Thursday, December 30, 2010

मगर ‘प्रियंका’ को संघर्ष के दौर ने एक सही तर्क दिया

आदमी और अपराध के बीच की सरल रेखा को काटकर स्वास्तिक का चिन्ह बना लेने का कमाल सिर्फ कलम को हासिल है और कलम सियासी रावण की अदालत में मुल्जिम के कटघरे में खड़े बेकसूर आदमी का हलफनामा है। इसी कलम ने इकतीस बरस पहले ‘प्रियंका’ को जन्म दिया, पांच साल माता सरस्वती के बेटों के चरण पखारते गुजर गए। छठे साल राजनीति के परकोटे पर जहांगीरी घंटे की तरह जा पहुंची ‘प्रियंका’। नतीजे में इंसाफ की जगह मुकदमों और जेल का प्रशिक्षण हासिल हुआ। कठिन संघर्ष के दौर ने एक सही तर्क दिया।
    लेकिन खाली तर्क का सिक्का किसी महाजन को उत्तेजित नहीं कर पाता, तिस पर चार पन्नों वाले चीथड़े की क्या बिसात जो गरीब की जोरू की तरह अपना तन ढकने में या फिर सुविधाओं के ठाठ की लालच में महज एक साड़ी के बदले किसी महाजन के साथ रात भर सोने के लिए राजी हो जाती है। बस यहीं उसके पेट पर अपने बेडौल पांव रखकर महाजनों का पूरा टोला उसे छिनाल-छिनाल पुकारते हुए सभ्यता की नाक पर रूमाल लपेटे दुत्कारता रहता है। फिर द्रौपदी नहीं जन्मेगी? और उसके भीतर आग नहीं जलेगी? उसके अंगारे भभक कर इधर-उधर नहीं छिटकेंगे? निश्चित रूप से आग भी जलेगी, अंगारे भी धधकेंगे और फिर महाभारत भी होगा।
    और वहीं हुआ भी। द्रौपदी महज किसी औरत का नाम भर नहीं है। द्रौपदी एक क्रांति का नाम है। नाइंसाफी के मुखालिफ एक आंदोलन है, एक जोरदार आवाज है। इसी प्रेरणा के पथ पर जनता से जंगल तक ‘जनतंत्र’ के जिम्मेदारों को ललकारने के लिए ‘प्रियंका ने सच बयानी का हलफनामा दाखिल किया।
    ‘प्रियंका’ के पाठकों और विज्ञापनदाताओं की संख्या में एक बड़ा इजाफा हुआ। बड़े अखबारों की कतार में दिखनेवाली पाक्षिक ‘प्रियंका’ जहां मुकदमों से लदी-फंदी रही, वहीं एक भरा-पूरा परिवार पाने में भी सफल रही। समूचे उत्तर प्रदेश में एक अलग पहचान बनी। गांव-गंवई क्षेत्रों में भी दखल बढ़ा। गांव के मुखिया से लेकर पांच विधानसभा क्षेत्र से चुने जाने वाले सांसद तक सुर्खियां बने। गूंगों की जुबान बनने और निष्ठा की तुक बिठाने में सूबे के मुख्यमंत्री के गुस्से की बारूद ने हाथ-पांव झुलसा दिए। इसी समय कई शालीन हाथ, जो परिवर्तन के हिमायती थे दोस्ती के लिए बढ़े। उनके पास पूंजीवादी दिमाग था। वे ‘प्रियंका’ का सहयोग करते हुए कुछ इस तरह अपने मकसद में कामयाबी  चाहते थे कि शालीनता भी बनी रहे और विरोध में उठे हुए हाथ की मुट्ठी भी तनी रहे। और ऐसा ही हुआ भी। यह सब इतने आहिस्ता-आहिस्ता, लेकिन सड़क पर दौड़ते ‘ट्रैफिक’ की तरह हुआ कि राज बदल गया, समाज बदल गया और सत्ता के शीर्ष पर बैठे लोग बदल गए। यहां तक एक समूची नई पीढ़ी पल-पुसकर तैयार हो गई। मगर ‘प्रियंका’ के हलक से चीखें निकलना बंद न हुई।
    रावण के पुतले को जलते हुए देखकर ताली बजाने वाले हिजड़ों की जमात जब सत्ता पर काबिज हो गई और रामनामी बेंचकर ‘सीता’ की ही दलाली करने का हौसला कर बैठी तब जकार अहसास हुआ कि आदमी अपनी ही नैतिकता से कितना मजबूर होता है। शायद इन्हीं अनुभवों के चलते धूमिल ने कहीं लिखा हैं -          
                       एक खुला हुआ सच है कि आदमी
दायें हाथ की नैतिका से
इस कदर मजबूर होता है
कि तमाम उम्र गुजर जाती है मगर
गांड़ सिर्फ, बांयां हाथ धोता है।
यह लाइनें किसी अफसोस के लिए नहीं बल्कि सचबयानी की हलफ के लिए हैं। ‘प्रियंका’ भारत के हिन्दी भाषी पाठकों के दुलार से बेहद गदगद है।  भले ही ‘प्रियंका’ किसी श्रीकृष्ण की खोज में कामयाब न हो सकी, लेकिन अर्जुन के गांडीव की तरह अपनी कलम थामें आपका आशीर्वाद पाकर गौरवान्वित होती रही है और होगी। श्री कृष्ण ने अपने बालसखा सुदामा की पोटली से दो मुट्ठी चावल खाकर दो लोकों के सुख, संपदा से उन्हें मालामाल कर दिया था। शायद ‘प्रियंका’ किसी सुदामा के रिश्ते में नहीं आती, नहीं तो क्या वजह रही कि श्रीकृष्ण का पीताम्बर ओढ़े दसियों हिमायती ‘सियासत की द्वारका’ में भटक गए।
    इक्तीस बरसों में इक्तीस हजार बार सुनने को मिला, यह नाम तो कभी सुना नहीं। कब से यह अखबार निकल रहा है। फिर भी कोई शर्म या घबराहट नहीं पैदा हुई। हां अखबार बेचने, विज्ञापन जुटाने और समाचार लिखने में जिस संकल्प की जरूरत थी, उससे इंच भर भी पीछे हटने का इरादा कभी न बन सका, क्योंकि आप पाठकों ने, विज्ञापनदाताओं ने और जिले-जिले बैठे ‘प्रियंका’ के संवाददाताओं ने कभी इस आोर सोंचने का मौका ही नहीं दिया। अखबार को संघर्ष का उपकरण नहीं, आदमी की सचबयानी का हलफनामा बनाए रखने में आप गुरूजनों का आशीर्वाद रहा है। हम तो एकलव्य की तरह आपसे ग्रहण करते रहे और उसे समग्र समाज में फैलाते रहे।
    और अंत में इतना ही कि आप द्वारा दी गई संजीवनी ही कलम के सच का हलफनामा थी और आगे भी रहेगी। प्रणाम!

Sunday, December 26, 2010

कम्प्यूटर जी नाराज हैं... कोई सुनेगा...?

