कलम है मेरी माँ का नाम/स्वर है मेरे पिता. अक्षर है मेरा सगा भाई. ख़बरें/समाचार हैं मेरे बेटे -बेटियां. अखबार है मेरा हीरामन. पाठक हैं मेरे नातेदार. और हम हैं पत्रकार. बोलो क्या कहते हो? उठाओगे बहन वेदना की कराहती आवाज़ को? अगर हाँ, तो आगे बढ़कर थाम लो आदमी का हाथ, बना डालो धारदार तलवार. जी हाँ! धारदार तलवार . धारदार तलवार. धारदार तलवार.
Tuesday, April 28, 2015
Tuesday, December 2, 2014
विज्ञापनों में बेइमानी है पुरानी!
अखबारों में छपने वाले विज्ञापनों के बाजार में सरकारी तंत्र में और दलालों में करोड़ों-अरबों के घपले बरसों से लगातार जारी हैं। दो महीने पहले यूपीटीयू में विज्ञापन देने के नाम पर करोड़ों के घपले का खुलासा लखनऊ से छपने वाले एक हिन्दी दैनिक ने अपने अखबार के पन्नों पर किया था। उस घपले में एक विज्ञापन एजेंसी के साथ दो-तीन छोटे अखबारों के शामिल होने का खुलासा किया गया था। यह नाम खासतौर पर बाक्स में छापे गये थे। खबर दो दिन छपी। इसके बाद जांच के नाम पर सब कुछ शान्त हो गया। दरअसल विज्ञापन के क्षेत्र में बड़े-बड़े चोर दरवाजे हैं और शातिरों के अपने करतब/लखनऊ की कई विज्ञापन एजेंसियों के दफ्तर सूरज ढलने के साथ ही ‘बाॅर’ मंे बदल जाते हैं और देर रात तक ‘जाम’ के साथ ‘जाॅन’ तक छलकते रहते हैं। इन महफिलों में सरकार के बड़े ओहदेदार, एजेंसी के मालिकान/ अधिकारी, अखबार के अधिकारी कभी भी देखे जा सकते हैं।
‘प्रियंका’ ने 1986 के कई अंकों में उप्र राज्य लाॅटरी में हो रहे घपलों में विज्ञापनों के खेल को कई अंकों में उजागर किया था। उस समय ‘पीएसी’ के नाम से मशहूर विज्ञापन कंपनी लाॅटरी निदेशालय से लेकर लगभग प्रदेश के हर विभाग में काबिज थी। खुलासा होने के बाद ‘प्रियंका’ को खरीदने में नाकाम रहने पर विज्ञापन एजेंसी के मालिक की धमकियां, हाथापाई फिर तत्कालीन लाॅटरी निदेशक द्वारा मुकदमा दायर करना। इसमें भी मनचाही सफलता न मिलने पर नौकरशाही व न्यायिक कर्मियों के षड़यंत्र से संपादक को एक दिन के लिए जेल भेज देने का कृत्य किया गया। जब अपने फंसने और जेल जाने की बारी आई तो लखनऊ के तत्कालीन जिलाधिकारी के हस्तक्षेप और ‘प्रियंका’ के संरक्षक व शुभचिंतकों के माध्यम से 9 साल चले मुकदमें में निदेशक द्वारा खेद जताकर न्यायालय में क्षमा याचना कर समझौता कर लिया गया। आज भी उसी विज्ञापन एजेंसी के वारिस बेखौफ उसी राह पर बढ़ रहे हैं। हाल ही में हुए लोकसभा चुनावों में भाजपा ने उसे तमाम छोटे-बड़े अखबारों में अपने प्रचार का विज्ञापन छपाने का ठेका दिया था। एजेंसी ने खुले हाथों छपवाया भी लेकिन भुगतान के समय असल भुगतान से 50-60 फीसदी तक कटौती कर के छोटे-मंझोले पत्र-पत्रिकाओं को भुगतान किया।
विज्ञापनों के खेल में सूचना विभाग के कारिन्दों का अपना अलग गिरोह है। इसमें विज्ञापन एजेंसियां, अखबार/पत्रिकाओं के मालिकान/अधिकारी पूरी तरह भागीदारी निभाते हैं। टेण्डरों से लेकर सजावटी विज्ञापनों में विज्ञापन दर, आकार व किस अखबार में कौन सा टेण्डर छपेगा तक का खेल बड़े ही सुनियोजित ढंग से चलता आ रहा है। इसी तरह अखबरों के साथ लेन-देन का धंधा जारी है। छोटे-मंझोले अखबारों को जानबूझकर बदनाम किया जाता है जबकि खेल तो बड़े-बड़ों में हो रहे हैं। सूचीबद्धता जैसे नियमों ने विज्ञापन मान्यता समिति का नाम ही दफना दिया।
विज्ञापन के बजट का खेल आंकडों में इस कदर उलझा दिया जाता है कि उसके लिए काबिल सीए को भी अपना सिर पीट लेने के बाद भी नतीजा निकालना आसान नहीं होगा। इसी तरह कामर्शियल दरों पर दिये जाने वाले विज्ञापनों का अपना अलग जाल-बट्टा है। यह सब बरसों से चल रहा हैं जिसने इसके मुखालिफ आवाज उठाई उसके विरोध में चन्द अखबारवालों का समूह, सूचना विभाग के बेईमान और विज्ञापन एजेंसियां सक्रिय हो जाते हैं। यह एक गंभीर जांच का विषय है, लेकिन कौन करेगा जांच?
