Thursday, April 18, 2013

सड़क, साँड़ शोहदे.... उफ्फ!

अम्बेडकर नगर। डाॅ0 लोहिया की जन्म स्थली और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता डाॅ0 गणेश कृष्ण जेटली की कर्मस्थली होने के साथ पवित्र और पौराणिक तमसा नदी का किनारा होने का गौरव प्राप्त अकबरपुर और शाहजादपुर की पीड़ा भरी चीखें डाॅ0 लोहिया के चहेतों को सुनाई नहीं दे रही हैं? वह भी तब, जब सूबे में छोटे लोहिया कहे जाने वाले के पुत्र मुख्यमंत्री हैं।
    1975 में अकबरपुर को नगर पालिका का दर्जा मिला और तब से अब तक इस शहर की आबादी कई गुना बढ़ गई है, साथ ही इसके विस्तार का सिलसिला बदस्तूर जारी है। नगर पालिका का दर्जा हासिल होने के ठीक 20 वर्ष बाद इस नगर (अकबरपुर) को जिला मुख्यालयी शहर होने का गौरव प्राप्त हुआ। अकबरपुर बस स्टेशन से पुरानी तहसील तिराहे को जाने वाले मुख्य सड़क मार्ग पर फ्लाई ओवर के निर्माण से यहाँ की शहरीयत विलुप्त हो गई। जिस क्षेत्र में यह उपरिगामी सेतु बना है उसे सिविल लाइन्स कहा जाता रहा, अब वही इलाका कबाड़ सा होकर रह गया। यही नहीं नगर पालिका की कैबिनेट द्वारा उपेक्षित इस क्षेत्र के लोग अपनी रिहायशी कालोनियों से निकलकर मुख्य सड़क मार्ग पर आने से हिचकिचाते हैं।
    कारण एक नहीं अनेकों है, जिनके चलते बच्चे, बूढ़े, जवान और महिलाओं को अपने ही शहर के दोनों तरफ की दुर्दशाग्रस्त पटरियों (फुटपाथ)  पर पैदल चलना दूभर है। बच्चे एवं बूढ़े तथा महिलाएँ इन पटरियों पर गिरकर अनेकों बार घायल हो चुके हैं। कोई गिरकर घायल हो, उसका अंग-भंग हो या फिर परलोक गमन कर जाए, यह नगरवासियों की निजी समस्या हो सकती है, जिससे निजात पाने के लिए वह नगर पालिका परिषद के पदाधिकारियों को कोसें या मन मसोस कर घुटन भरा जीवन जीए यह वह जाने। वर्तमान नगर पालिका अध्यक्ष चन्द्रप्रकाश वर्मा से उनके प्रथम कार्यकाल में सड़क पटरियों के निर्माण के लिए पूँछा गया था, उन्होंने कहा कि किसी भी वार्ड के सभासदों ने बैठकों में इस पर प्रस्ताव ही नहीं दिया। 50-60 लाख रूपए का खर्चा है, यदि प्रस्ताव आता तो शासन को लिख करके धन की डिमाण्ड करते।
    यह बताना जरूरी हो गया है कि अकबरपुर नपाप के अध्यक्ष पर पक्षपात का आरोप लगने लगा है। पुरानी तहसील तिराहे के उत्तर से बस स्टेशन, टाण्डा रोड मुख्य सड़क मार्ग के दोनों तरफ व्यवसाय करने वालों का कहना है कि चन्द्र प्रकाश वर्मा ने बीते नगर निकाय चुनाव के दौरान यह वादा किया था कि यदि दुबारा अध्यक्ष पद पर आसीन हुए तो अकबरपुर के रेलवे क्रासिंग, क्षेत्रीय श्री गाँधी आश्रम, बस स्टेशन, टाण्डा रोड से लेकर पटेल नगर तक मुख्य सड़क मार्ग के दोनों तरफ की पटरियों का निर्माण कार्य कराना उनकी सर्वोच्च प्राथमिकता होगी।  नगर पालिका का चुनाव सम्पन्न हो गया और वह पुनः अध्यक्ष पद पर आसीन भी हो गए, लेकिन अपना वादा पूरा नहीं कर सके। उनके इस झूठे वादे से उक्त क्षेत्रों के निवासियों में व्यापक रूप से असंतोष देखा जाने लगा।  एक कथाकार/व्यंग्यकार कहते हैं कि अब इस शहर में रहने लायक नहीं है।
