Tuesday, March 12, 2013

बर्फ की सिल

मेरे बगल मंे लेटी हुई औरत के बदन पर तार भी नहीं था उसके जिस्म की गर्माहट में झुलसते हुए तमाम वक्त मेरे हाथों से फिसल चुका था, आज उसका वही बदन किसी बर्फ की सिल की तरह ठंडा लग रहा था। एहसास हो रहा था, मेरे बगल में लेटी हुई ताजा हाड़-मांस की औरत नहीं बल्कि फ्रिज में जमी बर्फ पसरी पड़ी हो। मैंने कई बार प्रयत्न किया, छू कर भी देखा मगर मुझे हर बार ठंडक का आभास मिला। शरीर में कंपकपी छाने लगी।
    यह मेरे लिए असहनीय था, मैं जब कभी ऐसे रास्ते से गुजरता तो लगता कि मैंने ईश्वर के विधान में दखल दे डाला है। शायद! सरल को यह एहसास मुझसे पहले से ही था। सरल का स्वभाव बेहद सरल था। सरल में दुनियां भर की खूबियों के बावजूद, ठंडेपन की एक चादर उसके बदन पर लिपटी रहती। मुझमें इतनी ताकत कभी पैदा न हो सकी कि उस ठंड़ी चादर के नीचे की गर्माहट का एहसास कर सकूं। मुझे यह कहने में कतई हिंचक नहीं कि शायद उतने समय के लिए मुझमंे नपुंसकता समा जाती रही है।
    सरल को लेकर जीवन की तमाम मुश्किलों का सफर आसानी से तय किया था। उसकी प्रेरणां से मोहब्बत और इंसनियत की जागीर का अकेला मालिक होने का दावा कर सका। सरल ने ही तो जीने के नये रास्ते की खोज में मेरा साथ दिया। सरल ने ही तो भूखे पेट को सिर्फ दो आंसुओं से भर लेने में मदद की। सरल ने ही तो निराशा को अपने बदन की गर्माहट से जलाकर भस्म कर दिया। फिर....... फिर आज उसके बदन की गर्माहट-मौन क्यों हैं?
    क्या हुआ है मुझे कि मैं उसके बगल मंे लेटा हुआ भी उसे बर्फ की गोद से नहीं निकाल पा रहा हूं? क्यों ऐसा होता है? क्या मैं उसके अहम् को कहीं कुचल तो नहीं रहा हूं? मेरे सामने सिर्फ सवालों की कतार है, जवाब का एक जुम्ला भी नहीं।
    इन सवालों की कतार से परे मुझे अपने जीवन के पिछले क्षणों के दृश्य दिखते है। मैं और सरल, सरल और मैं! कहीं कोई ठंडापन नहीं, कोई रीतापन नहीं। जोश और उमंग के समुद्र में तैरते हुए सरल और मैं। अचानक मेरा हाथ सरल के बदन से टकरा जाता है और विचारों की दुनिया से निकलकर यथार्थ की चिकनी और सपाट सड़क पर आ खड़ा होता हूं।
    ‘सरल...सरल.....। कोई उत्तर नहीं, सिर्फ ठंडी सांसे। अभी कल की ही तो बात है, गांव से पिता जी और भइया आये थे। सरल ने उन्हें आभास तक नहीं होने दिया कि वे अपने घर में नहीं हैं। सरल ने ही सारी मेहमाननवाजी पर कब्जा कर लिया था। पिता जी और भाइया बड़े ही खुश थे। जाने से पहले भइया ने मुझसे कहा था, ‘राम मैंने तुम्हें खत भी लिखा था कि खेतों ने इस बार हमारा साथ नहीं दिया हैं, हमें दस हजार रूपयों की जरूरत हैं, मगर तुमने कोई जवाब ही नहीं दिया।’
    ‘भइया मुझे तो तुम्हारा कोई खत नहीं मिला। बहरहाल मैं अभी देता हूँ।’
    वादा करके अंदर कमरे में गया,  अल्मारी खोल कर पैसे निकाले, और जैसे ही बाहर जाने के लिया घूमा, सरल सामने खड़ी थी। उसने एक नजर उन नीले नोटों पर डाली और दूसरी मुझ पर, फिर घूमकर चली गयी। उसकी खामोश निगाह ने क्या कहा? मैं न जान सका। मैंने बाहर आकर अपने बड़े भाई को रूपये दिये। उनको विदा करने की गरज से कोठी के गेट तक आया और उनके जाने के बाद भी लान में ही बैठा रह गया। दिल्ली की खुशनुमा शाम, माहौल में गर्माहट जरूर पैदा कर रही थी, मगर नागवार नहीं गुजर रहा था। शाम को और हसीन बनाने के इरादे से सरल को आवाज दी, मगर कोई उत्तर नहीं।
