Wednesday, March 12, 2014

लखनऊ में लगेगा ‘अखबार मेला’

लखनऊ। नये साल के प्रथम सप्ताह में सात अखबारवालों ने मिल बैठकर की गई बहस में कई सवाल और जावब के बीच एक सवाल उठाया कि ‘हमारा परिचय कैसे और व्यापक हो?’ तमाम जद्दोजहद के बीच जवाब आया स्वाभिमान, सम्मान, सम्बन्ध, सहभागिता एवं सत्य के पंच पथ के शक्तिशाली निर्माण के लिए ‘अखबार मेला’ का आयोजन लखनऊ में किया जाय। तारीख तय हुई हिन्दी पखवारे के बीच 28 सितम्बर, 2014। अब बड़ी समस्या है इसके लिए धन, जन और मन के ताकत की, तो मन में मशाल जलाने का काम तो सोशल मीडिया और अखबारों, पत्रिकाओं में जारी है। पत्रकार संगठन, पत्रकार और सामान्यजनों के उत्साही उत्तर मिल रहे हैं। रह गया धन तो देश में भामाशाहों की कोई कमी नहीं है।
    ‘अखबार मेला’ जैसा आयोजन सम्भवतः देश में पहली बार होने जा रहा है। इस मेले की विशेषता यह होगी कि इसमें अखबार/पत्रिका व उनके सम्पादक-प्रकाशक/संवाददाताओं के साथ पाठक, विज्ञापनदाता, प्रसारकर्ता, मनोरंजन के अभिलाषीजन, प्रतिष्ठित उद्यमी और विशिष्ट राजनयिकों की भागीदारी एक साथ होगी। मेले में हजारों अखबार एवं पत्रिकाओं को एक साथ एक ही पंडाल में देखा जा सकेगा। सम्भवतः कई भाषाओं के पत्र-पत्रिकाओं से भी सामाना होगा। एक दिनी मेले में प्रिंटमीडिया के छोटे-मंझोले पत्र-पत्रिकाओं की विविधिताओं के साथ कई तकनीकी पहलुओं का भी प्रदर्शन होगा।
    ‘अखबार मेला’ स्थल पर कई अखबारों/पत्रिकाओं के अलावा विशेष स्मारिका ‘अखबार मेला’ का विमोचन भी होगा। ‘अखबार मेला’ स्मारिका अपने आपमें अनूठी होगी। इसके पन्नों पर तमाम अखबारों का हू-ब-हू प्रकाशन होगा। परिचय और परचम का समागम होगा। अखबारों के स्टालों पर ग्राहक बनने, बनाने की सुविधा व पत्र-पत्रिका मुफ्त प्राप्त करने की व्यवस्था भी होगी। पत्र-पत्रिकाओं के विस्तार के लिए जिला/तहसील स्तर के संवाददाता आदि के लिए वार्ताकक्ष का भी आयोजन होगा। विज्ञापनदाताओं से भेंट और राजनेताओं/उद्यमियों से साक्षात्कार के अवसर भी होंगे। इस हेतु अलग से पंडाल बनाया जायेगा। एक महत्वपूर्ण सवाल ‘छोटे-मंझोले पत्र-पत्रिकाओं और उनके पत्रकारों की खबरपालिका में क्या हैसियत व भागीदारी है? पर एक सेमिनार भी होगा। इस सेमिनार में जाने-माने विद्वतजनों के साथ गंवई पत्रकारों की बड़ी भागीदारी होगी।
    ‘अखबार मेला’ में तमाम पत्रकार संगठनों के अलावा आॅन लाइन न्यूज पोर्टल, दक्षिण भारतीय पत्रकारों व सोशल मीडिया के लोगों की भारी जुुटान होगी। अभी से ही मीडिया से सम्बन्धित लोगों को आमंत्रित किया जा रहा है। मेला संयोजक राम प्रकाश वरमा, सम्पादक, ‘प्रियंका’ हिन्दी पाक्षिक ने छोटे-मंझोले व गंवई पत्रकारों को खुले मन से मेले में भागीदारी के लिए आमंत्रित करते हुए कहा, ‘बाजार की मांग है कि छोटे-मंझोले अखबार/पत्रिका आम आदमी के हाथों में पहुंचे और थैलीशाहों का वर्चस्व टूटे। यह तभी संभव है जब चार-आठ पेजी अखबार व तीस-चालीस पेजी पत्रिकाएं देश के हर क्षेत्र व साक्षर तक कम दामों में अपनी पहुंच बना सकें।’’