    क्यों? का उत्तर था कि अकबरपुर शहर की मुख्य सड़क पर चलने में उन्हें कई बातों का भय सताता है। पहला यदि सड़क की पटरियों पर चला जाए तो ऊबड़-खाबड़ फुटपाथ के साथ पटरियों पर टैक्सी-टैम्पो, दुकानों के सामने मोटर-मोटर बाइक बेतरतीब खडे़ हैं, ऊपर से अतिक्रमणकर्ता ठेले वाले यमदूत से जमंे रहते है। गिर गए तो धूल, कीचड़ के साथ-साथ फुटपाथ पर यत्र-तत्र-सर्वत्र जमंे ईंटें माथा फोड़कर ‘कोमा’ में पहुँचा देंगी। रही बात पतली सड़क की तो उस पर से गुजर जाएँगे तो कुचला शरीर पहचान में नहीं आएगा। साथ ही आत्मा परमात्मा में मिल जाएगी। तब गलियों से चलिए के उत्तर में उनका कहना है कि शोहदों और कुत्तों से कैसे बचा जाए? साथ ही आबादी में आवारा और तबेलों से निकले मवेशियों (सांड़, गाय, भैंस) की कुलाँचे पोस्टमार्टम हाउस तक पहुँचाने में अपना विशेष योगदान देंगी। मीडिया से कुछ भी छिपा नहीं है। शोहदों के लिए ‘मजनूँ पिंजड़ा’, कुत्तों के काटने पर ए.आर.वी., आवारा जानवरों, पालतू मवेशियों के छुट्टा घूमने पर पाबन्दी के लिए ‘काँजी हाउस’ की आवश्यकता है, लेकिन ये सब यहाँ के परिप्रेक्ष्य में स्वप्न की बातें हैं। इसके अलावा अकबरपुर शहरवासियों का आरोप है कि प्रभावशाली और स्वजातीय लोगों की दुकानों/घरों और सहन पर सम्बन्द्दित सभासदों के मद से टाइल्स ब्रिक लगवाई गई है। टाण्डा रोड के पटेलनगर तिराहे पर अध्यक्ष के स्वजातीयों की बहुलता है, इसलिए उक्त स्थान को आकर्षक बनवाया गया है। यह नहीं मालूम कि इसमें खर्च धन कहाँ और किस मद से नपाप अकबरपुर को मिला?
    अकबरपुर नपाप में नए परिसीमन के पश्चात् तीन दर्जन से अधिक राजस्व गाँव शामिल हुए जिनमें चन्द्र प्रकाश वर्मा की जाति के लोगों की बहुलता बताई जाती है, ऊपर से अकबरपुर विधान सभा क्षेत्र के विधायक सूबे की सपा सरकार में राज्यमंत्री राममूर्ति वर्मा का वरदहस्त नपाप अध्यक्ष के प्रभाव में इजाफा कर रहा है ऐसा उपेक्षित क्षेत्र के नगरजनों का कहना है। कुछ भी हो नगरवासियों को नगरीय सुविधाओं की दरकार है और इन्हें मुहैय्या कराना नपाप अध्यक्ष/सभासदों की जिम्मेदारी है, लेकिन अकबरपुर के वाशिन्दों को अभी तक निराशा ही हाथ लगी है। साफ-सफाई, पेयजल, पथ प्रकाश के बारे में यदि लिखा जाए तो उसमें भी अकबरपुर नपाप दो आँखों से देख रहा है?

वजीर-वजीर... जी... हुजूर.. आओ गरीबी गरीबी खेलें

नई दिल्ली। देश के सरकारी सफेद वाले कागजों से लेकर चांदी सी चमकती दीवारों पर लिखे बलन्द नारे गरीबी हटाओं को भजते-पढ़ते और नौकरशाह से नेता तक को गरीबी-गरीबी खेलते 65 साल गुजर गये। इस दौर-दौरे में आबादी बढ़ी, आमदनी बढ़ी, महंगाई बढ़ी, कर्ज बढ़ा, घोटाले-घपले बढ़े, कारपोरेट घरानों, राजनेताओं और नौकरशाहों की दौलत बढ़ी, मध्यवर्गीय अमीर बढ़े और गरीबी की रेखा के नीचे जीने वालों की संख्या पहुंच गई 1947 की जनसंख्या के आंकड़े 37 करोड़ के बराबर। गांवों में 60 फीसदी लोग 35 रूपये, तो शहरों में 10 फीसदी लोग 20 रूपये रोज पर गुजर करने वाले सरकारी रजिस्टर में दर्ज हैं। वह भी तब जब देश में पिछले बरस अकेले गेहूं की पैदावार 317 लाख टन हुई थी और इस साल 235 लाख टन संभावित है। दूध, दाल और जूट के उत्पादन में दुनियाभर में अव्वल है, भारत।
    हकीकत का बही खाता बताता है कि बरफ का गोला बेचने वाला सुदूर गांवों में मोबाइल के टाॅपअप बेचने से बैटरी चार्ज करने के धंधे में लगा है। पांच रूपये की गोरा बनाने वाली ‘फेयर एण्ड लवली’ क्रीम व एक रूपये का शैम्पू पाउच ग्रामीण व शहरी गरीब धड़ल्ले से खरीद रहे हैं। छोटा पैक मैगी से लेकर चाऊमीन तक उन गांवों में बिक रहे हैं जिनका नाम भी देश के वित्तमंत्री और योजना आयोग के उपाध्यक्ष ने नहीं सुना होगा। बिजली, मोबाइल टाॅवर से लेकर केबिल/डिश नेटवर्क का जाल बैटरियों, जेनरेटर, इन्वर्टरों के सहारे लगातार अपने पांव पसारता जा रहा है। एकदम ताजा उदाहरण उप्र के इलाहाबाद में पचास दिनों के कंुभ मेले में जहां सरकार ने 16 हजार करोड़ खर्च किये वहीं मेले में आए 10 करोड़ लोगों के एक लाख करोड़ से अधिक खर्च करने का अनुमान है। इसी तरह बीती महाशिवरात्रि में आस्था के नाम पर करोड़ों लीटर दूद्द गटर में बहा दिया गया।