लखनऊ। बिजली बिलों का भुगतान कम्प्यूटर जी के जरिए बाबूजी लोग जमा करते हैं और कम्प्यूटर जी हैं कि लगभग रोज घंटे-दो घंटे के लिए, मन में आया तो पूरे दिन के लिए नाराज हो जाते हैं। उपभोक्ता अपने बिल का भुगतान जमा करने के लिए जहां लम्बी लाइन में लगने को मजबूर होता है वहीं सर्वर फेल होने से कई चक्कर काट कर परेशान होता है। कई बार तो इसी फेर में भुगतान जमा नहीं हो पाता। ऐसे हालात में ठेके पर काम करने वाले गैंग कनेक्शन काटने पहुंच जाते हैं। उपभोक्ता से यह लोग तीन सौ रूपया डिस्कनेक्शन/रिकनेक्शन के नाम पर बतौर रिश्वत वसूलते हैं। इन्दिरा नगर के कृष्ण राना से एसडीओ ने तीन सौ रूपये रिकनेक्शन के नाम पर ले लिए, जबकि उनका कनेक्शन कटा ही नहीं था तो जुड़ने का मतलब ही नहीं। उन्हें इसकी रसीद तक नहीं दी गई। इस रिश्वत में अधिशासी अभियंता सीधे साझीदार होते हैं। क्योंकि डिस्कनेक्शन गैंग को अधि0अभि0 ही अपने क्षेत्र में ठेके पर लगाते हैं। इस तरह के गैंगे (ठेकेदार) विद्युत निगमों से बाकायदा पंजीकृत होते हैं।
    गौरतलब है कि उपभोक्ता की परेशानी को बड़ी ढिठाई से आलाहाकिम नकार देते हैं। सर्वर 36 घंटों तक खराब रहने के बाद भी बेशर्मी से बयान दिये जाते हैं कि सर्वर में गड़बड़ी आई थी जिसे शाम तक ठीक कर लिया गया था और ई-सुविधा केन्द्रों को रात 10.30 बजे तक खुला रखा गया। ऐसे हाकिमों से कौन पूछेगा कि सारा दिन सहायक अभियंता राजस्व से लेकर भुगतान जमा करने वाली खिड़की पर बैठे बाबू तक दिन भर उपभोक्ताओं को यह कह कर लौटाते रहे कि कम्प्यूटर खराब है, उन्हें कैसे पता पड़ेगा की सर्वर ठीक हो गया और 7 से 10 बजे रात के बीच सारे काम छोड़कर बिजली का बिल जमा करने की लाइन में उपभोक्ता आकर खड़ा हो जाए? फिर यह तो रोज की बीमारी है।
    झूठ और बेईमानी की हलफ उठाए लेसा के हाकिम अपने आगे किसी की सुनने को तैयार नहीं, भले ही हाई वोल्टेज से विद्युत उपकरण फुंके, नाजायज वसूली हो, बिजली के बिलों की रकम का गबन हो, या मीटर रीडिंग गड़बड़ हो। हां, सपने दिखाने में सबसे आगे है, लेकिन काम करने में सबसे पीछे। किसी भी मामले को टाल देने में माहिर लेसाकर्मी का एक उदाहरण और देखिए।
    बिजली के बिल में भुगतान जमा करने की 30 तारीख व विच्छेदन तिथि 7 अंकित है। अब उपभोक्ता कई बार चक्कर काटता है, कभी सर्वर फेल, कभी भीड़ बेहद, कभी बाबूजी गायब बमुश्किल 8 को सब ठीक मिला तो बाबूजी से लेकर एसडीओ तक भुगतान लेने से मना कर देता है। उनका जवाब होता अब इसे अगले बिल के साथ जमा करिएगा। अगले बिल में विलम्ब सरचार्ज जुड़ जाता है। इसे राजस्व बढ़ाने का तरीका माना जाए या नियमित भुगतान करने वाले उपभोक्ताओं का खून पीना?

