Thursday, March 10, 2016

राजधानी में ‘अवैधों का है बोलबाला!

राजधानी में हर तीसरा आदमी ‘प्रापर्टी डीलर’, हर चैथा आदमी ‘बिल्डर’ और हर पांचवां आदमी ‘टाउनशिप आर्गनाइजर’ है। ठेकेदार, राजनैतिक कार्यकर्ता और पत्रकार उंगलियों पर गिन पाना नामुमकिन है। ऐसे हालात में
राजधानी की कीमती जमीनों पर कब्जे, अवैध निर्माण, फर्जी दस्तावेजों के जरिये जमीनों/मकानों की खरीद-फरोख्त का धंधा जोरों पर है। जो 4-5 साल पहले तक सड़कों पर चप्पल चटाकते थे या बरफ बेचते थे, दर्जी थे, या ऐसे ही छोटे-मोटे धंधे करते थे वे आज पजेरो या फार्चूनर जैसी महंगी गाडि़यों में मय कीमती हथियारों के बेखौफ सफर करते दिखाई देते हैं।
    आठ किलोमटर गोलाकार (रेडियस) का लखनऊ तीस किलोमीटर गोलाकार क्षेत्र में बदल चुका है। काकोरी, निगोहां, बख्शी का तालाब, बनी बंथरा से आगे तक काॅलोनियों, बहुमंजिली इमारतों, रिसार्टाें, होटलों और महंगे स्कूलों की जगमगाहट देखी जा सकती है। यह सब केवल मुख्य सड़कों पर ही नहीं है बलिक भीतरी इलाकों तक में सीमेंट/लोहे के ये ‘कैकटस’ उगे दिख जायेंगे। इनमें अधिकांश अवैध और मूलभूत सुविधाओं से वंचित हैं। यहां एलडीए की ही एक काॅलोनी में पिछले दिनों सीवर लाइन के बगैर गंदगी से उफनाते मेनहोल पकड़े गये थे। पुराने लखनऊ, मध्य, पूर्वी व कैण्ट की घनी आबादी के बीच घुमावदार चार-पांच फीट संकरी गलियों में बहुमंजिली इमारतें अपने में दसियों दड़बेनुमा फ्लैट समेटे हादसों के इंतजार में नियमों को तोड़कर सरकार और उसके बनाये कानूनों को मुंह चिढ़ा रहे हैं।
    इतना ही नहीं, इन्हीं भवनों में तमाम नाजायज कारोबार फल-फूल रहे हैं। जुए के अड्डे, सेक्स रैकेट, नाचघर, अवैध शराब के बार के अलावा कोचिग, छोटे-मोटे कारखाने खुलेआम चलाये जा रहे हैं। यहीं बिजली चोरी से लेकर पानी-सीवर टैक्स, वाणिज्य/आयकर ने देकर सरकारी राजस्व को चूना लगाया जा रहा है। इससे भी बदतर हालात विधायकों/सांसदो/पार्षदों द्वारा किये गये अवैध कब्जे व निर्माण के हैं। कहीं पार्क पर, तो कहीं आवास-विकास, नगर निगम की जमीन पर इन्हीं जनसेवकों के कब्जे हैं। यहां बताते चलें कि अपने को सर्वश्रेष्ठ देशभक्त मनवाने को बजिद राजनैतिक दल के पार्षद दिनेश यादव को न तो पुलिस अब तक गिरफ्तार कर सकी न ही उसके चंगुल से अवैध कब्जे छुड़ाये जा सके। यही हाल अन्य विधायकों या नेताओं के हैं।
    हां, आम आदमी के वैध माकन बनने मंे सौ झंझट और उसकी पंचायत करने भी यही अवैध कब्जा करने वाले पहुंचकर उस पर अपना हक जताने पहुंच जाते हैं। इन अवैध कब्जों की गूंज सरकारी विभागों से लेकर विधानसभा के सदन तक भी सुनी जा चुकी है।

तो अब मरने के लिये भी गारंटर.....?