    मैं समझ गया कि खामोशी अब रंग लायेगी। मैं खुद ही अंदर गया। सरल रसोई में नौकर को कुछ समझा रही थी, मेरी मौजूदगी का एहसास होते ही, खामोशी ने उसका दामन थाम लिया। मैं तो यही कहुंगा। क्योंकि सरल खमोशी का दामन नहीं थाम सकती, इतना मैं अच्छी तरह जानता हूं। उसमें चंचलता कूट-कूट कर भरी है। जब चंचल हो जाती है तो किसी शरीर बच्ची की तरह और जब चंचलता ठहर जाती है तो उसका नयारूप एक खामोश बुत की तरह होता है। वो खामोश बुत मुझे बेचैन कर देता है। मुझे अच्छी तरह याद है, जब पहली बार यह खामोश बुत हम दोनों के बीच आया था। उस समय मैं दिल्ली की सड़कों पर अपनी मंजिल की तलाश में भटक रहा था। भटकाव में मेरे अपनों ने और भी भटका दिया। निराशा और भूख ने सरल के बदन से जेवरों को उतार लिया। जेवर जो औरत को पति के बाद सबसे प्यारे होते हैं। वही जेवर सरल से जुदा हो गये, मगर सरल ने उफ तक न की। फिर वक्त कब सरक गया, पता ही नहीं चला।
    दिल्ली जैसे शहर की भीड़ में अपनी पहचान बनाना बड़ा मुश्किल था, फिर भी सरल के साथ ने मुझे दिल्ली शहर का भारी-भरकम ‘साईन बोर्ड’ बना दिया। ठीक उसी तरह जैसे रेलवे स्टेशन पर ‘पीला बोर्ड’ उस स्टेशन और शहर की पहचान कराता है। दिल्ली शहर की ऊंची सोसाइटी में ‘राम’ का नाम लेने और याद रखने वालों की संख्या काफी लम्बी हो गई। तब आया एक नया मोड़, जो पिछले छूटे हुए मोड़ों के पास निकलता था। वहां मेरे परिवार के लोग हाथ फैलाये खड़े थे। मेरे अपने खून के रिश्ते भीख मांगते हुए सड़क पर खड़े हों, यह मुझे बर्दाश्त नहीं हुआ और मैंने बिना सरल की राय के उन फैले हाथों को बन्द मुट्ठी में बदल डाला। बस उसी दिन से मेरे और सरल के बीच वह खामोश बुत आ गया। सरल ने कभी शिकायत नहीं की। कभी कुछ मांगा नहीं। मांगा तो सिर्फ अपने खाये हुए, बिगड़े हुए जेवर। जो मैं दे न सका। ऐसा नहीं कि मैं दे नहीं सकता, मगर व्यापारी होने के नाते बैंक के लाकर का खर्च और पूंजी की हत्या बर्दाश्त नहीं होती। जी कड़ा करके जैसे-तैसे एक बार पूंजी की हत्या भी कर डाली मगर ईश्वर शायद मेरी सरल को जेवरों से जगमगाता नहीं  देखना चाहता था या फिर सरल का जेवरों के प्रति अटूट मोह उसे उससे दूर ले जाना चाहता था। जो भी हो, व्यापार में घाटा उठाना पड़ा और कर्जदारों ने कोठी के गेट पर खड़े हो लाल-पीली आंखे दिखानी शुरू की, तब एक बार पुनः सरल के जेवरों के बाक्स ने ‘शाख’ बचाई। वहीं जेवरों का बाक्स मैं न भर सका, लोगों की झोलियां भरने की आदत भी न छुडा सका। नतीजा वो खामोश बुत साये की तरह मेरे साथ लग गया। सरल मंे ठंडापन बढ़ता गया और मैं अपने दंभ में ठंडेपन को रौंदता गया और आगे बढ़ता गया।
    आज भइया को गांव गये दूसरा दिन है, मगर सरल ने मुंह नहीं खोला। रात बिस्तर पर निर्जीव सी पड़ी रही। बर्फ भी गर्मी पा कर पिघलने लगती है, मगर सरल शायद बर्फ से भी अधिक ठंडी हो जाती है, इन क्षणों में.... उफ! क्यों ऐसा होता है?