‘प्रियंका’ ने 1986 के कई अंकों में उप्र राज्य लाॅटरी में हो रहे घपलों में विज्ञापनों के खेल को कई अंकों में उजागर किया था। उस समय ‘पीएसी’ के नाम से मशहूर विज्ञापन कंपनी लाॅटरी निदेशालय से लेकर लगभग प्रदेश के हर विभाग में काबिज थी। खुलासा होने के बाद ‘प्रियंका’ को खरीदने में नाकाम रहने पर विज्ञापन एजेंसी के मालिक की धमकियां, हाथापाई फिर तत्कालीन लाॅटरी निदेशक द्वारा मुकदमा दायर करना। इसमें भी मनचाही सफलता न मिलने पर नौकरशाही व न्यायिक कर्मियों के षड़यंत्र से संपादक को एक दिन के लिए जेल भेज देने का कृत्य किया गया। जब अपने फंसने और जेल जाने की बारी आई तो लखनऊ के तत्कालीन जिलाधिकारी के हस्तक्षेप और ‘प्रियंका’ के संरक्षक व शुभचिंतकों के माध्यम से 9 साल चले मुकदमें में निदेशक द्वारा खेद जताकर न्यायालय में क्षमा याचना कर समझौता कर लिया गया। आज भी उसी विज्ञापन एजेंसी के वारिस बेखौफ उसी राह पर बढ़ रहे हैं। हाल ही में हुए लोकसभा चुनावों में भाजपा ने उसे तमाम छोटे-बड़े अखबारों में अपने प्रचार का विज्ञापन छपाने का ठेका दिया था। एजेंसी ने खुले हाथों छपवाया भी लेकिन भुगतान के समय असल भुगतान से 50-60 फीसदी तक कटौती कर के छोटे-मंझोले पत्र-पत्रिकाओं को भुगतान किया।
विज्ञापनों के खेल में सूचना विभाग के कारिन्दों का अपना अलग गिरोह है। इसमें विज्ञापन एजेंसियां, अखबार/पत्रिकाओं के मालिकान/अधिकारी पूरी तरह भागीदारी निभाते हैं। टेण्डरों से लेकर सजावटी विज्ञापनों में विज्ञापन दर, आकार व किस अखबार में कौन सा टेण्डर छपेगा तक का खेल बड़े ही सुनियोजित ढंग से चलता आ रहा है। इसी तरह अखबरों के साथ लेन-देन का धंधा जारी है। छोटे-मंझोले अखबारों को जानबूझकर बदनाम किया जाता है जबकि खेल तो बड़े-बड़ों में हो रहे हैं। सूचीबद्धता जैसे नियमों ने विज्ञापन मान्यता समिति का नाम ही दफना दिया।
विज्ञापन के बजट का खेल आंकडों में इस कदर उलझा दिया जाता है कि उसके लिए काबिल सीए को भी अपना सिर पीट लेने के बाद भी नतीजा निकालना आसान नहीं होगा। इसी तरह कामर्शियल दरों पर दिये जाने वाले विज्ञापनों का अपना अलग जाल-बट्टा है। यह सब बरसों से चल रहा हैं जिसने इसके मुखालिफ आवाज उठाई उसके विरोध में चन्द अखबारवालों का समूह, सूचना विभाग के बेईमान और विज्ञापन एजेंसियां सक्रिय हो जाते हैं। यह एक गंभीर जांच का विषय है, लेकिन कौन करेगा जांच?
नये दौर का नया आन्दोलन ‘अखबार मेला’
छोटे-मंझोले अखबारों/पत्रिकाओं के सामने आज के लक-दक बाजार की रंगीनियों में हर पल कुछ नये की तलाश में भटकते पाठकों के बीच अपने वजूद को बनाए रखने की सबसे बड़ी चुनौती है। 70-80 करोड़ हिंदी पढ़ने-समझने वाले हिन्दुस्तानी छोटे-मंझोले पत्र/पत्रिकाओं से कैसे जुड़ें? कैस दिली नातेदारी कायम कर सकें? इस पर बातें तो बहुत होती हैं। इनके तमाम संगठन भी सक्रिय हैं। लघु पत्रिका दिवस तक मनाया जाता है, मगर उसमें केवल साहित्यिक पत्रिकाओं की ही भागीदारी होती है। साप्ताहिक/पाक्षिक अखबारों और राजनैतिक, सामाजिक पत्रिकाओं का ऐसा कोई मंच नहीं है, जहां से वे अपना परिचय पाठकों के एक बड़े समुदाय से करा सकें। उन्हें अपनी सचबयानी और आदमी की पीड़ा से कराहते समाचारों-विचारों को पढ़वा सके। न ही कोई अखबार बेचनेवाले या वितरकों को कोई दिलचस्पी है और न ही बचे-खुचे पुस्तकालयों को। ऐसे में इन अखबारों/पत्रिकाओं को अपना दायरा बढ़ाने के लिए गम्भीरता से सोंचना होगा। बाजारीकरण, सरकारी उपेक्षात्मक नीतियों, विज्ञापनदाताओं की बेरूखी और अपनी ही बिरादरी के बेगैरतों के थोथे आरोपों की शाक्तियों को दर किनार कर पाठकों तक छोटे-मंझोले अखबारों/पत्रिकाओं की पहुंच कैसे आसान बनाई जा सकती है? खासकर तब जब बड़े अखबार 16-24 रंगीन पन्नों में पूरी दुनिया की नंगई और नेताओं की दबंगई, थियेटर, माॅल और बड़े वितरकों के जरिए बेचने पर बजिद हों। आज हर बड़े अखबार ने तहसील/ब्लाक स्तर पर अपने भव्य कार्यालय बना लिए हैं और उनके जरिए विज्ञापनों, पाठकों पर पूरी तरह काबिज होने का षड़यंत्र जारी है। इसमें उनका भरपूर सहयोग बड़ा कहा जाने वाला महाजनी समाज और सरकारी तंत्र पूरे मनोयोग से कर रहा है। जाने-अन्जाने मध्यम वर्ग व पेट की आग में झुलस रहा गरीब तबका भी शामिल है, व्यावसायिकता का तकाजा भी शायद यही है। छोटे-मंझोले अखबारों को ऐसे हालातों में विज्ञापन जुटाने, पाठक बनाने में बड़े परिश्रम के बाद भी कुछ खास हासिल नहीं होता। नतीजा यह होता है कि अखबार/पत्रिका अनियमित छपते हैं या असमय बंद हो जाते हैं। इसके जिम्मेदार सरकारी तंत्र, विज्ञापनदाताओं और पाठकों से अधिक पत्र/पत्रिकाओं के सम्पादक/प्रकाशक होते हैं। वे विज्ञापनों को हासिल करने के लिए हर जतन करते हैं। सरकारी कारिन्दों की परिक्रमा से लेकर राजनेताओं के यहाँ माथा टेकने व राजनैतिक दल विशेष, सत्तादल के गुणगान तक के पराक्रम में अपनी भरपूर ऊर्जा लगाते हैं। यहां तक जबरन उगाही तक के मामलों में फंसा दिये जाते हैं या फंस जाते हैं। विज्ञापन हासिल करने का यह चक्रव्यूह इतना गजब का है कि इसके भीतर धंसते जाने का लोभ न अभिमन्यु रहने देता है और न ही जयद्रथ। फिर होता वही है जो महाभारत के दोनों योद्धाओं का हश्र हुआ था। अपवाद छोड़ दें तो अधिकांश पत्र/पत्रिकाएं केवल सांस लेते भर रह जाते हैं। ऐसे हालातों में अखबार/पत्रिका के पन्नों पर पढ़ने लायक सामग्री नहीं छप पाती। कई बार तो हालात इतने हास्यास्पद होते हैं कि विदेशों की खबरें निजी संवाददाता के हवाले से छपी दिखाई दे जाती हैं। मजे की बात है कि अखबार/पत्रिका जिस इलाके से छप रहे होते हैं वहां की खबरें उसके पन्नों पर होती ही नहीं या न के बराबर होती हैं। बड़े अखबारों की तर्ज पर या नकल पर बड़ी खबरें या बड़ों की चिंता में दुबला होने वाली खबरें छपी होती हैं, जिन्हें पहले से ही कई-कई बार टेलीविजन के पर्दे पर देखा और बड़े दैनिक पत्रों में पढ़ा जा चुका होता है। इसके अलावा छपाई, भाषा की अशुद्धियां, कागज और पढ़े जाने लायक गम्भीर सामग्री या खबरों का लगभग अभाव होता है। इसके बाद इंटरनेट या टीवी चैनलों पर आरोप लगाना कि उनके आने से छोटे-मंझोले अखबारों/ पत्रिकाओं के पाठकों को घटाया है, कहां तक तर्कसंगत हैं?