 राम नाम सत्य है का जयकारा लगाने वालों को मुर्दे की तस्दीक भी करनी होगी कि वह फला शख्स था। यदि ऐसा नहीं
किया तो नगर निगम मानेगा ही नहीं, मरने वाला सच में मर गया। अब नगर निगम घरों में स्वाभाविक रूप से मरने वालों को तभी मरा हुआ स्वीकार करेगी जब पांच गवाह मय आईडी के साक्ष्य के रूप में हस्ताक्षर करेंगे। गांवों में 5 गवाहों के अलावा परधान को भी गवाही देनी होगी।
    यही हाल पैदा होने को लेकर है, जो अस्पताल में पैदा होंगे वे पैदा हुये मान लिये जायेंगे और जो सड़क पर या घर पर पैदा होंगे वे कहां दर्ज होंगे? एक तुर्रा और कि सब आॅनलाइन व्यवस्था है। गौरतलब है कि अब सरकारें तय करेंगी कब कौन कैसे मरेगा या कब पैदा होगा? गो कि जीने मरने पर भी सरकारी अमले की चांदी? अभी तक श्मशानघाट के झगड़े ही थे, अब मरने के लिये भी पहले गारंटर तलाश लें वर्ना औलादें चप्पलें चटकाती वारिस होने को तरस जायेंगी ? क्योंकि जन्म/मृत्यु प्रमाण-पत्र बगैर गारंटर के बनेंगे ही नहीं। मजे की बात है कि नगर निगम में आये दिन सर्वर डाउन रहने की समस्या से आॅनलाइन व्यवस्था पूरी तरह ध्वस्त रहती है।

झूठा है लखनऊ साफ का दावा

लखनऊ। कचरा जो करोड़ों की कीमत रखता है, उसे गंदगी कहना कहां का इंसाफ है? कचरा गलियों की शान व राजधानी का वकार हो गया है। क्योंकि कचरे से बिजली बनेगी? सारा शहर कचरे की बदइंतजामी का शिकार है। मोहल्ला कटरा मकबूलगंज, विधानसभा के दरवाजे से सिर्फ दो-ढाई किलोमीटर दूर बसा है। यहां की लगभग हर चार फुटिया गली में दर्जनों कुत्तों, गायों का परिवार, कूड़ा बीनने वाले और कचरे का फैलाव राहगीरों के लिए चलने का रास्ता नहीं छोड़ते। इस कूड़े में आम कचरे के साथ ‘हगीज’ व ‘माहवारी’ के निल्र्लज पोतड़ों के अलावा टूटा हुआ कांच, लोहे के जंग लगे सामान पूरे चार फुट की चैड़ाई में फैले वहां से गुजरने वालों को मुह चिढ़ाते हैं। वहां सफाईकर्मी दिन में 12 बजे के बाद तशरीफ लाते हैं। इनका सुपरवाइजर कभी भी नहीं आता, शायद ही किसी ने उसे देखा हो? जो सफाईकर्मी आते हैं, वे भी इसकदर बदजुबान कि यदि कोई नागरिक उनसे नाली साफ करने या गली के किसी विशेष हिस्से से कूड़ा उठाने को कह दे तो महिला सफाईकर्मी गाली-गलौज करने लग जाती है। वहीं पुरूषकर्मी मौन साधकर कूड़ा बीनने वाले बच्चों के साथ कूड़ा उठाने से लेकर इधर-उधर छितराने में व्यस्त रहता है। झाड़ू लगाना, नाली से सिल्ट निकालना शायद उसके काम का हिस्सा नहीं है?
