भारत में शौचालय घरों व सार्वजनिक स्थालों पर बनाये जाने के लिए अभियान चलाया जा रहा है। सरकार 12 हजार रूपये प्रोत्साहन राशि देने का प्रचार करने जा रही है। वहीं जापान में सरकार ने पिछले दिनों फैसला लिया है कि वह अपने देश की लिफ्टों (एलीवेटर्स) में शौचालय व पानी की व्यवस्था करेंगे जो आकस्मिक अवसरों पर उपयोग में लाये जा सकेंगे दरअसल पिछले दिनों जापान में 7.8 तीव्रता वाले भूकंप आने के कारण बहुत सारे लोग घंटो लिफ्ट में फंसे रहे और कंपकपाती द्दरती ने उन्हें बाहर निकलने से रोके रखा। कई इलाकों में लोगो ने कई दिन लिफ्ट में गुजारे जहाँ उन्हें पीने का पानी व शौचालय की दिक्कतों का सामना करना पड़ा। मेट्रो न्यूज रिपोर्ट के अनुसार सरकार नष्ट किये जा सकने वाले कार्ड बोर्ड के ढांचे वाले शौचालय और पानी सोख लेने वाले कागज (सोखता) के थैले छोटी जगह में रखने पर विचार कर रही है। एलीवेटर्स एसोसिएशन और इंस्फ्राटक्चर मंत्रालय इसे मूर्तरूप देंगे।
कलम है मेरी माँ का नाम/स्वर है मेरे पिता. अक्षर है मेरा सगा भाई. ख़बरें/समाचार हैं मेरे बेटे -बेटियां. अखबार है मेरा हीरामन. पाठक हैं मेरे नातेदार. और हम हैं पत्रकार. बोलो क्या कहते हो? उठाओगे बहन वेदना की कराहती आवाज़ को? अगर हाँ, तो आगे बढ़कर थाम लो आदमी का हाथ, बना डालो धारदार तलवार. जी हाँ! धारदार तलवार . धारदार तलवार. धारदार तलवार.
Tuesday, November 17, 2015
जानवरों के लिये भी बनाओ शौचालय
आदमी खुले में शौच करे तो अपराध कुत्ता, बिल्ली, गाय, सांड, भैंस, दम्पत्ति राजपथ पर खुलेआम फारिग हांे तो साहब मेम साहब सहित समूचा सरकारी अमला मस्त बंद्ररों की भारी जनसंख्या शहरों-गांवो के घरों की छतों पर मल-मूत्र त्याग रही है, जबकि आदमी का सार्वजनिक स्थान पर पेशाब करना भी दण्डनीय अपराध है। राजपथ से लेकर गली-मोहल्लों, काॅलोनीयों से लेकर जनपथ और खूबसूरत पार्को तक में हर सुबह-शाम अपने प्यारे पप्पी को टहलाते, फारिग कराते लाखों बाबू-बबुआइन दिख जाएंगे। ये प्यारे आपके मकान के दरवाजे के सामने, बीच रास्ते में कार-बाइक के आस-पास या कहीं भी खुली सड़क पर नित्यकर्म से निबटते दिख जाएंगे। आवारा जनवरों का शौचालय सड़कें गलियां, पार्क तो हंै ही। मजे की बात है अपने कुत्तों को सड़कांे पर नित्यकर्म कराने वालो में अधिेांश धरती बचाने के सेमिनारों में बड़ी-बड़ी बातेे करते हैं और पशु प्रेम के साथ आवारा पशुओं पर हल्ला भी मचाते हैं? पर्यावरण पर भाषणों सहित अखबारों में अपना ज्ञान बघारते हुए फोटो छपातें हैं। जबकि कुत्ते और बंदर के मल मौजूद इ कोली वैक्टीरिया प्रदूषण फैलाने का काम करते है। कुत्ते के एक ग्राम मल में दो करोड़ से अद्दिक इ कोली सेल होते हैं और लाखों करोड़ों कुत्तों का मल-मूत्र जमीन के जरिये भूजल को दूषित कर रहा है। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने अपने समय में खुले में शौच पर नारा दिया था, टट्टी पर मिट्टी डालो। यह जहमत भी कोई उठाने को तैयार नही है। देश में बंगलौर, चंडीगढ़ छोड़कर शायद ही कहीं कुत्तों के मल को सुरक्षित स्थान पर फेंकने का नियम हो। एनीमल वेल्फेयर बोर्ड आॅफ इंडिया ;।