बेशक छोटे-मंझोले पत्र/ पत्रिकाओं के आंदोलन का वह दौर अंग्रेजों के साथ चला गया जब संपादकों को बतौर पारिश्रमिक दो सूखी रोटियां, एक गिलास पानी और उम्र भर के लिए काला पानी का दण्ड मिलता था, फिर भी संपादकों की कतार मौजूद रहती। आज समय बदल गया है, जगर-मगर करते मोबाइल फोन के छोटे पर्दे पर हर जरूरत पूरी करने की क्षमता है। शेयर मार्केट के उतार-चढ़ाव से लेकर
प्रधानमंत्री के हर पल की खबर तक फेसबुक, ट्विटर पर मौजूद हैं, लेकिन लौकी बेचने वाले की घटतौली, परचूनिये की हेरा-फेरी, दरोगा जी की उगाही, मोहल्ले की दादागीरी, शहर-कस्बे-गांव के मेले, पर्व और ठगी के साथ कलेक्टर, पुलिस कप्तान के कामों में आनेवाली दिक्कतें, बिजली, पानी, अस्पताल, सड़क, पुलिया, बेवा-बुढि़या, बन्दर, कुत्ता, सांड़, शोहदे, सफाई के कष्ट जैसी हजारों खबरें हमारे आस-पास हैं। इन्हंें छापने की जरूरत है और आदमी से नातेदारी बनाने की ओर कदम बढ़ाने से शादी डाॅटकाम से लेकर मेटरीमोनियल काॅलमों पर हल्ला बोलने की जरूरत है। एक बार फिर से लघु-मध्यम पत्रों के आन्दोलन को धार देकर प्रधानमंत्री के ‘मेक इन इंडिया’ से जोड़ कर शुरूआत करने जरूरत है। लालू यादव के कुम्हार को रोजी देने की तर्ज पर मोहल्ले की खबरें देने की जरूरत है। महात्मा गांधी के ‘इंडियन ओपीनियन’ या ‘हरिजन’ की तरह अपने ही जिले की पीड़ा, पर्व और प्रेम को अखबार/पत्रिका के पन्नों पर छापकर स्वस्थ और स्वच्छ शहर-कस्बा और जिला बनाने के आन्दोलन से पाठकों, विज्ञापनदाताओं और वितरकों को जोड़ा जा सकता है। इसी सोंच के साथ ‘अखबार मेला’ लखनऊ में लगाया जा रहा है। मेला महज चाय समोसे के साथ ताली बजाने के लिए नहीं वरन् नये दौर में नये आन्दोलन का शंखनाद है।
बेशक छोटे-मंझोले पत्र/ पत्रिकाओं के आंदोलन का वह दौर अंग्रेजों के साथ चला गया जब संपादकों को बतौर पारिश्रमिक दो सूखी रोटियां, एक गिलास पानी और उम्र भर के लिए काला पानी का दण्ड मिलता था, फिर भी संपादकों की कतार मौजूद रहती। आज समय बदल गया है, जगर-मगर करते मोबाइल फोन के छोटे पर्दे पर हर जरूरत पूरी करने की क्षमता है। शेयर मार्केट के उतार-चढ़ाव से लेकर
प्रधानमंत्री के हर पल की खबर तक फेसबुक, ट्विटर पर मौजूद हैं, लेकिन लौकी बेचने वाले की घटतौली, परचूनिये की हेरा-फेरी, दरोगा जी की उगाही, मोहल्ले की दादागीरी, शहर-कस्बे-गांव के मेले, पर्व और ठगी के साथ कलेक्टर, पुलिस कप्तान के कामों में आनेवाली दिक्कतें, बिजली, पानी, अस्पताल, सड़क, पुलिया, बेवा-बुढि़या, बन्दर, कुत्ता, सांड़, शोहदे, सफाई के कष्ट जैसी हजारों खबरें हमारे आस-पास हैं। इन्हंें छापने की जरूरत है और आदमी से नातेदारी बनाने की ओर कदम बढ़ाने से शादी डाॅटकाम से लेकर मेटरीमोनियल काॅलमों पर हल्ला बोलने की जरूरत है। एक बार फिर से लघु-मध्यम पत्रों के आन्दोलन को धार देकर प्रधानमंत्री के ‘मेक इन इंडिया’ से जोड़ कर शुरूआत करने जरूरत है। लालू यादव के कुम्हार को रोजी देने की तर्ज पर मोहल्ले की खबरें देने की जरूरत है। महात्मा गांधी के ‘इंडियन ओपीनियन’ या ‘हरिजन’ की तरह अपने ही जिले की पीड़ा, पर्व और प्रेम को अखबार/पत्रिका के पन्नों पर छापकर स्वस्थ और स्वच्छ शहर-कस्बा और जिला बनाने के आन्दोलन से पाठकों, विज्ञापनदाताओं और वितरकों को जोड़ा जा सकता है। इसी सोंच के साथ ‘अखबार मेला’ लखनऊ में लगाया जा रहा है। मेला महज चाय समोसे के साथ ताली बजाने के लिए नहीं वरन् नये दौर में नये आन्दोलन का शंखनाद है।
गांधी, गणेश और गंगाधर की विरासत हैं छोटे अखबार
ईश्वर से या चैरासी करोड़ देवी-देवताओं से मेरी मुलाकात कभी नहीं हुई। मिले तो हमेशा आप लोग। आप ही सहोदर हो, देव हो और बिरादर भी। सुख में, दुख में और अक्षरों के गांव-गलियारे में आपने ही हाथ थामा। आज ‘अखबार मेला’ के मण्डप में आप सभी के चरण पखारते हुए धन्य हुआ। आप सभी का स्वागत करते हुए मैं राम प्रकाश वरमा अपने सहयोगियों सहित प्रणाम करता हूँ। आपका आशीर्वाद पाने के बाद यहां पर बैठे हुए माननीय अग्रज का इस्तकबाल आप सबकी ओर से करता हूँ और चाहुँगा कि इन राजर्षियों, ऋषियों के सम्मान में, खैरमकदम में आप सब इतनी जोरदार तालियां बजायें कि मेला मण्डप और उसके ऊपर का आसमान भी खिलखिला कर हंसते हुए अदब से आदाब करें।..... लखनऊ की तबियत और तरबियत बिलाशक नवाबी है, सो रूआब, शवाब और कबाब को सुर्खियां हासिल हैं, मगर मेले-ठेलों के शायराना ठहाके मजाज की ‘आवारा’ यादें ताजा करते हैं, तो नागर जी की ‘कोठे वालियों’ से भी आपकी मुलाकात कराते हैं। ‘अखबार मेला’ लखनऊ की सरजमीं पर लगाने का हौसला ओर प्रेरणां अपने गुरूवर आचार्य दुलारे लाल भार्गव के ‘कवि-कोविद-क्लब’ की पावन स्मृतियों से मिला। खासकर छोटे और मंझोले अखबारों/पत्रिकओं के प्रति आम सोंच से अलग उनकी असलियत से आमना-सामना कराने के लिए यह मेला आयोजित किया गया है। इसलिए भी कि गांधी, गणेश (शंकर विद्यार्थी) और गंगाधर की विरासत अभी चुकी नहीं है। दो-चार पन्नों के अखबार गली-मुहल्लों की खबरों के अलावा सचबयानी का हलफनामा होते हैं। पत्रिकाएं प्रेमचन्द की ‘ईदगाह’ से लेकर के.