    यहाँ बताना आवश्यक होगा कि यह दोनों सफाईकर्मी सभ्भवतः नियमित नहीं ठेके पर कार्यरत हैं या फिर किसी के बदले (एवजी) में  काम करते हैं। वैसे पूरे शहर में एवजी पर काम हो रहा है! यह जांच का विषय है। इन दोनों को ‘हरिजन एक्ट’ व अपनी संवैधानिक, राजनैतिक स्थिति के साथ नगर निगम के अंदरूनी हालात की खासी जानकारी है। दबी जुबान से सुना जाता है कि वे भी अपने अधिकारियों को रिश्वत देते हैं। इन गलियों में घर-घर से कचरा उठाने का कोई प्रावधान नहीं है।
    हां, राजधानी के लिये योजनाएं ढेर सारी हैं, जिनके लिये नगर प्रमुख (मेयर), नगर आयुक्त से लेकर नगर निगम का मलाईदार तबका देश-विदेश के कई हिस्सों से प्रशिक्षण प्राप्त कर ‘लखनऊ साफ’ का प्रमाण-पत्र तक हासिल कर चुका है। उसी झूठ को आगे बढ़ाने के लिए आये दिन अखबारों में बयान छपते हैं, ‘शहर को जल्द मिलेंगे और पांच हजार शौचालय’, ‘ब्राजील की तरह कूड़ा घरों पर लगेंगे पौधे,’ ‘घरों में शौचालय बनायेगा नगर निगम’, ‘कूड़े से बनेगी बिजली’, ‘नगर निगम साफ करेगा गोमती’, ‘लखनऊ ने सफाई में बंगलुरू को पछाड़ा’, ‘शहर में ... नई सीवर लाइन बिछेगी’, ‘घरों के बाहर सड़क पर खड़े होने वाले दो-चार पहिया वाहनों से पार्किंग शुल्क वसूलेगा नगर निगम’, ‘एलडीए 5 लाख में बेचेगा पार्किंग... सिंगापुर की तर्ज पर पार्काें में कम्युनिटी पार्किंग बनने की योजना’। इनमें से किसी एक को भी आज तक अमली जामा नहीं पहनाया जा सका। शौचालय तो दूर की कौड़ी है, मूत्रालय तक नहीं है और अगर हैं भी तो वहां आप खड़े नहीं हो सकते। चारबाग से बर्लिग्टन चोराहे तक आप तालश कर नगर निगम के मूत्रालयों के फोटो खींचकर ‘प्रियंका’ को भेजें हम छापेंगे। हीवेट रोड पर बंगाली क्लब के पास एक टूटा-फूटा और बर्लिग्टन चैराहे पर एफआई टाॅवर के टीचे बदबूमारता एक मूत्रालय है जिसकी ओर शायद ही कोई सफाई कर्मी देखता भी हो, फिर आम आदमी की बिसात?
    गौरतलब है कि सफाई व्यवस्था को सुचारू रूप से चलाने वाली रकम का इस्तेमाल दूसरे मदों में किया जाना आम है। 2011 में कांग्रेस पार्षद दल ने ऐसी ही एक शिकायत 387 लाख रूपये के दुरूपयोग की लोकायुक्त से की थी। लेकिन नतीजा वही ढाक के तीन पात। आये दिन सफाईकर्मियों की भर्ती के एलान विज्ञापनों के जरिये किये जाते हैं लेकिन ताजा हालात बताते हैं की लखनऊ की आबादी के हिसाब से सफाईकर्मी अपर्याप्त है। हेल्थ मैनुअल के अनुसार दस हजार की आबादी पर 28 कर्मी होने चाहिए। इस हिसाब से 50 लाख की आबादी पर 14 हजार सफाई कर्मी होने चाहिए। सफाईकर्मियों की भर्ती को लेकर आये दिन धरना प्रदर्शन होते हैं। पिछले महीने एक धरने के दौरान वाल्मीकि व धानुक समाज ने धर्मपरिवर्तन तक की धमकी दी थी। बावजूद इसके ‘स्मार्ट सिटी’ के दावेदार हैं। यहां एक आश्चर्यजनक बात लिखनी जरूरी हो जाती है, ग्रामीण क्षेत्रों में भले ही साठ फीसदी लोग खुले में शौच करते हों लेकिन सूबे की राजधानी लखनऊ में खुले स्थानों पर शौच करने वालों की संख्या आबादी की 25 फीसदी से कम नहीं है। आंकड़े कुछ भी कहते हों, अधिकारी कुछ भी कहते हों, नगर विकासमंत्री कितने ही कड़क ईमानदार तेवर रखते हों, लेकिन राजधानी गू, गोबर, गंदगी और आवारा जानवरों से अटी पड़ी है।

गरमी आई, बिजली गई!

