊ

लखनऊ से मुझे बेइंतहा प्यार है। इसलिए नहीं कि लखनऊ मेरी मातृभूमि है, कर्मभूमि है, द्दर्मभूमि है। दरअसल लखनऊ के मिजाज में शिष्टता, संस्कार और साहित्य इस कदर रचे बसे हैं कि यहां की जमीन पर पांव धरते ही अजनबी भी आप...आदाब का दामन थाम लेता है। यहां तक शराब के नशे में झूमता हुआ आदमी भी आपसे महज टकरा जाने भर से बोल उठता है, गुस्ताखी माफ हो...!’ गोया लखनऊ बेअदब भी है तो चांदी के शफ्फ़ाफ वर्क में लिपटा हुआ। आज भी जब ‘काले अंग्रेजों’ की ‘कई सितरा’ संस्कृति की नंगई ताजा बनी सड़कों पर उछलती फिर रही है, ‘प्लीज.. अपनी गाड़ी आगे लीजिए या साॅरी.. मैं देख नहीं सका’ जैसे जुम्ले आमतौर पर सुनने को मिल जाते है।
    लखनऊ का ‘ट्रैफिक’ भी यहां की सुबह के नाश्ते में मशहूर जलेबी, कचैरी की तरह गड्ड-मड्ड, मीठा-नमकीन लगता है। आप शहर में लगने वाले ‘जाम’ से जितना निकलना चाहेंगे उतना ही जलेबी की तरह फंसते जाएंगे और किसी दिलजले या झुंझलाए हुए सिपाही के अलंकार से नवाजे जाने के बाद कचैरी की नमकीनियत का स्वाद भी मिलेगा। गो कि लखनऊ की रूह में आप जी.. जनाब बसे हैं, बसे रहेंगे। इनसे आपकी मुलाकात न दिल्ली मंे होगी, न मुंबई में होगी।
    बिरयानी से लेकर तहरी तक, पूरी से लेकर रूमाली रोटी तक, सालन से लेकर तरकारी तक, अलीगंज के बजरंगबली से लेकर चैक से आगे रूमी गेट तक सब लखनऊवा है। जी हां! अमीनाबाद वाले हनुमान मंदिर से निकलते पंडित जी का परसाद बांटना और मोहल्ले की मजिस्जदों से निकलते नमाजियों का बाहर खड़े व माओं की गोद में लिपटे बच्चों पर फूंक डालना भी लखनऊवा ही रहा है। यहां न कोई हिन्दू है, न मुसलमान। शाहमीना शाह, खम्मनपीर बाबा की दरगाह में जुड़ने वाली भीड़ के चेहरों से हिन्दू-मुसलमान छांटना मुमकिन नहीं, तो गली-मुहल्लों में ज्योतिषियों व गंडा-तावीज वाले मौलवियों के यहां जुटनेवाली भीड़ में आसानी से फिरकों की तलाश नहीं की जा सकती।
    बेशक लखनऊ बदल रहा है। नये हुक्मरानों की सोंच लखनऊ की छाती पर पसर रही है, बावजूद इसके समूचे लखनऊ का आसमान गवाह है कि आद्दे-अधूरे कपड़ों में खिलखिलाती युवतियां भी हजरतगंज के हनुमान जी को भले ही ‘हाय हनु’ कहें, लेकिन मंदिर में जाते ही दुपट्टे के अभाव में सिर पर रूमाल रखकर अपने भगवान जी या हनु को प्रणाम ही नहीं करतीं बल्कि मन्नतें भी मांग लेती हैं। इसी तरह ‘कान्वेंट’ शिक्षित भी नमाज की शफ (लाइन) में अल्लाह के आगे सिजदा करता दिखेगा। यह सबका सब लखनऊवा है।
    लखनऊ हमेशा से दुनिया के मानचित्र में पर्यटन, नवाबियत और उत्सवधार्मिता के लिए दर्ज रहा है। यहां के इमामबाड़े, मंदिर, बाजार, पहनावा, मेले, लंगर, नवरात्र, मुहर्रम सबकी अपनी अलग पहचान और शान है। टी.वी., इंटरनेट के जमाने में भी रामलीलाओं का जलवा बरकरार है। कव्वालियों और कवि सम्मेलनों का रूतबा आज भी कायम है।
    चुनांचे लखनऊ की नवाबियत और शायराना तबीयत के साथ चैक में बैठी बड़ी काली माता जी के साथ हजरतगंज में शहानजफ का इमामबाड़ा मौजूद है, तो विधानसभा मार्ग पर सरकारी कामकाज के लिए सचिवालय की इमारत बुलंद है। इसके अलावा कई ऐशगाहों से अलग गोमती किनारे की ठंडी सड़क को हजरतगंज कहा जाता है। हाल ही में इसका कायाकल्पा हो गया है। सो साफगोई से कहूं तो लखनऊ लखनऊवों की इबादत है।

मनोरंजन की प्रयोगशाला में... ‘कुंती’?

