Sunday, February 6, 2011

शुभकामनाएं देते टैक्सचोर!

लखनऊ। नए साल की मुबारकबाद के हल्ले के बीच नगर निगम को करोड़ों के राजस्व का नुकसान हुआ है। इसकी चिंता न नगर निगम को है, न सरकार को और न ही नेताओं व उभरते हुए नेताओं को है। समूची राजधानी की सड़कों के किनारे, बीच में लगे स्ट्रीटलाइट के खंभों पर नववर्ष की बधाई के छोटे-बड़े बोर्ड लगे हैं। इनमें भावी नेताओं के हाथ जोड़े मुस्कराते हुए चेहरों के साथ क्षेत्रवासियों की मंगलकामना का प्रचार दिखता है। मजे की बात है, तमाम चेहरों को क्षेत्रवासी पहचानते तक नहीं है।
    शहर के चैराहों व बाहरी हिस्सों में लगी बड़ी-बड़ी होर्डिंगों में भी विद्दानसभा क्षेत्रवासियों को शुभकामनाएं देने वालों का मुस्कराता चेहरा दिखता है। ये चेहरे निकट भविष्य में होने वाले पार्षद व विधायक के चुनाव के नजरिये से लगाये गये हैं। गौरतलब है कि प्रचार के नजरिये से लगाए जाने वाले होर्डिंग या छोटे बोर्ड का टैक्स नगर निगम को चुकना होता है। यहां बताते चलें कि लखनऊ नगर निगम के अद्दिकारियों ने नए साल की आमद से ठीक दस दिन पहले शहर में अभियान चलाकर 24 विज्ञापन एजेन्सियों के 15 होर्डिंग्स व अन्य बोर्डों को हटवाया था। अपर नगर आयुक्त के मुताबिक इन विज्ञापन एजेंसियों पर 1. 35 करोड़ का टैक्स बाकी है।
    इसके बावजूद इतनी अधिक तादाद में नववर्ष की शुभकामनाओं वाली होर्डिंग्स कैसे लगीं? नगर निगम ने उन्हें अब तक क्यों नहीं उतरवाया? निगम ने इन प्रचार बोर्ड लगाने वालों को कोई नोटिस भेजा? इसके अलावा जो जिला प्रशासन के आला हाकिम लखनऊ को सुन्दर बनाने की होड़ में आधुनिकता के प्रतीक ‘नियोन साइन’ तक उतरवाने पर बजिद हैं, उन्होंने क्यों नहीं इन ‘शुभकामनाओं’ की ओर ध्यान दिया?
    सूबे की राजनीति में विपक्ष को सिर्फ मुख्यमंत्री मायावती के जन्मदिन पर लगी होर्डिंग्स, लाइट या नीले रंग पर गुल-गपाड़ा मचाना याद रहा, लेकिन शहर भर में टंगी इन अवैध होर्डिंग्स के जरिए की जाने वाली टैक्सचोरी का ख्याल तक नहीं आया? शुभकामनाओं के नाम पर टैक्स चोरों के खिलाफ नगर निगम कोई कदम उठाएगा?

रोटी को पत्थर में मत बदलो...यारों...!

