Friday, November 9, 2012

माँ तेरी ही बीमार है

ओ पुत्र! सुन धैर्य से,
तेरी छह फुट साठ किलो की
काया में रक्त जो दौड़ रहा है
चूसा है तूने अपनी मां के तन से।
उद्दंड आवाज नीची कर
मां तेरी ही बीमार है
आज भी तेरे काटे का
घाव टीसता है मां के स्तन से।
एक रात तू तप रहा था
बुखार में आग सा
न सोने दिया उसने किसी
देवी देवता को, सबको सुमिरा मन से।
डाॅक्टरों ने कह दिया था
अब भगवान ही बचा सकता है
आँगन में लगी तुलसी के आगे
रात भर आँसू उसके बहते रहे सावन से।
और जिस पेड़ के नीचे है खड़ा
तू जिसे पूजता है पिता मान
उसे भी उसने सींचा है अपने बदन से।
अरे मूर्ख, वो नहीं चीखेगी
दर्द को भी उसने ही है पाला पोसा
उसका है वो बड़ा बेटा
वही साथ है रहा उसके पूरे जीवन से।
माँ तेरी ही बीमार है।
माँ तेरी ही बीमार है।
माँ तेरी ही बीमार है।
माँ तेरी ही बीमार है।
-राम प्रकाश वरमा
09839191977

DEEPAWALI PER BADHAI

मित्रो,
दीपावली पर शुभकामनाएँ .जब माता लछमी के आगे दीपक जलायें तो एक दीपक मेरे नाम का भी .............
जला ................मै भी आपकी मुडेर पर एक छोटा सा चिराग बन आपकी ख़ुशी में रौशन हो सकुंगा
                 


                                 शुभकामनाएं            

सूरज ढले ,दीप जले ,फिर हम तुम मिले ,
प्यार से गले मिले,  हो गई दीवाली .
          राम प्रकाश वरमा 