    मनरेगा की मजदूरी में लाख घपले हों लेकिन आम श्रमिक की आमदनी में खासा इजाफा हुआ है। गांवों से आज भी शहरों में आकर और विदेश (गल्फ) जाकर कमाने वालों का रेला कम नहीं हुआ है। ग्रामीण इलाकों की झोपड़ी और बाजार नये बदलाव से रौशन हो रहे हैं। नाई से लेकर कसाई, दर्जी से लेकर जूता गांठने वाले तक हाईटेक और ब्रांडेड के नशे में गाफिल हैं। करोड़ांे की आबादी दोहरे राशनकार्ड, वोटर कार्ड और दो पत्नियों के सुख में मस्त हैं। मगर उनके घरों में शौचालय नहीं, पीने का शुद्ध पानी नहीं है और गांव/मोहल्ले में अस्पताल, स्कूल नहीं है।
    कबाब-पराठे खाकर बोतलवाले पानी से योजनाओं का गरारा करते हुए आंकड़ों की कुल्ली करने वाले ही बताते हैं कि हर साल 30 फीसदी उत्पादन बर्बाद हो जाता है, किसानों को अपनी कमाई का अधिकतम 23 फीसदी ही मिलता है। 80 फीसदी किसान भारी कर्ज में डूबा है तो 60 फीसदी कर्ज न चुका पाने के चलते आत्महत्या कर लेते हैं। कर्जमाफी घोटाले के बाद इस साल के बजट में किसानों को 7 लाख करोड़ का कर्ज देने का इंतजाम किया गया है। वहीं देशभर के 172 बड़े घराने बैंकों की 37 हजार करोड़ से अद्दिक की रकम दबाए बैठे हैं। कुल आबादी का सत्तर फीसदी रोजमर्रा की जरूरतों का मोहताज है। उसके लिए दवाई, सफाई, पढ़ाई और सुरक्षा के नाम पर योजनाओं का ठेंगा, वहीं देश में 10 लाख करोड़ रूपया महज 55 अरबपतियों के पास है। इन्हीं के सात हजार दो सौ पच्चानबे भाई बंदों पर सरकारी बैंकों का 68262 करोड़ रूपया बकाया हैं। यह रकम मनरेगा पर खर्च होने वाली राशि से दोगुनी और पौने चार करोड़ किसानों को दी गयी कर्ज माफी से अधिक है। सरकार को टैक्स अदा करने वाले 3.24 करोड़ लोगों में 89 फीसदी की सालाना आमदनी 5 लाख रू0 तक है। बाकी के 11 फीसदी अमीरों/कारपोरेट्स को हर साल 5.15 लाख करोड़ रूपये से अधिक की टैक्स रियायत दी जाती है। इसे खत्म कर दिया जाये तो राजकोषीय घाटा स्वतः खत्म हो जायेगा। 55 करोड़ युवा आबादी रोजगार के मौके तलाशते हुए बुढ़ापे की ओर कदम बढ़ा रही है, तो 10 करोड़ बुजर्ग वरिष्ठ नागरिक सुविधाओं की बाट जोह रहे हैं। 48 करोड़ महिलाएं अपनी सुरक्षा, समानता और सम्पन्नता के लिए बेचैन हैं। वित्तमंत्री के मुताबिक देश में प्रति व्यक्ति आय 38,037 रू0 है। रेलमंत्रालय के आंकड़े गवाह हैं कि दो करोड़ तीस लाख लोग रोज रेलवे को 245 करोड़ की आमदनी करवाते हैं।
    इससे इतर इस साल के बजट में जेब काटने और मूर्ख बनाने के इंतजाम भी बेहद मजबूत हैं। 14 हजार करोड़ रू0 से ग्रामीण क्षेत्रों में नये बैंक खोले जाएंगे। नए बैंक की हर चैथी शाखा गांव में खोली जाएगी। इसी तरह 10 हजार करोड़ रूपयों से महिलाओं के लिए अलग बैंक खोले जाएंगे। इसके मायने हैं कि सरकार जानती है कि गांवों में पैसा है। महिलाओं के पास पैसा है। देशवासियों के पास पैसा है। तभी तो उनसे पैसा निकलवाने के लिए हर छोटे से छोटे पहलू पर हाल ही में गौर किया गया है। तिस पर तुर्रेदार नारा है आत्मनिर्भर बनाने का। सरकारी आंकड़ों (2011-12) के मुताबिक देशवासी अपनी आमदनी का 31.2 फीसदी खाने-पीने पिलाने व तम्बाकू पर, 20.2 फीसदी परिवहन, संचार और सबसे कम 3 फीसदी मनोरंजन, शिक्षा व सांस्कृतिक सेवाओं पर खर्च करते हैं। इसीलिए आयकर से लेकर मनोरंजन, संचार तक में वसूली के नये फरमान जारी हो रहे हैं। रेल का किराया न बढ़ाकर आरक्षण में सरचार्ज और मालभाड़े में 5 फीसदी इजाफा कर आदमी की जेब काटी जाएगी। यही नहीं 10 हजार करोड़ खाद्य सुरक्षा के लिए देकर सरकारी सांड़ों को भ्रष्ट होने का पूरा मौका भी दे दिया गया है। केन्द्र सरकार बहुत शीघ्र सांतवें वेतन आयोग को लागू करने पर विचार कर रही है यानि आने वाल सालों में महंगाई और बढ़ेगी, कर्ज और बढ़ेगा।