ऐश्वर्या

मुल्क़ प्रधानमंत्री का, घर घरवाली का, सो हुक्म हुआ दूध लेकर आइये तो चाय मिलेगी। कमबख्त सुबह-सुबह जाना ही पड़ेगा। चाय भी तो पीनी है। रहता ऐसे मोहल्ले में हूं, जहां भोर में उठकर अगली पीढ़ी के साथ लोग टहलने नहीं निकलते। टहलें भी कहां, यहां कोई पार्क नहीं है। उबड़-खाबड़ सड़कें हैं, जिन पर ‘मार्निंग वाॅक’ करते कुत्तों की टोली मय एक-दो सखियों के साथ अवश्य मिल जाती। इन्हीं के आगे-पीछे बड़ी-बड़ी सींगों वाली मरियल सी गायें और उनके पीछे भोले बाबा शिव के प्रिय नंदी वंशज सांड़ अपने वंश वृद्धि के नजरिये से दौड़ते दिखाई दे जाते।
    दूधवाले की गुमटी तक पहुंचने के लिये मोहल्ले के भौगोलिक और मानव सौंदर्य के संग-संग चलना पड़ेगा। उसकी गुमटी और और मेरे घर के बीच के रास्ते पर किसी छोटी नदी जैसी शक्ल द्दरे नाली बहती है। इस नाली में मोहल्ले भर की बिष्ठा, कचरा और महिलाओं के उत्सर्जित गंदे कपड़े डूबते-उतराते आधी से अधिक सड़क पर फैले होते। बची-खुची नंगी पड़ी सड़क पर अपने घरों का कूड़ा फेंकते, पानी के खाली भरे डिब्बों को लेकर लगभग भागते दिख जातीं तीन-तीन पीढि़यां। परचूनिये की दुकान से चाय की पत्ती, शक्कर, सूखी हुई डबर्रोटी के टुकड़े या आटा, दाल, चावल, तेल, नमक, मसाला, खरीदती अलसाई, सूखी और उदास औरतें दिखतीं। पानवाले की दुकान पर इलाकाई आवारा छोकरों के दल के अलावा अपनी तलब मिटाने के लिए बीड़ी, सिगरेट, गुटखा खरीदते ग्राहकनुमा वर्तमान खड़ा होता और सामने दूधवाले के यहां आने-जाने वाली जवान होती लड़कियों व भरपूर जवान औरतों के जिस्मानी उपकरणों को आंखों ही आंखों में नापता-जोखता व फब्तियां कसता रहता है। दूधवाले से बस थोड़ी दूरी पर बजरंगबली का बहुत पुराना मंदिर है। मंदिर के चबूतरे पर जमाने की जंगखाई एक बुढि़या मालिन टूटी सी डलिया में फूल रखकर बेचती है। मंदिर में सामने ही बजरंगबली की आदमकद मूर्ति है, नौ देवियों की छोटी-छोटी मूर्तियां हैं, शिवलिंग है, गणेश प्रतिमा समेत पूरा शिव परिवार है। एक पीपल का पेड़ भी है। मंदिर में दर्शनार्थियों की संख्या मोहल्ले की जनसंख्या का एक प्रतिशत भर है। सड़क पर आते-जाते लोग मंदिर को प्रणाम कर लेते और आगे बढ़ जाते हैं। इसी मंदिर में स्कूल जाती बच्चियां अपने जेबखर्च के पैसों में से एक सिक्का उछाल कर अबकी बार की परीक्षा में अपने फस्र्ट आने की मन्नतें मांगती हैं।
    मंदिर से दक्षिण की ओर मोहल्ले की ‘ऐश्वर्या’ का मकान है। इस मकान का मालिक खुदा जाने कौन है, लेकिन खुद ऐश्वर्या लगती मकान मालकिन जैसी ही हैं, सुबह के समय वे नियम से अपने घर के सामने सड़क की धुलाई करते या उस पर पानी की फुहार का छिड़काव करते दिखाई देतीं। ये पानी जल संस्थान का कर चुकायें बगैर ही वे बेधड़क इस्तेमाल करतीं। इस चालू सड़क का सबेरा हांफता सा धीरे-धीरे बढ़ता लेकिन उनके दरवाजे पर कई बार थम जाता था। उनकी मुस्कराहट के दीवानों के बच्चे अक्सर बगैर चाय-नाश्ते के स्कूल चले जाया करते थे। उनकी सुन्दर काया गाउननुमा कपड़े के भीतर क्या गजब ढ़ाती है जानने की जिज्ञासा से निहायत शरीफ आदमी भी एक पल को ठिठक कर उन्हें भर नजर देख जरूर लेता। आते-जाते लोगों के लिए यह नजारा केबिल टी.वी. के एक चटखारेदार विज्ञापन जैसा होता। आज भी वे पूरी तल्लीनता से सड़क द्दुलने में व्यस्त थीं। दूधवाला उनसे हंस-हंसकर बातें कर रहा था। मुझे देखकर वह आंखों में हैरत भरे मेरी ओर ताकने लगा। मैंने दूध के दो पैकेट उठा लिये, नोट उसकी ओर बढ़ा दिया। वापसी में ‘क्या प्यारी चीज है....’ जुम्ला हवा में उछलता हुआ मेरी पीठ से टकराया।