लखनऊ। बुद्धू बक्से को बुद्धिमान हुए अरसा हो गया। अब उसे अभिमान भी हो गया है। टेलीविजन इस कदर प्रभावमान है कि उसकी ओर टकटकी लगाए देखते दर्शक बकायदा उससे प्रेरणां और प्रशिक्षण पा रहे हैं। जिसके चलते बाजार भी उत्साहित होकर उछालें भर रहा है। इसके विभिन्न चैनलों पर दिखाए जाने वाले धारावाहिकों में मनोरंजन से अधिक हिंसा, षड़यंत्र और अश्लीलता के सफल प्रयोग हो रहे हैं। जिसके चलते ब्लड प्रेशर व हृदयघात के रोगियों में खासा इजाफा हो रहा है और मानवदेह के सेक्स उपकरणों का प्रदर्शन खुली सड़कों पर हो रहा है। इससे जहां डाॅक्टरों के यहां हृदय रोगियों की कतार बढ़ती जा रही है, वहीं भारतीय संस्कारों के चीरहरण के साथ शोहदई, सहमति के साथ यौनानंद, बलात्कार, समलैंगिक दोस्ताना व अनैतिक अप्राकृतिक यौन संबंधों वाले अपराधों की बाढ़ से समाज प्रदूषित हो रहा है।
    टेलीविजन के सभी चैनल सामाजिक समस्याओं के नाम पर बेहूदगियों से भरपूर धारावाहिक दिखाने की होड़ लगाए हैं। जी टीवी पर अगले जनम मोहे बिटिया कीजो, पवित्र रिश्ता, कलर्स पर भाग्य विधाता, उतरन, बालिका वधू, न आना इस देश लाडो, तुझसे लागी लगन, एनडीटीवी इमैजिन पर बाबा ऐसा वर ढूंढो, गुनाहों का देवता, बंदिनी जैसे दिखाए जाने वाले धारावाहिकों में लगभग एक जैसे षड़यंत्र सास-बहू के तमाशे, बाल विवाह, विद्दवा विवाह, प्रौढ़ आदमी का बालिका से विवाह, औरतों की खरीदी, बालिका की हत्या, अनैतिक संबंध, लिव इन रिलेशन, तलाक, प्रेमिका या होने वाली पत्नी से बलात्कार, शादी से पहले बच्चा या अनैतिक गर्भ, हत्या के तरीके, अपराध व अपराधियों की प्रयोगशाला मे होते नए-नए प्रयोग होते हैं। विज्ञापनों के जरिए बीच-बीच में सेनेटरी नेपकीन व कंडोम, 72 घंटे वाली गर्भनिरोधक गोली के बहाने पूरी तरह अश्लीलता परोसी जाती है। किट चाॅकलेट का प्रचार दो गिलहारियों की आइ लव यू.. से होता है। काॅमेडी शो के नाम पर द्विअर्थीय संवादों की अदायगी के साथ आधे-अधूरे पारदर्शी कपड़ों में सजी लड़कियों से फूहड़ व अश्लील मजाक होते हैं।
    समाज में तमाम समस्याओं से जूझने वाले एनजीओ के अध्यक्ष सुनील मिश्रा का कहना है, ‘इस तरह के द्दारावाहिक सरकार द्वारा चलाए जा रहे कार्यक्रमों में बांधक साबित हो रहे हैं। खासकर औरतों की प्रताड़ना व स्वास्थ्य मामलों में तो बेहद खतरनाक है।’
    मध्यमवर्गीय क्षेत्र में प्रैक्टिस करने वाले डाॅ0 ए0के0 खान कहते हैं, ‘इन सीरियलों में जो भी दिखाया जाता है उसमें अधिकांश असत्य होता है। सेक्स संवाद या अनैतिक संबंधों के कारण युवा-किशोर यौनशक्ति बढ़ाने की दवाएं पूंछने आते हैं। लड़कियां गर्भ गिराने की दवा लेने आती हैं। पांच सालों में इस तरह के मरीजों का आना बढ़ा है। इसके अलावा इन सीरियलों को देखते हुए उत्तेजना के चलते रक्तचाप बढ़ जाता है जिससे इंसान का चिड़चिड़ा हो जाना सामान्य बात है। औरतें अत्याचार, महिला किरदारों की पिटाई, यौन उत्पीड़न, सास/बहू षड़यंत्र आदि देखकर उत्तेजित हो जाती हैं, रोने लगती हैं। इसके नतीजे में अधिकांश अवसाद ग्रस्त हो जाती हैं। अवसाद की दवा के नाम पर नींद की गोलियां देकर उन्हें नशेड़ी बनाया जा रहा है।’ विधान सभा मार्ग पर दवा की दुकान चलाने वाले मुश्ताक खान बताते हैं, ‘कंडोम, 72 घंटे वाली गर्भ-निरोधक गोलियां या यौनशाक्ति बढ़ानेवाली दवाओं को लड़के ही नहीं लड़कियां भी बेझिक खरीद रही हैं।’
    समाज में सेक्स व अपराध के बढ़ते चलन से सरकार भी चिंतित है। सरकार की तमाम नसीहतों के बाद भी टीवी चैनल अश्लीलता, अंधविश्वास और फूहड़ता दिखाने से बाज नहीं आ रहे हैं। सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने ऐसे चैनलों के खिलाफ पिछले छह महीने के दौरान दो दर्जन से अधिक कड़ी चेतावनियों वाले और कारण बताओं नोटिस जारी किए हैं। कई चैनलों को दर्शकों से माफी मांगने और कई मामलों में तो प्रसारण पर रोक के लिए मजबूर किया गया है।
    खबरों में अश्लीलता और सनसनी दिखाने में कुछ न्यूज चैनल भी कम नहीं है। मंत्रालय ने एक प्रमुख हिंदी न्यूज चैनल को एक ऐसा कार्यक्रम दिखाने के लिए कड़ी चेतावनी दी, वहीं ‘बिग बाॅस’ रिएलिटी शो के प्रकारण पर कलर्स चैनल को अदालत तक जाना पड़ा।
    हालांकि सेंसर बोर्ड का कहना है कि इंडियन ब्राडकास्टिंग फाउंडेशन अपनी आचरण संहिता लागू करता है और उसी पर जोर देता है।
    अमेरिका में पिछले दिनों दिखाया गया सीरियल ‘द सीक्रेट लाइफ आॅफ द अमेरिकन टीनएजर’ में 16 साल की नायिका शैलेन विवाहपूर्व ‘बालिका वधू’ है। इसमें हाईस्कूल में पढ़ने वाली लड़की गर्भवती हो जाती है और अपने बच्चे को जन्म देने के लिए उत्साहित है। सीरियल में किशोरों के यौन मस्ती-उत्पीड़न, ड्रग, शराब सेवन जैसी तमाम विसंगतियों को दिखाया गया है। नतीजे में 10-16 तक उम्र के बच्चे सेक्स का आनंद उठाने में मगन है और मां-बाप परेशान। परेशानी बढ़ने का यह हाल है कि हर साल लगभग चार लाख लड़कियां यौन संक्रमण का शिकार हो रही हैं। ये लड़कियां अवसादग्रस्त होकर मनोवैज्ञानिकों की शरण में पहुंच रही हैं। भारत में यह समस्या अभी पहले चरणपर है। भले ही राष्ट्रमंडल खेलों के दौरान कंडोम की लूट या उससे चोक हुए टाॅयलेट का प्रचार जोर-शोर से किया गया हो या यौन अपराध हो रहे हैं। कंडोम की बिक्री बढ़ रही हो। गर्भ निरोधक, यौनशक्तिवर्धक दवाओं का बाजार बड़ा हो रहा है। बच्चियों से बलात्कार, हत्याएं हो रहे हैं। फिर भी अभी इसे रोका जा सकता है।