Tuesday, November 6, 2012

हिन्दी के स्वर्णयुग में भी था बाजार


आरोप और आलोचना के नामवर प्रेमचंद्र की फोटो पर अपने पंजों के बल खड़े होकर गुलाब के फूलों की माला पहनाते हुए हिन्दी के स्वर्णयुग को जातियों के खांचे में बांटने का अपराध जानबूझकर लगातार करते रहे हैं। उस पर जिद यह कि उसे शोध मान लिया जाए। ऐसा ही एक प्रयास ‘हिन्दुस्तान’ हिन्दी दैनिक समाचार-पत्र 26 जुलाई, 2000 के अंक में ‘लखनऊ की अदालत में प्रेमचंद के खिलाफ नालिशे दीवानी’ लेख के जरिये किया गया था। उसके उत्तर में मैंने स्वयं सुबूतों व प्रेमचंद की स्वीकारोक्ति के साथ लेख लिखा, जिसे ‘एक पहलू यह भी’ के शीर्षक से उसी पृष्ठ पर 30 अगस्त, 2000 के अंक में ‘हिन्दुस्तान’ ने छापा था। नई पीढ़ी के लिए एक बार फिर यहां छापा जा रहा हैं। -संपादक
    चिता की ठंडी राख से पवित्र भूमि पर आड़ी तिरछी रेखाएं खींचकर उसके पुण्य को, उसकी कीर्ति को, उसकी पवित्रता को कालंकित नहीं किया जा सकता। और न ही सच के मुंह में झूठ की जुबान डाली जा सकती है। जब-जब ऐसे प्रयास होते हैं, तब-तब नई पीढ़ी को इतिहास के जंगलों में भटकना पड़ता है। हिन्दी के माथे की बिन्दी प्रेमचन्द अकेले ‘मोटे रामजी शास्त्री’ या ‘सोजेवतन’ के लिए ही नहीं विवादों में फंसे थे, वरन ‘रंगभूमि’ थैकरे के ‘वैनिटी फेयर’ व ‘कायाकल्प’ हालकेन के ‘एटर्नल सिटी’ पर आधारित होने के विवाद में भी फंसे थे। यह दोनों विवाद उस समय की ख्याति प्राप्त पत्रिका ‘सरस्वती’ व ‘सुधा’ में छपे थे। प्रेमचन्द के स्पष्टीकरण भी छपे थे। बावजूद इसके पं. दुलारेलाल भार्गव ने अपने प्रकाशन ‘गंगा पुस्तक माला’ से ‘रंगभूमि’ को 1924 में प्रकाशित किया। ‘रंगभूमि’ के लिए पं. दुलारेलाल भार्गव ने आठारह सौ रूपया उस समय दिया था।
    प्रेमचन्द की रंगभूमि तथा थैकरे के ‘वैनिटी फेयर’ के साम्य को श्री अवध उपाध्याय ने सरस्वती के सन् 26 की अंकों में ‘गणित के समीकरणों’ द्वारा प्रमाणित करने की चेष्ठा की थी। प्रेमचन्द ने ‘अपनी सफाई’ में इसका स्पष्टीकरण स्वयं कर दिया था। फिर भी वह लेखमाला निकलती ही रही थी। बाद में श्री रूद्र नरायण अग्रवाल ने एक विस्तृत लेख द्वारा श्री उपाध्याय के आरोपों का पूर्णतः खंडन किया था।
उपाध्याय जी के आरोप
1- एक से अधिक नायक-नायिकाओं का समावेश।
2-वैनिटी फेयर की अमेलिया, रंगभूमि की सोफिया से, जिसमें कुछ भाग ‘वैनिटी फेयर’ के दूसरे नारी पात्र रेबेका का भी है, काफी मिलती-जुलती है।
3-रेबेका का, संभवतः सोफिया के साम्य से बचे हुए अंश का, इंदु का साथ साम्य है।
4- जार्ज आसवर्न का विनय से साम्य है।
    श्रीमती गीतालाल एम.ए., पी.एच.डी. रंगभूमि पर थैकरे के ‘वैनिटी फेयर’ का प्रभाव उसके नाम के चुनाव अथवा विस्तृत पट की दृष्टि से पड़ा है। पर नारी पात्रों पर तो अवश्य नही है।