    मानव विकास सूचकांक में हमारा देश भले ही 186 देशों की सूची में 134वें पायदान पर हो। इस साल 542,449 करोड़ रूपए उधार लेने की सोंच बनाए है और 2011-12 के अंत में 34508 अरब डाॅलर की विदेशी उद्दारी थी। वहीं मार्च 2012 तक अमीर घरानों के चलते 2 लाख करोड़ का बैंकों का एनपीए है। इसकी वसूली वित्तमंत्री के बयानों में उलझ कर रह गई है। यहां बताते चले ंकि महंगाई की खुदरा दर 11 फीसदी के पास है फिर भी दिल्ली, मुंबई दुनिया में सबसे सस्ते शहर माने जाते हैं। राज्य सरकारों में उप्र में कन्या विद्याद्दन, बेरोजगारी भत्ता, छात्र-छात्राओं को छात्र वृत्ति, मुफ्त लैपटाॅप/टैबलेट, मिड-डे मील, किसानों को कर्ज माफी और मुफ्त साड़ी जैसी योजनाएं खुले हाथों चलाई जा रही हैं। तामिलनाडू सरकार गरीबों को दो रूपये किलो चावल से लेकर विद्यार्थियों को एक साल में तीन कमीज-पैंट, पाठ्य पुस्तकें, एक साइकिल, ट्रेन/बस का पास, दिन का भोजन व छात्रावास में रहने की मुफ्त सुविधा दे रही है। पोंगल जैसे पर्व पर एक साड़ी, एक धोती, 500 रू0 नकद व अतिरिक्त राशन भी देती है। शायद चुनावों के चलते या क्षेत्रीय दलों की सरकारों को पछाड़ने की गरज से गरीबों को केन्द्र सरकार हर महीने 1 रू0 किलो ज्वार, 2 रू0 किलो गेहूँ, 3 रू0 किलो चावल कुल पांच किलो अनाज देगी। दरअसल गलत आंकड़ों के सहारे विकास के नाम पर राजनेता, नौकरशाह और काॅरपोरेट घराने आदमी का दोहन करने के साथ विश्व के मानचित्र पर ‘भिक्षान देहि’ की आड़ में अपनी तिजोरी भरने में जी जान से लगे हैं। यही काम साद्दू -संतों और मजहबी उद्योग भी करने में आगे-आगे खड़े होकर गरीबी-गरीबी खेलने में मगन हैं। सच में गरीबी कितनी गरीब हैं, यह शोध का विषय है।

भू-स्वर्ग के नक्शे में दर्ज है राम राज्य का संविधान


धूप ने करवट क्या बदली, सियासत से समाजवाद तलक का मिजाज गरम हो गया। अक्षर अँगार तो भाईचारा भयंकर। अपराध की दहशत के साथ महंगाई भी हमलावर। तिस पर मनोरंजन के नाम पर टेलीविजन ठप और गुटखे पर पाबंदी से नशा हिरन। ऐसे में कलम से निकलती नीली-नारंगी किरणें कौन सा विस्फोट कर देंगी? मैं इसी जगह, इसी कागज के टुकड़े ‘प्रियंका’ में लिखता रहा हूँ, ‘रावण के पुतले को जलते हुए देखकर ताली बजाने वाले हिजड़ों की जमात में शामिल होकर हिंसा का उत्सव मनाने भर से कोई बदलाव नहीं होने वाला और न ही ‘या देवी सर्वभूतेषु मातृ रूपेण...’ के सस्वर पाठ से नारी अस्मिता की रक्षा होने वाली है।’
    समुद्र मंथन की तरह समाज मंथन की भी अलख जगानी होगी। ‘लक्ष्मी’ की जगह माँ को, केवल माँ को प्रणाम करने का संकल्प लेना होगा। नवसंवत् 2070 के स्वागत के साथ माँ दुर्गा के नौ रूपों का पूजन और प्रभुश्रीराम का जन्मदिवस मनाते हुए आत्ममंथन करना होगा। समुद्र मंथन से ही संवत्सर की उत्पत्ति हुई है- समुद्रादर्णवादधि संवत्सरों अजायत। समाज मंथन से ही भू-स्वर्ग का नक्शा हासिल होगा। इसी नक्शे में दर्ज होगा राम राज्य का संविधान और सृष्टि की रचनाकार मां का दुलार भी। नवसंवत् 2070 ‘पराभव’ के राजा बहृस्पति व मंत्री शनि का अभिनन्दन तभी सार्थक होगा, जब नारी के सम्मान को ठेस नहीं लगेगी। अपराध, अधर्म और अशिष्टता को छूत की बीमारी माना, जाना जाएगा। परिवार की पाठशाला में एकल परमाणु ऊर्जा (न्यूक्लीयर फेमिली) या सेक्स सर्कस के पाठ्यक्रमों की जगह जीवन के सत्य से साक्षात्कार कराने वाले आचरण को शामिल करना होगा। पाखण्ड और पश्चिम के प्रेम से पैदा होने वाले बाजार की चकाचैंध से अपनी पीढ़ी को सचेत करना होगा, तभी तो नई पीढ़ी को माँ का आंचल नसीब होगा।