इनको और नहीं, उनको ठौर नहीं

लखनऊ। समाजवादी किले की दरकी हुई दीवारों को दुरूस्त करने की ताजा कोशिश में मुलामय सिंह यादव ने अपनी पार्टी के मुसलमान नेता की शक्ल में कुख्यात रामपुरी खां साहब को आंसुओं से भिगोते हुए एक बार फिर गले से लगा लिया। आजम खां ने भी 18 महीने के बनवास के बाद अपने सफेद रूमाल से अपनी गीली आंखे पोंछकर सूबे से बसपा सरकार को उखाड़ फेंकने का एलान कर डाला। इसी गरज से उन्होंने छोटे समाजवादी भइया की पेशकश नेेता विपक्ष पद को भी ठुकरा दिया। तमाम गिले, शिकवों और तंज में डूबे भारी भरकम शेर सुनाकर, भावनाओं के ठाठे मारते दरिया में बरसों पुरानी बहती रिश्तों की कश्ती का वास्ता देकर भाई जान को मुसलमान वोटों से बेफिक्र होने की गारंटी भी दे डाली। गो कि साइकिल के फर्राटा भरने के दिन आ गए। समूचे मीडिया ने भी उनकी दोबारा कायम हुई दोस्ती को इसी नजरिए से देखा, दिखाया और पढ़ाया। हालांकि यह पहली घटना नहीं है।
    मुलामय सिंह यादव मतलब परस्त दोस्ती, लाभ व सुविधा की राजनीति के लिए बखूबी जाने-पहचाने जाते हैं। उनके अतीत के पन्ने पलटिये, तो पता चलेगा कि उनकी सफलता के पीछे अपराध को राजनीति से जोड़ने, अपने ही सहयोगियों को मतलब निकल जाने के बाद ठिकाने लगाने की खतरनाक चालाकी भरा उनका मिजाज रहा है। जानने वाले जानते हैं, चैधरी चरण सिंह राम विलास पासवान को अपना राजनैतिक पुत्र कहा करते थे, उन्हें इन्हीं मुलायम सिंह की अगुवाई में अजीत सिंह की मर्जी के खिलाफ पार्टी से बाहर का रास्ता दिखाया गया था। मुलायम की खतरनाक चालांें का शिकार शारदा प्रताप रावत से लेकर एक लम्बी फेहरिस्त रही है। यहां तक सूबे के मुख्यमंत्री रहे राम नरेश यादव भी मुलायम की चालों का शिकार रहे। इसी तरह कई दुश्मनों से उनकी दोस्ती में उनके दुश्मन नंबर एक रहे इटावा के बलराम सिंह यादव से हुई उनकी दोस्ती का जिक्र काफी होगा। यहां 1985 के चुनाव के दौरान उनके चालाकी भरे षड़यंत्रों के शिकारों की लम्बी सूची उजागर किये बगैर केवल एक नाम राजेन्द्र सिंह लोकदल के वरिष्ठ नेता का लेना ही काफी होगा, जिन्हें धकियाकर मुलायम सिंह उप्र विधानसभा में नेता विरोधी दल बने थे। जबकि राजेन्द्र सिंह ही चैधरी साहब के दरबार में मुलायम सिंह के पैरोकार थे। ऐसे सैकड़ों प्रकरण है और उनकी खतरनाक चालों के शिकार बीसियों तेज तर्रार नेताओं के नाम हैं। इनमें एक वाकये का जिक्र मुसलमानों की मसीहाई शक्ल को आईना दिखाने के लिहाज से बेहद जरूरी है। उप्र लोकदल के अध्यक्ष राम नरेश कुशवाहा को हटाने को लेकर हुए लंबे नाटक के दौरान 27 नवंबर 1986 को लोकदल के महामंत्री सत्य प्रकाश मालवीय के घर हुई एक बैठक में प्रदेश अध्यक्ष रशीद मसूद या सखावत हुसैन को बनाने की बात हुई, तब मुलायम सिंह यादव ने ही कहा था, ‘मुसलमान तो वोट ही नहीं देते हैं।’
    मुलायम सिंह के दोस्तों की हालिया लिस्ट में बेनी प्रसाद वर्मा, सुब्रत राय सहारा, अमिताभ बच्चन, अमर सिंह, संजय दत्त, मनोज तिवारी, जयाप्रदा जैसे बड़े नाम जहां काट दिये गये, वहीं कल्याण सिंह आज फिर से कट्टर दुश्मनों में शुमार हो रहे हैं, तो कुसुमराय से पर्दे के पीछे गुफ्तगू जारी है। ध्यान रहे कुसुमराय मुलायम के मंत्रिमण्डल में मंत्री भी रह चुकी हैं।
    मुलायम सिंह यादव का इतिहास दोहराने की आवश्यकता इसलिए थी कि वे कल्याण सिंह की दोस्ती के जरिए पिछड़े हिंदुओं का वोट हासिल करके जहां लोकसभा में बढ़त बनाना चाहते थे, वहीं पिछड़ों के एक मात्र नेता साबित करने की बरसों पुरानी चाहत भी पूरी करना चाहते थे, नाकामयाब रहे। एक बार फिर सफलता की सीढ़ी चढ़ने को आतुर आजम खां के जरिये मुसलमान वोटों को हासिल कर सूबे में सपा की सरकार बनाने का सपना संजोए हैं। लब्बोलुआब यह कि तिकड़म और मतलबपरस्ती की राजनीति में भावुकता का मुलम्मा चढ़ाकर वे ‘वोटरों’ को क्या संदेश देना चाह रहे हैं?
    आजम खां के भावुकता भरे अल्फाजों, नेताजी ने उन्हें दल से निकाला था, दिल से नहीं। मेरी भी स्थिति वैसी ही थीं। पार्टी से बाहर होने के दौरान भी उनके नेता मुलायम सिंह यादव ही थे। एक गलत व्यक्ति समाजवाद का मुस्तकबिल बनने लगा था। ऐसे में अगर विरोध न करता तो क्या इतिहासपुरूष बनने जा रहे एक व्यक्ति को गलत रास्ते की तरफ बढ़ने देता? सच तो यह है कि उस समय अपना बहुत कुछ खोकर बहुतों की आवाज बन गया था। माफी मांगकर मुलायम सिंह का कद पहले से और अधिक बढ़ गया है। मेरा मुलायम सिंह से रिश्ता सिर्फ राजनीति का नहीं है। अनेक मुश्किल दौर में उन्हें परखा भी है। इसका अहसास मुलायम सिंह को भी नहीं है इसीलिए उन्हें गलत रास्ते की तरफ जाने नहीं देना चाहता था। एक बात और कि अगर लोगों का मुलायम सिंह यादव पर से भरोसा हट गया तो लंबे समय तक लोग किसी नेता पर भरोसा नहीं करंेगे, के साथ उनकी आंख नम हो गई। खुदा जाने मुसलमानों के दिलों में कोई हलचल पैदा हुई या नहीं, लेकिन यह साबित हो गया कि कोई किसी से कम नहीं और उनके लिए कहीं ठौर नहीं, तो इनके लिए कोई और नहीं। ऐसा नहीं है कि अकेले आजम खां को ही रूलाने में कामयाबी हासिल की गई है। संजय डालमिया की भी आंखे मुलायम से एक मुलाकात के दौरान नम हो चुकी हैं। तमाम पुराने समाजवादियों को आंसुओं से भीगे रूमाल की नमी दिखाने का अभियान जारी है। इसके पीछे उनकी बहू डिंपल व भतीजे की हार भर का मलाल ही नहीं है, वरन एक बार उप्र के सिंहासन पर बैठकर कई हिसाब-किताब चुकता करने की चाहत भी पाले हैं मुलायम सिंह यादव। बहरहाल इस मुहिंम का नतीजा जो भी हो लेकिन एक बात तय है कि सूबे का मतदाता बेहद समझदार है और मुसलमान अब ‘वोट’ भर नहीं रहा। यहां एक बात और कहना गैर जरूरी नहीं होगा कि समाजवादी पार्टी का मुसलमान चेहरा आजम खां उस तरह से देखा जा रहा है जैसे बारातों में सबसे आगे चालते हाथी की शोभा।