पी. सक्ेसना के लखनउवा आंगन तक की हकीकत बयां करती हैं। और भी बेलाग कहूं तो दो पन्नों में लोकतंत्र के झूठे दर्प का रोजनामचा छपा होता है। दरोगा से लेकर दागदारों की हकीकत से जलते हुए अक्षर इंसाफ के जयकारे लगाते हुए खबर की शक्ल में पढ़ने को मिलते हैं। कटरों-कस्बों की गंधाती जिंदगी और उनसे पैदा होने वाले कीमती कचरे का नरक से सामना करातीं खबरों की पूरी जमात का दर्द पढ़ा जा सकता है।
गो कि इन अखबारों/पत्रिकाओं में पसीना बेचकर अक्षरों को आलू, नमक और आटे की मंडी के ताजा भाव में बदलने के करतब करने पड़ते हैं। चुनाचे छोटे-मंझोले अखबारों/पत्रिकाओं के बेरंग या बेनूर होेने से उसकी गरिमा या पठनीयता कम नहीं होती। और आम पढ़े-लिखे अभिजातों के दिलो-दिमाग में बैठा यह भरम कि छोटे अखबार सरकारी विज्ञापन पाने की गरज से सौ-पचास (फाइल काॅपी) की संख्या में छापे जाते हैं, यह कोरी कल्पना है। सरकारें (केन्द्र/प्रदेश) छोटे पत्र/पत्रिकाओं को विज्ञापन देने के नाम पर तमाम ऐसे नियमों को लादे है जिसे पूरा करने में छोट प्रकाशक/संपादक हलकान रहते हैं। सूचीबद्धता के नाम पर भ्रष्टाचार का, शोषण का पूरा कुनबा जनसम्पर्क विभाग में खा पीकर अघा रहा है। सूचीबद्ध छोटे अखबारों (साप्ताहिक/पाक्षिक मासिक) को भी साल भर में महज तीन विज्ञापन जारी किये जाते हैं, जिनकी अधिकतम दर 6 हजार है। डीएवीपी की दरों पर जारी किए जाने वाले विज्ञापनों की अपनी अलग दास्तां है। ऐसे हालातों में अभावों से प्रतिस्पर्धा करनेवाले भला पीडि़त और शोषितों की आवाज कैसे बनेंगे?
इससे भी खतरनाक हालात पत्रकार मान्यता के हैं। जहां मान्यता समिति का बरसों से कोई अता-पता नहीं, वहीं (लघु-मध्यम पत्रों के) सम्पादकों को पहचान-पत्र तक नहीं जारी किये जाते। मान्यता प्राप्त धमाकाधुनी पत्रकारों की एक लम्बी जमात (अखबारों/इं.चैनलों में छोड़कर) बरसों से स्वतंत्र पत्रकार के रूप में सरकारी सुविधाओं के साथ अर्थ हिंसा के धंधे में अपना ठीहा जमाए है? प्रेस क्लब और दो जंग खाएं 19वीं शताब्दी के संगठन और उनके सरगना इसकी गवाही हैं। वहीं छोटे अखबार वालों को खबरें इकट्ठी करने तक के हक नहीं दिये जाते? यहां एक बात प्रदेश की समाजवादी सरकार, उसके मुखिया और तमाम जनप्रतिनिधियों से कहनी तर्कसंगत होगी कि आये दिन बड़े अखबारों के झूठे और अनर्गल प्रचार से उन्हें परेशानी का सामना करना पड़ता है, तो क्यों नहीं छोटे-मंझोले अखबारों को बढ़ावा देने की पहल की जाती? यदि ऐसा किया जाये तो सरकारी विकास का सच झोपडि़यों से जंगल तक अपनी पहुंच बना सकेगा। और अन्त में बेटियों की बात, जो कल की मां हैं। नई पीढ़ी का भविष्य हैं। उनकी सुरक्षा के साथ सम्मान और शिक्षा पर बाकायदा जन जागरण अभियान चलाना होगा। दरअसल मानवीय संवेदना की सरस्वती लुप्त हो गई है, उसे तलाशना होगा और उसे पूर्वजों की गंगा, परम्पराओं की यमुना से मिलाना होगा। उस पर सामुहिक सरोकारों के सेतु का निर्माण करना होगा।
इन्हीं संकल्पों के साथ आभार। प्रणाम।
गो कि इन अखबारों/पत्रिकाओं में पसीना बेचकर अक्षरों को आलू, नमक और आटे की मंडी के ताजा भाव में बदलने के करतब करने पड़ते हैं। चुनाचे छोटे-मंझोले अखबारों/पत्रिकाओं के बेरंग या बेनूर होेने से उसकी गरिमा या पठनीयता कम नहीं होती। और आम पढ़े-लिखे अभिजातों के दिलो-दिमाग में बैठा यह भरम कि छोटे अखबार सरकारी विज्ञापन पाने की गरज से सौ-पचास (फाइल काॅपी) की संख्या में छापे जाते हैं, यह कोरी कल्पना है। सरकारें (केन्द्र/प्रदेश) छोटे पत्र/पत्रिकाओं को विज्ञापन देने के नाम पर तमाम ऐसे नियमों को लादे है जिसे पूरा करने में छोट प्रकाशक/संपादक हलकान रहते हैं। सूचीबद्धता के नाम पर भ्रष्टाचार का, शोषण का पूरा कुनबा जनसम्पर्क विभाग में खा पीकर अघा रहा है। सूचीबद्ध छोटे अखबारों (साप्ताहिक/पाक्षिक मासिक) को भी साल भर में महज तीन विज्ञापन जारी किये जाते हैं, जिनकी अधिकतम दर 6 हजार है। डीएवीपी की दरों पर जारी किए जाने वाले विज्ञापनों की अपनी अलग दास्तां है। ऐसे हालातों में अभावों से प्रतिस्पर्धा करनेवाले भला पीडि़त और शोषितों की आवाज कैसे बनेंगे?