    ऐश्वर्या के ही मकान में ऊपरवाली मंजिल पर मेरे दफ्तर के एक बाबू प्रबोद्द कुमार तिवारी रहते हैं। वे जब प्रसन्न होते तो सिसकारियां लेकर बड़ी ही बेहयाई से किसी ‘एडल्ट’ फिल्म की कहानी की तरह उसके किस्से किस्तों में अपने साथियों को सुनाया करते। पूरा दफ्तर अपने थूक को बिलोकर और घोटकर शहद की तरह चाटता जाता तृप्त होता जाता। दो-एक पेशाब करने के बहाने बाथरूम तक भी होकर आ जाते और पूरी तनमयता से एक-एक शब्द सुनते जाते।
    ‘तिवारी जी... तुमने यह तो बताया नहीं कि वह नंगी हुई थी तुम्हारे सामने?’
    ‘बताया तो... खुले आंगन में धूप खौल रही थी, वो आई... इधर-उधर देखा फिर हांक लगाई ‘ओ तिवारी, मैं नहाने जा रही हूं बाहर जाना है, तो अभी चले जाओ’।
    ‘आराम से नहाओ बाद में जाऊंगा।’ और बस एक ही बार में उसने अपनी मैक्सी उतारकर फेंक दी, पूरा बदन धूप की तपिश में सुनहरा दिखाई दे रहा था।’।
    ‘तिवारी, तेरे तो मजे ही मजे हैं।’ ईष्या भरी आवाज ने सन्नाटा तोड़ा।
    ‘क्या खाक मजे हैं। वहां तो कालिया दरोगा मजे लूटता है।’
    ‘भाई.. तिवारी साफ-साफ बताओ, ये कालिया दरोगा वाला क्या किस्सा हैं?’
    ‘साला अपने को उसका भाई बताता है। रात में उसी के साथ सोता है।’
    ‘और उसका मर्द?’
    ‘वो तो अंग्रेजी पीकर बेहोश सोता है।’
    ‘यार तिवारी तुमने कोई चक्कर नहीं चलाया।’
    ‘धीरे बोलो। क्या नौकरी से बाहर करवाओगे?’
    ‘क्यों... डरते हो क्या..... ’ बीच में ही दूसरी आवाज ने रहस्य खोला.....
    ‘बड़े साहब भी वहीं आगे रहते हैं। उनकी कलफ लगी सूती कपड़े जैसी करारी आवाज सुनकर तिवारी का सारा जोश ठंडा पड़ जाता है।’
    कामांध सांसों की गंध और उसके मैल से फूटने वाले बुलबुलों ने कमरे में एक खामोश बदबू भर दी थी।
    सच तो मैं नहीं जानता लेकिन कालिया दरोगा को ऐश्वर्या के घर आते-जाते मैंने भी देखा है। वो उसकी मोटरसाइकिल पर पीछे बैठकर आती-जाती भी दिखी है। अभी पिछले ‘पल्स पोलियों अभियान’ के दौरान कालिया रोज ही उसे बिठाकर पोलियों बूथ तक छोड़ने आता था। यह तो सभी ने देखा, मैंने भी देखा है।
    दूध की थैली बीवी को थमाते हुए मन में आया कि पूंछू, ‘ऐश्वर्या-कालिया की गुटरगूं के बारे में उन्हें कुछ मालूम हैं? ‘फिर हिम्मत न जुटा सका। मन में खुराफती अनुभव का विश्वास था कि दूर छोटे शहरों, कस्बों और गांवों से राजद्दानी में आकर बसने वाले छोटे एकल परिवार, जिन पर किसी का अंकुश नहीं था, तो तरक्की की सबसे ऊपरवाली मंजिल पर पहुंचने की जल्दी में रहते हैं। इन परिवारों के मर्द छोटी-मोटी नौकरियां, मजदूरी या फुटकर व्यापार करके पेट के लिए दो रोटियों की जुगत बमुश्किल कर पाते। औरतें पेट से एक बलिस्त नीचे और एक बलिस्ता ऊपर की कीमत पर अपने सपनों को पूरा करके मस्त हैं। वे अपने को भ्रष्ट नहीं मानती चरित्रहीन तो कतई नहीं। और चालाक दिमाग शहरी उनकी देह का एक-एक इंच बेचकर एक नई ‘समाजवादी यौन क्रांति’ की उत्तेजना पैदा करने में लगा है। वे इसे ‘कामर्शियल सेक्स रिवोल्यूशन’ तक कहने से नहीं हिचकते।
