Tuesday, July 10, 2012

जल का जलजला चरणामृत भी फिल्टर्ड ही पीएं


पेयजल के प्रदूषण से एक बहुत बड़ी आबादी प्रभावित होती रहती है, इसलिए पेयजल को लेकर आम लोगों में चेतना भरने की भारी जरूरत है। प्रदूषित पानी के पीने से केवल डायरिया, डिसेंट्री, टायफायड, हैजा, पीलिया ही नहीं हो रहे हैं, इससे बाल भी झड़ रहे हैं, दांत भी खराब हो रहे हैं। 2010 में हुए सर्वे में देश के सभी मेट्रोपोलिटन सिटी के पानी को रोग फैलाने वाला पाया गया। इसलिए सुपरबग पर माथा पच्ची करने के साथ-साथ पानी को शुद्ध करने के आसान तरीकों पर ध्यान दें तो बेहतर होगा। सुपरबग उस बैक्टीरिया को कहते हैं जिस पर सभी एंटीबायोटिक निष्प्रभावी हो जाते हैं।
पूजा -अर्चना में जल - आचमन सभी प्रकार के कर्माें अर्थात सद्कर्म एवं निष्काम कर्म का अति महत्वपूर्ण अंग है। धार्मिक और अरोग्यशास्त्र की दृष्टि से आचमन का असाधारण महत्व है। एक साथ लोटा या गिलास से गटागट पानी पीने की अपेक्षा चम्मच से थोड़ा-थोड़ा पानी पीते रहने से वह व्याधिनाशक तथा लाभदायक होता है। ‘मनुस्मृति’ में भी कहा गया है, सोकर उठने पर, भूख लगने पर, भोजन के बाद, छींक आने पर, झूठ बोलने पर व अध्ययन करने के बाद आचमन अवश्य करें। यह आचमन यदि अशुद्ध पानी से किया गया तो पाचनतंत्र को बिगाड़ देगा। इसलिए पूजा-अर्चना में भी उबले हुए या फिल्टर्ड पानी का ही इस्तेमाल करें।
    सबसे पहले शुरूआत चरणामृत से करें। मंदिरों में मुक्त हस्त से दिया जाने वाला यह ‘आध्यात्मिक’ पानी फिल्टर से छना हुआ है या नहीं, यह भी पता करें। अगर नहीं है तो श्रद्धा अपनी जगह है। संक्रमित चरणामृत भी पेट में गया तो पूजा के पहले फल के रूप में ये बीमारियां भी मिलेंगी। हनुमान चालीसा के हर छंद में सेहत के छिपे राज का दर्शन करनेवाले, पूजा और अध्यात्म को दवा से कम नहीं समझने वाले हार्ट केयर फाउंडेशन आॅफ इंडिया के अध्यक्ष पद्मश्री डाॅ. के.के. अग्रवाल अगर यह बात कह रहे हों तो फिर स्थिति की गंभीरता समझनी चाहिए। निश्चित रूप से उनकी इस बात को धर्मविरूद्ध नहीं कह सकते। लाखों भक्तों को चरणामृत बांटने वाले मंदिर प्रबंधन भी अगर इस बात की गंभीरता को समझें तो फिर क्या कहने। सेहत के लिए ही नहीं, शास्त्रों के अनुसार पूजा में भी शुद्धता का उतना ही महत्व बताया गया हैं। पूजा में अशुद्धि हो जाए तो देवता भी कुपित हो जाते हैं। पूजा में शुद्धता की पूरी अवधारणा सेहत की ही अवधारणा है। घर में तो पानी को उबाल कर पी सकते हैं। लेकिन कोई चरणामृत उबाल कर पीने की सलाह दे तो हास्यास्पद ही लगेगा। पानी को फिल्टर करके या उबाल कर ही पीएं।