ॅठप्द्ध के तमाम दिशा निर्देशों में भी पालतू पशुओं के सार्वनिक स्थलों पर मल त्यागने के संबंध में प्रतिबंध का उल्लेख नही है। यहाँ यह भी बताते चलें कि एनीमल वेल्फेयर बोर्ड आवारा पशुओं खासकर कुत्तों के आतंक से निपटने के लिए राज्यों को बाकायदा पैसा भी देता है। उप्र नगर निगमों को कब कितना पैसा मिला कैसे खर्च हुआ या लापरवाही के चलते मिला ही नहीं यह जांच का विषय है। इसके साथ ही यह भी बताना आवश्यक होगा कि नगर निगमों में आवारा कुत्ते पकड़ने या पकड़कर उनकी नसबंदी करने का कोई अभियान भी नहीं चलाया जाता और तो और इसके लिए अलग से कोई बजट भी नहीं रखा जाता।
उससे भी अधिक हास्यास्पद स्थिति यह है कि नगर निगमों/पंचायतों पालिकाओं के पास आवारा व पाले हुए कुत्तों के आंकड़े तक नहीं है। कई बार आवारा पशुओं की गणना के फैसलों का एलान हुआ तो, लेकिन अभी तक यह काम शुरू नहीं हुआ। कब होगा यह कोई नही जानता, कुत्ते हंै कि लगातार बढ़ते जा रहे हैं और बिल्ली से लेकर नवजात शिशुओं तक को फाड़ खा रहे हैं। यह आंकड़ा अकेले लखनऊ में 2014 में 53 हजार के पार हो चुका है। पीडि़तों का हाल यह है कि हर साल देश में 22 हजार मौतें रैबीज के कारण हो रही हैं, उनमेें 90 फीसदी लोग कुत्ते के काटने से मरने वाले होते है। बंदरो के आतंक से शायद ही कोई शहर या गांव बचा हो। हाल ही में कैम्पियरगंज में चार महीने के मासूम बच्चे को मां की गोद से छीनकर बंदर ने मार डाला और लखनऊ के गोसाईगंज इलाके में बंदरों को भगाने के लिए एयरगन से फयर करते हुए निशाना चूकने से एक किशोर घायल हो गया। ऐसे हजारों हादसे है। आतंक के इस माहौल में स्मार्ट सिटी, सफाई अभियान, गौशाला या आई टी सिटी सुनने में तो बड़ा अच्छा लगता है, लेकिन सच इस सबसे कोसों दूर है। बहरहाल आदमी के लिए भी शौचालय की आवश्यकता से इन्कार नहीं किया जा सकता, साथ ही आवारा पशुओं पर भी गम्भीरता से सोचना होगा।
उससे भी अधिक हास्यास्पद स्थिति यह है कि नगर निगमों/पंचायतों पालिकाओं के पास आवारा व पाले हुए कुत्तों के आंकड़े तक नहीं है। कई बार आवारा पशुओं की गणना के फैसलों का एलान हुआ तो, लेकिन अभी तक यह काम शुरू नहीं हुआ। कब होगा यह कोई नही जानता, कुत्ते हंै कि लगातार बढ़ते जा रहे हैं और बिल्ली से लेकर नवजात शिशुओं तक को फाड़ खा रहे हैं। यह आंकड़ा अकेले लखनऊ में 2014 में 53 हजार के पार हो चुका है। पीडि़तों का हाल यह है कि हर साल देश में 22 हजार मौतें रैबीज के कारण हो रही हैं, उनमेें 90 फीसदी लोग कुत्ते के काटने से मरने वाले होते है। बंदरो के आतंक से शायद ही कोई शहर या गांव बचा हो। हाल ही में कैम्पियरगंज में चार महीने के मासूम बच्चे को मां की गोद से छीनकर बंदर ने मार डाला और लखनऊ के गोसाईगंज इलाके में बंदरों को भगाने के लिए एयरगन से फयर करते हुए निशाना चूकने से एक किशोर घायल हो गया। ऐसे हजारों हादसे है। आतंक के इस माहौल में स्मार्ट सिटी, सफाई अभियान, गौशाला या आई टी सिटी सुनने में तो बड़ा अच्छा लगता है, लेकिन सच इस सबसे कोसों दूर है। बहरहाल आदमी के लिए भी शौचालय की आवश्यकता से इन्कार नहीं किया जा सकता, साथ ही आवारा पशुओं पर भी गम्भीरता से सोचना होगा।
बदहाल रविवार और बेरोजगार!