    इसी प्रकार एक लेख में शिलीमुख ने प्रेमचन्द की ‘विश्वास’ कहानी को हालकेन के ‘एटर्नल सिटी’ पर पूर्णतः अवलम्बित बताया था (सुधा 10/27) यह कहानी पहले ‘चांद’ में छपवायी थी। फिर ‘प्रेम प्रमोद’ नाम कहानी संग्रह में उसने पहली कहानी का स्थान पाया, शिलीमुख का कहना था कि ‘एटर्नल सिटी’ एक उपान्यास है और ‘विश्वास’ एक कहानी, इसलिए प्रेमचन्द की रचना उस पर अवलम्बित होने पर भी तर्कयुक्त और संगत नहीं हो सकी है, बल्कि विकृत और अविश्वसनीय हो गयी है। इस लेख के साथ ही प्रेमचन्द जी का प्रतिवाद शीर्षक से सुधार सम्पादक श्री दुलारे लाल भार्गव के नाम प्रेमचन्द का पत्र भी छपा था। उन्होंने ‘शिलीमुख’ के आरोपों को इन शब्दों में स्वीकार किया था।
    प्रिय दुलारे लाल जी!
हमारे मित्र पं. अवध उपाध्याय तो ‘काया कल्प’ को ‘एटर्नल सिटी’ पर आधारित बता रहे थे। मि. शिलीमुख ने उनको बहुत अच्छा जवाब दे दिया। मैं अपने सभी मित्रों से कहा चुका हूं कि ‘विश्वास’ केवल हालकेन रचित ‘एटर्नल सिटी’ के उस अंक की छाया है। जो वह पुस्तक पढ़ने के बाद मेरे हृदय पर अंकित हो गया।.... छिपाने की जरूरत न थी और न है। मेरे प्लाट में ‘एटर्नल सिटी’ से बहुत कुछ परिवर्तन हो गया, इसलिए मैंने अपनी भूलों और कोताहियों को हालकेन जैसे संसार प्रसिद्ध लेखक के गले मढ़ना उचित न समझा। अगर मेरी कहानी ‘एटर्नल सिटी’ का अनुवाद, रूपांतर या संक्षेप होती, तो मैं बड़े गर्व से हालकेन को अपना प्रेरक स्वीकार करता। पर ‘एटर्नल सिटी’ का प्लान मेरे मस्तिष्क में आकर न जाने कितना विकृत हो गया। ऐसी दशा में मेरे लिए हालकेन को कलंकित करना क्या श्रेयकर होता?... फिर भी मेरी कहानी में बहुत कुछ अंश मेरा है, चाहे वह रेशम में टाट का जोड़ ही क्यों न हों?
-‘प्रेमचन्द’।
    प्रेमचन्द जी की ‘मोटेरामजी शास्त्री’ कहानी ‘माधुरी’ में छपने के बाद सवर्णवादी लेखकों-सम्पादकों के बीच कोई गदर नहीं मची थी। यह सब उस युग के बाजारवादी और उपभोक्तावादी संस्कृति का तमाशा भर था। इसे उसी दौरान प्रेमचन्द जी ने भी स्वीकार किया है, ‘इस होड़ के युग में अन्य व्यवसायों की भांति पत्र-पत्रिकाओं को अपने स्वामियों या संचालकों को नफा देने या अपने अस्तित्व बनाये रखने के लिए तरह-तरह की चालें चलनी पड़ती हैं। यूरोप वाले तो शब्दजाल या पहेलियों या लाटरियों का लटका निकालते हैं... हिन्दी में धन के अभाव से और ढंग से चालें चली जाती हैं। पत्र में किसी तरह का विवाद छेड़ दिया जाता है या कला के नाम पर अर्द्धनग्न चित्र दिये जाते हैं। (उत्तर प्रदेश: प्रेमचन्दविशेषांक जुलाई, 1980 पृष्ठ 106 सू. एवं ज.सं.वि.)