    ‘अखबार मेला’ के अध्यक्ष प्रदीप श्रीवास्तव, सम्पादक ‘दिव्यता’ हिन्दी मासिक ‘अखबार मेले में लखनऊ चलो’ अभियान के प्रचार के लिए बहुत शीघ्र ही दक्षिण भारत की यात्रा पर जा रहे हैं। मेला महामंत्री रिजवान चंचल, सम्पादक, ‘रेड फाइल’, हिन्दी पाक्षिक इसी अभियान को आगे बढ़ाते हुए पत्र-पत्रिकाओं पत्रकारों के पंजीकरण के लिए अपने साथियों महेन्द्र शुक्ल, सम्पादक-लखनऊ ब्यूरो, अनिल सेठ, सम्पादक-सिटी मैनेजमेंट त्रैमासिक, खुर्शीद अहमद, सम्पादक-माया अवध हिन्दी मासिक, राजेन्द्र कु. पाण्डे, सम्पादक- चक्रीयकाल हिन्दी पाक्षिक के साथ लगातार सक्रिय हैं।
    ‘अखबार मेला’ के संरक्षक श्री राम सजीवन पाण्डेय, सम्पादक, ‘संग्राम बटोही’ हिन्दी साप्ताहिक ने देश भर से छपने वाले छोटे-मंझोले पत्रों के सम्पादकों/प्रकाशकों/संवाददाताओं व गंवई पत्रकारों से अपील की कि वे अपनी भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए मो.ः 09839191977 ई-मेल मकपजवतण्चतपलंदां/हउंपसण्बवउ पर सम्पर्क करें। फेसबुक पर ‘अखबार मेला’ का विज्ञापन ंिबमइववाण् बवउ/तंउअंतंउं पर मौजूद है, इसे अधिक से अधिक शेयर करें। मेरा विश्वास है कि ‘अखबार मेला’ पाठकों, विज्ञापनदाताओं और पत्र-पत्रिकाअें के लिए एक मजबूत पुल साबित होगा।
बंधुवर,
’कृपया इसे अन्य अखबार, पत्रिका व पोर्टल को भी प्रकाशनार्थ फारवर्ड करें।

पांव लागी अपराध है?

पुलिस कप्तान ने पत्रकार को ‘पांव लागी’ कहने पर क्यों पीटा?
-राम प्रकाश वरमा
‘पांव लागी’ शब्द भारतीय दण्ड विधान (प्च्ब्) की किस धारा के तहत जुर्म माना जायेगा? यह सवाल मेरी दाल-भात-तरकारी में कंकर-बालू की तरह पिछले दो महीनों से मुझे लगातार पीड़ा दे रहा है। इसका जवाब तलाशने के लिए सियासी मोहल्लों के संस्कार और नौकरशाही की शाहाना रवायतों पर भरपूर नजर डाली लेकिन वहां भी ‘पांव छुआई’ संस्कृति का सम्मान और दुलार देखने को मिला। रामायण, गीता, महाभारत जैसे महान ग्रंथों से भी पैर छूकर आशीर्वाद लेने की सीख, संस्कार मिले हैं। आज तो हिन्दुओं के अलावा अल्पसंख्यक समुदाय भी पैर छूने से गुरेज नहीं कर रहा। समूची भारतीय संस्कृति का शिष्ट आचरण ही है अपने से बड़ों का पैर छूठकर आशीर्वाद लेना। पांव छूना अति सम्मान का परिचायक है। फिर एक पुलिस अधिकारी ‘पांव लागी’ कहने पर किसी को कैसे पीट सकता है? अपने बालिग पुलिसवालों से कैसे पिटवा सकता है? समझ से परे है, लेकिन है सच।
    सच कुछ यूं है, 3 जनवरी, 2014 की सुबह सोनभद्र जिले के पुलिस कप्तान अपने पांच सिपाहियों के साथ रौप प्राथमिक विद्यालय के पास मुख्यमार्ग पर ‘मार्निंग वाॅक’ पर थे। उसी रास्ते से विनय कुमार यादव ‘दैनिक जागरण’ हिन्दी दैनिक समाचार-पत्र के संवाददाता/अभिकर्ता अपने समाचार-पत्र को बांटते हुए साइकिल से गुजर रहे थे। पुलिस कप्तान को विनय यादव का साइकिल पर सवार होकर पास से गुजरना नागवार लगा। उन्होंने बाकायदा उसकी पिटाई खुद की, अपने सिपाहियों से पिटवाया फिर भी अहं नहीं संतुष्ट हुआ तो विनय यादव को चुर्क चैकी भेज दिया।