सपनों को घूम-घूमकर बेचने को बेचैन सियासी दल लगातार बेरोजगारों को ठगते चले आ रहे हैं। सरकारें भी उन्हें ठगने में पीछे नहीं है? हर रविवार लाखों युवा लखनऊ के स्कूलों में प्रतियोगी परीक्षाओं में भाग लेने के लिए दूर-दराज से आता है।
ये बेरोजगार परीक्षा के लिए सरकार की तय फीस अदा करते हैं। रेल, बस या अन्य साधनों से धक्के खाते हुए लखनऊ तक आने और वापस जाने का किराया अदा करते हैं। लखनऊ की फुटपाथों पर सोने के लिए नकद पैसे देकर जगह खरीदने को मजबूर होते हैं। खाने के लिए मजबूरन कच्चे-पक्के भोजन पर गुजारा करते हैं। यही नहीं इन युवाओं खासकर युवतियों को शहर के रिक्शा-आॅटो वाले भी ठगने में पीछे नहीं रहते। गो कि डेढ़-दो लाख की आमद शौचालय से लेकर सड़कें तक अस्त-व्यस्त कर देती है, लेकिन सरकार को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता?
सरकारें रोजगार मांगने वालों को लाठियों का जोर दिखाने के साथ लुभावने वायदे करती रहतीं हैं। अभी तक शिक्षामित्रों के मामले पर कोई फैसला नहीं हो पाया है। उसके बाद भी कभी केन्द्र सरकार घोषणा करती है। 18 लाख नौकरियों, की तो कभी प्रदेश सरकार एलान करती है, ‘यूपी में नौकरियों की भरमार’, मगर होता जाता कुछ नहीं। 368 चपरासी के पदों के लिए सवा तेईस लाख बेरोजगारों के लाइन लगा लेने से देशभर के मीडिया में भूकंप की तरह समाचार छपे थे। आंकड़ों के साक्ष्य दिये गये। अगले-पिछले बयान दोहराये गये। घोटाले और ठगी के तमाम मामलों को उछाला गया। आरक्षण की तुरही भी पूरे जोर-शोर से बजायी गयी। सलाहें भी दी गयीं। उद्यमिता क्रांति का बिगुल भी फूंकने की जुबानी कोशिशें हुईं, लेकिन हुआ क्या? 368 चपरासियों के चुनाव के लिए एक समिति गठित कर दी गई जो सात-आठ महीनों में चयन योजना बनाएगी। गोया अगले विधानसभा चुनाव के दौर-दौरे की आपाद्दापी में ये बेरोजगार राह ताकते रहे जायेंगे? यहां यह बताना जरूरी होगा कि बेरोजगारों के अभिभावकों की जेब कटती रहती है और उनकी उम्मीदों पर पानी फिरता जाता है।
लखनऊ में हर रविवार परीक्षा देने आने वाले बेरोजगारों से समुचित शौचालयों के अभाव से गंदगी के साथ तमाम कचरा बढ़ जाता है जो सोमवार को सफाईकर्मियों के लिए नई मुसीबत बन जाता है। पेशाब और गू की सफाई के साथ शहर को भीषण जाम की तकलीफ भी झेलनी पड़ती है। जबकि 30 लाख से अधिक दो-तीन-चार पहिया वाहनों के अलावा घोड़ा गाडि़यां, साईकिल ट्रालियां पहले से ही राजधानी की सड़कों पर दौड़ रहे हैं। पैदल चलने वालों की संख्या अलग है। ऐसे हालात में रविवार बेहाल होकर हांफता नजर आता है। मजा तो तब आता है जब न ट्रैफिक सिपाही और न ही थानों से तैनात किये जाने वाले सिपाही दिखाई देते हैं।
बहरहाल शहर के वाशिन्दे हलकान हैं तो बेरोजगारों की फौज बदहाल है। इस सबका जिम्मेदार कौन है? आरोप लगाने से भला नहीं होगा लेकिन जिम्मेदारों को संजीदगी से इन हालातों पर सोंचना होगा और कारगार कदम उठाने ही होगे।
ये बेरोजगार परीक्षा के लिए सरकार की तय फीस अदा करते हैं। रेल, बस या अन्य साधनों से धक्के खाते हुए लखनऊ तक आने और वापस जाने का किराया अदा करते हैं। लखनऊ की फुटपाथों पर सोने के लिए नकद पैसे देकर जगह खरीदने को मजबूर होते हैं। खाने के लिए मजबूरन कच्चे-पक्के भोजन पर गुजारा करते हैं। यही नहीं इन युवाओं खासकर युवतियों को शहर के रिक्शा-आॅटो वाले भी ठगने में पीछे नहीं रहते। गो कि डेढ़-दो लाख की आमद शौचालय से लेकर सड़कें तक अस्त-व्यस्त कर देती है, लेकिन सरकार को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता?