    क़लम है मेरी मां का नाम..... बड़ी बुलंद आवाज में बार-बार दोहराते हुए ‘प्रियंका’ 34वें बरस में दाखिल हो चुकी है। इस दौर-दौरे में झूठ-मूठ के गीत गाने से जहां परहेज बरता गया, वहीं दाल-भात की लड़ाई लड़ने वालों के साथ सुर में सुर मिला कर खबरों के विस्फोट सत्ता के महलों में किये गये। यही वजह रही कि दक्षिण भारत के कई क्षेत्रों में ‘प्रियंका’ को भरपूर दुलार मिला, तो कई जगहों पर पाठकों/संवाददाताओं ने मिल बांट कर पढ़ा, लोकापर्ण किया और प्रसार-प्रचार में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। मजा तो यह रहा कि पूरे बरस भर राजनीति के कटरे से नदारद रही ‘प्रियंका’। कहीं से कोई शिकायत नहीं आई उल्टे पाठकों की संख्या में इजाफा हुआ। बावजूद इसके ‘चीथड़े’ की संज्ञा से भी सामना होता रहा। किसी ने नाम नहीं सुना, तो कोई स्वर्गीय राजीव गांद्दी की बिटिया से नाता जोड़ने की गफलत में रहा। इससे कोई घबराहट या शर्मिन्दगी नहीं हुई। हां, खबर लिखने, अखबार बेचने के लिए जिस इरादे की जरूरत थी उससे तनिक भी पीछे हटने की कोशिश नहीं की, क्योंकि पाठकों ने, विज्ञापनदाताओं ने और जिलों, शहरों, कस्बों में बैठे ‘प्रियंका’ के संवाददाताओं ने कभी इस ओर सोंचने का मौका ही नहीं दिया। गुरूजनों और पाठकों के आशीर्वाद से चैंतीस बरस के बालिग समाचार पाक्षिक का ‘वार्षिंकांक-2013’ आदमी की पैरोकारी का हलफनामा दाखिल कर रहा है।
    सियासत की हकीकत बयान करते हैं ‘लखनऊ में पिटा एक मुख्यमंत्री, ‘गरीबी-गरीबी खेलें, ‘सपा का हीरामन। उत्सवप्रियता और आस्था के दर्शन ‘रामकथा,’ ‘कुंभकरण के बेटे’, ‘रावण की लाश’, ‘गोबर के लड्डू का चढ़ावा’, ‘एक मेला था छैल-छबीला’, ‘मां दुर्गा पूजन’ में होंगे। ‘आधी सड़क’ पर पसरी नंगी हकीकत से सामना होगा, तो ‘हिन्दी के स्वर्णाक्षर ‘सुधा’, हिन्दी के पुरखों की पत्रकारिता को उजागर करने के साथ हिन्दू-मुसलमान खांचे के निर्माण के सच से सामना भी कराएंगे। हिन्दी पत्रकारिता, हिन्दी साहित्य और हिन्दी के समाचारों का वह दौर सच में हिन्दी का स्वर्णयुग था। और अन्त में केदार नाथ सिंह की यह लाइने -
मैं पूरी ताकत के साथ
शब्दों को फंेकना चाहता हूँ
आदमी की तरफ
यह जानते हुए कि आदमी का
कुछ नहीं होगा
मैं भी सड़क पर सुनना चाहता हूँ
वह धमाका
जो शब्द और आदमी की टक्कर से
पैदा होता है
यह जानते हुए कि लिखने से
कुछ नहीं होगा
मैं लिखना चाहता हूँ

प्रियंका की आवाज हुई बुलंद

लखनऊ। आपके अखबार ने साल भर पहले लिख था ‘भारतवासी फेंक देते हैं 883.3 करोड़ किलो जूठन’ (देखें ‘प्रियंका’ 1 मार्च, 2012’ का अंक) जिससे 35 करोड़ गरीब भारतीयों का पेट पूरे साल भर तक भरा जा सकता हैं। इस खबर में तमाम आंकड़े भी दिये गये थे। भुखमरी कुपोषण की असलितयत के साथ शिवरात्रि पर्व में की जानेवाली दूध की बर्बादी का खुलासा भी किया गया था। इस खबर को हिन्दी साप्ताहिक ‘ब्लिट्ज’ के पूर्व संपादक व ‘नूतन सवेरा’ के संपादक श्री नन्द किशोर नौटियाल ने सबसे पहले सराहा और ‘प्रियंका’ के पाठकों ने भी मुक्तकंठ सराहना की थी। आज इसी को सिनेमा से लेकर दुनिया के बड़े संगठन उठा रहे हैं, अभियान चला रहे हैं।