    टेलीविजन पर दबाव बनाने की आवश्यकता है। ‘सेल्फ कंटेंट’ के नाम पर अश्लीलता की कोचिंग चलाने से टीवी चैनलों को रोकना होगा, दंडित करना होगा। सरकार के साथ हमें यानी समाज को, परिवार को पूरा सहयोग करना होगा। इसे रोकने के लिए पुलिस नहीं मां-बाप, शिक्षकों को आगे आना होगा। सीता-अहिल्या के देश में, श्रीराम की माता कौशल्या के देश में बार-बार कंुती को प्रयोग करने की छूट देने से सिर्फ और सिर्फ महाभारत ही होगा। इस सर्वनाश से भारत को भारतीयता को और उसके संस्कारों को बचाना ही होगा।

औरतों का मीना बाजार है गड़बड़झाला

लखनऊ। शहर का दायरा बढ़ता जा रहा है। सौंदर्य में निखर आ रहा है। पहचान की नई-नई इमारतें अपने हुस्न पर इठला रही हैं। नए बाजार और शार्पिंग माॅल्स का ग्लैमर सर चढ़कर बोल रहा है। शहर के हर कोने में नामी गिरामी चीजों की फ्रेंचाइजी उपलब्ध है। काकोरी के कवाब हों या टुंडे के सड़क किनारे ठेले से लेकर ‘वेब माॅल’ तक में मिल जाएंगें। चूड़ी, क्राकरी, चिकन के कपड़े, बिंदी, लाली, पाउडर सब बंथरा से लेकर चिनहट तक, मोहनलालगंज से ठाकुरगंज तक उभरी नई काॅलोनियों के बाजारों में बिकता है। महिलाओं के उपयोग में आने वाला हर सामान शहर में खुली हजारों नई दुकानों में बिकता है। मगर जो बात अमीनाबाद बाजार के बीचोबीच बसे गड़बड़झाला बाजार की है, वह कहीं नहीं है।
    अमीनाबाद बाजार में मौजूद भीड़ खाली वहां से गुजरती भर है या वहां खरीददारी भी करती है। यह देखने के लिए वहां थोड़ी देर ठहर कर देखने की जरूरत पड़ेगी। आज भी अमीनाबाद में माताबदल पंसारी शहर के इकलौते पंसारी हैं, जहां आदमी की जरूरत के लिए जड़ी-बूटियों, ग्रहों के अनुसार हवन की लकड़ियों से लेकर रसोई में काम आनेवाले पुराने मसाले और न जाने क्या-क्या मिलता है। मिलने को तो यहां बहुत कुछ मिलता है। यहीं है जूतों वाली गली, झउवे वाली गली, मारवाड़ी गली, भूसेवाली गली और इन सबके बीच में है औरतों का मीना बाजार ‘गड़बड़झाला’। सच में गड़बड़झाला में सब गड़बड़ नजर आता है। उसका हर गलियारा हर दुकान एक जैसे नजर आते हैं। यहां बेलन भी बिकता है, बर्तन भी हैं और महिलाओं के अंतरंग उपयोग की चीजे भी बिकती हैं। आर्टिफीशियल ज्वैलरी भी है तो बिंदी, चूड़ी, कंगन, फीता भी है। शादी ब्याह, पूजापाठ में उपयोग होने वाले तमाम सामान बिकते है।
    लखनऊ को आधुनिक बनाने की होड़ में या सियासत के मोहल्लों में अमर हो जाने की नई संस्कृति के चलते भले ही नये-नये आए ‘लकनौवालों’ को गड़बड़झाले की गड़बड़ न समझ आए लेकिन उसकी अहमियत आज भी जस की तस बरकरार है। ‘स्टेफ्री’, ‘जाॅकी’, ‘नेपी’, ‘हगीज’, ‘हेयर रिमूवर’ या ‘तनिष्क’ के विज्ञापन टी0वी0 के छोटे से पर्दे पर चैबीसों घंटों दिखाएं जाएं, मगर आम औरतों को ये सारी चीजें आज भी गड़बड़झाला बाजार से खरीदने में मजा आता है। दरअसल गड़बड़झाले से औरतों का अपनत्व है, अंतरंगता है और बहनापा है। इसीलिए गड़बड़झाला चूड़ियों की खिलखिलाहट और पायलों के संगीत की मुस्कराह से गुलजार है। गो कि गड़बड़झाला बाजार नहीं लखनऊ की आत्मा है और आत्मा तो अजर अमर होती है।