    पत्रकार पिटा था। अभिकर्ता पिटा था। कई लोग उस दिन का अखबार नहीं पा सके, पढ़ सके। स्वाभाविक है खोजबीन हुई। चश्मदीदों ने कई अखबारवालों को बताया। पत्रकारों की जमात पुलिस चैकी पहुंची फिर ‘दैनिक जागरण’ के ब्यूरोचीफ सहित कई पत्रकार पुलिस कप्तान से मिले तब कप्तान ने पत्रकारों से कहा, ‘यह एसपी साहब पांय लागी कह रहा था।’ यहां गौर करने लायक है कि पत्रकारों ने घटना का विरोध करने की जगह विनय यादव से एक माफीनामा लिखवाकर पुलिस चैकी से छुड़ा लिया। किस बात का माफीनामा लिखाया गया? जबकि विनय यादव को गम्भीर चोटें पैर व आँख पर आई हैं, ऐसा चिकित्सा प्रमाण पत्र में दर्ज है। यहां गौरतलब है कि विनय विकलांग भी है।
    पत्रकार का पिटना, वह भी पुलिस से पिटना कोई अनहोनी नहीं है। पत्रकारों की बाकायदा हत्याएं हो रही हैं। पिछले साल देश भर में आठ पत्रकार मारे गए। पिटनेवालों की संख्या खासी है। पीटने वालों में पुलिस, साधु-संत, राजनेता सभी हैं वह भी जो पत्रकारों की लेखनी के मोहताज रहे हैं। वह भी जो मीडिया की गणेश परिक्रमा के लिए जाने गये। कई बार तो महज सवाल पूछने भर से पत्रकार को जेल की सजा भुगतनी पड़ी, मनहानी के मुकदमें तो आम बात है। अखबारों के मुखालिफ फतवे तो आये दिन दिये जाते हें। सरकारें अपनी आलोचना किये जाने पर बेतरह नाराज होती रहती हैं।
    उप्र सरकार मीडिया से गाहे-बगाहे इसलिए नाराज हो जाती है कि वह सैफई पर सवाल उठा देता है, वह मुजफ्फरनगर दंगे पर सवाल उठा देता है, वह माधुरी दीक्षित पर सवाल उठा देता है, वह विधायकों, मंत्रियों के दल की विदेश यात्रा पर सवाल उठा देता है, यही नहीं चुनावी दौर-दौरे में भाजपा के ताजा चेहरे मोदी को अखबार के पन्नों व टीवी के पर्दे पर अधिक तरजीह मिलने पर सत्तादल के मुखिया खफा हो जाते हैं। तो स्वस्थ आलोचना अपराध की श्रेणी में दर्ज की जायेगी? यह सवाल बरसों से जस का तस है। इस बीच देश के जगमगाते शहर मुंबई में फोटो पत्रकार लड़की के साथ बलात्कार हो जाता है। सुकुमा, छत्तीसगढ़ के पत्रकार नेमीचन्द्र जैन की हत्या कर दी जाती है। मुजफ्फरनगर दंगों के दौरान पत्रकारों से बदसलूकी की जाती है। सुल्तानपुर में मुख्यमंत्री की मौजूदगी में जिले के कप्तान पत्रकार को पीटने व शिकायती फोटो छीनने की बदतमीजी करते हैं। ऐसी सैकड़ों घटनाएं आये दिन पत्रकारों के साथ घटती हैं। गो कि पत्रकार को सच्चाई से अपना काम करना बेहद कठिन है।
    पत्रकार, अखबार और आदमी के बीच उम्मीदों का पुल है और अखबार समस्या, पीड़ा, पर्व और सूचना का वेद है। दोनों के बगैर लोकतंत्र की ताकत कमजोर होगी। खासकर तब और भी जब दुर्योधनी ताकतों के लाखों ‘प्रिंट आउट’ सभ्यता की दीवारों पर चस्पा हों। ऐसे हालातों में पत्रकार पत्रकारिता के बुनियादी मूल्यों से, सच से कैसे मुंह मोड़ सकता है? यह सच है कि अखबारों की बड़ी जमात सरकारी विज्ञापनों पर निर्भर है और उनके पत्रकार सरकारी सुविधाओं के मोहताज। जाहिर है, इन हालातों में सरकार के या नौकरशाही के मुखालिफ लिखना या समीक्षा करना कठिन है। छोटी जगहों पर तो हालात और भी तकलीफ देह हैं, वहां अद्दिकारी, अपराधी और नेता का स्वाभाविक दबाव होता है। इससे भी बड़ा दबाव नये अखबार मालिकों का होता है जो सिर्फ अपने फायदे के लिए प्रेस को परचून की दुकान में तब्दील करने को बाजिद हंै। इनका साथ देने में तमाम छोटे अखबार और उनके संपादक-प्रकाशक भी गुरेज नहीं कर रहे हैं। फिर पत्रकारों की बिरादरी भी अपने मालिकों के प्रति वफादारी दिखाने में पीछे नहीं है, तब भला आलोचना या सच की बात करना कितना नैतिक हैै?