Monday, November 1, 2010


तुलसी की ‘रामायण को पढ़े बिना ही...
आदमी के पसीने में पेट्रोल की गंध सूंद्दनेवाले प्रगतिवादियों ने अपनी कलम की रोशनाई से अक्षरों का खतरनाक बम हिंदुस्तानियों के सर पर दे मारने में कोई कसर नहीं उठा रखी है। और, इसी बम के जरिये ये वैचारिक विद्रोह का भी एलान करने में नहीं हिचकते। इसी बम को अपनी संस्कृति का रक्षक मानने में भी उन्हें कोई हिंचक नहीं हैं। उनका वैचारिक विद्रोह और प्रगतिशीलता अपने ही भाई के सरे आम कपड़े उतारकर मादरजात नंगा कर देने औररामायणको हिंदुओं की शरीअत का फतवा देकर अपनी कलम में पुरखों के कलम की कील गाड़कर तैयार किये गये ताजा सलीब में आदमी को जड़ देने की जिद-भर है।
                समाजवादी सोच नेरामायणको धार्मिक और पौराणिक बही-खाते के तआस्सुबी खाने में दर्ज करके हिंदी साहित्य के मूर्धन्य ग्रंथ को ही नहीं, बल्कि जनवादी और प्रयोगधर्मी रचनाकार तुलसी की मान्यता को समाप्त करने की ठान ली है। इससे भी आगे एलियट, मिल्टन, होमर, दांते, शेक्सपियर और मैथ्यू आनोल्ड की साहित्यिक पंूजी पर भी डाका डालने की बेअदबी की है।
क्रांतिकारी कदम: तुलसी ने अपनी काव्य-रचना में देवभाषा संस्कृत को नज़रअंदाज कर आम आदमी के बीच बोली जानेवाली अवधी भाषा का इस्तेमाल किया, जो तत्कालीन सामाजिक और राजनीतिक वातावरण में एक क्रांतिकारी कदम ही नहीं, एक बहुत बड़ा जुआ था। उन्होंने अपनी रचनाओं में रूढ़िवादिता और पाखंड का प्रबल विरोध और खंडन किया है। राम भक्ति के प्रबल समर्थक ने साफ-साफ स्वीकार किया है कि आदमी अपनी धार्मिक और आध्यात्मिक तुष्टि के लिए स्वयं समर्थ है। उसे किसी बिचैलिये या वकील की कोई जरूरत नहीं है और यही सोच उनके जनवादी होने का गवाह भी है।
                तुलसी धार्मिक कवि के रूप में प्रतिष्ठापित हैं, लेकिन उनके ऐतिहासिक संवेदन को नकारा नहीं जा सकता। तुलसी ने काव्य को धर्म और दर्शन से जोड़ने का काम बखूबी किया है। मिल्टन नेपैराडाइज लास्टमें इसी धर्म और दर्शन को अपने काव्य का विषय बनाया है। आदम के स्वर्ग से नीचे गिरने की कथा के जरिये मानवीय नियति का सवाल उठाया हैं। इसी को तुलसी ने भक्ति के अनुग्रह और आस्था से जोड़ा है।
                तुलसी और मिल्टन ने मानवीय मूल्यों के प्रति आस्था जगायी है। यही विश्वास और भक्ति दांते, शेक्सपियर और यूनानी नाटककारों की कृतियों में भी झलकती है। एलियट नेएश वेडनेसडेऔरफोर क्वार्टेट्समें ईसाई परंपरा से हटकर धर्म के साथ व्यक्तित्व को जोड़कर एक नया प्रयोग किया है। यही तुलसी ने भी किया है। राम-नाम महिमा का गुणगान परंपरागत धार्मिंकता से हटकर एक नये स्वरूप में उभरा है, जो आम आदमी की भावनाओं और विरासती मूल्यों के बीच एक पुल का काम करता है।
मनोरंजन का साधन: और आज भी यही पुल हिंदुस्तानियों के दिलों में प्यार, विश्वास और भाईचारे का जज़्बा जगाने का काम कर रहा है। हां,  इस पुल के नीचे दिमागी दिवालियेपन से तैयार किये गये काले अक्षरों के बारूद का पलीता सुलगाकर नफ़रत के एक जोरदार धमाके से चिथड़े हो गयी लाशों के लोथड़ों से सियासी जानवर अपनी भूख मिटाने की कोशिश में जरूर लगे हैं।
                इब्लीस के बेगैरत बेटों ने अपनी इसी भूख की खुराक के लिए जागरूक बुद्धिवादियों और प्रगतिशील कलम के बादशाहों के दिमागों के ईमान को कुछ सुविधाओं के बदले खरीदकर अपना जहनी गुलाम बना लिया है। सख़्त अफ़सोस की बात है कि फ़नकार कैफ़ी आज़मी को भीरामायणकी जिल्द पर रामभक्त जनवदी कवि तुलसी का मुकद्दस चेहरा नहीं दिखा। उन्हें गांधी और दशरथ पुत्र राम में फर्क दिखा। वह भी सियासी शिकारियों के हांके में सिर्फ हरकारे-भर होकर रह गये।
                रामायणधारावाहिक (दूरदर्शन पर दिखाया जानेवाला) हिंदुओं को गलत जानकारी देकर और कट्टर हिंदू बना रहा है-कहनेवालों ने यह भी नहीं सोचा कि भारत केशहरों में रहनेवाली आबादी में पीने का पानी भले ही घर-घर पहुंचा हो, लेकिन दूरदर्शन का डिब्बा बगै़र किसी भेदभाव के नब्बे फीसदी घरों में अपनी जगह बना चुका है। दूरदर्शन मुसलमान, हिंदू, ईसाई, सिख, बंगाली और मराठी नहीं है। सिर्फ मनोरंजन का साधन-भर है। फिर क्या फर्क पड़ता है कि देश का मानसहम लोग, बुनियाद, आश्चर्य दीपक, सिंहासन बत्तीसी, अदालत या रामायणसीरियल देखे और देखने के बाद उस पर चर्चा करें।
हम लोगके बाद कितने बसेसर पैदा हुए औरबुनियादके बाद सतबीर को किसने तलाश किया? दीपक दास को खोजनेवालों का समाचार किस अखबार में छपा? राजा विक्रमादित्य की तलवार से किस अन्यायी का सर कलम हुआ? ‘अदालतदेखने के बाद कहां अपराध रूके या बढ़े और कौन-सा तबका सीद्दे इन सीरियलों से जुड़कर उन पर अमल करने लगा? फिररामायणही एक खास फिरके को तआस्सुबी (सांप्रदायिक) कैसे बना रही है? इसके खतरनाक होने के पहलू पर कैसी बहस? क्या यह जहर हिंदुस्तानी फिजां में जानबूझकर फैलाया जा रहा हैं?
हीनता का प्रदर्शन!: रामानंद सागर के सीरियलरामायणके संवादों में इतिहास और भूगोल की तलाश करनेवाले लोग रामानंद सागर से अपनी मित्रता का दम भरते हुए उनके कंर्जों के बही-खाते पलटते हुए उनकी आमदनी पर नजरे गड़ाये उनके अंदर का झोलाछाप माक्र्सवादी निकालने का शोर मचाये हैं? क्या यह शोर उनकी हीनता के बोध का खुलासा नहीं करता?
रामायणसीरियल के जरिये दूरदर्शन हिंदुओं को धर्म की अफीम के नशे मंे गाफिल करने में लगा हैं-कहने वाले भूल जाते हैं कि पूरा सिनेमा उद्योग और दूरदर्शन सभ्य कहे जाने वाले समाज में ख्ंाूरेजी, हिंसा और नग्नता का मीठा जहर आहिस्ता-आहिस्ता घोलकर मानवीय रिश्तों को वहशियाना नंगेपन में तब्दील करता जा रहा है और प्रगतिशील सोच इसे तरक्की का रास्ता मानकर खादी के कुर्तों की लंबी और भारी जेबों पर अपनी गिद्व नज़रें गड़ायें सफेद कागजों को काला करके कार्लमाक्र्स की कब्र से लिपटकर फूट-फूटकर रोने में लगा है।
                इसमें कोई शक नहीं किरामायणका सफल व्यावसायीकरण जिस खूबसूरती से रामानंद सागर ने किया है, वह इससे पहले कभी नहीं हुआ, लेकिन रामलीलाओं के जरिये, कथावचकों के जरिये बारातों-जुलूसों के जरिये और दूरदर्शन पर दिल्ली की ख्याति प्राप्त नाट्य संस्था के जरिये रामलीला का भावपूर्ण प्रदर्शन करके लाखों बाररामायणकी नीलामी की गयी। तब कलम की जुबान खामोश क्यों रही?
दिमागी दिवालियापन: ‘रामायणसीरियल में अभिनय करने वाले कलाकरों के निजी जीवन में ताक-झांक करने वाले उनकेबेडरूमके किस्से चटखारे लेकर उजागर करने में, तो राम-सीता में रोमांस, कैकेयी में बाजारू वेश्या, सुपर्णखा में सेक्स, परशुराम और रावण में मवाली दादा, दशरथ में अपाहिज और लक्ष्मण में नक्सलवाद तलाशने में अपने दिमाग का दिवालियापन जाहिर कर रहे हैं।
                रामायणको पढ़े बिना ही प्रगतिशीलता का दावा करना और पूरे मुल्क को वैचारिक विद्रोह की दावत देना बेहद खतरनाक है। खासकर उस दौर में, जब नयी पीढ़ी अपनी सभ्यता, भाषा और मानवीय मूल्यों की जमीन से कटकर पश्चिम से उधार ली हुई नंगी संस्कृति के तूफान में बेलगाम उड़ान भरने की कोशिश में लगी है।