गंदा है! गंदा है!! गंदा है!!! लखनऊ शहर

लखनऊ। कूड़े से पाटा पार्षद का घर। गणेशगंज के 10 वार्डों में नहीं होगी सफाई। सफाईकर्मियों का प्रदर्शन। भ्रष्टाचार के मसले पर मुख्य अभियंता व पार्षद भिड़े। ननि के इंजीनियर हड़ताल पर। मलबा न उठाने पर नगर निगम का घेराव। घर से कूड़ा उठाने का मामला टला। ये सारी सुखिंयां पिछले महीने सुबह के अखबारों में छपी थीं। इन सुर्खियों के पीछे की पहली घटना कुछ यूं बयान की गई हैं, यदुनाथ सान्याल वार्ड के पार्षद विनोद सिंघल ने सुपरवाइजर से अपने घर की सफाई करने को कहा। विकास ने मना कर दिया। इस पर उन्होंने उसे पीट दिया। उसके बाद तमाम सफाईकर्मी आन्दोलित हो उठे, धरना-प्रदर्शन से लेकर पार्षद के खिलाफ पुलिस में प्राथमिकी दर्ज करा दी गई। पार्षद के घर के सामने कूड़े का ढेर लगा दिया गया। सफाई कर्मचारी नेताओं ने भी लगे हाथ नगर निगम घेर लिया।
    इस घटना का सच बयान करने के लिए पार्षद से मुलाकात नहीं हो सकी। आस-पास व इलाके के लोगों से बात करने पर जो जानकारी हाथ आई वह पार्षद से अद्दिक सफाईकर्मियों पर अंगुली उठाती है। बेशक पार्षद की तू-तू, मैं-मैं सफाई को लेकर सुपरवाइजर से अक्सर होती रही है। इसी बात को लेकर सुपरवाइजर और पार्षद में झड़पे होती है। दबी जुबान से लोगों का कहना था असल मामला कुछ लेन-देन का है। सच कुछ भी हो, लेकिन समूचे शहर में वीआईपी इलाका छोड़कर दिन के 9-10 बजे सड़कांे पर झाडू लगाते, कूड़े का ठेला ले जाते सफाई कर्मियों को देखा जा सकता है। इस बीच सड़कों, गलियों में आवागमन जारी हो जाता है। ऐसे में सफाईकर्मियों से किसी शिष्टता की उम्मीद करना अपराध हो जाता है। कोई भी सफाईकर्मी किसी के कहने से रूकने की जगह अकड़कर खड़ा हो जाता है या अनसुनी करके कूड़ा, द्दूल-गर्द राहगीरों की ओर द्दकेलता-उड़ाता रहेगा। आमतौर पर सुबह-सुबह ही अल्कोहल का सेवन किये सफाईकर्मियों को बगैर काम किये घर-घर उगाही करते देखा जा सकता है। इनके सुपरवाइजर भी इन्हीं की तरह देखे जा सकते हैं। ये गलियों में झांकने की जहमत तक नहीं उठाते। गली से किसी ने इनकी शिकायत नगर निगम अद्दिकारियों या मेयर के कार्यालय में कर दी तो ये सुपरवाइजर बाकायदा गाली-गलौज तक करने पर अमादा हो जाते है।
    पिछले साल की गर्मियों में मकबूलगंज के एक सुपरवाइजर की शिकायत मेयर कार्यालय में की, उसी इलाके के एक सज्जन ने नगर विकास मंत्रालय में भी सफाई न होने की शिकायत की। जिस पर सुपरवाइजर गली में आया और बड़ा लाल-पीला हुआ। लोगों के बाप-दादाओं तक रिश्ते बनाने की कोशिश करने लगा, तब इलाके के एक दबंग ने उसे अपनी भाषा में समझाया। उसे वह भाषा आसानी से समझ में आ गई। पूरे शहर में जहां-तहां कूड़ा बिखरा पड़ा है। गालियों-सड़कों की नालियों में सिल्ट भरा है। फिर कौन सी सफाई ये कर्मचारी करते हैं?