लखनऊ। बिजली चोरी का हल्ला हर चार दिन बाद ऊर्जा मुख्यालय की बैठकों से लेकर अखबार की सुर्खियों तक में छाया रहता है। इसी शोर की आड़ में बिजली वालों की बेईमानी नजरअंदाज की जाती है और उपभोक्ताओं की गर्दन दबाई जाती हैं। कभी लोड बढ़ाने के नाम पर, कभी मीटर चेक करने के नाम पर तो कभी बिजली चोरी के नाम पर बिजलीकर्मी बेघड़क घरों में घुस जाते हैं। महिलाओं, बुजुर्गाें को बाकायदा धमकाते, डराते हैं। जेल भेज देने का भय दिखाकर सीधे-सीधे रिश्वत तक मांगते हैं। भय भी ऐसा कि पिछले दिनों पुराने लखनऊ में एक बुजुर्ग महिला की करंट लगने से मौत हो गई। इसके अलावा मनमाने तरीके से उपभोक्ताओं से जुर्माना वसूला जाता है। इसी तरह मीटर रीडर रीडिंग में गड़बड़कर उपभोक्ताओं की जेबें काट रहे हैं। यही हाल बिजली बकाया वसूली के दौरान खुलेआम किया जा रहा है, जबकि पाॅवर कारपोरेशन प्रबंधन ने साफ-साफ बड़े अधिकारियों को वसूली के लिए उपभोक्ताओं के घरों तक जाने के आदेश दिये हैं। राजधानी में मुख्य अभियंता से लेकर अवर अभियंता तक अपने दफ्तरों से बाहर निकलना मुनासिब नहीं समझते। हर अधिशासी अभियंता ने वसूली का बाकायदा ठेका उठा रखा है। यही ठेकेदार व उनके सहयोगी पूरे शहर में वसूली करने में लगे हैं। मजे की बात है उपभोक्ता से वसूली में बकाया रकम के साथ तीन सौ रूपये अलग से लिये जाते हैं। यह तीन सौ रूपये अधिकतर नकद मांगे जाते हैं। उपभोक्ता चेक से भुगतान करना चाहे तो बकाया भुगतान राशि का चेक म्ेनअपकीं के नाम से और तीन सौ रूपयों एक चेक और म्म्म्न्क्क्ीनेेंपदहंदरध्बीवूा या जहाँ कहीं का भी हो के नाम से लिया जाता है। यह किस मद का होता है और क्यों लिया जाता है? जब उपभोक्ता बकाया भुगतान कर रहा है तो बिजली काटने/जोड़ने का पैसा भी उससे जबरिया नहीं लिया जा सकता। बिजली के बिलों में अनाप-शनाप पैसे लगा देना आम बात है। जरा उदाहरण देखिए, उपभोक्ता कुल 20 यूनिट बिजली जलाता है, उस पर 11501 रू0 बकाया है, उस पर एनर्जी व फिक्स चार्ज के अलावा 1505.38 रू0 अलग से चार्ज किये जाते हैं। वहीं 27 यूनिट वाले उपभोक्ता से एनर्जी व फिक्स चार्ज के अलावा 1545.09 रू0 लिए जाते हैं जब उस पर महज 7634 रू0 बकाया होता है। जरा आप देखें गरीब उपभोक्ता की जेब फाड़कर उसे कैसे लूटा जाता हैं। 20 यूनिट पर एक महीने में बिल होता है 698.38 रू0 27 यूनिट पर डेढ़ महीने में बिल आता है 1133.71 रूपया। खेल देखिये उपभोक्ता से 15 दिनों का फिक्स चार्ज दो बार वसूला जा रहा है? एमटी के नाम से 20 यूनिट दर 116रू0, 27 यूनिट पर 319.18 रू0 वसूला गया? गोया मीटर रीडर अपनी मर्जी से कभी भी आये अपनी मनमानी रकम भर कर उपभोक्ता को पकड़ा दे उसे वह देना ही होगा?