यह लेख बंबई से छपने वाले हिन्दी साप्ताहिकब्ल्ट्जिमें 7 नवंबर, 1986 के अंक में तब छपा था, जब रामानन्द सागर केरामायणसीरियल को हिन्दुस्तान के घर-घर में और विदेशों तक में देखा जा रहा था। उस समय हिन्दी जगत के स्वनामधन्य सेकुलर कथाकार, लेखक रामानन्दसागर के मित्र रहे सज्जन ने दूरदर्शन पर प्रसारितरामायणसीरियल के जरिये साम्प्रदायिकता फैलाने का आरोपगंगामासिक रविवारहिन्दी साप्ताहिक पत्रिकाओं में कई लेख लिखकर लगाया था। उन लेखों के जवाब में लिखे गये इस लेख को उस समय छपने वाले बड़े कहे जाने वाले अखबारों बड़े कद की दंभी पत्रिकाओं ने छापने से मना कर दिया था। आज की तारीख में उनमें सेब्लिट्जसहित अद्दिकांश का प्रकाशन बंद हो गया है।
            हिंदीब्लिट्जके अलावाप्रियंकापाक्षिक में भी इसे नवंबर, 1986 में छापा गया था। इस लेख के मूल मेंरामायणको पढ़ने की बात कही गई है, सो पाठकों के लिए एक बार फिर 23 वर्षों बाद इसे ज्यों का त्यों छापा जा रहा है।                                                -सम्पादक लेखक


तो यह है पत्रकारिता!
राम प्रकाश वरमा
अखबार यानी अनुशासन, खबर, बातचीत और रपट। इसी पर समूची पत्रकारिता टिकी है। इसके पहरेदारों के निशाने पर हमेशा छोटे अखबार और उनके पत्रकार रहे हैं। उनके मुख़ालिफ चिकने कागजों पर छपी रंगीन पत्रिकाओं में आये दिन चीखते चिंघाड़ते लेख लिखे जाते हैं।उलट-पुलट’, ‘किंग कोबराजैसे नामों के उदाहरण देकर उन्हें सौदेबाज ब्लैक मेलर, अराजक अपराधी तत्व ठहराने का शंख सूचना मंत्रालय की सीढ़ियों से लेकर संागठनिक सम्मेलनों के ताली बजाऊ सम्मेलनों तक पूरी ताकत लगाकर फूंका जाता है। इस साजिश में पत्रकारिता केस्लमएरियेसे निकलकर सत्ता के तखत पर जा बैठे लोग बराबर के साझीदार हैं। नए कानून बनाए जाने की वकालत के साथ पत्रकारिता की मर्यादाओं को सही ढंग से परिभाषित करने की पाखंडी कोशिशे भी की जा रही हैं।
                अनुशासन अत्यावश्यक है, लेकिन छोटे या अछूत कहे या माने जानेवालों से पहलेगांडुओं सुनो’, ‘पगलाया राहुल’, ‘हरामखोर गृहमंत्री इस्तीफा दो’, ‘कमीनावेल्थ’, जैसी अश्लील और अराजक सुर्खियां लगाकर अखबार की प्रसार संख्या बढ़ाने के साथ समूचे सरकारी तंत्र को ब्लैकमेल करनेवालों के साथ पहरेदारों की जमात क्या सलूक कर सकी है? आज तक बड़े संपादकों के संगठनएडीटर्स गिल्डया प्रेस कौंसिल ने मुंबई से छपने वालेसामना’, ‘दोपहर का सामनाके खिलाफ क्या कदम उठाए? इस अखबार के संपादक-पत्रकारों के खिलाफ कौन सी अनुशासनात्मक या दण्डात्मक कार्यवाही मौजूदा कानूनों के तहत की गई? अकेलासामनाही क्यों और भी कई अखबार उसके नक्शेकदम पर चलकर सनसनी फैला कर जनसामान्य को हिंसा के अखाड़े में ढकेलेने का अपराध कर रहे हैं।
                सच बेहद खतरनाक है। छोटे अखबारों की संख्या जहां अधिक हैं, वहीं वे देश के उन हिस्सों के आदमियों के हाथों में अपनी पहुंच बनाए है, जहां बड़े अखबार, टीवी आदि की पहुंच नहीं है। इसी वजह से आम आदमी की तमाम बुनियादी समस्याओं, निचले स्तर के भ्रष्टाचार और सियासत के जरिए होने वाले तमाम अपराधों को उठाने-उजागर करने का सेहरा इनछोटे-अछूतोंके सिर बंध जाता है। इसके अलावा सरकारी विज्ञापनों का एक हिस्सा भी इनअछूतोंके पास जा रहा है। इनकी वजह से बड़े अखबार के सरकारी सुविधाभोगी पत्रकारों को अपने अपने मालिकों के स्वार्थसिद्ध करने में गंभीर परेशानियों का सामना करना पड़ता है। इस सबसे खतरनाक और हैरतगंज साजिश छोटे अखबारों के मुखालिफ रची जा रही है। समूचे मीडिया को चंद बड़ों की मुट्ठी में कैद करने का खेल बेहद खामोशी से खेला जा रहा है। बड़े़ समाचार पत्रों के समूह उद्योगपतियों सत्ताधारियों की मिलीभगत से अरबों रूपयों की पूंजी लगाकर अखबारों के प्रकाशन का बड़ा हिस्सा अपने हाथों में सुरिक्षत करने की साजिश में लगे हैं, तभी तो हर जिले के अलग संस्करण एक ही जगह बैठकर छापे जा रहे हैं। इन संस्करणों के जरिये विज्ञापनों का सत्तर-अस्सी फीसदी हिस्सा हड़पा जा रहा है। इन संस्करणों की अनियमितताओं को पिछले दिनों आरएनआई ने पकड़ा था और कई अखबारों के कई संस्करण निलम्बित भी किये गये थे। मुट्ठीभर बड़े अखबार राजनैतिक दबाव बनाकर सरकारी तंत्र से मिलकर छोटे अखबारों के सफाये का अभियान चलाने की साजिश में पूरी संजीदगी से लगे हैं। खासकर हिंदी अखबार।
                छोटे अखबारों का तंत्र बेहद कमजोर है। उन्हें सरकारी विज्ञापन सीमित मात्रा में मिलते हैं। जो मिल रहे हैं, उनमें भी आये दिन नई नीतियों और भ्रष्टाचार का ग्रहण लग रहा है। गैरसरकारी विज्ञापन के बराबर मिलते हैं। केन्द्र सरकार के डीएवीपी राज्य सरकार के सूचना विभाग की रोज-रोज बनती नई नीतियों की गाज छोटे अखबारों पर ही गिरती है। बड़े कहे जानेवाले उनसे हर हाल में बाहर निकल जाते हैं। जो मान्यता समितियां गठित की जाती है उनमें छोटे अखबार के संपादकों को नुमाइंदगी देने से परहेज बरता जाता है। लब्बोलुआब यह कि छोटे अखबारों को सर्वमान्यअछूतघोषित कराने का खामोश षड़यंत्र जारी है।
                बहरहाल छोटे अखबारों को इसके मुखालिफ ईमानदार आवाज बुलंद करनी होगी। अपनी अगुवाई के लिए किसी कांशीराम की, किसी मायावती की तलाश करनी होगी? यह लाइने महज सनसनी पैदा करने के लिए नहीं हैं, वरन छोटे अखबारों के अस्तित्व पर आने वाले खतरे से आगाह करने के लिए लिखी गई है।