    इससे भी भ्रष्ट आचरण नगर निगम के इंजीनियरों व अन्य कर्मियों का है। उनके भ्रष्टाचार का लेखा-जोखा हजारों बार अखबारों में छपा लेकिन ढीठ अफसरों का कुछ नहीं हुआ। क्योंकि भ्रष्टाचार में सभी आकंठ डूबे हैं। क्या पार्षद, क्या अधिकारी क्या बाबू सबके सब एक ही आचार संहिता भ्रष्टाचार का पालन करने में लगे हैं। यदि ऐसा न होता तो निगम कंगाल न होता और शहर चमक रहा होता। दरअसल लोकतंत्र से अधिकारियों की आस्था दरक रही है, तो साधारण कर्मी भी उनके साथ खड़ा हो रहा है। नेताओं की भ्रष्टता का बयान करना अक्षरों को महज काला करना होगा। इसका हल कैसे निकलेगा? सफाई से शहर कैसे चमकेगा? कर्मचारी अपनी जिम्मेदारी कैसे समझेगें? नागरिक अपने अधिकारों और कर्तव्यों के प्रति कैसे सचेत होंगे? इन सभी सवालों का जवाब है, मैं सुधरूं, तुम सुधरों तो हम भी सुधरेंगे की तर्ज पर नागरिकों को ही आगे आना होगा।

गलियों में भी लगता है जाम!

लखनऊ। राजधानी की सड़कों पर आदमी को लगभग 12 घंटे हर दिन यातायात जाम की समस्या से जूझना पड़ रहा है। वाहनों की बेतरतीब भीड़ में पैदल चलना भी कष्ट देता है। उस पर युवाओं के फर्राटा भरते दो पहिया वाहन रोंगटे खड़े कर देने के लिए काफी है। गलियों तक में आप पैदल नहीं चल सकते। सारा शहर इस जाम की समस्या से परेशान है। यह समस्या सरकार ने कम जल्दबाज व मतलब परस्त नागरिकों ने ज्यादा पैदा की है।
    गलियों में लोग-बाग अपने घरों के बाहर दो पहिया वाहन, यहां तक चार पहिया वाहन भी खड़े करने से नहीं चूकते। कई जगह जहां गलियां चैड़ी हैं वहा दोनों ओर मोटरबाइकों की कतार देखी जा सकती है। किसी ने अपने दरवाजे लगे नल के पाइप में जंजीरों से अपनी बाइक जकड़ कर खड़ी कर रखी है। तो किसी ने बिजली के खम्बे से बांद्द रखी हैं। इस अवैध पार्किंग से आद्दी से अधिक गली घिरी रहती है। इस तरह की पार्किंग शहर की हर गली में मौजूद है। इन्हीं गलियों में लोगों ने अपने घरों में दुकानंे तक खोल रखी हैं। इससे जहां पैदल चलने वालों, साईकिल यात्रियों, फेरीवालों को तकलीफ होती है, वहीं छोटे बच्चों के साथ महिलाओं के चोटहिल होने का अंदेशा बना रहता है। इसके अलावा सफाईकर्मी इन गलियों में जाने से कतराते हैं, नतीजे में गंदगी से बजबजाती नालियां और कूड़े-कचरे का ढेर लग जाता है, जो संक्रामक रोगों के फैलने का कारण बनता है। इन गलियों में आॅटो रिक्शा, तीन पहियों वाला हाथ रिक्शा, ठेला गाड़ी, कूड़ागाड़ी की पार्किंग आम है। गली के बच्चे इन पर खेलते हैं तो आवारा जानवरों के लिए आश्रय व प्रसूति केन्द्र के काम आते है ऐसे वाहन। बेघरों, उचक्कों, जुआरियों व चोरों के लिए भी यह वाहन फायदेमंद होते हैं। वहीं इन गलियों में अतिक्रमण आम बात है। किसी की चारपाई, तखत तो कोई पूरी की पूरी गृहस्थी बसाये हैं।
    ऐसा नहीं है कि इसकी जानकारी नेताओं या सरकारी कारिन्दों को नहीं हैं, वे खूब अच्छी तरह जानते हैं। वोट मांगते समय नेताजी इन गलियों से गुजरते हुए, करों की वसूली के दौरान सरकारी कर्मचारी गुजरते हुए यहां के जाम व अतिक्रमण से दो-चार होते हैं। फिर भी दोनों ही अपने-अपने स्वार्थाें के चलते चुप्पी लगा जाते है। सच पूछा जाए तो क्या गलियों में अतिक्रमण, पार्किंग, जाम के लिए सरकार जिम्मेदार है। कतई नहीं। नागरिक जिम्मेदार हैं। नागरिकों को ही सोचना होगा। उन्हें ही इससे निजात पाने का उपाय तलाशना होगा वरना सरकार तो नियम-कानून के डंडे से ही शायद निपटे। उसे निपटना ही होगा। सभ्य शहरी और सरकारी हाकिम क्या कोई कदम उठाएंगे?