    चाय बर्फ की तरह ठंडी हो गई। दफ्तर समय से पहुंचना था। आज नये ‘विशेषांक’ की बैठक थी जिलों से भी लोग आने वाले हैं। चाय भूलकर जल्दी-जल्दी तैयार होकर बस स्टैंड तक आया। सिगरेट की तलब में निगाहें इधर -उधर घुमाईं अनायास सामने पानवाले की दुकान पर नई चमचमाती मोटरसाइकिल पर तिवारी की कमर में हाथ डाले ऐश्वर्या बैठी मुस्करा रही थी। ऐश्वर्या के चेहरे पर न कोई झिझक थी न पश्चाताप। और तिवारी की गर्दन अहंकार से अकड़ी हुई, चेहरा मुस्कराता हुआ। चुटकी बजाकर सिगरेट की राख झगाड़ी। ठीक मेरे सामने से मोटरसाइकिल फर्राटा भरती आगे चली गई।

Sunday, January 13, 2013

मंगल करेगा मंगल


लखनऊ। शारदीय नवरात्र मंगलवार से शुरू होकर मंगलवार को समाप्त हुई। दीपावली भी मंगलवार को ही मनाई गई। वर्ष 2013 का प्रारम्भ भी मंगलवार को ही हुआ और होलिका दहन भी मंगलवार को ही है। अभी तीन महीने मंगल ग्रह से प्रभावित रहेगी पृथ्वी, जिससे हादसों, दुर्घटनाओं के साथ मांगलिक आयोजन होंगे।
    पौराणिक मान्यताओं के मुताबिक शिव का ही मांगलिक स्वरूप मंगल ग्रह के रूप में प्रकट हुआ। माना जाता है कि शिव अंश या तेज के भूमि पर गिरने से मंगल ग्रह का जन्म हुआ। इसलिए मंगल देव भूमि के गर्भ से पैदा होने वाले और उसके द्वारा पालन-पोषण किए जाने से भूमिपुत्र या भौम नाम से भी पूजनीय है। यही वजह है कि मंगल पूजा सांसारिक जीवन से जुड़ी तमाम कामनाओं जैसे विवाह, संपत्ति, सेहत, धन, दाम्पत्य, संतान, सफलता आदि सिद्ध करने वाले मानी गई है। इस तरह मंगल उपासना तन से पुष्ट, मन से साहसी व भूमि-संपत्ति व धन से समृद्ध बनाने वाली मानी गई है। मंगल देव भूमि, भार्या या पत्नी के रक्षक भी माने जाते हैं। मंगलवार, मंगल उपासना से जन्मकुंडली में बने मंगल दोष शांति की भी शुभ घड़ी मानी जाती है, जिससे दाम्पत्य, विवाह और रक्त संबंधी समस्याएं पैदा होती है। इसलिए शास्त्रों में हर मंगलवार को विशेष मंगल मंत्र स्तोत्र का पाठ इन दुःखों व परेशानियों से निजात दिलाने वाला माना गया है। जानिए यह मंगल मंत्र स्तोत्र और सरल मंगल पूजा विधि -
    साल के हर मंगलवार की सुबह स्नान के बाद लाल वस्त्र पहन नवग्रह मंदिर मंे मंगलदेव की प्रतिमा का लाल पूजा सामग्रियों जिनमें लाल चंदन, अक्षत, फूल, लाल वस्त्र व नैवेद्य शामिल हों, ‘ऊँ अंकारकाय नमः’ यह मंत्र बोल अर्पित करें। धूप, दीप लगाएं व लाल आसन पर बैठ नीचे लिखा छोटा-सा मंगल स्त्रोत संकट, बंधनों से मुक्ति की प्रार्थना के लिए बोलें-
भौमो दक्षिणदिक्र्तिकोणयमदिग्विघ्नेश्वरो रक्तभः
स्वानी वृश्चिक-मेषयोः सुरगुरुश्चार्कः शशी सौहृदः।
ज्ञोरिः षट् त्रिफलप्रदश्च वसुधा स्कन्दौ क्रमाद् देवते
भारद्वाजकुलोöवः क्षितिसुतः कुर्वात् सदा मंगलम्।।