    वहीं लाखों बिजलीकर्मियों/पेंशनधारियों को लगभग मुफ्त बिजली दी जा रही है। वे दूसरों को बाकायदा बिजली बेच रहे हैं। वहीं पेंशनधारक मर गया है उसके घर में कोई पारिवारिक पेंशन भी नहीं पा रहा है फिर भी बगैर मीटर के मुफ्त में बिजली उसके घर में जल रही है? दसियों बार बिजली कर्मियों के यहां मीटर लगाने के आदेश हुए लेकिन अब तक नहीं लग सके? बिजली संकट और बिजली चोरी की खबरें दैनिक अखबारों से मिलीभगत कर छपवायी जातीं हैं। अब गरमी ने दस्तक दे दी है रोज औसतन चार घंटे लखनऊ में बिजली गुल रहती है। 24 घंटे आपूर्ति की नाकामयाबी के साथ राजस्व वसूली का लक्ष्य न पूरा कर पाने के खोखले वायदे से ध्यान भटकाने की गरज से 252 करोड़ सालाना बिजली चोरी की ख़बर छपवा दी गई। साथ में यह बताने से भी नहीं चूके कि पांच सालों में बिजली चोरी रोकने के लिए लगभग एक हजार करोड़ की रकम खर्च की गई। दरअसल बिजली के अधिकारी, कर्मचारी लापरवाह होने के साथ भ्रष्ट, बेईमान और हवाई किले बनाने में उस्ताद हैं। आये दिन सर्वर ठप हो जाता है जिसका खामियाजा उपभोक्ता को भुगतना पड़ता है। इसके अलावा जितनी भी योजनाओं की घोषणाएं की गईं वे सब मुंह चिढ़ा रही है। उस पर तुर्रा यह कि सूबे के मुख्यमंत्री बिजली संकट के लिए बसपा को दोषी ठहराकर इन बेईमानों की पीठ ठोक देते हैं लिहाजा ये और हौसलामन्द होकर उपभोक्ताओं का गला काटने में लग जाते हैं। साफ-साफ सवाल उठाया जाय तो उपभोक्ता से बड़े चोर बिजली वाले नहीं हैं?

गृहिणी के मन की बात मेट्रो से.....?


भइया दाल, भात और आलू-टमाटर पर कौन बहस करेगा? यह सवाल किसी ‘होरी’ या ‘घीसू’ ने नहीं मेरे सामने गरीबी की रेखा की तरह फैला दिया और न ही मनरेगा के स्मारक के इंतजार में खड़े ‘झंझटी’ ने उठाया है। यह तो एक शुद्ध भारतीय गृहिणी की उदास निराश लेकिन अहम् पूंछताछ है। उसे न तो किसी आरक्षण की आस है, न ही किसी सब्सिडी की, उसे तो अपनी रसोई में खाना पकाने के लिए सस्ती दर पर गैस सिलेंडर की जरूरत है। उस पर पकाने लिए दाल-चावल, सब्जी-आटे की दरकार है। इस गृहणी के ‘मन की बात’ ‘मेट्रो’ से चलकर कब तक सरकार के दरवाजे तक पहुंचेगी?
    जो लोग कल संवारने में अपनी पूरी ताकत खपा दे रहे हैं और जिनकी अस्थियां तक भारत माता के जयकारे लगाने की बाकायदा कसमें खाने  को तैयार हैं, क्या उनके कानों में भी यह मासूम सवाल सुनाई दे रहा है? या फिर जिस तरह रेल किराये की तुलना सेब, सिनेमा के टिकट से करते हुए उत्तर प्रदेश के खाते में बड़े-बड़े एलान कर दिये गये और पिछले वाले भुला दिये गये, उसी तरह इस पेट का दोजख भरने वाले सवाल को नजरअंदाज कर दिया गया।? क्या केन्द्रीय खाद्यमंत्री के बयान, ‘भारतीय दाल ज्यादा खाने लगे हैं, इसलिए अरहर दाल महंगी हो गई’ को सही मान लिया जायेगा?