हाय..हाय.. कपड़े उतारूं?
प्रियंका संवाददाता
लखनऊ। नाच गाकर जीवनयापन करने वाले किन्नरों की उद्दंडता को नजर अंदाज कर देना या उसे महज मजाक में बदलकर टाल देना अब आम आदमी के लिए भारी पड़ने लगा है। पिछले महीने सीतापुर में सिधौली के गांव भण्डिया के गांधीनगर मोहल्ले में हसून के घर नेग मांगने गये किन्नरों की टोली ने इस कदर उत्पात मचाया छीना झपटी की कि नवजात बच्चे की हाथ से छूट जाने पर मृत्यु हो गई। दूसरी घटना इसी साल जनवरी में सप्रू मार्ग पर वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक आवास के सामने बाइक के शोरूम में हजारों रूपया नेग मांगने को लेकर इस कदर हंगामा काटा कि कर्मचारी सहित वहां मौजूदा ग्राहकों को भागने के लिए मजबूर होना पड़ा। शोरूम प्रबन्धक के एतराज जताने पर किन्नर अपने कपड़े उतारने लगे और हाथापाई पर उतर आये। लगभग पांच साल पहले अशोक मार्ग पर नये खुले एक रेस्टोरेन्ट में नेग मांगने को लेकर इन हिजड़ों ने अपने पूरे कपड़े उतारकर फेंक दिये थे। घंटों हंगामा काटा था। पुलिस भी दूर खड़ी तमाशा देखती रही थी।
                नेग वसूलने को लेकर किन्नरों के गुटों में भी आये दिन झंझट-झगड़े होते रहते हैं। इसी साल जनवरी महीने में लखनऊ के सआदतगंज कोतवाली गरमियों की शुरूआत में बाजारखाला थाने पर किन्नरों ने धरना प्रदर्शन कर हंगामा काटा था। पुलिस ने दोनों गुटों में बमुश्किल समझौता कराया था। नेग वसूलने यौन धंधों के चलते हमले, अपहरण हत्याओं की वारदातें तक हो रही हैं।
                पिछले साल अगस्त में 16 साल के किशोर अंकुश के अपहरण की रपट उसके पिता ने किन्नर शानू के मुखालिफ लखनऊ की आलमबाग कोतवाली में लिखाई थी। पुलिस पड़ताल में किन्नर शानू को इस किशोर की प्रेमिका बताया गया। हकीकत को आसानी से समझा जा सकता है। जनवरी, 10 में बाजारखाला क्षेत्र के रहनेवाले किन्नर अल्ताफ उर्फ टुन्नी (41) को उसके प्रेमी/पति अनवर ने अपने दोस्तों राजू मस्तान अशोक के साथ मिलकर काकोरी के जमालपुर पुलिया के नीचे नाले के पास गला रेतकर मार डाला था। यह हत्या रूपयों की उधारी चुकाने प्रेमिका किन्नर टुन्नी से पीछा छुड़ाने को लेकर हुई थी। गये महीने बिल्लौचपुरा इलाके में रहने वाले हाजी चम्पा किन्नर पर कातिलाना हमला हुआ। इस हमले के पीछे भी नेग वसूलने का झगड़ा बताया गया।
नेग वसूलने में किन्नरों ने सारी हदें तोड़नी शुरूकर दी हैं। हर त्यौहार पर दुकानदारों से, घरों से आॅटो रिक्शा चालकों तक से नेग वसूलते हैं। व्यावसायिक काम्पलेक्सों के व्यापारिक कार्यालयों में नेग मांगते समय अनाप-शनाप रकम की मांग करते हैं। इसी तरह बच्चों के जन्म, विवाह, गृहप्रवेश आदि अवसरों पर 5 से 10 हजार रूपयों की मांग करते हुए झगड़ते हैं। आम मध्यम वर्गीय परिवारों में ही इनकी पहुंच है और वे लोग इतनी लम्बी रकम दे नहीं पाते सो किन्नरों की टोली नंगई पर उतर आती है। कई बार तो ये लोग अपने कपड़े उतार कर नाचने गाने की अश्लीलता के सहारे जबरिया वसूली कर लेते हैं।
                किन्नरों की जमात ने इधर राजनीति, फैशन से लेकर अपराध जगत तक में खासी धमक बनाई हैं। आए दिन हत्या से लेकर लूट की वारदातों में इनके जुड़े होने की खबरें रही हैं। कई किन्नर लखपति ही नहीं करोड़पति भी हैं। इन परटैक्सका कोई कानून नहीं लागू होता? दिसम्बर, जनवरी, महीने में मुंबई, गोवा में किन्नरों के लिए फैशन शो और सुपर क्वीन प्रतियोगिताएं तक आयोजित हुई। इन आयोजनों में अभिनेता सलमान खान, अभिनेत्री जीनत अमान, सेलिना जेटली, समाज सेविका परमेश्वर गोदरेज, फैशन डिजाइनर तरूण तहिलयानी तक शामिल हुए थे। इसे हिजड़ों और समलैंगिकों के लिए काम करने वाली लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी ने आयोजित कराया था। गौरतलब है कि मुंबई, गोवा आदि शहरों में बाकायदा यौनकर्मियों की तरह हिजड़े भी जिस्म बेचने का धंधा करते हैं। कई जगहों पर तो सजे-धजे किन्नरों का पूरा बाजार पुराने वेश्वालयों की तर्ज पर हैं। हाल ही में विक्रोली पार्क साइट और सांताक्रुज इलाके के समलैंगिकों हिजड़ों के बीच एक दूसरे के इलाके मेंधंधाकरने को लेकर जबर्दस्त मारपीट हुई थी।
                मुंबई की तर्ज पर लखनऊ में भीनजाकत क्वीनके चुनाव के लिए किन्नरों के लिए सौन्दय्र प्रतियोगिता के लिए आॅडीशन हुए थे। इसे वी.केयर एफ.एम. इण्टरनेशल कारपोरेट समूह ने आयोजित किया था। इसमें जज की भूमिका ख्यातिनाम किन्नर गुरू पायल (लखनऊ से चुनाव भी लड़ चुकी) प्रसिद्ध रंगकर्मी उर्मिल कुमार थपलियाल ने निभाई थी। इसी संस्था ने नजाकत डाॅट काॅम नाम से वेबसाइट भी बनाई है। इस साइड में किन्नरों के तमाम ब्यौरे दर्ज है। इस साइड पर किन्नरों की बदसलूकी की शिकायत दर्ज कराने की भी सुविधा बनाई गई है।
                यहाॅ बताते चलें कि लखनऊ में लगभग 3600 किन्नर हैं, इनमें एक हजार पढ़े-लिखे हैं। बावजूद इसके नेग मांगने का बेहूदा तरीका अपनाने या जबरिया मुंहमांगी रकम वसूलने के लिए अश्लीलता या मारपीट करना किन्नरों की आम आदत में शुमार है। मजे की बात है इनके साथियों में एक लम्बी फौज जो वाद्ययंत्र बजाती है या अन्य घरेलू कामों के लिए साथ रहती हैं, वो भी इनके झगड़ों में सहयोगी होते हैं। ऐसे ही तमाम युवक यौनानंद या यौनकर्म के जरिए पैसा कमाने के लिए इनके साथ रहते हैं। कुल मिलाकर हिजड़ा होना अभिशाप से अधिक मोटी कमाई के धंधों में बदलता जा रहा हैं। इसके साथ ही अपराध भी इनके घुंघरूओं, ढोलक की थाप और तालियों की लय पर नृत्य कर रहा है। यह बेहद गंभीर है, इस पर शासन और समाज दोनों को संजीदगी से सोचना होगा। हाल ही में खबर आई है कि नगर निगम इनका पंजीकरण करने इनके नेग की रकम तय करने की योजना बना रहा है। ऐसा होना आम नागरिकों के लिए बेहद शुभ होगा