सियासत के मोहल्लांे मंे जो घमासान इन दिनों मचा है, उससे भारतीय लोकतंत्र बेहद आतंकित है। और नागरिकों को अपने वोट देने पर शार्मिन्दगी महसूस हो रही है। घपले-घोटालों की आड़ में जिस ‘रारनीति’ का नाटक देशभर में हो रहा है, वह निंदनीय ही नहीं अपराध है। देश की महापंचायत का मानसून सत्र बगैर किसी कामकाज के हंगामे की भेंट चढ़ गया। जनता की गाढ़ी कमाई के 6 सौ करोड़ रुपयों का नुकसान हुआ। इसकी भरपाई कौन करेगा? कायादा तो यह कहता है कि इसे सभी सांसदों से वसूल किया जाये।
    देश में महंगाई पर हो-हल्ला मचाने के अलावा कहीं कुछ नहीं हुआ। सरकार ‘प्रयासरत’ होने के दावे करती रही, तो विपक्षी ‘टीवी स्क्रीन’ पर आरोप लगाते रहे। बोफोर्स तोप को पकड़कर रोने वाले, जेपीसी की जिद पर अड़े महासंग्राम रैली करने वाले और लालचैक पर तिरंगा फहरा कर राष्ट्रप्रेम दर्शाने वाले अपनी जिम्मेदारी कब समझेंगे? उनकी पार्टी ने भी कई बरस भारत में राजकाज सम्हाला है। उन्हें भी अपने किये हुये फैसले और कारनामे अच्छी तरह याद होंगे। उन पर गौर करना होगा। वे अपना एक भी वायदा पूरा नहीं कर सके। हिन्दुओं की भावनाओं से लगातार खेलने का अपराध अलग कर बैठे। साथ ही भगवान श्रीराम के भी अपराधी हैं। महज भगवा टोपी के नीचे लंबी चोटी में गांठ बांधकर और पीले रंग का जनेऊ कान पर चढ़कार हिंदुत्व के नाम की लघुशंका करते रहने से क्या होगा? आज की पीढ़ी आपसे सच की जमीन पर खड़े होने की आशा रखती है। अपने ही झूठ को सच करने के लिए हलक फाड़ने से ज्यादा जरूरी है नई पीढ़ी में ‘कर्मण्ये व धिकारस्ते..’ की ऊर्जा भरने की, उनमें राष्ट्र के प्रति ईमानदार सोंच जगाने की और आजादी को बचाए रखने की प्रेरणा देने की।
    गांधी को गरियाने से या सारे देश को ‘अयोध्या’ बनाने की जिद से कुछ नहीं होने वाला। जरा गौर से देखिए विदेशी पूंजी आपके देश में लगातार बढ़ रही है। महान राष्ट्रों के महान राज्याधीश आपके देश में व्यापार करने की, बढ़ाने की मांग करने आ रहे हैं। यानी एक बार फिर ईस्ट इंडिया कंपनी की बदली हुई शक्ल में विदेशी ताकतें देश में सक्रिय होने को बेताब हैं और आप हैं कि मीरजाफर व जगत सेठ का इतिहास बांचने में समय बर्बाद कर रहे हैं। हम एक बार फिर पं0 जवाहर लाल नेहरू के शब्दों को दोहरा रहे हैं, ‘आजादी खतरे में है इसे हमें पूरी ताकत से बचाना होगा।’
    बेहद तकलीफ और हैरत के साथ लिखना पड़ता है, रोटी को पत्थर में बदलने से तरक्की नहीं होती। सूबा उप्र की समूची सियासत में 16वंे चुनाव कुंभ की हाय तौबा मची है। हर राजनैतिक दल उम्मीदवारों के चुनाव से लेकर आदमी को झूठे सपने दिखाने में मसरूफ है। सूबे में क्या हो रहा है? आदमी किन तकलीफों से गुजर रहा है? ये कौन सोंचेगा? वह भी तब जब इस वित्तीय वर्ष के दस महीनों में विकास योजनाओं पर बजट का महज 45 फीसदी ही खर्च किया गया है। इसी तरह पिछले साल आई बाढ़ से निपटने व बाढ़ग्रस्तों की सहायता के लिए 220 करोड़ दिये गये थे, उसमें भी आधी ही रकम खर्च की गई है। ऐसे बहुत सारे आंकड़े हैं, जिनकी वजह से उत्तर प्रदेश को ‘बीमारू’ प्रदेश कहा जाता है। ह्यूमन डेवलपमेंट इन्डेक्स पर 2006-07 में उप्र 17वें स्थान पर था। इन तीन चार सालों में सूबे में शिक्षा, स्वास्थ्य,सड़क, पानी, बिजली, कृषि, उद्योग सभी क्षेत्रों में कोई आशाजनक कदम नहीं उठाए गए। आंकड़ों में उप्र की विकासदर 6.3 प्रतिशत है और प्रतिव्यक्ति आय 11 हजार रुपए और टेलीफोन व मोबाइल 11 करोड़ हैं।
    यहां गौर करने लायक है कि सूबे की जनसंख्या 16 करोड़ है, यानी महज चार करोड़ लोग फोन, मोबाइल फोन से महरूम है। इस बाजीगरी से अलग जमीनी हकीकत बिल्कुल अलग है। राजधानी के विधानसभा मार्ग के आसपास की बस्तियों को शौचालय तक नसीब नहीं है। जहां सरकार बैठी है उसके चारों ओर बंदरों, आवरा कुत्तों, सांडों, गायों का आतंक है। घरों में नल लगे हैं, उनमें पानी नहीं आता। बिजली के कनेक्शन हैं लेकिन बिजली जब-तब गायब रहती है। अस्पतालों में मरीज भर्ती नहीं किये जाते। प्रसूता को बगैर इलाज के मरने के लिए तड़पना पड़ता  है। स्कूल में पढ़ने  वाले बच्चों से मजदूरी कराई जा रही है। पुलिस पीड़ितों को ही जेल भेज कर अपनी पीठ थपथपा रही है। कानून-व्यवस्था संभाल रहे हाकिम ही कानून का मखौल उड़ाकर गौरान्वित हो रहे हैं। सारा लखनऊ शहर गंदगी से अटा पड़ा है। समूची राजधानी में कचरा सड़ रहा है। हां, हजरतगंज की सूरतेहाल बदलने की कवायद जारी है। नक्खास को कौन सुधारेगा? हैदरगंज में आदमी नहीं रहते? हाकिमों की ढिठाई इस कदर कि बीत गई ठंड में सूबे में मरनेवालों की संख्या हजारों में थी, मगर राहत आयुक्त/प्रमुख सचिव नहीं मानते कि एक भी आदमी ठंड से मरा। वहीं नगर निगम के रैन बसेरा बनाने व अलाव जलवाने के झूठ को उजागर करने के लिए उच्चतम न्यायालय को टीम गठित करनी पड़ी। फिर भी सरकार हर मोर्चें पर सफल है, ऐसा मुख्यमंत्री का कहना है।
    सूबे का थका हारा विपक्ष पार्को-स्मारकों पर हल्ला मचाने के बाद 16वें चुनाव कंुभ में स्नान करने की चिंता में पल-पल घुल रहा है। उसके पास न कोई नीति है, न नीयत। बस सत्ता पर कब्जा करने के मंसूबे और सपने हैं। यहां एक बात और कहनी होगी कि समूची राजनीतिक जमात गैरजिम्मेदाराना रेस में दौड़ रही है। इनमें भी एक बड़ी संख्या लव, सेक्स, धोखा, भ्रष्टाचार और अपराध के हैरतअंगेज सर्कस में शामिल होकर सूबे की जनता को हलकान करने में लगी है। रह जाती है हमारे सूबे की सर्वजन सरकार, तो उसके अपने एजेंडे हैं, अपनी सोंच है वह उसी पर अमल कर रही है। बहुमत की सरकारों का आचारण प्रायः ऐसा ही होता है। हमें सरकार से उम्मीद छोड़कर खुद आगे बढ़कर कदम उठाने होंगे। 16वें चुनाव कंुभ में शामिल होकर उम्मीद का नया चिराग रौशन करना होगा। कुछ करने वालों को तलाशना होगा ईमानदारों को छांटना होगा। गो कि अब भी समय है, वरना... न समझोगे तो तुम्हारी दास्तां तक न होगी दास्तानों में...!