    गोलगप्पा (उसे फोकचा या पानी पूरी भी कहते हैं) का पानी भी खतरे से खाली नहीं हैं। खासकर महिलाएं तो फोकचा पानी ऐसे ही पीती हैं जैसे वह अमृत ही हो। सच पूछिए तो पानी पूरी मुंह से पानी गिराने वाली वह ‘बला’ है जिससे मुंह मोड़ लेना अच्छे-अच्छों के बूते की बात नहीं होती। लजीज पानी में फोकचे वाले का बार-बार डूबता हुआ हांथ वहां कौन से और कितने बैक्टीरिया छोड़ रहा है, इस पर किसी की नजर कहां पड़ती है। प्रदूषित पानी के पेट में जाने का यह एक और खतरनाक स्रोत है। वह है गर्मी में रोज लाखों लोगों के गले को तर करने के काम में आने वाले बर्फ की बड़ी-बड़ी सिल्ली। पता नहीं किस तरह के पानी से बनाई जाती हैं ये सिल्लियां। बर्फ की इन सिल्लियों पर तो तत्काल रोक लगनी चाहिए।
सुरक्षित है फिल्टर्ड वाॅटर पीना किंतु....!
शुरू-शुरू में जो केंडल वाला फिल्टर होता था वह पानी को सिर्फ छान सकता था। एकदम शुद्ध नहीं बना पाता था लेकिन अब जो अत्याधुनिक फिल्टर हैं उसे ‘प्यूरीफायर’ कहते हैं यानी उससे होकर जो पानी निकलता है वह पूरी तरह से शुद्ध होता हैं। यानी पानी तमाम बैक्टीरिया, वायरस और अन्य अशुद्धियों से मुक्त। ‘आरओ’ वाले फिल्टर भी बेहद प्रभावी माने जा रहे हैं। जल जनित बीमारियों के सभी विशेषज्ञों ने भी कहा है कि स्टैंडर्ड प्यूरीफायर हो तो उसका पानी एकदम सुरक्षित है। लेकिन साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि बाजार में दोयम दर्जे के फिल्टर भी मिल रहे हैं, उसके पानी के सुरक्षित होने की गारंटी नहीं है।
कैसे अशुद्ध होते हैं पेयजल:
पहले पानी जब अधिक हो जाता है तो वह पेयजल को प्रदूषित करने का कारण बनता है। जैसे बाढ़ आ गई, खूब बारिश हो गई। शहर के नाले भर गए। ऐेसे में स्वच्छ पानी के पाइप में लीकेज के जरिए प्रदूषित पानी आ जाता है। सीवेज का पानी भी पेयजल में मिल जाता हैं। ये प्रदूषित पानी कुंए में जाकर मिल जाता है। यदि पीने के पानी में चूहें ने पेशाब कर दिया तो लेप्टोसपायरिसिस बीमारी फैलने का खतरा है।
पानी को उबालना जरूरी:
सवाल है जिनके पास कीमती फिल्टर खरीदने के पैसे न हों, वे क्या करें? उन्हें भी निराश होने की जरूरत नहीं। एक आग है जो सबके पास है। वह पानी के अंदर के रोगों के सभी कीटाणुओं का यूं नाश कर देगा बशर्तें आप पीने वाले पानी को अच्छी तरह उबाल लें सिर्फ गर्म कर देने से काम नहीं चलेगा। डाॅक्टरों का तो यहां तक कहना है कि कचरे के पानी को भी अच्छी तरह उबाल कर फिर ठंडा कर पीएं तो कोई नुकसान नहीं होगा। सीधा फंडा है फिल्टर वाटर नहीं है तो उसे उबालों तभी पीयों। उबालने का साधन उपलब्ध न हो तो पानी नहीं पीना बेहतर है। पानी से भीगी सब्जी को कभी कच्ची नहीं खाएं, उसे उबालकर, पकाकर ही खाएं। चाय-काफी भी गर्म ही पीनी चाहिए। बाजार में मिलने वाले गन्ने के रस या कटे फल में भी पानी है, उनसे भी परहेज करें।
क्या हैं जल जनित बीमारियां:
डायरिया, हैजा (काॅलरा), पेचिस (डिसेंट्री) पीलिया (हेपेटाइटिस ए एवं ई), टायफाइड, त्वचा रोग, बाल झड़ने का रोग, दांत खराब होने का रोग, पेट में पनपेंगे अमीबा एवं गियार्डिया जैसे कीटाणु, रोगों से लड़ने की क्षमता घटेगी।
    (प्रियंका ब्लाग स्पाट से)