    सवाल और भी हैं और उन्हें उठाना भी बेहद जरूरी है। वकील साहबान से किस ‘देशप्रेम’ की प्रेरणां मिल रही है? मेरे चाचा ने मुझे वकील बनाना तय किया था। उसी हिसाब से सपने भी देखे, लखनऊ विश्वविद्यालय के भीतर तक पहुंचाने की कोशिश की लेकिन मैं वकील न बन पाया। आज लगता है शायद ईश्वर ने सही फैसला किया था, क्योंकि जो हिंसात्मक समाचार वकीलों के लिए सुर्खियां पाते रहते हैं, वह मेरी 35 किलो की काया कतई बर्दाश्त न कर पाती। तकदीर ने पत्रकार, वह भी लोगों की जुबानी चिथड़ा पत्रकार बना दिया। यूं तो पत्रकारों को गरियाने का फैशन या चलन जो भी हो काफी बढ़ गया है। कोई दलाल कहता है, तो कोई रंडी। इससे भी मन नहीं भरता, तो गालियों के शब्दकोश का हर पन्ना उछाल देते हैं। मजा इस बात का है कि यही गरियाने वाले अपने दोहरे चरित्र के साथ जीते हुये अपने समाचार/फोटो छपवाने के लिये सौ-सौ जतन करते हैं। इतना ही नहीं तमाम तरह के प्रलोभनों का सहारा लेते हैं। आज के युवा व देशभक्त श्रेणी की पहली पांत के नेता लिपी-पुती महिलाओं को ‘विजटिंग कार्ड’ की तरह साथ में लेकर अखबार के दफ्तरों के चक्कर लगाते देखे जा सकते हैं। इनमें तमाम अपनी खबर छपवाने के लिये फोन करके, कराके काम करना दूभर कर देते हैं। गो कि रंडी के खिताब से पत्रकारों को नवाजने वाले उसी ‘रंडी’ के आगे लार टपकाते नहीं थकते।
    मुझे अपने पत्रकार होने पर नाज है,भले ही मूर्खों की जमात हिंसा पर, हत्या पर या जिंदा जला देने पर ही क्यों न उतारू हो। हां अंतिम बात या चेतावनी कि पत्रकार केवल गांधी या गणेश का शिष्य नहीं रह गया है, अब उसे भी कलम के साथ तमाम आधुनिक संसाधनो की जानकारी है।
    हां! इन दिनों देशप्रेम, देशद्रोह का सवाल पूरे देश के सामने पसरा हुआ है। इस सवाल को खड़ा और बड़ा करने वाले महानुभाव  रोज देशद्रोह जैसा अपराध करते नहीं थकते, कोई बिजली चोरी में लगा होता है, तो कोई टैक्स। इससे भी बढ़कर जमीनों पर कब्जा, पानी, अनाज, दवाई और जीवनदायी सामानों में सरेआम लूट करते हैं। और तो और आदमी की तस्करी जैसे जघन्य अपराध कर रहे हैं। दाल, आलू, प्याज तक की कालाबाजारी करने के साथ मिलावटी खाद्य वस्तुएं सरेआम बेंचते हैं। यह अपराध या देशद्रोह नहीं है? इन अपराधों में कितनों को पकड़ा जा रहा है या कितनों को सजा हो गई?
    इन सारे सवालों से बड़ा सवाल यह है कि यह मुल्क किसका है? बयानबाजों का या भाजपा का या कांग्रेस का या साधू से नेता में बदले जुबानदराजों का या जातियों का, आखिर किसका है यह देश? क्या देश-प्रदेशों में काबिज सरकारों से पूंछकर देशप्रेम करना होगा? क्या मंत्री, अफसर तय करेंगे कि देशवासी अपनी पत्नियों के पास सोने, सेक्स के लिए कब जायेंगे? बगैर पूछे जाने पर बलात्कार का आरोपी माना जायेगा?
    मैं राम प्रकाश वरमा, पत्रकार से पहले भारत का नागरिक होने की हैसियत से सरकारों और तमाम नेताओं से पूंछता हूं, देशप्रेम की क्या परिभाषा है? कौन आता है देशप्रेम के दायरे में? और क्या देश से प्रेम करने के लिये सियासी दलों से प्रमाण-पत्र लेना पड़ेगा?