    इसका यह मतलब कतई नहीं है कि सच के नातेदारों और आदमी के पैरोकारों की जमात से समाज का भरोसा उठ गया है, भरोसा आज भी बरकरार है, यदि ऐसा नहीं होता तो यह लाइने लिखते समय क़लम की रौशनाई सूख जाती। फिर उसी सवाल पर आते हैं कि पुलिस कप्तान ने विनय यादव को क्यों मारा? क्या वे किसी तनाव में थे या उनका दिमागी संतुलन कुछ क्षणों के लिए बिगड़ गया था? हिंसा पुलिस महकमें का बड़ा हथियार है या रोग? इसकी जाँच होनी चाहिए। इस पर शोध की आवश्यकता है।
    सरकार को इस ओर गम्भीरता से सोंचने की जरूरत है। हालांकि मुख्यमंत्री उप्र ने पिछले दिनांे खुद कहा है कि पुलिस ही बनाती बिगाड़ती हैं सरकार की छवि/पुलिस अपनी छवि सुधारे। इससे भी बड़ा प्रश्न है कि जिले के पत्रकारों ने महज धरना प्रदर्शन और मोमबत्ती जुलूस के बीच विनय की पीड़ा, अपमान और सुरक्षा को दरकिनार कर दिया? तो क्या यह खुद पर हमला कराने का दावतनामा तैयार कर रहे हैं पत्रकार बन्धु? जो भी हो पुलिस कप्तान के हिंसात्मक आचरण को कतई नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए।

कुर्सी एक ग्रह है

कुर्सी एक ग्रह है
इसका भूगोल
महज चार टांगों पर
टिका हुआ है?
जी नहीं!
कुर्सी को ग्लोब
की भांति घुमाईये तो
चारो ओर
घूर्तता, बेईमानी, झूठ
भ्रष्टाचार, शिष्टाचार
के छोटे-बड़े द्वीप
और
धुंध में नहाया हुआ
ईमानदार मोहल्ला
सत्य की अक्षांश रेखाओं व
शीतोष्ण कटिबन्ध के बीच
छोटे से, बहुत छोटे से बिन्दु
की शक्ल में दिख जायेगा।

लेकिन अखबार पहले पढ़ेंगे हम!


    हम सुबह उठते हैं। अखबार पढ़ते हैं, हालांकि कोई नियम नहीं है, और न ही समाज के प्रति, साहित्य के प्रति बेहद संवेदना है। यह तो एक प्याली चाय के साथ एक पूरा दिन काटने, सौदेबाजी के लिए कच्चेमाल की तलाश और दुर्घटनाओं पर चटखारे लेने भर का ‘काउंटर’ है। सच कहा जाय तो अधिकतर लोगों की ‘क्राइम डायरी’ है। और ‘क्राइम’ उधार की जमीन पर तेजी से फलता-फूलता है। अखबार के साथ ‘क्राइम’ शब्द जोड़ने का मतलब? दरअसल अखबार, पत्रिका या पुस्तक मांगकर पढ़ने वाले को मैं अपराधी मानता आया हूं। क्योंकि यहीं मंगते व्यवस्था में होते हैं। सच कहूं तो नपुंसक।
    अखबार मांगकर पढ़ने वाले पूरे देश में और हर वेश में पाए जाते हैं। उनका नारा है, ‘अखबार तुम्हारा, अधिकार हमारा।’ यानी पैसे तुम खर्च करो लेकिन अखबार पहले पढ़ेंगे हम।