इससे भी खतरनाक हालात पत्रकार मान्यता के हैं। जहां मान्यता समिति का बरसों से कोई अता-पता नहीं, वहीं (लघु-मध्यम पत्रों के) सम्पादकों को पहचान-पत्र तक नहीं जारी किये जाते। मान्यता प्राप्त धमाकाधुनी पत्रकारों की एक लम्बी जमात (अखबारों/इं.चैनलों में छोड़कर) बरसों से स्वतंत्र पत्रकार के रूप में सरकारी सुविधाओं के साथ अर्थ हिंसा के धंधे में अपना ठीहा जमाए है? प्रेस क्लब और दो जंग खाएं 19वीं शताब्दी के संगठन और उनके सरगना इसकी गवाही हैं। वहीं छोटे अखबार वालों को खबरें इकट्ठी करने तक के हक नहीं दिये जाते? यहां एक बात प्रदेश की समाजवादी सरकार, उसके मुखिया और तमाम जनप्रतिनिधियों से कहनी तर्कसंगत होगी कि आये दिन बड़े अखबारों के झूठे और अनर्गल प्रचार से उन्हें परेशानी का सामना करना पड़ता है, तो क्यों नहीं छोटे-मंझोले अखबारों को बढ़ावा देने की पहल की जाती? यदि ऐसा किया जाये तो सरकारी विकास का सच झोपडि़यों से जंगल तक अपनी पहुंच बना सकेगा। और अन्त में बेटियों की बात, जो कल की मां हैं। नई पीढ़ी का भविष्य हैं। उनकी सुरक्षा के साथ सम्मान और शिक्षा पर बाकायदा जन जागरण अभियान चलाना होगा। दरअसल मानवीय संवेदना की सरस्वती लुप्त हो गई है, उसे तलाशना होगा और उसे पूर्वजों की गंगा, परम्पराओं की यमुना से मिलाना होगा। उस पर सामुहिक सरोकारों के सेतु का निर्माण करना होगा।
इन्हीं संकल्पों के साथ आभार। प्रणाम।
जगर-मगर मीडिया के बीच लगा अखबार मेला
रविवार का दिन। राजधानी लखनऊ के राजपथ पर लगा ‘अखबार मेला’ का काफी बड़ा विज्ञापन पर्दा (बैनर) हर आने-जाने वाले को रोक रहा था। हर कोई जानना चाह रहा था, ‘यह कैसा मेला है?’ यहां अखबार बेचे जायेंगे?लखनऊ से छपने वाले सारे अखबार यहां मिलेंगे?क्या कोई राजनेता आ रहा है?कोई मनोरंजन का कार्यक्रम हैं?जितने लोग उतनी बातें। भीड़ बढ़ती जा रही थी। ‘अखबार मेला’ बैनर के पीछे लगे शामियाने के नीचे कई मेजों पर तमाम बहुरंगी अखबार/पत्रिकाएं करीने से सजे थे। उत्सुक भीड़ खासी थी। दरअसल तमाम छोटे-मंझोले, नये-पुराने अखबारों/पत्रिकाओं की प्रदर्शनी/मेला का पहला आयोजन राजधानी लखनऊ से छपनेवाली ‘प्रियंका’ हिन्दी पाक्षिक पत्र ने अपने कार्यालय ‘दिलकुशा प्लाजा’ के बाहर, विधानसभा मार्ग, हुसैंनगंज चैराहे पर अपने दो मित्र प्रकाशनों रेड फाईल’ हिन्दी पाक्षिक व ‘दिव्यता’ हिन्दी मासिक/साप्ताहिक के साथ किया था।
‘अखबार मेला’ की मुख्य अतिथि तेरह साल की कक्षा आठ में पढ़नेवाली नवयुग रेडियन्स स्कूल लखनऊ की छात्रा प्रतिष्ठा थी। यह विशेषता ‘बेटी कल की मां है-बेटी बचाओ’ सोंच पर आधारित थी। मेले में कोई मंच या मनोरंजक कार्यक्रम नहीं थे। साधारण से पंडाल के पीछे, ‘प्रियंका’ कार्यालय के बेसमेन्ट में ‘माता सरस्वती’ के चित्र को माल्यापर्ण कर प्रतिष्ठा ने मेले का शुभारम्भ किया। मेले का उद्घाटन दीप जलाकर पूर्वांचल के लोकप्रिय नेता, 25 करोड़ से अधिक भोजपुरी भाषियों के दुलारे ‘‘बाबा’ उप्र के पूर्वमंत्री व ‘प्रियंका’ हिन्दी पाक्षिक के संरक्षक पं0 हरिशंकर तिवारी ने किया। दीप जलाने में साथ रहे सरोजनीनगर लखनऊ के सपा विधायक पं0 शारदा प्रताप शुक्ला, पूर्वमंत्री उप्र डाॅ0 सुरजीत सिंह डंग व सामाजिक कार्यकर्ता, लेखक पद्यनाभ त्रिपाठी।
‘अखबार मेला’ में आये अतिथियों का स्वागत करते हुए मेला आयोजक राम प्रकाश वरमा बोले,
‘बचपन में सिखाते यही धाम सत्य है
यौवन में लगे अर्थ काम सत्य है
जब राम चले जाते तन की अयोध्या से
तब लोग बताते राम नाम सत्य है
इसी सत्य से मेरा सामाना रोज होता है। राम से मेरी मुलाकात हर कदम पर, हर प्रयास पर और मेरी कलम से लिखे गये हर अक्षर में होती है। सुख में, दुख में मेरे साथ राम ही होते हैं। मेरे राम आप हो। आप ही मेरे प्रेरक हो, पालक हो और पथ प्रदर्शक हो। सखा हो, सगे भाई हो। मैं नहीं जानता ईश्वर को और जानना भी नहीं चाहता। मेरे लिए आदमी यानी आप ही ईश्वर हो। आपको प्रणाम। आपकी प्रेरणा से ही ‘अखबार मेला’ का ख्याल जब मेरे मन में जन्मा तो मैंने आपसे ही इसकी चर्चा की, आपसे इसके आयोजन की सलाह ली और आशीर्वाद की अभिलाषा भी। मेरे साथ मेरे साथी श्री रिजवान चंचल जी, श्री प्रदीप श्रीवास्तव