    इस सामाजिक भ्रष्टाचार के मुखालिफ ‘प्रियंका’ की आवाज से आवाज मिलाते हुए कलई खोली है संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (यूएनइपी), खाद्य एवं कृषि संगठन (एफओए) व वेस्ट एंड रिसोर्स एक्शन प्रोग्राम (डब्ल्यूआरएपी) ने, इन संगठनों ने एक साथ मिलकर खाद्यान्न बचाने की वैश्विक पहल की है। इनकी पिछले महीने आई रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया में हर साल 1.3 अरब टन खाद्य पदार्थ बर्बाद हो जाता है। इसे मामूली उपयों से बचाकर दुनिया के करोड़ों भूखों का पेट भरा जा सकता है। ‘प्रियंका’ के अनुमान से कहीं अधिक 11 किलो खाद्य प्रति व्यक्ति बर्बाद होता है, भारत समेत एशियाई देशों में और विकसित देशों में यही आंकड़ा 115 किलो हैं।
    ‘प्रियंका’ और भी गदगद है कि 2013 के इस्तकबाल के समय उप्र के सर्वाधिक पिछडे़ इलाके सोनभद्र जिले के ऊर्जा उत्पादन क्षेत्र ओबरा में 17 जनवरी को हुए पत्रकारों के लघु कम्भ में ‘प्रियंका के हस्ताक्षर-2013’ अंक का लोकार्पण स्थानीय पत्रकारों ने कराया। इससे भी आगे बढ़कर पाठकों में अंक प्राप्ति की होड़ लगी रही। यह तब हुआ जब ‘प्रियंका’ के लखनऊ मुख्यालय से संपादक/प्रकाशक या अन्य कोई भी उस समारोह में मौजूद नहीं था। इस उद्य़म और मेहनत का पूरा श्रेय वाराणसी मण्डल ब्यूरों व उसके संवाददाताओं को ही है।     धन्यवाद!

न मुलायम, न सख्त सपा का हीरामन


लखनऊ। ‘टीपू सुल्तान’ जिन्दाबाद की गंूज में मगन सूबे की समाजवादी सरकार अपनी उपलब्धियों का ढोल खूब ऊँची आवाज में बजाने में मस्त है। यही वजह है कि जरूरतमंदों और भूखे-नंगों की आवाज नौजवान मुख्यमंत्री तक नहीं पहुंच पा रही। यह सच है कि सरकार के युवा मुखिया अखिलेश यादव की छवि जो जनता के बीच बनी है वह निश्छल, ईमानदार और उत्साही आदमी की है। वे करना बहुत कुछ चाहते हैं, पर बेलगाम चाचाओं की फौज और बेअदब नौकरशाहों की अनुशासनहीनता का अंगदी पांव उनके आड़े आ जाता है। वे मीलों साइकिल चला कर मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंचे हैं, तो महज सुस्ताने के लिए नहीं। उनके मन मंे गरीबों, पीडि़तों और शोषितों के लिए बहुत दर्द है, लेकिन वे उनके लिए कुछ भी नहीं कर पा रहे हैं। वे प्रशासन को चुस्त बनाना चाहते हैं, पर सचिवालय में उनके आदेशों का पालन नहीं होता। उनकी घोषणाओं और चेतावनियों पर कोई ध्यान नहीं देता। तिस पर जब-तब सपा मुखिया की हड़क-दड़क। यही है साइकिल पर सवार उप्र की ठहाके लगाती सरकार का सच।
    मुख्यमंत्री की दयनीय हालत का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि उन्हें अपनी सरकार की सालगिरह के जश्न के बाद भी कहना पड़ रहा है कि अफसर सुधर जायें..., अब सख्ती होगी, प्रदेश में थानों की दशा देखकर बाहर से ही डर लगने लगता है... इनमें सुधार किया जाएगा। यह कानून और व्यवस्था से जलते सूबे के लिए आग में घी डालने जैसा है। वह भी तब जब सरकार ने विधानसभा सदन के भीतर माना है कि सूबे में अपराध  बढ़े हैं। अकेले 642 बलात्कार के मामले साल भर में हुए हैं। इन बलात्कार पीडि़तों के आँसूं पोंछने के लिए सरकार ने कुछ भी नहीं किया। जबकि विधानसभा चुनावों के दौरान सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव ने सिद्धार्थनगर व बाराबंकी की चुनावी सभाओं में जनता से वायदा किया था कि अगर