    सबसे पहले अखबार पढ़ने वालों की बात करते हैं। ये पाठक, आपसे पहले बिस्तर त्याग देते हैं और आपके घर के आगे चहल-कदमी करते रहते हैं। अखबार वाले के आते ही वे बड़ी बेहयाई से आपकी घंटी बजाते हैं ओर ‘दो मिनट’ के लिए अखबार मांग लेते है। उनके ‘दो मिनट’ खत्म होते-होते दो-एक घंटे तो बीत ही जाते हैं। यदि इस बीच आपकी अखबार पढ़ने की इच्छा जोर मारती है और आप अपना अखबार उनके घर से मंगवा लेते हैं तो वे सारे मुहल्ले को यह बताने से नहीं चूकते कि पड़ोंसियों के प्रति आपका आचरण कितना अशोभन है। ऐसे पाठकों को अखबार देते रहना, आपके धैर्य की चरम परीक्षा है, क्योंकि जब तक आपका अखबार वापस आता है, उसकी वर्ग पहेली भरी जा चुकी होती है, खिलाडि़यों और अभिनेत्रियों के चित्र काटे जा चुके होते हैं और अक्सर अखबार के दो-एक पन्ने भी गायब हो चुके होते हैं।
    कुछ अति बुद्धिमान लोग, अखबार ले जाने की जगह, उसे आपके घर में ही बैठकर पढ़ना पसंद करते हैं। इसका सबसे बड़ा फायदा यह है कि उन्हें मुफ्त के अखबार के साथ-साथ मुफ्त की चाय भी प्राप्त होती रहती है। वे इस बात को जानते हुए भी अन्जान बने रहते हैं कि उनके जाने के बाद घर में कैसा कोहराम मचता है। अखबार मांगने वालों का दूसरा वर्ग ट्रेनों तथा बसों में उपस्थित रहता है। आपने अखबार खरीद कर सीट पर रखा नहीं कि मांगने वाले हाजिर। अगर एक बार अखबार इनके हाथ में चला गया तो उसका भगवान ही मालिक है। पहले आपका अखबार कई हिस्सों में बंटेगा और कई मांगने वाले एक-दूसरे से अपना हिस्सा प्राप्त करते रहेंगे। फिर पूरे डिब्बे में या बस में फैल जाएगा। अगर आप खुद अपना अखबार पढ़ना चाहते हैं, तो दौड़-दौड़कर उसके पन्ने एकत्रित करने का प्रयास करते रहिए। इसकी कोई गारंटी नहीं है कि दौड़-भाग के बाद  आपको अखबार के सभी पन्ने मिल जाएंगे। उनमें से कुछ से बच्चों की नाक साफ हो चुकी होगी, कुछ पर खाना खाया जा चुका होगा और कुछ हवाई जहाज के रूप में इधर से उधर तैरते नजर आएंगे।
    सबसे आनंददायी स्थित तब आती है जब आप ही का अखबार पढ़ने के बाद, आपको वापस करते समय पढ़ने वाला नसीहत देता है कि जब पैसा खर्च किया जा रहा है, तो केाई बेहतर अखबार खरीदा जाना चाहिए। ऐसे में मन तो करता है कि सलाह देने वाले से कहा जाए कि पंसद-नापसंद का इतना ही ख्याल है तो अपना अखबार खुद क्यों नहीं खरीद लेते, लेकिन आप कुछ कहंे इससे पहले ही वे किसी दूसरे सज्जन से लिए हुए अखबार के पन्नों मंे डूब चुके होते हैं।
    अखबार पढ़ने की तरह ही एक शौक है, पत्रिकाएं पढ़ने का। जो लोग पैसे खर्च कर पत्रिकाएं खरीदते हैं, वे अपनी पत्रिकाएं पढ़ने में कम और उन्हें पड़ोसियों से वापस प्राप्त करने में ज्यादा समय व्यतीत करते हैं। नयी पत्रिका के घर में आते ही पड़ोसियों का पे्रम भाव अचानक बढ़ जाता है और हम असहाय देखते रहते हैं। पे्रम के मुखालिफ कोई तर्क आज तक गढ़ा नहीं जा सका है।                                                            ’1996 में छपा संपादकीय एक बार फिर पढ़े

Friday, November 15, 2013

यह झगड़े वोट बैंकों के दरवाजे हैं...