जी और आप सब ‘अखबार मेला’ में मौजूद हैं। खासकर पूर्वांचल की धरती से आये पत्रकारों की मौजूदगी ने मुझे बेहद हौसलामन्द किया है। दरअसल ‘अखबार मेला’ अपने लिए अपनों से संघर्ष है। अपनी पहचान के लिए अपनों के बीच पर्व है। यह ताली बजाऊ या हल्ला-गुल्ला मचाने वाला कार्यक्रम नहीं है बल्कि जगर-मगर करते मीडिया के बीच छोटे-मंझोले अखबारों/पत्रिकाओं और आदमी के बीच संवाद कायम करने की पहल है। इसके अलावा देश की आधी आबादी जो बदलाव का परचम थामे बाजार की साजिशों का शिकार हो रही है के लिए आवाज बनने की कोशिश है। सो ‘बेटी कल की मां’ है के सच को अक्षरों का आन्दोलन बनाने का प्रयास है। बिलाशक यह रास्ता पथरीला है। इसी रास्ते पर गांधी, गणेश शंकर विद्यार्थी और बाल गंगाधार तिलक चले थे। यही रास्ता सरस्वती पुत्र प्रेमचन्द्र ने ‘ईदगाह’ जाने के लिए चुना था। नाम तो बहुत हैं हमारे पुरखों के मगर उनकी विरासत को चार कदम आपके साथ चलकर संजोये रखने की एक छोटी सी कोशिश भर है ‘अखबार मेला’।समय और सम्माननीयों का अदब करते हुए इतना ही कहूंगा-
बैठ जाता हूँ खाक पर अक्सर,
अपनी औकात अच्छी लगती है।’
मुख्य अतिथि प्रतिष्ठा ने बेटी बचाओं पर गंभीर चिंता व्यक्ति की, ‘बेटियों को दान करके अपना परलोक सुधारने के सनातन चलन ने आज बेटियों को महज असुरक्षा के वातावरण में जीने को ही नहीं मजबूर किया है, वरन् माता-पिता के वंश से भी निकाल फेंका है। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी बेटी के पिता भले ही नहीं थे लेकिन उन्होंने स्वर्गीय इंदिरा गांधी को अपनी दत्तकपुत्री मानकर अपना ‘गांधी’ नाम उन्हें दिया था। आज भी
गांधी वंश का नाम बड़े अदब से भारत में ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया में लिया जाता है। बेटियों को दुलाराएंगे तो देश को बा... मदर टेरेसा और इंदिरा गांधी के सैकड़ों अवतार मिलेंगे।’
‘प्रियंका’ परिवार के संरक्षक पं0 हरिशंकर तिवारी पूर्व मंत्री ने अखबार के सम्पादक के पिछले तीस वर्षाें के संघर्षाें की चर्चा के साथ अखबार और उसके सम्पादक राम प्रकाश वरमा को ‘अखबार मेला’ आयोजन पर बधाई देते हुए कहा, ‘ऐसे अद्भुद आयोजन तो बड़े अखबार के लोग भी नहीं सोंच सके। ‘प्रियंका’ के ‘अखबार मेला’ अंक का लोकार्पण करते हुए श्री तिवारी जी बोले, ‘इसी तरह इनके अखबार ‘प्रियंका’ में भी एकदम अलग खबरें पढ़ने को मिलती हैं, जो इन्हें व इनके अखबार को तमाम बड़े-छोटे-मंझोले अखबारों से अलग खड़ा करता हैं। आप इसी अखबार में पढ़ेंगे तो कई खबरें ऐसी होंगी जो पिछले पन्द्रह दिनों में आपने कहीं नहीं पढ़ी होंगी’ ‘अखबार मेला’ में लगी तमाम अखबारों की प्रदर्शनी देखकर पंडित जी बेहद आचर्य चकित हुए। मेले में मौजूद सरोजनी नगर, लखनऊ के सपा विधायक पं0 शारदा प्रताप शुक्ला ने ‘अख़बार मेला’ के आयोजन को सराहते हुए कहा, ‘पुस्तक मेला सुनाा था, साहित्य मेला सुना था, लिट्रेरी कार्निवाल सुना था, लेकिन ‘अख़बार मेला’ पहली बार सुना, देखा और गुना। गुना यों कि इसके आयोजक मेरे मित्र ही नहीं हैं वरन ‘प्रियंका’ समाचार पत्र को निकालने के लिए नये-नये प्रयोग करते रहे, लड़ाइयाँ लड़ते रहे। आज भी मेला की मुख्य अतिथि बेटी है। इसके अलावा आयोजन का निमंत्रण भी अखबार के पन्नों पर ही छपा हैं एक-दो पन्नों में नहीं साढ़े चार पन्नों में, मैंने आज तक ऐसा कभी नहीं देखा, पढ़ा। राम प्रकाश बधाई के पात्र हैं।
डाॅ0 सुरजीत सिंह डंग ‘अखबार मेला’ देखने के बाद और बिटिया प्रतिष्ठा को मुख्य अतिथि की प्रतिष्ठा दिये जाने से बेहद भावुक शब्दों में बेटियों को शिक्षित किये जाने पर जोर देते हुए बोले, ‘हमें नकल करने की आदत है, इससे परहेज करना होगा। नकल करके पास होने वाला जब शिक्षक बन जाता है तो वह नई पीढ़ी को क्या शिक्षा देगा? आज दुर्भाग्य से हो ऐसा ही रहा हैं हमें अपनी बेटियों को बेटी समझने की ओर कदम बढ़ाने होंगे। प्रतिष्ठा बिटिया ने जो कहा है उस पर अमल करने का संकल्प लेना होगा।