आदमी की जेब फाड़ रहे हैं, बिजली वाले
प्रियंका संवाददाता
लखनऊ। शहर को रोशनी से जगमगाने वाले ऊर्जा विभाग के कितने ही कारनामों का खुलासा करिये। कुछ भी लिखिये, मगर इसके ढीठ अधिकारी कर्मचारी झूठ और बेईमानी के बलबूते जहां उपभोक्ताओं का जमकर शोषण करते हुए अपनी जेबें भरने में लगे हैं, वहीं सरकारी खजाने को भरने के लिए भी नई तरकीबें लगाकर उपभोक्ताओं की जेबें फाड़ रहे हैं। यह सब तब होता है, जब रिश्वत की रकम के साथ राजस्व वसूली बढ़ाने का दबाव ऊर्जा मंत्रालय शक्तिभवन में बैठे आला हाकिमों द्वारा विद्युत वितरण कं0 पर बनाया जाता है।
                गौरतलब है लेसा हर महीने उपभोक्ताओं को उनके घरों पर मीटर रीडर भेजकर बिल उपलब्ध कराती है। आम तौर पर मीटर रीड़िग की तारीखें इलाकेवार तय होती हैं। जो तीस दिनों के अंतराल को पूरा करने के बाद की होती है। इधर एक नया चलन शहर के अद्दिशासी अभियंताओं ने मुख्य अधीक्षण अभियंताओं की देखरेख में शुरू किया है। उपभोक्ताओं के घरों में मीटर रीडर रीडिंग के लिए तीस की जगह पैंतालिस दिनों में भेजा जा रहा है। इसकी खास वजह है, छोटे उपभोक्ताओं से अधिक पैसा उगाहना। उदाहरण के तौर पर एक किलोवाट घरेलू कनेक्शन धारक उपभोक्ता तीस दिनों में डेढ सौ यूनिट से कम ही बिजली उपयोग करते हैं। इसके पीछे उनका अपना मासिक बजट होता है। डेढ़ सौ यूनिट तक उपयोग करने पर विद्युत मूल्य लगभग दो रूपया प्रति यूनिट पचास रूपया फिक्स  विद्युत कर 13 रुपए यानी कुल तीन सो तिरसठ (300$50$13µ363) रुपये वसूले जाते हैं। इसी एक किलोवाट वाले उपभोक्ता से पैंतालिस दिनों में एक सोै चैरासी यूनिट रीडिंग पर विद्युत मूल्य 3.45 रू0 प्रति यूनिट की दर से फिक्सड 65 रू. कर 16.56 रू0 यानी कुल 716.36 रू. वसूले जाते हैं। केवल 34 यूनिट बढ़ जाने से उपभोक्ता को महज डेढ़ माह में दोगुना भुगतान करना पड़ रहा है। जबकि यही भुगतान उसे तीन सौ यूनिट उपयोग करने पर (प्रतिमाह 150 यूनिट के हिसाब से) दो माह के बिलों पर देना होता। उस पर तुर्रा यह कि उपभोक्ता के पूछने पर बड़ी ही रौबदार आवाज में विद्युत दरों को अभियन्तागण गिना देते हैं। सवाल यहां यह उठता है कि आखिर पैसा देने वाले उपभोक्ताओं के साथ इस तरह का खिलवाड़ क्यों हो रहा है? जबकि बड़े उपभोक्ताओं से लाखों करोड़ों का बकाया वसूलने में परहेज बरता जाता है।
                अभियंताओं का ढीठ जवाब भी सुन लीजिए, उपभोक्ता को अपनी रीडिंग लेकर भुगतान केन्द्र आकर अपना बिल निकलवा लेना चाहिए। जबकि केन्द्र पर रीडिंग लेकर जाने पर जवाब दिया जाता है कि मीटर रीडर आपके क्षेत्र में ही है एक-दो दिन में बिल आपको मिल जाएगा, तब बिल लेकर आइएगा। दरअसल इसके पीछे राजस्व बढ़ाने के साथ मीटर रीडिंग करने वाली कंपनी से कमीशन और रीडरों के जरिये अवैध कमाई के रास्ते पुख्ता किये जाते हैं। यहां बता दें कि छोटे उपभोक्ताओं की बिजली उपयोग करने की क्षमता सौ से डेढ़ सौ यूनिट से अधिक होती ही नहीं। ऐसे में यही अभियंता घरों में जांच करने के बहाने उपकरणों की गिनती करते हैं। उनमें ट्यूब बल्ब, सीएफएल, टी.वी., फ्रिज, कूलर, ओवन, मिक्सी सब के स्विच एक साथ जोड़कर उसे डराते हैं। जबकि साधारण सी बात है कि यह सभी उपकरण एक साथ नहीं इस्तेमाल हो सकते, आवश्यकतानुसार ही उन्हें आदमी उपयोग करता है। यह सभी राजस्व वसूली बढ़ाने का एक तरीका है। इसके अलावा फर्जी बिलिंग, हाई-लो वोल्टेज से उपकरण फंुकने जैसी समस्याएं आम है।
                यहां यह बताना बेहद जरूरी है कि लेसा के भुगतान केन्द्रों पर सर्वर खराब होना रोज की बीमारी है। इससे त्रस्त उपभोक्ता कई-कई चक्करों के बाद अपने बिलों का भुगतान जमा कर पाते हैं। कई बार तो काम की अधिकता के कारण लोग बाग बिल नहीं जमा कर पाते तो कभी कनेक्शन काट दिया जाता है तो कभी बेवजह ही ब्याज जोड़ दिया जाता है। मजे की बात है किसर्वरडाउनका ठीकरा बीएसएनएल के सर फोड़कर अभियंता अपनी खाल बचा लेते हैं, लेकिन उपभोक्ता क्या करें?
                क्या इन अभियंताओं या आला हाकिमों से यह कहना या चेताना जरूरी नहीं होगा कि उपभोकता ही आपका नियोक्ता है। यदि वह बिजली के उपयोग का भुगतान नहीं करेगा या सरकारी बिजली का उपयोग ही बन्द कर देगा तो क्या होगा? यहोअगर-मगरसे परे वैकल्पिक श्रोतों को
ध्यान में रखकर सोचने की बेहद जरूरत है। ग्रामीण, कस्बाई छोटे शहरी इलाकों में जहां विद्युत आपूर्ति महज चार-पांच घंटे है वहां जेनरेटर सेट से घरेलू बिजली जलाने के साथ उद्योग तक चलाए जा रहे है। यह हास्यास्पद लइने नहीं है वरन् आपदा आने से पहले की चीख-चिल्ललाहट है।