सरकारें रोजगार मांगने वालों को लाठियों का जोर दिखाने के साथ लुभावने वायदे करती रहतीं हैं। अभी तक शिक्षामित्रों के मामले पर कोई फैसला नहीं हो पाया है। उसके बाद भी कभी केन्द्र सरकार घोषणा करती है। 18 लाख नौकरियों, की तो कभी प्रदेश सरकार एलान करती है, ‘यूपी में नौकरियों की भरमार’, मगर होता जाता कुछ नहीं। 368 चपरासी के पदों के लिए सवा तेईस लाख बेरोजगारों के लाइन लगा लेने से देशभर के मीडिया में भूकंप की तरह समाचार छपे थे। आंकड़ों के साक्ष्य दिये गये। अगले-पिछले बयान दोहराये गये। घोटाले और ठगी के तमाम मामलों को उछाला गया। आरक्षण की तुरही भी पूरे जोर-शोर से बजायी गयी। सलाहें भी दी गयीं। उद्यमिता क्रांति का बिगुल भी फूंकने की जुबानी कोशिशें हुईं, लेकिन हुआ क्या? 368 चपरासियों के चुनाव के लिए एक समिति गठित कर दी गई जो सात-आठ महीनों में चयन योजना बनाएगी। गोया अगले विधानसभा चुनाव के दौर-दौरे की आपाद्दापी में ये बेरोजगार राह ताकते रहे जायेंगे? यहां यह बताना जरूरी होगा कि बेरोजगारों के अभिभावकों की जेब कटती रहती है और उनकी उम्मीदों पर पानी फिरता जाता है।
लखनऊ में हर रविवार परीक्षा देने आने वाले बेरोजगारों से समुचित शौचालयों के अभाव से गंदगी के साथ तमाम कचरा बढ़ जाता है जो सोमवार को सफाईकर्मियों के लिए नई मुसीबत बन जाता है। पेशाब और गू की सफाई के साथ शहर को भीषण जाम की तकलीफ भी झेलनी पड़ती है। जबकि 30 लाख से अधिक दो-तीन-चार पहिया वाहनों के अलावा घोड़ा गाडि़यां, साईकिल ट्रालियां पहले से ही राजधानी की सड़कों पर दौड़ रहे हैं। पैदल चलने वालों की संख्या अलग है। ऐसे हालात में रविवार बेहाल होकर हांफता नजर आता है। मजा तो तब आता है जब न ट्रैफिक सिपाही और न ही थानों से तैनात किये जाने वाले सिपाही दिखाई देते हैं।
बहरहाल शहर के वाशिन्दे हलकान हैं तो बेरोजगारों की फौज बदहाल है। इस सबका जिम्मेदार कौन है? आरोप लगाने से भला नहीं होगा लेकिन जिम्मेदारों को संजीदगी से इन हालातों पर सोंचना होगा और कारगार कदम उठाने ही होगे।
मोबाइल वेश्यावृति ...?