    मंगल मंत्र स्मरण के बाद मंगल देव की धूप, दीप आरती करें व यथासंभव गुड़, केसर मसूर दाल का दान किसी विद्वान ब्राह्मण को करें।

‘मनमोहन’ रहा ईसा का साल 2012


ईसा के साल 2012 को नमस्कार। समय अखण्ड सत्ता है। भारत में साल, मास ग्रहों की गति से समझे जाते हैं। लेकिन अब जमाना कालगणना नहीं ‘माल गणना’ का है। इस लिहाज से 2012 माल का साल रहा। जिसने माल मारा, उसी का साल। बाकी अकाल। कोई कह सकता है कि यार कविता कर रहे हो क्या? मैं उत्तर दूंगा भारत के लोकजीवन में यह विकट गद्यकाल है। कविता भी गद्य हो रही है। आंकड़ों का खेल है। प्रीति, प्रेम, गरीबी की रेखा के नीचे है। इसके ऊपर का सारा कुछ मनमोहन है। यहां एक नया समाज बना है। यह समाज मनमोहन है। कला कौषल हो रही है। 2012 का कैलेन्डर तारीखों के हिसाब से बेषक खलास हो गया लेकिन हर माह के पन्ने की तस्वीरें एकदम बिन्दास। तरोताजा। कांटीनुअस टेन्स। ‘डर्टी पिक्चर’ का नकद मजा। मित्र हैपी न्यू इयर बोल रहे। नेटवर्क बिजी है। सोचता हूं कि जनवरी का नववर्ष भी कोई नया साल है। कड़ाके की ठंढ। जाड़ा भी कोहरे की रजाई में है। सूर्य देव का ताप भी कम मिलता है लेकिन हमारे आपके मुंह से भी भाप निकलती है। अंग्रेजी कैलेन्डर महीनों की गिनती में भी झोल है। लैटिन/अंग्रेजी में सितम्बर का मतलब सांतवा, अक्टूबर का आठवां, नवम्बर का नवां और दिसम्बर का अर्थ दसवां होता है। इल्लत यह है कि अंग्रेजी के कैलेन्डर मंे सितम्बर नवां, अक्टूबर दसवां, नवम्बर ग्यारहवां और दिसम्बर बारहवां है। लेकिन भारत के अनेक लोगो को अंग्रेजी के ही चलन ठीक लगते हैं। अंग्रेजी सभ्यता से प्रभावित मित्रों को डांटती अम्मा नहीं ‘मैम’ सुहाती हैं। उन्हें चाची से चिढ़ है और आन्टी के प्रति आदरभाव। अम्मा चाची मर्यादा पालन करती हैं, आन्टी में चाची का वात्सल्य कहां?
हम ठहरे देहाती। गंवाई, गांव वाले गंवार। हमारे गांव देहात में नया साल आता है चैत में। चैत्र वाले नववर्ष में मधुगन्ध, मधुरस और मधु छन्द हैं। तब हवाएं भी हलकट जवान होती हैं। खेतखलिहान भी गीत गाते हैं। मधुरस उफनाता है। प्रकष्ति के अंग उमहते हैं, अंगिया चरकती है। जनवरी वाले ‘न्यू इयर’ के पहले हैप्पी लगाए बिना काम नहीं चलता। उधर से मित्रों ने हैप्पी बोला, हमने इधर से। न वे हैप्पी और न हम। कड़ाके की ठंढ मंे बेमौसम कहीं क्या कोई हैप्पी हो सकता है? हम लोग हैप्पी न्यू इयर नहीं बोलते, नववर्ष के स्वागत में होली है - होली है गाकर एक दूसरे पर रंग उड़ेलते हैं। नववर्ष यह रंगबाजी देखता है, ठिठकता है, होली के ठीक 15 दिन बाद आता है नवसम्वत्। ईसा के साल 2012 और 2013 में क्या फर्क? यह सब कैलेण्डर के साल हैं। इसका कोई मतलब न भूगोल से है और न खगोल से। सम्वत्सर खगोल (आकाष-व्योम) से उतरता है, भूगोल को लहालोट करता है। न्यू इयर जिनका मनमोहन है, वे माने, वे ही जाने और उनका काम जाने।