हैल्लो... बाथरूम में हूं..यार!
विशेष संवाददाता
लखनऊ। साहब बाथरूम में हैं, थोड़ी देर बाद फोन करिएगा। साहब टायलेट में हैं। या साहब पूजा कर रहे हैं... जैसे जुम्ले अक्सर आदमी को झुंझलाने के लिए मजबूर कर देते थे। आज नई तकनीक ने इसे उलट दिया है। अब नये जमाने के साहब. ‘सरऔर मेमसाहबमैममें बदल गये हैं। अब फोन पर सर/मैम कहते सुनाई पड़ते हैं, ‘ओह..यार बाथरूम में हूं या आय.. एम इन बाथरूम.. एनी प्राब्लम.. ऐसा करो सभी को मीटिंग हाल मेंइन आॅवरपहुंचने को बोल दो। आय.. कम जस्ट.. .के।गो कि जमाना बदल गया है। समूचा कारपोरेट जगत और नई पीढ़ी कम्प्यूटर, लैपटाॅप, मोबाइल बायरलेस फोन पर चाक चैबन्द है। इन्हीं उपकरणों पर समूचे आफिस की कार्यक्षमता टिकी है। आॅफिस हो या सड़क, बाथरूम हो या बेडरूम, किचेन हो या कार, स्कूटी हो या बाइक, आॅटो हो या रिक्शाा, टाॅयलेट हो या श्मशान कहीं भी मोबाइल फोन की घंटी बजी और बातों का सिलसिला शुरू। सड़कों पर चलते हुए कान में सुनने वाला यंत्र (इयर फोन) ठूंसे लड़के-लड़कियों को देखना सामान्य बात है। कई बार किशोरवय की पीढ़ी को मोबाइल पर अधिकांश समय बातें करते हुए देखकर आश्चर्य होता  है, लेकिन सत्य जानकार बड़ा ही क्लेश हुआ।प्रियंकाने सौ किशोर-किशोरियों से जानने की कोशिश की कि वे मोबाइल फोन पर इतनी देर तक किससे क्यों बातें करते हैं।
                इस युवा हो रही पीढ़ी में कई तो बातों के दौरान नाराज हो गये। वे गुस्से में बोले, ‘मोबाइल पर बातें करें तो क्या घर की दीवारों से या सन्नाटे से बातें करें। मम्मी-पापा आॅफिस में भाई/दीदी काॅलेज में या बोर्डिंग में रहते हैं। ऐसे में दोस्तों/सहेलियों से बातें करें तो किससे करें? अधिकतर युवा अपना अकेलापन दूर करने के लिए मोबाइल फोन का इस्तेमाल करते हैं। वहीं कामकाजी युवा अपने कार्यक्षेत्र में हर समय अपनी मौजूदगी बनाये रखने के लिएहाइटेकरहना चाहते हैं।
                पुरानी पीढ़ी को भले ही अच्छा लगे लेकिन सच यही हैं कि अब टायलेट में अखबार पढ़ने का जमाना गया। आज बाथरूम/टाॅयलेट नये दफ्तर बनते जा रहे हैं। नई पीढ़ी बाथरूम में बेहद गोपनीयता का अहसास करती है। वहां लैपटाप पर काम करना या फोन पर काम की बातें करना उसकी कार्यशैली का अहम् हिस्सा बनता जा रहा है। हां, रोमांस के लिए तो बाॅथरूम हमेशा से नायाब जगह रही है। सो जमाना गया है, मैं बाॅथरूम में हूं और तुम...?

लड़कियां भी छेड़ती हैं.... लड़के!
प्रियंका संवाददाता
लखनऊ। ... बास्टर्ड... तुझे अपनी गाड़ी खुद देखनी चाहिए थी। .... मगर ब्रेक तो तुमने मारे थे। आगे वाले ने मारे तो मैंने भी बे्रक लगाना ही था.... न। मेरे हाथ की चोट का क्या...? जाता है या उतारूं चप्पल!
                हाय हैंडसम... लिफ्ट... जस्ट नेक्सट् क्रासिंग। मगर गाड़ी फर्राटे भरती आगे निकल गई। स्साला... बोरिंग।
                ओए गोलके... चलेगा। किधर...? फन में... कोई शरारत नहीं। .के. पर यार पप्पी झप्पी तो चलेगी।... ओनली वन..!
                ये वो जुम्ले हैं जिन्हें शहर के किसी भी आॅटो/बस स्टैंड के आस-पास की हवा में उछालंे मारते हुए किसी समय देखा जा सकता हैं। किशोर युवा लड़कियों में आए बदलाव ने फैशन के साथ उनके आचरण, व्यवहार ने भी खासी तरक्की की है या शायद आजादी हासिल की है। आजादी का अर्थ उद्दंडता और फैशन का अर्थ शारीरिक उपकरणों का प्रदर्शन भर है, शायद।
पिछले दिनों अखबर में गाजियाबाद से एक खबर छपी थी, चार-पांच लड़कियों ने उनकी मनचाही ब्रांड की सिगरेट देने पर पानवाले से मारपीट की काफी देर तक उसकी दुकान पर बवाल काटा। इसी तरह की एक खबर हाल ही में देश भर के अखबारों में छपी थी, गुड़गांव में डीएलएफ फेज-2 के नाइट राइडर शराब ठेके के सेल्समैन के साथ शराब के नशे में टुन्न युवती को अश्लील हरकतें करने के प्रयास में पुलिस ने गिरफ्तार किया। युवती हिमांचल की रहने वाली है और डीएलएफ फेज-3 में अकेले रहती है।
ये दोनों घटनाएं अपवाद कही जा सकती हैं, लेकिन लखनऊ से लेकर कस्बों तक सिगरेट, शराब, कंडोम, 72 आॅवर पिल्स, सेक्स पाॅवर पिल्स/ आॅयल खरीदते हुए युवतियों को देखा जा सकता है। इसके अलावा छोटे-बड़े शहरों के होटलों में कमरों में घंटों के हिसाब से ठहरने वाले युवा जोड़ों की बढ़ती तादाद भी देखी जा सकती है। इनमें सभ्रांत परिवार की शादीशुदा युवतियों की संख्या भी खासी है। शायद तलाक के बढ़ते मामलों में इसआजादीका भी दखल हो।
                गौरतलब है पूरे देश में तलाकशुदा अकेले रहने वाली महिलाओं की संख्या 20.34 लाख है। उप्र में यह संख्या बेशक कम है, लेकिन दिनोंदिन तेजी से बढ़ रही है। दहेज, उत्पीड़न, संपत्ति से बेदखली, यौनहिंसा जैसे कारण भी युवतियों के अकेले रहने के बडे कारण हैं। बावजूद इसके येअकेलीनाम की संज्ञा जिसआजादीका भोग करने की इच्छा पाले उद्दंडता की सीढ़ी चढ़ रही हैं वह भारतीय समाज को शायद ही स्वीकार हो, क्योंकि आजादख्याली की बुलंदी पर बैठी युवती भी विवाह के मंडप मंे परम्परागत गुड़िया या दुल्हन के लिबास में सजधज कर ही वरमाला अपने हाथों में थामती है। फिर मंगल-सूत्र, मेहंदी, बिंदिया, बिछिया, मांग में सिन्दूर का छोटा सा तिलक और पांव के पंजों में महावर सजाए पिया...पिया... पिया... गीत गाती नजर आती हैं।
                तो टेलीविजन के पर्दे पर उछलती पेशेवर लड़कियों की नकल करके लड़कों से छेड़छाड़ करने से क्या हासिल होगा? यह एक गंभीर सवाल है। इसका जवाब अकेले युवतियों को ही नहीं उनके माता-पिता पूरे परिवार को तलाशना होगा।