। इसके अलावा प्रेमचन्द स्वयं भी सवर्ण ही थे। रही ब्राह्मणवादी लेखकों की घबराहट या हिन्दी के महारथी साहित्यकारों के गोलबंद आक्रमण की बात, तो इन्हीं ब्राह्मणवादियों ने प्रेमचन्द को सशक्त कथाकार बनने में सहयोग दिया। हिन्दी पुस्तक एजेंसी, गंगा पुस्तक माला जैसे प्रकाशन संस्थाओं के मालिक और ‘सरस्वती’, ‘माधुरी’, ‘सुद्दा’ के सम्पादकगण ब्राह्मण व सवर्ण ही थे। पं. दुलारे लाल भार्गव ने ही 1924 में उन्हें सबसे पहले लखनऊ बुलाया और अपनी बाल पत्रिका ‘बाल विनोद वाटिका’ का सम्पादक सौ रूपये मासिक पर नियुक्त किया तथा रहने हेतु मैक्सवेल प्रेस, लाटूश रोड (डाॅ. पाठक के सामने) की इमारत के पिछले हिस्से, जिसे गंगा फाइन आर्ट प्रेस हेतु किराये पर ले रखा था। अस्थाई रूप से साठ रूपये मासिक पर प्रबंध कर दिया। काफी समय वे वहीं रहे, फिर गणेशगंज चले गये। 1925 के आखिर में प्रेमचन्द्र बनारस वापस चले गये। अपनी आर्थिक दशा में सुधार न होते देखा फिर 1927 में ‘माधुरी’ में आ गये जहां 1930 तक रहे। पं. दुलारे लाल भागर्व सम्पादक, प्रकाशक, मुद्रक, कवि, लेखक और दुर्लभ हिन्दी सेवक थे। उन्होंने केवल प्रकाशन व्यवसाय नहीं किया वरन सैकड़ों लेखकों का परिचय हिन्दी जगत में कराया। जब निराला जी की ‘जूही की कली’, ‘सरस्वती’ से वापस हो गयी तो उसे ‘माधुरी’ में भार्गव जी ने ही छापा। निराला जी का पहला कहानी संग्रह ‘लिली’ से लेकर पं. अमृतलाल नागर तक का पहला उपन्यास भार्गव जी ने ही छापा था। उस समय लखनऊ में हिन्दी का परचम लहराने वालों के अग्रज थे पं. दुलारेलाल भार्गव। साहित्यकारों, पत्रकारों, नौकरशाहों और हिन्दी के दुलारों ने ही उस समय को हिन्दी का ‘स्वर्ण युग’, ‘दुलारे युग’ तक कहा है। पं. दुलारेलाल भार्गव ‘सुधा’, ‘माधुरी’ के अलावा ‘भार्गव पत्रिका’ के सम्पादक भी रहे। उनकी अनुपम कृति दुलारे दोहावली’ पर ओरछा नरेश की ओर से प्रथम देव पुरस्कार (अयोध्या सिंह जी उपाध्याय ‘हरिऔध’ द्वारा रचित ‘प्रिय प्रवास’ के मुकाबले) दिया गया था। सच यह है कि पं. दुलारेलाल भार्गव हिन्दी जगत के देदप्यिमान नक्षत्र हैं। इसे उस समय सभी ने मुक्त कंठ स्वीकार किया। बाद में हिन्दी का साफ और विशाल आकाश हिन्दी भाषियों ने ही अपने दंभ के बादलों से ढंक दिया। इससे भी आगे कहा जा सकता है कि अपनी मां को गाली देने वालों की जमात का बोलबाला हो गया।
    और अन्त में दो बातें। आधुनिक हिन्दी साहित्य का इतिहास बगैर पं. दुलारे लाल भार्गव के पढ़ाने वाले, हिन्दी साहित्य के साथ, नई पीढ़ी के साथ लगातार विश्वासघात कर रहे हैं। इन विश्वासघातियों को पहले पूरी ईमानदारी के साथ पं. दुलारेलाल भार्गव के बारे में पढ़ना, जानना चाहिए। यह भी देखना और समझना चाहिए कि सत्तर-अस्सी बरस पहले लखनऊ में हिन्दी जिस भव्य भवन में विराजमान थी आज उसे जर्जर किसने किया है? प्रेमचन्दजी अपने पारिवारिक मामलों में भी विवादित रहे। जबकि सच केवल इतना था कि यही उनकी शेहरत का कारण बनता। श्रीमती शिवरानी देवी से विवाह को लेकर भी तमाम हल्ला मचा।
    वास्तव में प्रेमचन्दजी विधुर थे और शिवरानी देवी विधवा। उस समय ऐसे विवाहों का चलन नहीं था। लेकिन यह विवाह आदर्श तो था ही। चुनांचे प्रेमचन्द अपमान के मित्र इसलिए रहे कि वे गरीबों, दलितों और तिरस्कृतों की जुबान थे।