‘अखबार मेला’ में आये अतिथियों, पत्रकारों व पाठकों को लेखक, विचारक व सामाजिक कार्यकर्ता पं0 पद्मनाथ त्रिपाठी, राष्ट्रपति से पुरूस्कृत शिक्षक पं0 ओम प्रकाश त्रिपाठी, भारतीय राष्ट्रीय पत्रकार महासंघ के राष्ट्रीय संयोजक डाॅ0 भगवान प्रसाद उपाध्याय, सोनभद्र से प्रियंका परिवार के वरिष्ठ सदस्य/पत्रकार मिथिलेश प्रसाद द्विवेदी, कांग्रेस नेता व प्रियंका परिवार के सदस्य राजेश द्विवेदी ने भी सम्बोधित किया। रायबरेली, उन्नाव, कानपुर, बाराबंकी, हमीरपुर, ललितपुर, बांदा, बनारस, इलाहाबाद, सुल्तानपुर, आजमगढ़, गोरखपुर, सीतापुर, मऊ, फैजाबाद, जौनपुर व राजधानी लखनऊ के पत्रकारों ने व सोनभद्र के वरिष्ठ पत्रकार श्री मिथिलेश द्विवेदी के नेतृत्व में सोनभद्र से 40 पत्र-पत्रिकाओं के तमाम संपादकों- प्रकाशकों ने मेले में सक्रिय भागीदारी निभाई। मेले में लगे अखबार-पत्रिकाओं में जहां हिंदी ‘ब्लिट्ज’ के पुराने अंक थे वहीं उनके संवाददाता रहे प्रदीप कपूर ने अपनी लिखी खबर भी उन्हीं अंकों में खोज ली और उसकी फोटो आयोजक के साथ अपने कैमरे में कैद कर ली। मेले में ‘‘वाह क्या बात’, ‘न्यूज साइट’ व कई अन्य पत्रिकाओं का विमोचन भी अतिथियों ने किया। सुदूर दक्षिण भारत के केरल, महाराष्ट्र, गुजरात, मध्य प्रदेश, राजस्थान, पंजाब, बिहार व उप्र के 1870 पत्र-पत्रिकाओं को देखकर पाठक, पत्रकार, नेता अभिभूत थे।
‘अखबार मेला’ की मुख्य अतिथि तेरह साल की कक्षा आठ में पढ़नेवाली नवयुग रेडियन्स स्कूल लखनऊ की छात्रा प्रतिष्ठा थी। यह विशेषता ‘बेटी कल की मां है-बेटी बचाओ’ सोंच पर आधारित थी। मेले में कोई मंच या मनोरंजक कार्यक्रम नहीं थे। साधारण से पंडाल के पीछे, ‘प्रियंका’ कार्यालय के बेसमेन्ट में ‘माता सरस्वती’ के चित्र को माल्यापर्ण कर प्रतिष्ठा ने मेले का शुभारम्भ किया। मेले का उद्घाटन दीप जलाकर पूर्वांचल के लोकप्रिय नेता, 25 करोड़ से अधिक भोजपुरी भाषियों के दुलारे ‘‘बाबा’ उप्र के पूर्वमंत्री व ‘प्रियंका’ हिन्दी पाक्षिक के संरक्षक पं0 हरिशंकर तिवारी ने किया। दीप जलाने में साथ रहे सरोजनीनगर लखनऊ के सपा विधायक पं0 शारदा प्रताप शुक्ला, पूर्वमंत्री उप्र डाॅ0 सुरजीत सिंह डंग व सामाजिक कार्यकर्ता, लेखक पद्यनाभ त्रिपाठी।
‘अखबार मेला’ में आये अतिथियों का स्वागत करते हुए मेला आयोजक राम प्रकाश वरमा बोले,
‘बचपन में सिखाते यही धाम सत्य है
यौवन में लगे अर्थ काम सत्य है
जब राम चले जाते तन की अयोध्या से
तब लोग बताते राम नाम सत्य है
इसी सत्य से मेरा सामाना रोज होता है। राम से मेरी मुलाकात हर कदम पर, हर प्रयास पर और मेरी कलम से लिखे गये हर अक्षर में होती है। सुख में, दुख में मेरे साथ राम ही होते हैं। मेरे राम आप हो। आप ही मेरे प्रेरक हो, पालक हो और पथ प्रदर्शक हो। सखा हो, सगे भाई हो। मैं नहीं जानता ईश्वर को और जानना भी नहीं चाहता। मेरे लिए आदमी यानी आप ही ईश्वर हो। आपको प्रणाम। आपकी प्रेरणा से ही ‘अखबार मेला’ का ख्याल जब मेरे मन में जन्मा तो मैंने आपसे ही इसकी चर्चा की, आपसे इसके आयोजन की सलाह ली और आशीर्वाद की अभिलाषा भी। मेरे साथ मेरे साथी श्री रिजवान चंचल जी, श्री प्रदीप श्रीवास्तव जी और आप सब ‘अखबार मेला’ में मौजूद हैं। खासकर पूर्वांचल की धरती से आये पत्रकारों की मौजूदगी ने मुझे बेहद हौसलामन्द किया है। दरअसल ‘अखबार मेला’ अपने लिए अपनों से संघर्ष है। अपनी पहचान के लिए अपनों के बीच पर्व है। यह ताली बजाऊ या हल्ला-गुल्ला मचाने वाला कार्यक्रम नहीं है बल्कि जगर-मगर करते मीडिया के बीच छोटे-मंझोले अखबारों/पत्रिकाओं और आदमी के बीच संवाद कायम करने की पहल है। इसके अलावा देश की आधी आबादी जो बदलाव का परचम थामे बाजार की साजिशों का शिकार हो रही है के लिए आवाज बनने की कोशिश है। सो ‘बेटी कल की मां’ है के सच को अक्षरों का आन्दोलन बनाने का प्रयास है। बिलाशक यह रास्ता पथरीला है। इसी रास्ते पर गांधी, गणेश शंकर विद्यार्थी और बाल गंगाधार तिलक चले थे। यही रास्ता सरस्वती पुत्र प्रेमचन्द्र ने ‘ईदगाह’ जाने के लिए चुना था। नाम तो बहुत हैं हमारे पुरखों के मगर उनकी विरासत को चार कदम आपके साथ चलकर संजोये रखने की एक छोटी सी कोशिश भर है ‘अखबार मेला’।समय और सम्माननीयों का अदब करते हुए इतना ही कहूंगा-
बैठ जाता हूँ खाक पर अक्सर,
अपनी औकात अच्छी लगती है।’