ईसा का साल 2012 विदेषी व्यापारियों के लिए मनमोहन रहा। मनमोहन मित्रों की अमेरिकी वालमार्ट कम्पनी ने मनमोहन खुषियां दीं। वालमार्ट पुरानी मनमोहन है। उसने अमेरिकी विधायिका को बताया कि मनमोहन खर्च पर उसने करोड़ो डालर फूंके। भारत की संसद में बवाल हुआ। उन्होंने मनमोहन खर्च का व्यापारिक नाम ‘लाबिंग’ बताया। उन्होंने मनमोहन व्यय पर भारत में भी काफी धन लुटाया। अब वे खुदरा व्यापार में भारत आ रहे हैं। समोसा ग्लोबल होगा। खैनी तम्बाकू की पुडि़या डब्लू डब्लू टोबैको होगी। ऐसे ही बीड़ी - बीड़ी पाइप और गुटखा स्पाइटिंग पिल्स। यू नो बतासा - बातासा होगा। योग जैसे योगा हुआ वैसे ही खुदरा का मालिक वालमार्ट और हम सब चिल्लर होंगे। सब कुछ मनमोहन। यू0पी0 के दो प्रमुख दलों सत्ता व मुख्य प्रतिपक्ष ने संसद में खुदरा में विदेषी निवेष का मनमोहन विरोध किया है। वे इसके खिलाफ बोले लेकिन वोट इसी के पक्ष में दिया। ढेर सारे अन्य दलों ने भी सबका मनमोहा। वे भी खिलाफ बोले लेकिन वोट में मनमोहन गति को प्राप्त हुए। पूरा साल मनमोहन रहा। महंगाई मनमोहन आंकड़ा पार कर गयी। आसमान पहुंची। मुद्रास्फीति ने मनमोहन सीमा रेखा को लांघा बावजूद इसके मनमोहन कमाल हुआ। जी0डी0पी0 मनमोहन रही। जी0डी0पी0 में ही मनमोहन भविष्य है।

खबरों के पटाखे दगाने को बेताब


खबरों की अदालत में खड़े पत्रकार को व्यवस्था के पैरोकारों की मातृभाषा में ही हर बयान दर्ज कराने को मजबूर होना पड़ता है। क्योंकि उसकी क़लम का अपहरण पहले ही कर लिया जाता है। यह अपराध बाजारीकरण की नाजायज कोख से भले ही पैदा हुआ हो लेकिन इसकी परवरिश में हमारे अपने सगे गांजाखोर भाई बिरादरीवाले शामिल हैं। इसकी गवाही में सैकड़ों किस्से गिनाये जा सकते हैं। हाल ही में जीटीवी के दो पत्रकार बन्धु देश के एक बड़े महाजन, बड़े नेता और कर्णधारों के चहेते से विज्ञापन की शक्ल में करोड़ों की रिश्वत मांगने के जुर्म में गिरफ्तार हो गये। जेल में कई रातें काटनी पड़ीं। जी टीवी के मालिकों से महज पूछताछ हुई? सवाल और भी हैं। क्या सौ करोड़ का विज्ञापन जी टीवी के लिए नहीं मांगा जा रहा था? दरअसल ऐसे सवाल व्यवस्था के पैरोकारों के आगे बौने हैं।
    राजधानी दिल्ली में गैंगरेप से चैतन्य समूचा मीडिया एक स्वर से गैंगरेप... इंसाफ चीखने लगा। सारे देश से छांट-छांट कर गैंगरेप/बलात्कार की खबरें सुर्खियों में छापी/दिखाई/सुनाई जाने लगीं। टेलीविजन के पर्दे पर जलती मोमबत्तियों के जुलूस, पुलिस का बेरहम चेहरा, सरकार की नाकामी, नेताओं की बेशर्मी, युवाओं का गुस्सा और भौंडी जुबानदराजी का भरपूर कब्जा पन्द्रह दिनों तक बरकरार रहा। इसी आपाधापी में दिल्ली पुलिस का एक सिपाही कानून-व्यवस्था दुरूस्त रखने का हुकुम बजाने में अपनी जान गंवा बैठा। उसकी मौत पर संवेदना कम राजनीति अधिक हुई। किसी ने भी उसके परिवार की आनेवाली तकलीफों के बारे में ईमानदारी से नहीं सोंचा? हां, अभिनेता अमिताभ बच्चन ने उस सिपाही के परिवार को ढाई लाख रूपए की आर्थिक मदद भेजी। राजनीति तो उस बलात्कार पीडि़ता की लाश से भी खूब हुई और हो रही है। कोई उसके परिवार को 20 लाख की मदद देने का एलान कर रहा है, तो कोई उसके परिवार के किसी एक को नौकरी देने की पेशकश, तो कोई उसके नाम से कानून बनाने की सिफारिश? मोमबत्ती लेकर राजपथ पर परेड करने वाली और गुस्से से तमतमाते हवा में मुट्ठी लहराती भीड़ में से किसी एक ने भी उस रोते बिलखते परिवार को एक रूपये की आर्थिक मदद देने कोशिश नहीं की?