लूटो इंडिया कारपोरेट शायद गोरों की ईस्ट इंडिया कंपनी का नया नाम कालों ने रखकर भारतीयों को लूटने का काम बेहद संजीदगी से जारी कर रखा है। मोबाइल/ब्राडबैंड सेवा का क्षेत्र जैसे-जैस विस्तारित हो रहा है वैसे-वैसे मोबाइल सेवा प्रदाता कंपनियां सरेआम ग्राहकों को लूट रही हैं। केवल इतना ही नहीं बाकायदा विज्ञापन (एसएमएस सेवा) के जरिये अंधविश्वास, अश्लीलता और आचरणहीनता को बढ़ावा दे रही हैं।
इसके साथ ही 2जी, 3जी सेवाएं, प्रीपेड टाॅपअप, काॅल दरों में खासा इजाफा कर दिया गया। गौरतलब है इस तेजी से यूपीए के 2जी घोटाले के समय भी दरें नहीं बढ़ीं थी। कोई 28 दिन, कोई 22 दिन तो कोई 20 दिन, कोई 10 दिन, कोई 7 दिन यानी अच्छे दिनों की सेवाओं के बदले मनमाने पैसे वसूलता है। टैरिफ ग्राहक की सुविधा के बजाये कंपनियां अपनी सुविधाओं के हिसाब से देती है। देश में सबसे तेज नेटवर्क का दावा करने वाली एयरटेल ने 8756500858 पर 6 मई को 171 रूपये का टैरिफ 28 दिन की वैधता वाला एटी टू एटी 20 पै0मि0 अन्य 1.5 पैसा प्रति सेकेंड की दर से डाला। 28 दिन बाद 20 पै0 मिनट की सेवाएं समाप्त कर दीं और 1.5 पैसा प्रति सेकेंड की दर लागू रही। ग्राहक को हर काल 90 पैसा प्रति मिनट बैठती हैं, आधी सेवा हटाने आधी जारी रखने का कौन सा तरीका है या औचित्य? कंपनी से बात करने के लिए 121 या 321 किसी पर डायल करिये तो 1 दबाइये 2 दबाईये से 9 तक दबाईये की सुरीली आवाज सुनाई देती है लेकिन बात नहीं हो सकती? दोनों नंबरों से ग्राहक की बात नहीं हो सकी। टोल फ्री 18001030121 पर भी वही 1 से 9 तक दबाईये लेकिन बात नहीं हुई। 16 सितम्बर को बात करने वाले ने उ.प्र. की जगह, मप्र लाइन ट्रांस्फर कर दी, जाहिर है बात नहीं हो सकी। दोबारा प्रयास करने पर 9810198101 नम्बर बताया गया जिस पर बात करते हुए बीच में काॅल रोककर काॅल बैक करने की बात कही गई। उपभोक्ता क्या करें? भले ही सरकार के दबाव में एटी ने प्रति सेकेंड दरें (प्रीपेड सेवा में) निर्धारित कर दी हों लेकिन जो पैसा लिया जा चुका है उसका क्या होगा?
अब इन मोबाइल कंपनियों की सेवाओं पर हर दस मिनट में एसएमएस आपके फोन पर आते रहते हैं। हर बार नई बात होगी। कहीं गाना तो कहीं भविष्य 3 रू0 मिनट से लेकर 30 रू0 तक की दर से, इसके अलावा वेश्यावृत्ति को बढ़ावा देने वाले विज्ञापन लगातार मैसेज सेन्टर के नंबरों 9827002229, 9022000504, 9322278627 से आते रहते हैं। आप उन्हें हटाते रहें वे भेजते रहेंगे। जरा विज्ञापन की लाइने देखिए हाय, आपसे बातें करने का बहुत मन कर रहा है, आपका नंबर आपके फ्रेंड से मिला प्लीज मुझे अभी काॅल करें 56464878। 3 रू0 मि0’ या ‘हाय मेरे घरवाले एक हफ्ते के लिए बाहर गये हैं। मैं घर पे अकेली हूं। मुझसे प्यार के लिए काॅल करें 56464876’ या ‘आपका दिल बहलाने के लिए आ रही हूँ, दोस्ती और चटपटी बातों का हसीन सफर शुरू करने के लिए डायल करें 53300111 या ‘सनी लियोन के पानी वाले डांस...’ ये रिलायंस से लेकर सभी मोबाइल कंपनियां कर रही हैं। इन संदेशों को वेश्यावृति को बढ़ावा देने वाला नहीं माना जाएगा? यही हाल नेट पर भी देखने को मिल जाएगा, भले ही उच्चतम न्यायालय के आदेशानुसार पोर्नसाइडें बन्द करने का दावा किया जा रहा हो। अश्लील कहानियों से लेकर अश्लील फोटो, चैटिंग के साथ काॅलगर्ल के फोन नम्बर तक हाजिर हैं।