डाॅ. राही मासूम रज़ा
अभी कुछ दिनों के लिए अमरीका जाना पड़ा। पतझड़ का मौसम था और जितना अमरीका मैंने देखा वह पतझड़ के रंगों में डूबा हुआ था।
    राष्ट्रपति रीगन का पतझड़ भी मेरे सामने ही शुरू हो गया था... साहब यह अमरीकी राजनीति भी गजब की चीज है। यह डाॅलर के सिवा और किसी की वफादार नहीं- इसकी बेहयाई देखिए कि सद्र रीगन चंद अमरीकी नागरिकों को लेबनान के शीया आतंकवादियों के कब्जे से निकालने के लिए खुमैनी सरकार से बातचीत करने पर तैयार हुए। यह बात बिल्ली के गुह की तरह छिपाई गयी। उस पर इंगलैंड की मिट्टी डाली गयी.. मोल-तोल हुआ। अमरीकी नागरिक छूट गये और इस सौदे में अमरीका ने सैकड़ों मिलियन डाॅलर कमा लिये!... और यह कमाई निकारागुआ में आतंकवादियों की मदद के लिए खर्च की गयी! ऐसी दोगली, ऐसी झूठी, ऐसी बेईमान राजनीति! यह मैली राजनीति दुनिया की किसी लाडरी में धुल कर साफ नहीं हो सकती... इसलिए इतिहास को प्रतीक्षा करनी पड़ेगी उस दिन की, जब अमरीकी जनता यह फैसला करेगी कि यह राजनीति उसका अपमान है। उस दिन वह इसे उतार फेंकेगी और डाॅलर की गुलामी से आजाद होकर अपनी क्रांति को पूरा कर लेगी।
    परंतु मैं आज राष्ट्रपति रीगन की बात करना नहीं चाहता था, पर वह जब भी ध्यान में आते हैं मेरी जुबान में खुजली होने लगती है; क्योंकि सच पूछिए तो हमारी राजनीति का हाल भी वैसा ही है। स्वतंत्रता जो आयी वह मेड इन इंगलैण्ड थी। स्वतंत्रता मेड इन इंगलैंड इसलिए आई कि जो पार्टी स्वतंत्रता संघर्ष की अगुवाई कर रही थी, अर्थात इंडियन नेशनल कांग्रेस, वह भी मेड इन इंगलैड ही थी.. इसलिए जब खुद ब्रिटेन डाॅलर की छत्रछाया में जा बैठा है तो भारतीय राजनीति भला डाॅलर की पाठशाला में कैसे न जा बैठती। और जनाब हमारी राजनीति ने भी डाॅलर के सबक फर-फर याद कर लिये। डाॅलर की सभ्यता यह है कि राजनीति देश के लिए नहीं है, देश राजनीति के लिए है और राजनीति उस ‘व्यक्ति’ के लिए है जिसकी स्वतंत्रता का ढिंढोरा डाॅलर सरकार पीटती रहती हैं। परंतु अमरीका दूसरे देशों के व्यक्तियों की स्वतंत्रता बरदाश्त नहीं कर सकता। अमरीका में दूसरों की स्वतंत्रता की परिभाषा डाॅलर की गुलामी है; और जो देश डाॅलर के गुलाम नहीं हैं, उन्हें यह ‘मेड इन अमरीका’ स्वतंत्रता देने के लिए अमरीकी सरकार करोड़ों डाॅलर खर्च करती रहती है। हमारा रूपया सींकिया पहलवान है। डाॅलर की तरह मुंहजोरी तो नहीं कर सकता.... परंतु जीवित है और डाॅलर के कदम चूमकर आत्महत्या करने पर तैयार नहीं, इसलिए अंतर्राष्ट्रीय मैदान में वह डाॅलरबाजी का विरोध करता है और दुनिया के सारे कमजोर देशों का साथ देता है। पर देश के अंदर वह डाॅलर ही का खेल-खेल रहा है। जो आतंकवाद उसके दुश्मन का दुश्मन है, वह आतंकवाद नहीं; जैसे गोरखालैंड की मांग करने वाले। दिल्ली सरकार उनके खिलाफ नहीं क्योंकि वह बंगाल सरकार का तख्ता उलटने की कोशिश में दिल्ली सरकार के काम आ सकते हैं। यह मत कहिए कि भारत एक लोकतंत्र है और यहां ऐसा नहीं हो सकता। केरल में नम्बूदरीपाद सरकार कैसे उलटी थी? कश्मीर में अब्दुल्लाह सरकार कैसे उलटी थी? आंद्द्र में एन.टी.आर. की तेलुगूदेशम की सरकार कैसे उलटी थी? भारतीय लोकतंत्र इस खेल का उस्ताद है। लोकतंत्र का मतलब यह थोडे़ है कि यहां सचमुच का लोकतंत्र है।