बालिका वधू या वध?

‘बालिका वधू’ टी.वी. सीरियल की आनन्दी को बालिग होने के साथ ही तलाक के गहरे घाव की पीड़ा सहनी पड़ी। हाँ, उसके सास-ससुर ने उसे अपनी बेटी और ददिया सास ने पोती मान लिया है। अब वे उसका ब्याह उसी (जैतसर) जिले के कलेक्टर से करने की तैयारी में हांफते-दौड़ते दिखाए जा रहे हैं। इसी बीच उसका पति अपनी दूसरी पत्नी गौरी के झूठ से बिफरा हुआ अपनी पहली पत्नी को वापस पाने अपने घर आ गया है, और भावनात्मक षड़यंत्रों का तमाशा जारी है। फिर भी यहां एक सवाल है कि क्या टेलीविजन के रंगीन पर्दे पर दिखाई जाने वाली आनन्दी जैसी किस्मत देश की असल बालिका बधुओं की भी है? सच ‘सत्यमेव जयते’ से भी अधिक खतरनाक है। हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री की सलाह और खाप पंचायतों के फरमान से भी कहीं अधिक दर्दनाक है। भारत ही नहीं दुनिया के तमाम मुल्कों में बाल विवाह का प्रचलन है। इसके पीछे सामाजी शातिर अपराधियों का घिनौना षड़यंत्र सक्रिय है।
    गुजरात के वाडिया में पिछले दिनों सामुहिक बाल विवाह का आयोजन हुआ था। इसका उद्देश्य मात्र वेश्यावृत्ति था। वहां की एक सामाजिक कार्यकर्ता ने इसके विरोध में आवाज उठाई भी थी। ऐसे ही छत्तीसगढ़, राजस्थान, झारखण्ड, बिहार, उप्र, मणिपुर, उत्तराखण्ड, पूर्वोत्तर व दक्षिणी भारत के इलाकों के अलावा नेपाल की लड़कियां आये दिन महानगरों में नारकीय जीवन जीते मौत की गोद में समा जाती हैं। कई बार खबरें छपती हैं कि पुलिस ने नाबालिंग लड़कियों को दलालों के चंगुल से छुड़ाया। बावजूद इसके गरीबी और अंधविश्वास के चलते एक बड़ी आबादी लड़कियों (नाबलिग/किशोरी) से छुटकारा पाने का आसान तरीका ‘बाल विवाह’ अपनाते हैं।’ राजस्थान के श्रीरामपुर में आखातीज पर पांच साल की इमली का ब्याह 15 साल के अशोक से उसके माता-पिता ने कर दिया। ऐसे ही सात साल की राधिका को 20 साल के राजू से उप्र के बलरामपुर जिले के इटियाथोक इलाके में ब्याह दिया गया। बाल विवाह का प्रचलन ग्रामीण क्षेत्रों में अधिक है तो 15-16 साल की किशोरियों को ब्याहने का चलन शहरों में भी धड़ल्ले से जारी है। वह भी तब जब यह कानूनन अपराध है और सरकारें ‘बेटियां बचाओ’ का हल्ला मचाए हैं। पिछले ही महीने दुनिया भर में ‘गल्र्स डे’ मनाया जा चुका है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस-3) के हालिया आंकड़े बताते हैं कि देश में 47.4 फीसदी लड़कियों को 18 साल से कम उम्र में ब्याह दिया जाता है। इनमें 15 साल से भी कम उम्र में ब्याहने वाली किशोरियों की संख्या 18.5 फीसदी हैं।
    नाबालिग बच्चियों के साथ उनके माता-पिता और रिश्तेदारों के संरक्षण में लगातार बलात्कार हो रहे हैं। उसके नतीजे में वे समय से पहले मां बन रही हैं। वे नवजात बच्चे कुपोषण का शिकार होकर मर रहे हैं। युनिसेफ के अनुसार दुनियाभर में एक तिहाई किशोरियों के विवाह होते हैं, उनमें दस फीसदी बालिकाएं होती हैं। ये बालिकाएं बालिग होने से पहले ही अधिकांशतः मौत के मुंह में समा जाती हैं। क्योंकि वे गाली-गलौज, मारपीट और यौन शोषण का क्रूर शिकार होती हैं। इसके अलावा उनके असमय गर्भवती होने के कष्ट भी इसमें सहायक होते हैं। इनकी उम्र जब खेलने, पढ़ने की होती हैं तब वे अपनी ससुराल में सूर्योदय से पहले उठती हैं। पानी भरना, नहाना धोना, घर की साफ-सफाई, कपड़े धोना, खाना बनाना फिर सास के निर्देशित कामों को करना। आधा पेट भोजन करने के बाद थकी हुई बालिका को रात में पति के बलात्कार का शिकार होना आम है। ऐसे परिवार अधिकतर मिट्टी की कच्ची झोपडि़यों में या सीलन भरी कोठरियों में रहते हैं। जहां कहीं अच्छे मकान हैं वहां भी दुर्दशा कम नहीं है। मां बनने के दौरान कोई चिकित्सा सुविधा भी नहीं हासिल होती। क्योंकि ग्रामीण इलाकों में अस्पतालों का दूर-दूर तक पता नहीं होता। युनीसेफ की बाल संरक्षण विशेषज्ञ के अनुसार विकासशील देशों में गर्भावस्था के दौरान 10-14 साल की बालिकाओं के मारने की संख्या 20-24 साल की युवतियों की अपेक्षा पांच गुनी अधिक है। 15-19 साल की 50 हजार लड़कियां हर साल गर्भधारण के दौरान मारी जाती है।
    संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या फंड ने पिछले दिनों चेतावनी जारी की है कि ‘बाल विवाह बच्चियों के विकास, शिक्षा में जहां बाधक हैं वहीं उनका बचपन लूटनेवाला भी है। इस पाप कृत्य को रोकना होगा वरना अगले दस वर्षों में 5 करोड़ बालिका वधुएं होंगी। यदि यही हालात रहे तो 2030 तक दस करोड़ की संख्या में होंगी 15 साल से कम की गृहणियां।’
    आधुनिक दुनिया में हर तीसरी नाबालिंग लड़की को उसके मां-बाप द्वारा ब्याह दिया जाता है। युनीसेफ इस परम्परा को रोकने के लिए शैक्षणिक अभियान चला रहा है। बच्चियों की शिक्षा के लिए दूर-दराज इलाकों में स्कूल खोले जा रहे हैं। पिछले पखवारे ‘क्योंकि मैं एक लड़की हूँ’ योजना को भी जमीन पर उतारा गया है। इसी तर्ज पर उप्र में ‘पढ़ें बेटियां’, मप्र में ‘बेटी बचाओ’ अभियान चलाए जा रहे हैं। ग्लोबल दुनिया में 83 फीसदी लड़कोें की अपेक्षा महज 74 फीसदी 11-15 वर्ष की बच्चियाँ स्कूल जाती हैं। भारत की दशा इससे भी खतरनाक है। वहीं बांग्लादेश बाल विवाह के मामले में सबसे ऊँचे पायदान पर है। समूचे दक्षिण एशिया में 46 प्रतिशत तो सबशारान अफ्रीका में 37 प्रतिशत, लैटिन अमेरिका में 29 प्रतिश तो यूरोप में सर्वाधिक टर्की व जार्जिया में 14 प्रतिशत और 17 प्रतिशत बालि (नाबालिग) विवाह होते हैं। कहांनियां भी हैं, बेटी बचाओ, कन्या विद्याधन जैसी तमाशाई योजनाएं भी हैं, लेकिन बच्चियों को वधू बनाने की जगह विद्वान बनाने की ओर गंभीर सोंच राजनैतिक, सामाजिक क्षेत्रों में कहीं नहीं दिखती। बालिका को वधू बनाकर उसका वध करने की जगह उसे शिक्षित बनाने की ओर बढ़ना ही होगा, तभी सुसंकृत नई पीढ़ी का निर्माण संभव होगा।