पैसेवालों की कांग्रेस

लखनऊ। मिशन 2012 के लिए कांग्रेस ने अपने माल एवेन्यू के दफ्तर में लगे लोहे के दोनों दरवाजे पूरी तरह से खोल दिये हैं। वहां बैठकें हो रहीं हैं। रणनीति तय हो रही है। राहुल गांधी से लेकर प्रदेश अध्यक्ष रीता बहुगुणा तक बेहद मसरूफ हैं। राजा दिग्विजय सिंह के साथ ताजा-ताजा दिल्ली के राज दरबार में शामिल बाबू बेनी प्रसाद वर्मा भी सक्रिय है। केन्द्रीय मंत्री और राहुल बिग्रेड का युवा चेहरा जितिन प्रसाद कांग्रेस वापस लाओं अभियान की कवायद में पसीना बहा रहा है। अरबपति ग्रह से आईं और उन्नाव से सांसद अनुटंडन भी कांग्रेस की सूबे में वापसी की कसमें खा रही है। गो कि कांग्रेस उप्र में अपनी सरकार बनाने के लिए सचमुच व्यायाम कर रही है।
    खबरों के मुताबिक कांग्रेस चुनाव-2012 के अखाड़े में उन्हीं पहलवानों को उतारने के मंसूबे बना रही है जो अरबपति ग्रह के वाशिन्दे हों। खासकर उद्योगपति, ठेकेदार, बिल्डर, ज्वैलर्स को तरजीह दिये जाने के संकेत लखनऊ भर में लगे होर्डिंग्स से मिलते हैं। इन होर्डिंगों से झांकते चेहरों को लखनऊवासियों ने आज तक साक्षात नहीं देखा है, फिर भी नववर्ष की शुभकामनाएं स्वीकार करनी पड़ रही हैं। पिछले महीने मुंबई के नामी-गिरामी ज्वैलर्स मोहित कम्बोज अपने कद्दावर कांग्रेसी दोस्तों और अभिन्न समर्थकों के साथ चाटर्ड प्लेन से लखनऊ आए थे। कांग्रेस के दफ्तर में उनका भव्य स्वागत हुआ। उन्होंने भी कांग्रेस के सूबाई नेताओं की अगली पांत में दबदबा बनाये नेताओं को खुश करने में कोई कसर नहीं उठा रखी। पक्की खबर है कि मोहित कम्बोज की वाराणसी कैन्ट से ‘उम्मीदवारी तय’ है। उन्होंने सूबे के कांगे्रसी दिग्गजों और राजधानी के चुनिंदा ‘मीडिया पर्सन’ को शानदार दावत दी। इस पांच सितारा उत्सव में उनके साथ उप्र में जौनपुर जिले के रहनेवाले और मुंबई प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष कृपाशंकर सिंह और उनके दामाद विजय प्रताप सिंह भी मौजूद थे। विजय प्रताप सिंह का नाम प्रतापगढ़ सदर सीट से तय माना जा रहा है। विजय प्रताप प्रतापगढ़ के निवासी हैं लेकिन मंुबई में रहकर कारोबार करते हैं।
    दूधवाले भइया से बड़े कारोबारी बने तुलसी सिंह राजपूत भी कांग्रेस में है और चंदौली सीट से उम्मीदवारी पक्की करने में कामयाबी के काफी करीब हैं। वे पिछला लोकसभा चुनाव अखिल भारतीय संयुक्त अधिकार मंच के बैनर तले लड़ चुके हैं। वे बहुत कम वोट पाकर हारे थे। मगर इस चुनाव में उनका हेलीकाप्टर उनसे अधिक उनके मतदाताओं में पहचान बना पाया था। उनका कहना है कि मेरा कारोबार बेशक मंुबई में है, लेकिन इसका मतलब यह तो नहीं है कि मैं अपने क्षेत्र में वापस नहीं हो सकता। मैंने वापसी का निर्णय इसलिए लिया कि यहां के युवाओं को अवसर मुहैय्या कराऊं। आखिर यहां के लोगों ने ही मुंबई को समृद्ध करने में अपना पसीना बहाया है, तो हम अपनी मंुबई यहां क्यों नहीं बना सकते? बुलंद हौसलों के मालिक राजपूत महज कक्षा 8 पास हैं और तेलगीकांड में भी उनका नाम आया था।