गौरतलब है प्रधानमंत्री ‘डिजिटल इंडिया’ नारे को सार्थक करने के लिए अथक परिश्रम कर रहे हैं। सोशल मीडिया पर योग के साथ मौजूद सिलिकाॅन वैली (अमेरिका) तक दौड़ लगा आये हैं। यह अलग बात है कि आज भारत में आई.टी. जन्मदाता सैम पित्रोदा का नाम भी भारतवासियों को याद नहीं। राजीव गांद्दी का नाम लेना तो राजनीति हो जायेगी? बहरहाल मोबाइल पर वेश्यावृति को बढ़ावा देने वाली कंपनियांे के बरखिलाफ सख्त कदम उठाने ही होंगे वरना नई पीढ़ी को संस्कार का पाठ पढ़ाने वाले सरकार और उसके पीछे संगठन को यह बदनाम कर देंगे। इसी तरह यह एक दबाइये... दो दबाइयें... की जगह सीद्दी बात करने या शिकायत दर्ज कराने का एसएमएस नम्बर अलग होना चाहिए वरना ‘डिजिटली इंडिया’ आंकड़ों में सिमट कर रह जायेगा? (जारी)
इसके साथ ही 2जी, 3जी सेवाएं, प्रीपेड टाॅपअप, काॅल दरों में खासा इजाफा कर दिया गया। गौरतलब है इस तेजी से यूपीए के 2जी घोटाले के समय भी दरें नहीं बढ़ीं थी। कोई 28 दिन, कोई 22 दिन तो कोई 20 दिन, कोई 10 दिन, कोई 7 दिन यानी अच्छे दिनों की सेवाओं के बदले मनमाने पैसे वसूलता है। टैरिफ ग्राहक की सुविधा के बजाये कंपनियां अपनी सुविधाओं के हिसाब से देती है। देश में सबसे तेज नेटवर्क का दावा करने वाली एयरटेल ने 8756500858 पर 6 मई को 171 रूपये का टैरिफ 28 दिन की वैधता वाला एटी टू एटी 20 पै0मि0 अन्य 1.5 पैसा प्रति सेकेंड की दर से डाला। 28 दिन बाद 20 पै0 मिनट की सेवाएं समाप्त कर दीं और 1.5 पैसा प्रति सेकेंड की दर लागू रही। ग्राहक को हर काल 90 पैसा प्रति मिनट बैठती हैं, आधी सेवा हटाने आधी जारी रखने का कौन सा तरीका है या औचित्य? कंपनी से बात करने के लिए 121 या 321 किसी पर डायल करिये तो 1 दबाइये 2 दबाईये से 9 तक दबाईये की सुरीली आवाज सुनाई देती है लेकिन बात नहीं हो सकती? दोनों नंबरों से ग्राहक की बात नहीं हो सकी। टोल फ्री 18001030121 पर भी वही 1 से 9 तक दबाईये लेकिन बात नहीं हुई। 16 सितम्बर को बात करने वाले ने उ.प्र. की जगह, मप्र लाइन ट्रांस्फर कर दी, जाहिर है बात नहीं हो सकी। दोबारा प्रयास करने पर 9810198101 नम्बर बताया गया जिस पर बात करते हुए बीच में काॅल रोककर काॅल बैक करने की बात कही गई। उपभोक्ता क्या करें? भले ही सरकार के दबाव में एटी ने प्रति सेकेंड दरें (प्रीपेड सेवा में) निर्धारित कर दी हों लेकिन जो पैसा लिया जा चुका है उसका क्या होगा?
अब इन मोबाइल कंपनियों की सेवाओं पर हर दस मिनट में एसएमएस आपके फोन पर आते रहते हैं। हर बार नई बात होगी। कहीं गाना तो कहीं भविष्य 3 रू0 मिनट से लेकर 30 रू0 तक की दर से, इसके अलावा वेश्यावृत्ति को बढ़ावा देने वाले विज्ञापन लगातार मैसेज सेन्टर के नंबरों 9827002229, 9022000504, 9322278627 से आते रहते हैं। आप उन्हें हटाते रहें वे भेजते रहेंगे। जरा विज्ञापन की लाइने देखिए हाय, आपसे बातें करने का बहुत मन कर रहा है, आपका नंबर आपके फ्रेंड से मिला प्लीज मुझे अभी काॅल करें 56464878। 3 रू0 मि0’ या ‘हाय मेरे घरवाले एक हफ्ते के लिए बाहर गये हैं। मैं घर पे अकेली हूं। मुझसे प्यार के लिए काॅल करें 56464876’ या ‘आपका दिल बहलाने के लिए आ रही हूँ, दोस्ती और चटपटी बातों का हसीन सफर शुरू करने के लिए डायल करें 53300111 या ‘सनी लियोन के पानी वाले डांस...’ ये रिलायंस से लेकर सभी मोबाइल कंपनियां कर रही हैं। इन संदेशों को वेश्यावृति को बढ़ावा देने वाला नहीं माना जाएगा? यही हाल नेट पर भी देखने को मिल जाएगा, भले ही उच्चतम न्यायालय के आदेशानुसार पोर्नसाइडें बन्द करने का दावा किया जा रहा हो। अश्लील कहानियों से लेकर अश्लील फोटो, चैटिंग के साथ काॅलगर्ल के फोन नम्बर तक हाजिर हैं।