सनातन ही है, शुभ

लखनऊ। 16 नवंबर से विवाह आदि शुभकार्य शुरू हो जाएंगे जो 11 दिसंबर तक जारी रहेंगे। इसके बाद धनु संक्रांति खरमास दोष है। इस बीच कुल 15 शुभ मुहुर्त हैं। नवंबर में दीपावली बाद 16, 17, 18, 23, 24, 29, 30 और दिसम्बर में 4, 5, 6, 7, 8, 9, 10, 11 तक ही विवाह संपन्न होंगे।
    इसी बीच तुलसी विवाह, हरि प्रबोद्दनी एकादशी व्रत, डाला छठ, कार्तिक स्नान व देव दीपावली पर्व होंगे। आजकल विवाहों और पर्वों पर पूजा पाठ व नियमों में काफी बदलाव आ गये हैं। जहां वैवाहिक कार्यक्रमों में वीडियों, फोटोग्राफी, डिस्को डांस और भारी भरकम साडि़यों/ड्रेसेस में सड़कों पर चलती बारात में नाचती युवतियों की मस्ती, वहीं कारों के काफिले और खाने के लम्बे-चैड़े दस्तरखान देखने को मिलते हैं। संस्कार और रस्मों-रिवाज, रिश्तों का दिखावा भर होता है। आठ घंठे के वैवाहिक कार्यक्रम में विवाह कार्यक्रमों को महज एक घंटे में निपटा लिया जाता है।
    पूजा पाठ में भी यही हाल है। वहां भी बदलाव की बयार ने काफी कुछ बदल डाला है। स्नान ध्यान और प्रणाम तो छोडि़ए अब आचमन और दीपदान से काम चल जाता है। बहुत हुआ तो अगरबत्ती जलाकर प्रसाद चढ़ाकर छुट्टी पा ली। अभी पितृपक्ष व नवरात्रि गये हैं। इनमें पितृपक्ष की परंपराओं का पालन करने वालों की संख्या बेहद कम दिखी। दुर्गा पूजा में पंडालों की सजावट भव्यता तो खूब थी लेकिन दर्शनार्थियों का रेला-मेला कहीं नहीं था। कहा पांच साल पहले तक राजधानी के लाटूशरोड, हीवेट रोड, गुरू गोविन्द सिंह मार्ग, हुसैनगंज में चलना मुश्किल था। यही हाल राम बारातों और रामलीलाओं का हो गया है।
    शायद यही कारण है कि एक भक्ति चैनल और कुछ आस्थावानों ने मिलकर निकट फरवरी में सनातन धर्म के गूढ़ ज्ञान की जानकारी देने के लिए भक्ति मेले के आयोजन की सोंची है। यह मेला लखनऊ में फरवरी तक संभावित है। इस मेले के जरिए युवाओं को धर्म का सत्य बताने के प्रयास होंगे। तिलक से वेद तक की व्याख्या का आनंद उठा सकेंगे श्रद्धालु। इसके अलावा सनातन ही शुभता का प्रतीक है का संदेश भी होगा यह मेला।