    दया शंकर पटवा मुंबई के बड़े ज्वैलर हैं। हाल ही में उन्होंने भी कांग्रेस के दफ्तर में दाखिला लिया है। इनकी पत्नी फिरोजा पटवा कांग्रेस से विधान परिषद चुनाव लड़ चुकी है, लेकिन हार गईं। इसी तरह एक नए उद्योगपति व ठेकेदार विवेक सिंह ने भी कांग्रेस में अपना नाम लिखाया है। उनके समर्थक उन्हें ‘‘विधायक जी’ कहकर बुलाते हैं। यह उत्साही युवा लखनऊ पूर्व सीट से चुनाव लड़ने को इच्छुक ही नहीं है बल्कि अपने को कांग्रेस प्रत्याशी भी घोषित कर चुका है। इनके साथ वाराणसी व लखनऊ छात्रसंघ से जुड़े लोगों का जमावड़ा दिखाई देता है। भावी उम्मीदवार के इस जत्थे को सियासत की हर चमकदार बारादरी में देखा जाता है। इंनरनेट पर कांग्रेस नेता राजा दिग्विजय सिंह के साथ के फोटो भी दिखते हैं। इसी तरह कई अमीर और पूर्व नौकरशाहों की कांग्रेस में सक्रियता व उम्मीदवारों की चर्चा सुनी व देखी जा रही है।
    कांग्रेस का रईसों, रजवाड़ों से प्रेम जगजाहिर है। उसी कड़ी को आगे बढ़ाते हुए पार्टी के दिग्गजों दिग्विजय सिंह, जितिन प्रसाद, प्रमोद तिवारी, प्रदेश अध्यक्ष ने पार्टी की कोआर्डिनेशन कमेटी की बैठक लखनऊ शहर से 30 किमी. दूर लखनऊ-कानपुर रोड पर बनी में एक नये होटल/रिसार्ट में की, इसी दिन इस होटल का उद्घाटन भी हुआ था। बताते हैं, होटल के मालिक अपराध जगत से होते हुए ठेकेदार हैं। अखबार से भी जुड़े होने के जिक्र के साथ उनके ‘पैलेस आॅन पोलीटिक्ल व्हील्स’ पर सवार होने की खबरें बेहद गर्म हैं। खबरों के मुताबिक उन्हें प्रदेश अध्यक्ष रीता बहुगुणा, दिग्विजय सिंह, जितिन प्रसाद, प्रमोद तिवारी का विशेष आशीर्वाद प्राप्त है और इन्हीं के सहारे वे अपने सियासी मंसूबे पूरे करने के खेल में सक्रिय हैं।
    कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता जहां इन बाहरियों पर अंगुली उठाते हुए कहते है, ‘इस तरह के लोगों के आने से कांग्रेस को कोई खास लाभ होने वाला नहीं है।’ वहीं ख्यातिनाम कांग्रेसी भोला पांडे व पूर्व प्रदेश अध्यक्ष अरूण सिंह मुन्ना ने इन ‘बहारियों’ का विरोद्द खुलेआम किया और राहुल गांधी तक इसे पहंुचाया भी।
    कांग्रेस के एक प्रवक्ता कहते हैं कि पार्टी ने किसी भी उम्मीदवार के नाम की अधिकारिक घोषणा नहीं की है, फिर भी यदि चुनाव जीत सकने वाले नामों पर चर्चा हो रही है या कोई अमीर आदमी पार्टी में शामिल हो रहा है, तो इसमें बुराई क्या है? टिकट उसे ही क्यों नहीं मिलना चाहिए जो चुनाव जीत सकता है?, सवाल किसी अमीर की उम्मीदवारी का नहीं है, बल्कि राहुल गांधी की कवायद का है जो पिछले काफी समय से जारी है। क्या उन साक्षात्कारों और आब्जर्वर्रो की पड़ताल में प्रदेश में सक्षम उम्मीदवार नहीं मिले? या फिर प्रदेश कांग्रेस में निजी, क्षेत्रीय, गुटीय स्वार्थों का बोलबाला जारी रहेगा? या फिर कांग्रेस के घर में बैठे विभीषण मायाराज बरकरार रखने के षड़यंत्र में कामयाबी से  सक्रिय हैं?