गौरतलब है प्रधानमंत्री ‘डिजिटल इंडिया’ नारे को सार्थक करने के लिए अथक परिश्रम कर रहे हैं। सोशल मीडिया पर योग के साथ मौजूद सिलिकाॅन वैली (अमेरिका) तक दौड़ लगा आये हैं। यह अलग बात है कि आज भारत में आई.टी. जन्मदाता सैम पित्रोदा का नाम भी भारतवासियों को याद नहीं। राजीव गांद्दी का नाम लेना तो राजनीति हो जायेगी? बहरहाल मोबाइल पर वेश्यावृति को बढ़ावा देने वाली कंपनियांे के बरखिलाफ सख्त कदम उठाने ही होंगे वरना नई पीढ़ी को संस्कार का पाठ पढ़ाने वाले सरकार और उसके पीछे संगठन को यह बदनाम कर देंगे। इसी तरह यह एक दबाइये... दो दबाइयें... की जगह सीद्दी बात करने या शिकायत दर्ज कराने का एसएमएस नम्बर अलग होना चाहिए वरना ‘डिजिटली इंडिया’ आंकड़ों में सिमट कर रह जायेगा? (जारी)
मच्छरों के लिये बनाओ कंडोम!
मौसम की मार ने मच्छरों को किसी आतंकी संगठन की तरह हमलावर बना दिया है । आबादी बढ़ने के साथ गंदगी, पानी की बर्बादी व जमाव, नाले-नालियों से गंदे पानी की निकासी की बदइंतजामी, लोगों व नगर निगम/पालिकाओं के लापरवाह आचरण ने मच्छरों की संगठनात्मक ताकत को बढ़ावा दिया है, नतीजे में उनके हथियार डेंगू, मलेरिया ने आदमजात को आहत करने से आगे मौत बांटनी शुरू कर दी है। साल दर साल हालात बेकाबू होते जा रहे हैं।
सरकारी इंतजामातों में हरारत या हरकत तब होती है जब सौ-पचास मौते हो चुकी होती हैं, पिछले साल 1100 से ज्यादा लोग डेंगू की चपेट में आये थे, मरने वालों की खासी तादाद थी, आंकड़ों की बाजीगरी से आगे अब तक 5 सौ से अधिक मौतों का आंकड़ा सामने आया है, सौ मरीज महज तीन दिनों में सरकारी अस्पतालों में भर्ती हुए हैं, किसी भी अस्पताल में जगह नहीं है, दूसरी ओर नर्सिंगहोम बीमारों को लूटने में लगे हैं, यह हाल तब है जब न्यायालय तक ने हिदायत दी है।
दिमागी बुखार पीडि़तों के खून की जांच के इंतजाम तक नाकारा हैं और डाॅक्टरों का सरकारी कुनबा झूठे बयान देने और अखबार में नाम छपाने में मस्त हैं। सलाहों का सिलसिला जारी है मगर सरकारी कारिन्दे स्वयं उसका पालन करने की हिमाकत नहीं करते इस बीच अपनी आदत के मुताबिक बाबा रामदेव ने सलाह के साथ इलाज भी बता डाला है, आप भी गौर कीजिये--- डेंगू के मरीज एलोवेरा, गिलोय, अनार, पपीते के पत्ते का रस 50-50 मिलीलीटर मात्रा में लें, एक साथ मिलाकर दिन में चार बार लेने से मरीज चार-पांच दिनों में ठीक हो जायेगा। यह हालात हर साल होते हैं और हो हल्ला मच कर रह जाता है, मगर सरकार संजीदा होने का ढोल पीटते हुए समय निकाल देती है? सरकारें इस ओर पहले से कोई इंतजाम क्यों नहीं करतीं? विश्वगुरू बनने - बनाने का सपना पालने वाले अपने साथी-संघियों, साइंसदानों से मच्छरों के लिये कोई कंडोम बनाने की पहल करने को क्यों नहीं कहते? शायद इसीलिए नगर विकास विभाग के आला अद्दिकारी विदेश गये थे? अस्पतालों में मरीजों की बाढ़ है, डेंगू, दिमगी बुखार और न जाने कौन-कौन सी गंभीर बीमारियों से पीडि़त बेहाल हैं, मुख्य सचिव इलाज में लापरवाही करने वाले डाॅ. को दंडित करने के आदेश दे रहे हैं, वहीं प्रदेश के स्वास्थ मंत्री को 108 डायल करने पर एम्बुलेंस सेवा नहीं मिल पाती, सेवा का नम्बर ही नहीं उठा, उनका अर्दली बीमार था, बाद में परेशान होकर सिविल अस्पताल में उसे दाखिल कराया गया, अक्सर 108 या 102 सेवा ठप हो जाती है, जिससे हजारों से ज्यादा लोग हलकान रहते हैं।
वहीं स्वास्थ महकमे के बाबुओं को मंत्री ने बेईमान, भ्रष्ट क्या कह दिया कि यू.पी.मेडिकल एंड पब्लिक हेल्थ मिनि. एसो. बयान वापस लेने का दबाव बनाते रहे और न लेने पर प्रर्दशन की धमकी देते रहे हैं। ऐसे में सवाल उठता है बाकी गरीब मरीजों का क्या हाल होगा? अब आप ही बताओ कि आपको क्या करना चाहिए या अखबार वाले क्या करें?