    ऐसे ही और कई सवाल हैं? जिन पर बहस की जरूरत है। खासकर आज के दौर में तो और भी, जब हम पत्रकारिता के क..ख..ग.. से नाता तोड़ रहे हैं। जी हां! मुझे प्रशिक्षण के दौरान सिखाया गया था कि हर सिक्के के दो पहलू होते हैं। दोनों को देखकर उसे भुनाया जाना चाहिए। आज ‘बलात्कार’ शब्द के साथ जिस बेगैरती से बलात्कार हो रहा है उसे देखकर लगता है कि बाजार ने सारी मान्यताएं, सारे संस्कार, सारे सिद्धान्त और समूची मानवता पूंजी माफिया के पास बंधक कर दिये हैं।
    यहीं जरायम के जोड़ीदार और मानवता की अलख जगाने वालों के बीच की रेखा को काटकर स्वास्तिक का चिन्ह बना लेने वालों की दरकार होती है। वे सच का मेला लगाने के साथ फिर न कहिएगा कि खबर न हुई का एलान करने में भी पीछे नहीं रहते हैं। इन्हीं की वजह से ‘तहलका’ मचता है, ‘सत्यमेव जयते’ की अलख भी जगती है। और ‘मिथिलेश’ भी उछलकर सामने आ जाते हैं। शब्द मिथिलेश के कई मायने हैं। मिथिला के राजा, माता सीता का दूसरा नाम और सीतापति राम... प्रभु श्रीराम। इन पर्यावाचियों के सद्गुणों से प्रेरणां लेकर भाई मिथिलेश द्विवेदी पत्रकारिता की पुरानी पीढ़ी के पुरोधा और नई पीढ़ी के प्रशिक्षक हैं। उनकी कलम ने दसियों घोटालों को ‘प्रियंका’ में उजागर किया, जिसकी गूंज से बहरा प्रशासन भी अपने कान साफ करने को मजबूर हुआ।
    65 साल की पहली सीढ़ी पर अपना पांव धरते हुए अपने सैकड़ों साथियों के नेह की गठरी लादे अखबार से पाठक तक खोजपरक खबरों के पटाखे दगाने को बेताब दिखाई पड़ते हैं। यह जोश उन्हें इस उम्र में भी जवान बनाए है। इसी जवानी की करामात है उनकी संगठनात्मक छवि। उसी के चलते हमारी प्रगाढ़ता भी बढ़ी। वे कई पत्रकार संगठनों से जुड़े हैं। मैं़ तीस साल पहले इससे पीछा छुड़ाकर अखबार में रम गया था। द्विवेदी जी मुझे बार-बार पत्रकारों, खासकर छोटे-मंझोले पत्रकारों की तकलीफों को सुनाकर उनके संगठनों से जुड़ने को उकसाते रहे। मैं नहीं माना, उन्होंने प्रयास नहीं छोड़ा। अपने मित्र डाॅ0 भगवान प्रसाद उपाध्याय को मेरे पीछे लगा दिया। वे सफल हुए मुझे संगठन का चेहरा बनाने में, मेरी शर्तों पर। कई पत्रकार अधिवेशनों में मैंने उन्हें सुना है। जो पीड़ा आदमी की आपदा के लिए उनके मन में है, वही वेदना पत्रकारों की तकलीफों को लेकर भी है। जिस ईमानदारी से खबर को खास बनाने की कला उनके पास है, उसी निष्ठा से पत्रकारों के कष्ट को उजागर करने में भी है। कई बैठकें पत्रकारों की समस्याओं को लेकर मेरे कार्यालय पर भी हुईं हैं। उस समय मैंने उन्हें पत्रकार बिरादरी के मुखिया के रूप में देखा है। उनका जन्मदिन सोनभद्र जिले के पत्रकार बड़े ही साहित्यिक वातावरण में मनाते हैं। कई परिचर्चाएं होती हैं, काब्य पाठ होता है, पत्रकारों की समस्याओं पर खुलकर बात होती है, फिर बधाई भी।
    बधाई... और बधाई के ढोल-नगाड़े हस्ताक्षर-2013 के हर पन्ने पर बज रहे हैं। श्री द्विवेदी जी की लम्बी उम्र की कामना के साथ प्रणाम।