Rajiv Dixit's Expose of Manmohan Singh as America's Agent 2

Thursday, December 30, 2010

मगर ‘प्रियंका’ को संघर्ष के दौर ने एक सही तर्क दिया

आदमी और अपराध के बीच की सरल रेखा को काटकर स्वास्तिक का चिन्ह बना लेने का कमाल सिर्फ कलम को हासिल है और कलम सियासी रावण की अदालत में मुल्जिम के कटघरे में खड़े बेकसूर आदमी का हलफनामा है। इसी कलम ने इकतीस बरस पहले ‘प्रियंका’ को जन्म दिया, पांच साल माता सरस्वती के बेटों के चरण पखारते गुजर गए। छठे साल राजनीति के परकोटे पर जहांगीरी घंटे की तरह जा पहुंची ‘प्रियंका’। नतीजे में इंसाफ की जगह मुकदमों और जेल का प्रशिक्षण हासिल हुआ। कठिन संघर्ष के दौर ने एक सही तर्क दिया।
    लेकिन खाली तर्क का सिक्का किसी महाजन को उत्तेजित नहीं कर पाता, तिस पर चार पन्नों वाले चीथड़े की क्या बिसात जो गरीब की जोरू की तरह अपना तन ढकने में या फिर सुविधाओं के ठाठ की लालच में महज एक साड़ी के बदले किसी महाजन के साथ रात भर सोने के लिए राजी हो जाती है। बस यहीं उसके पेट पर अपने बेडौल पांव रखकर महाजनों का पूरा टोला उसे छिनाल-छिनाल पुकारते हुए सभ्यता की नाक पर रूमाल लपेटे दुत्कारता रहता है। फिर द्रौपदी नहीं जन्मेगी? और उसके भीतर आग नहीं जलेगी? उसके अंगारे भभक कर इधर-उधर नहीं छिटकेंगे? निश्चित रूप से आग भी जलेगी, अंगारे भी धधकेंगे और फिर महाभारत भी होगा।
    और वहीं हुआ भी। द्रौपदी महज किसी औरत का नाम भर नहीं है। द्रौपदी एक क्रांति का नाम है। नाइंसाफी के मुखालिफ एक आंदोलन है, एक जोरदार आवाज है। इसी प्रेरणा के पथ पर जनता से जंगल तक ‘जनतंत्र’ के जिम्मेदारों को ललकारने के लिए ‘प्रियंका ने सच बयानी का हलफनामा दाखिल किया।
    ‘प्रियंका’ के पाठकों और विज्ञापनदाताओं की संख्या में एक बड़ा इजाफा हुआ। बड़े अखबारों की कतार में दिखनेवाली पाक्षिक ‘प्रियंका’ जहां मुकदमों से लदी-फंदी रही, वहीं एक भरा-पूरा परिवार पाने में भी सफल रही। समूचे उत्तर प्रदेश में एक अलग पहचान बनी। गांव-गंवई क्षेत्रों में भी दखल बढ़ा। गांव के मुखिया से लेकर पांच विधानसभा क्षेत्र से चुने जाने वाले सांसद तक सुर्खियां बने। गूंगों की जुबान बनने और निष्ठा की तुक बिठाने में सूबे के मुख्यमंत्री के गुस्से की बारूद ने हाथ-पांव झुलसा दिए। इसी समय कई शालीन हाथ, जो परिवर्तन के हिमायती थे दोस्ती के लिए बढ़े। उनके पास पूंजीवादी दिमाग था। वे ‘प्रियंका’ का सहयोग