सरकारी इंतजामातों में हरारत या हरकत तब होती है जब सौ-पचास मौते हो चुकी होती हैं, पिछले साल 1100 से ज्यादा लोग डेंगू की चपेट में आये थे, मरने वालों की खासी तादाद थी, आंकड़ों की बाजीगरी से आगे अब तक 5 सौ से अधिक मौतों का आंकड़ा सामने आया है, सौ मरीज महज तीन दिनों में सरकारी अस्पतालों में भर्ती हुए हैं, किसी भी अस्पताल में जगह नहीं है, दूसरी ओर नर्सिंगहोम बीमारों को लूटने में लगे हैं, यह हाल तब है जब न्यायालय तक ने हिदायत दी है।
दिमागी बुखार पीडि़तों के खून की जांच के इंतजाम तक नाकारा हैं और डाॅक्टरों का सरकारी कुनबा झूठे बयान देने और अखबार में नाम छपाने में मस्त हैं। सलाहों का सिलसिला जारी है मगर सरकारी कारिन्दे स्वयं उसका पालन करने की हिमाकत नहीं करते इस बीच अपनी आदत के मुताबिक बाबा रामदेव ने सलाह के साथ इलाज भी बता डाला है, आप भी गौर कीजिये--- डेंगू के मरीज एलोवेरा, गिलोय, अनार, पपीते के पत्ते का रस 50-50 मिलीलीटर मात्रा में लें, एक साथ मिलाकर दिन में चार बार लेने से मरीज चार-पांच दिनों में ठीक हो जायेगा। यह हालात हर साल होते हैं और हो हल्ला मच कर रह जाता है, मगर सरकार संजीदा होने का ढोल पीटते हुए समय निकाल देती है? सरकारें इस ओर पहले से कोई इंतजाम क्यों नहीं करतीं? विश्वगुरू बनने - बनाने का सपना पालने वाले अपने साथी-संघियों, साइंसदानों से मच्छरों के लिये कोई कंडोम बनाने की पहल करने को क्यों नहीं कहते? शायद इसीलिए नगर विकास विभाग के आला अद्दिकारी विदेश गये थे? अस्पतालों में मरीजों की बाढ़ है, डेंगू, दिमगी बुखार और न जाने कौन-कौन सी गंभीर बीमारियों से पीडि़त बेहाल हैं, मुख्य सचिव इलाज में लापरवाही करने वाले डाॅ. को दंडित करने के आदेश दे रहे हैं, वहीं प्रदेश के स्वास्थ मंत्री को 108 डायल करने पर एम्बुलेंस सेवा नहीं मिल पाती, सेवा का नम्बर ही नहीं उठा, उनका अर्दली बीमार था, बाद में परेशान होकर सिविल अस्पताल में उसे दाखिल कराया गया, अक्सर 108 या 102 सेवा ठप हो जाती है, जिससे हजारों से ज्यादा लोग हलकान रहते हैं।
वहीं स्वास्थ महकमे के बाबुओं को मंत्री ने बेईमान, भ्रष्ट क्या कह दिया कि यू.पी.मेडिकल एंड पब्लिक हेल्थ मिनि. एसो. बयान वापस लेने का दबाव बनाते रहे और न लेने पर प्रर्दशन की धमकी देते रहे हैं। ऐसे में सवाल उठता है बाकी गरीब मरीजों का क्या हाल होगा? अब आप ही बताओ कि आपको क्या करना चाहिए या अखबार वाले क्या करें?
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