    हमारे संविधान में तो और भी बहुत सारी खूबसूरत बातें लिखी हुई हैं। उसमें लिखा हुआ है कि भारत एक सेक्युलर डिमोक्रोसी है। लेकिन यहां न तो सेक्युलर ही है और न ही डिमोक्रेसी। यहां शिवसेना के नेता सर्वश्री बाल ठाकरे शिवाजी पार्क में माइक्रोफोन लगाकर भारतीय मुसलमानों को विदेशी बताते हैं और उन्हंे सीधा करने की बात करते हैं, और मुख्यमंत्री यह बयान देकर चुप हो जाते हैं कि मैं उन्हें ऐसा कहने पर छोडुंगा नहीं! गालिब का कोई माशूक अवश्य श्री चव्हाण जैसा रहा होगा; जभी तो उन्होंने यह लिखा है:
तेरे वादे पर जिये हम तो ये जान छूट जाता
कि खुशी से मर न जाते, अगर एतबार होता।
    और भारतीय राजनीति की सबसे मजेदार बात यहां 8 दिसम्बर के समाचार पत्रों में छपी। म्युनिसिपल बाई इलेक्शन में एक शिव सैनिक भारतीय जनता पार्टी के आदमी (?) को हराकर चुनाव जीत गया तो उसने यह बयान दिया कि उसकी जीत हिंदूइजम की जीत है। यह तो रोमनों से भी ज्यादा रोमन होने की बात हो गयी। जहां दो ईंटों के बीच में जरा सी भी जगह नहीं है, वहां भी मज़हब का भूत धुँआ बनकर घुसने की कोशिश कर रहा है और दुर्भाग्य से सफल भी हो रहा है।
    हर धर्म कभी न कभी मनुष्य को रास्ता दिखने आया था। परंतु, आज हर धर्म अपने मानने वालों को कुछ लोगों के फायदे के लिए राह से भटकाने का काम कर रहा हैं। लोग वोटो के दरबे पर धर्म का ताला लगाना चाहते हैं कि बस चुनाव के दिन वोटर दरबे से निकाले जायें, वोट दें और फिर पांच बरस के लिए बंद कर दिये जाएं। यदि आज अस्सी प्रतिशत हिंदुओं को यह समझाने का काम किया जा सकता है तो उनका धर्म खतरे में है, तब तो फिर 12 प्रतिशत मुसलमानों और 2) प्रतिशत सिखों को यह समझाना बहुत ही आसान है।
    इस बात पर याद आया कि 8 दिसम्बर को एक सभा बुलायी गयी थी। डाॅ. भ.दी. फड़के ने मराठी भाषा में एक किताब लिखी है- ‘‘स्वतंत्र आंदोलनातील मुसलमान’’ यह सभा इसी किताब के सिलसिले में थी और एक भारतीय मुसलमान के नाते मैं वहां बुलाया गया था। जब मैं भाषण देने के लिए उठा तो पहली बार यह सोचकर दुःख हुआ कि मैं मराठी नहीं जानता।
    जब मैं मराठी जानता होता तो शायद ज्यादा खुल के बात कर पाता। पर हम हिंदीवालों का दिल इस बात में बहुत छोटा है। हम यह तो चाहते हैं कि हिंदी देश भर में स्वीकार कर ली जाए, पर हम देश की दूसरी भाषाओं की न इज्जत करते हैं और न ही उनकी जरूरत समझते हैं। शायद यही कारण है कि अहिंदी भाषियों के लिए हिंदी का स्वीकार करना मुश्किल हो रहा है। परंतु यह बात फिर कभी।
    डाॅ. फड़के ने यह किताब बड़ी मेहनत
और गम्भीर सच्चाई से लिखी हैं। यह साबित भी कर  दिया है कि मुसलमानों ने स्वतंत्रता आंदोलन में बड़े काम किये हैं। पर मुझे इन मौकों पर हमेशा यह लगता है कि मैं मुलजिमों के कटघरे में खड़ा हूं और मेरी सफाई का गवाह अपना बयान दे रहा हैं। मुझे ऐसे में बड़े अपमान का अनुभव होता है। इसलिए मैंने उस सभा में कहा कि मुसलमानों ने स्वतंत्रता आंदोलन में कुछ नहीं किया, पर हिंदुओं ने भी कुछ नहीं किया; और अगर कुछ किया हो तो बताइए। सिखों और ईसाइयों का भी कोई योगदान नहीं.... स्वतंत्रता आंदोलन में तो हिस्सा लिया था किसानों-मजदूरों ने; विद्यार्थियों और अध्यापकों ने; क्लर्काें और दुकानदारों ने... रामप्रसाद बिसमिल हिंदू नहीं हिंदुस्तानी क्रांतिकारी थे; भगत सिंह सिख नहीं थे; भारतीय इंकिलाबी थे; धर्म तो स्वतंत्रता के रास्ते का रोड़ा था, जैसे आज प्रगति के रास्ते का रोड़ है... वह कहीं सर्वश्री बाल ठाकरे को नेता बना देता है, कहीं मौलाना बुखारी को। इनके हाथों से धर्म छीन लीजिए तो इन फुकनों की हवा निकल जाएगी।