करते हुए कुछ इस तरह अपने मकसद में कामयाबी  चाहते थे कि शालीनता भी बनी रहे और विरोध में उठे हुए हाथ की मुट्ठी भी तनी रहे। और ऐसा ही हुआ भी। यह सब इतने आहिस्ता-आहिस्ता, लेकिन सड़क पर दौड़ते ‘ट्रैफिक’ की तरह हुआ कि राज बदल गया, समाज बदल गया और सत्ता के शीर्ष पर बैठे लोग बदल गए। यहां तक एक समूची नई पीढ़ी पल-पुसकर तैयार हो गई। मगर ‘प्रियंका’ के हलक से चीखें निकलना बंद न हुई।
    रावण के पुतले को जलते हुए देखकर ताली बजाने वाले हिजड़ों की जमात जब सत्ता पर काबिज हो गई और रामनामी बेंचकर ‘सीता’ की ही दलाली करने का हौसला कर बैठी तब जकार अहसास हुआ कि आदमी अपनी ही नैतिकता से कितना मजबूर होता है। शायद इन्हीं अनुभवों के चलते धूमिल ने कहीं लिखा हैं -          
                       एक खुला हुआ सच है कि आदमी
दायें हाथ की नैतिका से
इस कदर मजबूर होता है
कि तमाम उम्र गुजर जाती है मगर
गांड़ सिर्फ, बांयां हाथ धोता है।
यह लाइनें किसी अफसोस के लिए नहीं बल्कि सचबयानी की हलफ के लिए हैं। ‘प्रियंका’ भारत के हिन्दी भाषी पाठकों के दुलार से बेहद गदगद है।  भले ही ‘प्रियंका’ किसी श्रीकृष्ण की खोज में कामयाब न हो सकी, लेकिन अर्जुन के गांडीव की तरह अपनी कलम थामें आपका आशीर्वाद पाकर गौरवान्वित होती रही है और होगी। श्री कृष्ण ने अपने बालसखा सुदामा की पोटली से दो मुट्ठी चावल खाकर दो लोकों के सुख, संपदा से उन्हें मालामाल कर दिया था। शायद ‘प्रियंका’ किसी सुदामा के रिश्ते में नहीं आती, नहीं तो क्या वजह रही कि श्रीकृष्ण का पीताम्बर ओढ़े दसियों हिमायती ‘सियासत की द्वारका’ में भटक गए।
    इक्तीस बरसों में इक्तीस हजार बार सुनने को मिला, यह नाम तो कभी सुना नहीं। कब से यह अखबार निकल रहा है। फिर भी कोई शर्म या घबराहट नहीं पैदा हुई। हां अखबार बेचने, विज्ञापन जुटाने और समाचार लिखने में जिस संकल्प की जरूरत थी, उससे इंच भर भी पीछे हटने का इरादा कभी न बन सका, क्योंकि आप पाठकों ने, विज्ञापनदाताओं ने और जिले-जिले बैठे ‘प्रियंका’ के संवाददाताओं ने कभी इस आोर सोंचने का मौका ही नहीं दिया। अखबार को संघर्ष का उपकरण नहीं, आदमी की सचबयानी का हलफनामा बनाए रखने में आप गुरूजनों का आशीर्वाद रहा है। हम तो एकलव्य की तरह आपसे ग्रहण करते रहे और उसे समग्र समाज में फैलाते रहे।
    और अंत में इतना ही कि आप द्वारा दी गई संजीवनी ही कलम के सच का हलफनामा थी और आगे भी रहेगी। प्रणाम!