प्रदेश में समाजवादी पार्टी की सरकार बनती है तो बलात्कार पीडि़ता लड़की को सरकारी नौकरी दी जाएगी और बलात्कारी के विरूद्ध कड़ी कार्यवाही की जायेगी। तब अखबारों में इसे जहां प्रमुखता से छापा गया था, वहीं भारी विवाद भी हुआ था। अपनी उस घोषणा को सपा सरकार क्यों भूल गई? ऐसें में ‘वूमेन पाॅवर लाइन’ का क्या मतलब रह जाता है जब थानों में रपट लिखाने गई युवती/महिला को सुरक्षा देने की जगह थानेदार थप्पड़ मारकर भगा देता है? यही नहीं जिन पर सरकार चलाने की जिम्मेदारी है वे अपने निजी आर्थिक फायदे के लिए, जमीन के छोटे से टुकड़े के लिए, झूठे स्वाभिमान के लिए, धार्मिक स्थल के अपमान के नाम पर हिंसा के रास्ते पर चल पड़ते हैं। छोटी से छोटी बात को निपटाने के लिए उनमें सरकारी ताकत का बेजा इस्तेमाल करने की आदत बनती जा रही है। इसी के चलते हर तीन घंटे में पुलिस कहीं न कहीं मार खा रही है, कई पुलिसवालों की हत्याएं हो चुकी हैं। क्या युवा मुख्यमंत्री के इरादों और सोंच की इसी तरह द्दज्जियां उड़ाई जानी चाहिए?
    उत्तर प्रदेश में उद्योग लगाने के लिए आमंत्रण बांटते मुख्यमंत्री उद्योगपतियों के एक सम्मेलन में आगरा पहुंचे थे। तब अखबारों में औद्योगिक इकाई लगाने की उनकी महत्वाकांक्षी योजनाओं को प्रमुखता से छापा गया था, लेकिन अभी तक कोई करगर पहल नहीं हुई। वह भी तब जब सरकार 10729 करोड़ की रकम औद्योगिक विकास के नाम पर तय कर चुकी है। ‘आईटी हब’ की घोषणा के बाद बेहद धीमी गति से उस पर अमल हो रहा है। नौकरशाहों की काहिली का ही नतीजा है कि गए साल के बजट का आधा हिस्सा भी अधिकतर विभागों में खर्च नहीं किया गया। इतना ही नहीं कर वसूलने में भी कोताही बरती। सरकार और उसके कत्र्ताधर्ता आये दिन केन्द्र सरकर पर राज्य को पैसा न देने व बढ़ती महंगाई के लिए उस पर आरोप लगाते रहते हैं। हकीकत इसके बिल्कुल उलट है। अफसरों के घुमा फिराकर दिये गये जवाब विधानसभा की कार्यवाही में मौजूद हैं। जवाहरलाल नेहरू रोजगार योजना और मनरेगा का क्रियान्वयन कलई खोलने के लिए काफी है। रही महंगाई बढ़ने की बात तो बेशक केन्द्र की नीतियां इसके लिए जिम्मेदार हैं, लेकिन राज्य सरकार ने बढ़ती महंगाई पर काबू पाने के लिए कौन से कदम उठाए? जबकि नियोजन विभाग के अर्थ एवं संख्या प्रभाग की ताजा रिपोर्ट बताती है कि रोजमर्रा के इस्तेमाल वाली वस्तुओं के दामों में 10 से 50 फीसदी तक इजाफा हुआ है। आज हालात इतने बदतर हैं कि सूबे में पैदा होते ही बच्चा 10988 रू0 का कर्जदार हो जाता है। यह कर्ज और बढ़ेगा नहीं इसकी क्या गारंटी हैै? जब बजट के आंकड़ें ही बता रहे हैं कि अब तक 219304 करोड़ रूपए का कर्ज बढ़कर इस साल 239878.35 करोड़ रूपये हो जाएगा। बिजली के मद में 32 हजार करोड़ रूपए से अधिक की देनदारी है। इसके लिए केन्द्र की वित्तीय पुनर्गठन योजना लागू करने की मशक्कत जारी है। इससे आम उपभोक्ता को झटका भर नहीं लगेगा बल्कि वह मरणासन्न हो जाएगा। यही नहीं सूबे के 26 जिला मार्गाें को डबल लेन करने के लिए एशियन डेवलपमेन्ट बैंक ने 2200 करोड़ रूपया कर्ज दिया है। कर्ज के बोझ से दबे सूबे के वाशिन्दे जीने मरने के लिए तड़प रहे हैं। सरकारी अस्पतालों में रक्त समेत तमाम जांचे काफी महंगी हो गई हैं। वह भी तब जब रोगियों को आयुष डाॅक्टरों की गुंडई, उचित इलाज व दवा का अभाव झेलना पड़ता है। यही हाल कूड़ा प्रबंधन को लेकर है, सामान्यजन पैसा देने के बाद गंदगी और सफाईकर्मियों की बदतमीजी से बेहद परेशान है। सरकारी खजाना भरने के चक्कर में जगह-जगह शराब की दुकाने खोलने के साथ आधुनिक ‘शाॅर्पिंग माॅल’ मे ंभी शराब बेचने की इजाजत दे दी गई।