    पंजाब में संत भिंडरवाला उभरे। उन्हें खोज के निकाला किसने था? कांग्रेस के भीतरी झगड़े ने, सरदार जैल सिंह और सरदार दरबारा सिंह की अनबन ने। दरबारा सिंह का सूरज डूब गया। जैलसिंह जी राष्ट्रपति हो गये, और पंजाब जल रहा है। इसी तरह श्री ठाकरे का सूरज स्वर्गीय नायक की राजनीति के क्षितिज से निकला। वह डांगे को हराकर बम्बई के मजदूरों को कम्युनिस्टों के असर से निकालना चाहते थे।
    डांगे आखिरकार हार तो गये। कम्युनिस्टों का असर भी टूट गया। परंतु बम्बई भी कांग्रेस के हाथ से निकल गयी और जो वातावरण यही रहा, तो शरद पवार को मिलाने के बाद भी आने वाले चुनाव में कांग्रेस के हाथ से महाराष्ट्र के निकल जाने का बड़ा डर है। क्योंकि, शिवसेना के हाथ में धर्म और क्षेत्र दोनों की लाठी है और कांग्रेस या किसी और पार्टी के पास इस दोहरे जादू की कोई काट नहीं है। असम में चुनी हुई सरकार से त्यागपत्र दिलवा कर असम को आतंकवादियों के हवाले कर दिया गया। कांग्रेस का बस चला तो बंगाल में एक ‘गुरखिस्तान’ भी बन जाएगा।
    मुझे तो उत्तर प्रदेश और बिहार भी थोड़े ही दिनों के मेहमान दिखाई देते हैं। इन दोनों का बंटवारा भी होने ही वाला है क्योंकि दाल बांटने के लिए जूतियां कम पड़ रही हैं....
यह बात सही नहीं है कि 14 अगस्त सन 47 को देश का विभाजन हो गया था। सही बात यह है कि 14 अगस्त सन 47 को देश का विभाजन शुरू हुआ था और विभाजन का काम खत्म नहीं हुआ है, जारी है।
    वहां अमरीका में मैंने हिंदुस्तानी- पाकिस्तानी दोस्तों से यह कहा कि-अपने घर की यादों को मत ताजा रखिए। भूल जाइए कि आप हिंदुस्तानी या पाकिस्तानी हैं। आप अमरीकी हैं। डाॅ. अब्दुल्लाह वाशिंगनटनवी... डाॅ. सलमान अख्तर फिलेडलफियावी...
    परंतु यहां, अपने घर में यह कहना चाहता हूं कि घर की याद को ताजा रखिए। भाषा भी ठीक, धर्म भी ठीक, पर यह भी सोचिए कि देश भी ठीक है या नहीं! जरा सी बात पर धर्म का यूं सड़क पर निकल आना, धर्म और देश दोनों की सेहत के लिए ठीक नहीं है।
    कल किसी ने शिवाजी की तस्वीर को जूते का हार पहना दिया, तो सजा मिली सैकड़ों बेगुनाहों को, जो कत्ल कर दिये गये। सजा मिली सैकड़ों  दुकानों को जो लूट ली गयीं, सजा मिली सैकड़ों घरों को जो जला दिये गये।
    आज किसी समाचार पत्र में इस्लाम के पैगम्बर के बारे में किसी ने कुछ अंट-शंट लिख दिया तो सजा मिली बाजारों को, सजा मिली सरकारी बसों को...
    सीधी बात यह थी कि उस समाचार पत्र पर मुकदमा चलाया जाता। उस कहानी के लेखक को सजा दिलावाने की कोशिश की गयी होती, क्योंकि पैगम्बर का अपमान बसों ने या दुकानों ने तो किया नहीं था!
    मगर कुर्सियों के आसमान से नीचे उतर कर कोई सोचने पर तैयार नहीं है.. यह झगड़े वोट बैंकों के दरवाजे हैं, लोग या डरके वोट दे रहे हैं या गुस्से में। और डर और गुस्से दोनों के लिए किसी न किसी फसाद की जरूरत पड़ती है।