मुख्य अतिथि प्रतिष्ठा ने बेटी बचाओं पर गंभीर चिंता व्यक्ति की, ‘बेटियों को दान करके अपना परलोक सुधारने के सनातन चलन ने आज बेटियों को महज असुरक्षा के वातावरण में जीने को ही नहीं मजबूर किया है, वरन् माता-पिता के वंश से भी निकाल फेंका है। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी बेटी के पिता भले ही नहीं थे लेकिन उन्होंने स्वर्गीय इंदिरा गांधी को अपनी दत्तकपुत्री मानकर अपना ‘गांधी’ नाम उन्हें दिया था। आज भी
गांधी वंश का नाम बड़े अदब से भारत में ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया में लिया जाता है। बेटियों को दुलाराएंगे तो देश को बा... मदर टेरेसा और इंदिरा गांधी के सैकड़ों अवतार मिलेंगे।’
‘प्रियंका’ परिवार के संरक्षक पं0 हरिशंकर तिवारी पूर्व मंत्री ने अखबार के सम्पादक के पिछले तीस वर्षाें के संघर्षाें की चर्चा के साथ अखबार और उसके सम्पादक राम प्रकाश वरमा को ‘अखबार मेला’ आयोजन पर बधाई देते हुए कहा, ‘ऐसे अद्भुद आयोजन तो बड़े अखबार के लोग भी नहीं सोंच सके। ‘प्रियंका’ के ‘अखबार मेला’ अंक का लोकार्पण करते हुए श्री तिवारी जी बोले, ‘इसी तरह इनके अखबार ‘प्रियंका’ में भी एकदम अलग खबरें पढ़ने को मिलती हैं, जो इन्हें व इनके अखबार को तमाम बड़े-छोटे-मंझोले अखबारों से अलग खड़ा करता हैं। आप इसी अखबार में पढ़ेंगे तो कई खबरें ऐसी होंगी जो पिछले पन्द्रह दिनों में आपने कहीं नहीं पढ़ी होंगी’ ‘अखबार मेला’ में लगी तमाम अखबारों की प्रदर्शनी देखकर पंडित जी बेहद आचर्य चकित हुए। मेले में मौजूद सरोजनी नगर, लखनऊ के सपा विधायक पं0 शारदा प्रताप शुक्ला ने ‘अख़बार मेला’ के आयोजन को सराहते हुए कहा, ‘पुस्तक मेला सुनाा था, साहित्य मेला सुना था, लिट्रेरी कार्निवाल सुना था, लेकिन ‘अख़बार मेला’ पहली बार सुना, देखा और गुना। गुना यों कि इसके आयोजक मेरे मित्र ही नहीं हैं वरन ‘प्रियंका’ समाचार पत्र को निकालने के लिए नये-नये प्रयोग करते रहे, लड़ाइयाँ लड़ते रहे। आज भी मेला की मुख्य अतिथि बेटी है। इसके अलावा आयोजन का निमंत्रण भी अखबार के पन्नों पर ही छपा हैं एक-दो पन्नों में नहीं साढ़े चार पन्नों में, मैंने आज तक ऐसा कभी नहीं देखा, पढ़ा। राम प्रकाश बधाई के पात्र हैं।
डाॅ0 सुरजीत सिंह डंग ‘अखबार मेला’ देखने के बाद और बिटिया प्रतिष्ठा को मुख्य अतिथि की प्रतिष्ठा दिये जाने से बेहद भावुक शब्दों में बेटियों को शिक्षित किये जाने पर जोर देते हुए बोले, ‘हमें नकल करने की आदत है, इससे परहेज करना होगा। नकल करके पास होने वाला जब शिक्षक बन जाता है तो वह नई पीढ़ी को क्या शिक्षा देगा? आज दुर्भाग्य से हो ऐसा ही रहा हैं हमें अपनी बेटियों को बेटी समझने की ओर कदम बढ़ाने होंगे। प्रतिष्ठा बिटिया ने जो कहा है उस पर अमल करने का संकल्प लेना होगा।
‘अखबार मेला’ में आये अतिथियों, पत्रकारों व पाठकों को लेखक, विचारक व सामाजिक कार्यकर्ता पं0 पद्मनाथ त्रिपाठी, राष्ट्रपति से पुरूस्कृत शिक्षक पं0 ओम प्रकाश त्रिपाठी, भारतीय राष्ट्रीय पत्रकार महासंघ के राष्ट्रीय संयोजक डाॅ0 भगवान प्रसाद उपाध्याय, सोनभद्र से प्रियंका परिवार के वरिष्ठ सदस्य/पत्रकार मिथिलेश प्रसाद द्विवेदी, कांग्रेस नेता व प्रियंका परिवार के सदस्य राजेश द्विवेदी ने भी सम्बोधित किया। रायबरेली, उन्नाव, कानपुर, बाराबंकी, हमीरपुर, ललितपुर, बांदा, बनारस, इलाहाबाद, सुल्तानपुर, आजमगढ़, गोरखपुर, सीतापुर, मऊ, फैजाबाद, जौनपुर व राजधानी लखनऊ के पत्रकारों ने व सोनभद्र के वरिष्ठ पत्रकार श्री मिथिलेश द्विवेदी के नेतृत्व में सोनभद्र से 40 पत्र-पत्रिकाओं के तमाम संपादकों- प्रकाशकों ने मेले में सक्रिय भागीदारी निभाई। मेले में लगे अखबार-पत्रिकाओं में जहां हिंदी ‘ब्लिट्ज’ के पुराने अंक थे वहीं उनके संवाददाता रहे प्रदीप कपूर ने अपनी लिखी खबर भी उन्हीं अंकों में खोज ली और उसकी फोटो आयोजक के साथ अपने कैमरे में कैद कर ली। मेले में ‘‘वाह क्या बात’, ‘न्यूज साइट’ व कई अन्य पत्रिकाओं का विमोचन भी अतिथियों ने किया। सुदूर दक्षिण भारत के केरल, महाराष्ट्र, गुजरात, मध्य प्रदेश, राजस्थान, पंजाब, बिहार व उप्र के 1870 पत्र-पत्रिकाओं को देखकर पाठक, पत्रकार, नेता अभिभूत थे।
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