    मुख्यमंत्री निश्चित ही तेजतर्रार, लगनशील और मेहनती हैं। वे सुबह से देर रात तक बिना थके मेहनत करते हैं। उनकी सरलता का दुरूपयोग 80 फीसदी अफसर से लेकर मंत्री तक कर रहे हैं। उनकी सज्जनता के चलते ही सूबे में प्रजातंत्र की बहाली से लेकर विपक्ष के ऊँचे स्वर सुनाई देते हैं। तभी तो भाजपा के प्रदेश प्रवक्ता आरोप लगाते हैं कि सूबे की सभी योजनाओं में मुस्लिमपरस्ती के साथ घोटालों का बोलबाला है। आरटीआई से हासिल जानकारी के आधार पर उनका दावा है कि राज्य सरकार ने अपने शुरूआती 8 महीनों में साढ़े आठ करोड़ रूपए बेरोजगारी भत्ते में बांटे और इसे बांटने के आयोजनों पर साढ़े बारह करोड़ खर्च किया। इसी तरह राजधानी लखनऊ में बांटे गए 10 हजार लैपटाप में अकेले 3192 शिया पीजी काॅलेज व 1569 करामत हुसैन गल्र्स काॅलेज को देकर मुस्लिम तुष्टीकरण किया गया। भाजपा प्रवक्ता का कहना है कि 26 सौ करोड़ की इस योजना में भी इसके वितरण आयोजनों पर अनाप-शनाप खर्च किया जाएगा। सरकार मुर्गी से ज्यादा मसाले पर खर्च कर रही हैं?
    विपक्ष का आरोप है कि सरकार का पूरा साल नाकामियों से भरा रहा है। मुख्य विपक्षी दल बसपा के वजनदार नेता नसीमुद्दीन कहते हैं, सरकार साढ़े चार सीएम चला रहे हैं। वहीं कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता कहते हैं कि मुझे तो समाजवादी पार्टी के हीरमन है सरकार की विफलताओं को जनता को बताने के लिए लगभग समूचा विपक्ष धरना-प्रदर्शन करके वापस अपने-अपने दफ्तरांें में पंखों के नीचे बैठकर अपने व अपने भय्याजी के लोकसभा चुनाव के टिकट पर बहस करने में व्यस्त हो गया है। मुसलमान उलेमा/नेता ‘सरकार चलानी है तो मुसलमानों की मदद करनी होगी’ जैसी धमकी देकर सरकार को दबाव में लेने के हर संभव प्रयास में है। हाल के कुंडा कांड से ठाकुरों में नाराजगी है। यादव (अहीर समाज) पार्टी दफ्तर से सरकार तक अपनी पूंछ ने होने से अंदरखाने नाराज है। कुल मिलाकर सपा का एटीएम (अहीर$ठाकुर$ मुसलमान) टूटने बिखरने के कगार पर है। वहीं सपा मुखिया 2014 में लोकसभा की कुल 80 सीटों को अपनी साइकिल पर लाद लेने के लिए बेताब हैं। किसी को भी दुनिया के सर्वाद्दिक गरीबों में 8 फीसदी आबादी वाले उप्र की चिन्ता नहीं है।
    मुख्यमंत्री अखिलेश को बिग-बिग थैंकयू बोलने वाले छात्र-छात्राओं की संख्या 2014 के लोकसभा चुनावों तक 41 लाख से अधिक होगी अगर सब कुछ ठीक-ठाक रहा। इन सभी को तब तक लैपटाॅप, टैबलेट मिल जाने हैं। इस महत्वाकांक्षी योजना के साथ गरीबों को कम्बल, साड़ी, कन्या विद्याधन, हमारी बेटी उसका कल को भी जोड़ लिया जाय तो यह संख्या लगभग तीन करोड़ आती है। यह संख्या लोकसभा चुनावों में वोटों में कितनी ही कम तब्दील हो तो भी 1.5 करोड़ से अधिक का आकलन समाजवादी पार्टी के खेवनहार लगा रहे हैं।
    आम जनता की उम्मीदों के तारे मुख्यमंत्री साल भर में महज चार बार जन मुलाकात के लिए समय निकाल सके, बाकी के दिनों में विदेश में छुट्टी मनाने, क्रिकेट खेलने, आयोजनो-समारोहों में शिरकत करने, शहीदों के घरों पर जाने या फिर सरकारी काम-काज निपटाने में अतिव्यस्त रहे। शिक्षक सड़कों पर पिटते रहे तो स्कूलों में ‘मुन्ना भाईयों’ का बोलबाला रहा और संस्कारी मुख्यमंत्री अंकल-आंटी वाली नौकरशाही का सम्मान करते रहे। अति सज्जन, सौम्य मुख्यमंत्री 2013 के बाकी दिनों में इस सबसे उबर कर नये आशाजनक कदम उठा पाएंगे?