पर्यावरणीय हिंसा है खुले में शौच

देश में 95 करोड़ मोबाइल हैं। गांव-गांव बरफ के गोले और टिकुल-बिंदी बेचने वाले फेरी दुकानदार उनके रिचार्ज कूपन बेच रहे हैं। ऐसे ही छोटे परचूनिए (जनरलमर्चेन्ट्स) बैटरी, इन्वर्टर, जेनरेटर से मोबाइल रिचार्ज करने का बड़ा व्यापार खड़ा कर चुके हैं। इन गंवई दुकानों में सेनेटरी नेपकीन से लेकर परफ्यूम कैन तक आसानी से उपलब्ध हैं। इन्हीं गांवों में शौचालय नहीं है। गांव की औरतें खुले में शौच जाते हुए यौन हिंसा का शिकार हो रही हैं। इससे भी आगे देश की आर्थिक राजधानी मुंबई की साठ फीसदी महिलाएं शौचालय के बगैर काम चला रही हैं। उप्र की राजधानी लखनऊ में महिलाओं की तो छोडि़ये पुरूषों के लिए अपेक्षा के अनुरूप शौचालय नहीं है। अमौसी हवाई अड्डे से लेकर निशातगंज (नेशनल हाइवे नं0 25) के बीच लगभग 22 किलोमीटर की दूरी पर महज चार-पांच सार्वजनिक शौचालय हैं। वे भी रेलवे-बस स्टेशन, मिलाकर।
    केन्द्रीय मंत्री जयराम रमेश ने पिछले दिनों घमरा में पर्यावरण हितैषी शौचालय जनता को सौंपते हुए कहा था, कितने शर्म की बात है कि हम अग्नि मिसाइल दाग सकते हैं, लेकिन साफ-सफाई की समस्या दूर नहीं कर पाते। आज भी देश की एक बड़ी आबादी को हम शौचालय नहीं दे पाएं हैं। देश की साठ फीसदी औरतों के लिए शौचालय की व्यवस्था नहीं हो पाई है। उन्होंने पर्यावरण मित्र शौचालय का नाम ‘बापू’ रखने का सुझाव दिया। क्योंकि यह महात्मा गांधी के स्वच्छता अभियान का ही हिस्सा है। शौचालय सुलभ कराने में पहला नाम बिंदेश्वरी पाठक का लिया जाता है। उनके नक्शेकदम पर कई स्वयंसेवी संगठन इस ओर सक्रिय हुए हैं। जिनके सक्रिय सहयोग से मोबाइल शौचालय भी उपलब्ध कराये जा रहे हैं। इसी मुहिम में शामिल नेशनल इंस्टीट्यूट आॅफ डिजाइन (एनडीआई) के स्नातकों राजेश ठाकरे व ट्राॅय बसंत सी ने ‘गुड मार्निंग मुंबई’ नाम से एक एनीमेटेड (रेखाचित्र) फिल्म बनाई है। फिल्म में मुंबई की झोपड़पट्टियों में शौचालय की आवश्यकता पर बल देते हुए उसके नुकसान से सावधान किया गया है। इसके साथ ही उन क्षेत्रों में शौचालय कैसे उपलब्ध कराये जा सकते हैं, भी दिखाया गया है। हालांकि इस ओर पहले से ही 35 संगठन सक्रिय हैं, जो खासतौर से झोपड़पट्टियों में सार्वजनिक शौचालय व मोबाइल शौचालय उपलब्ध कराने में कामयाब भी हुए हैं। इन्होंने ही मुंबई में 109 शौचालयों के बंद/खराब होने की रिपोर्ट भी दी थी, जिसके कारण इसी 6 जून को 500 शौचालयों के 37 करोड़ रूपयों में बनाये जाने की अनुमति मिली।
    सामाजिक कार्यकर्ता प्रोमिता बोहरा ने सार्वजनिक शौचालय की समस्या पर मुंबई में काम करते हुए देखा कि औरतों को सार्वजनिक शौचालय के इस्तेमाल का विरोध उनके ही मर्द करने में आगे हैं। उनके लिए बने अलग शौचालयों का लगातार इस्तेमाल भी मर्द ही करते हैं। रात में इन शौचालयों में ताले लगा दिये जाते थे। पेशाबघरों की तो और दुर्दशा हैं, पैसा देने के बाद भी उन्हें इसके इस्तेमाल की इजाजत नहीं होती। पानी तक बंद कर दिया जाता था। इसी समस्या पर उन्होंने भी एक वृत्त चित्र बनाया है। मानवाधिकार और राइट टू पी (शौचालय का अधिकार) के लिए सक्रिय स्वयं सेवी संगठन सरकार की पेयजल और शौचालय की दोहरी नीतियों के मुखालिफ मुंबई में जोर-शोर से सक्रिय है। ये संगठन झोपड़पट्टियों में सफाई, पानी व शौचालय के लिए बाकायदा अभियान चलाकर लोगों को इससे जोड़ रहे हैं। गौरतलब है महाराष्ट्र सरकार ने कानून बनाया हुआ है कि 2000 के बाद मुंबई में झोपड़पट्टी में घर बनाने वालों को कोई सुविधा सरकार द्वारा नहीं दी जाएगी। इस तारीख के बाद से मुंबई की झोपड़पट्टियों में आये लगभग 12 लाख लोग रह रहे हैं। हालांकि पिछले महीने सरकार की 12वीं पंचवर्षीय योजना में 36 हजार करोड़ का प्रावद्दान ग्रामीण क्षेत्रों में शौचालयों के निर्माण के लिए किया गया है।
    लखनऊ महानगर समेत समूचे सूबे में भी इस अहम् आवश्यकता पर न कोई सोंच है, न कोई नीति। आदमी की नैसर्गिंक आवश्यकता के लिए कोई स्वयंसेवी संगठन राजनैतिक दल भी आगे नहीं आता, जबकि रेलवे लाइन के किनारे, शहर के रिहाइशी इलाकों के नालें-नालियों के किनारे, पार्कों व खुले मैदानों में ‘गुड मार्निंग ओपेन टायलेट’ देखने को रोज मिलते हैं। इसे पर्यावरणीय हिंसा कहा जा सकता है। क्या भ्रष्टाचार, कालाधन के खिलाफ हल्ला मचाने वालों में कोई इस ‘कार्बनडाइआक्साइड उत्सर्जन’ से होने वाली बीमारियों के मुखालिफ मुहिम छेड़ने के लिए आगे आयेगा? ( प्रियंका ब्लाग स्पाट डाॅट काॅम में राम वरमा)

साफ-साफ लिखा करो डाॅक्टर साहब

लखनऊ। डाक्टरों की लापरवाही और उनके पैसा कमाऊ होने का हल्ला ‘सत्यमेव जयते’ से लेकर अखबारों व वेबपोर्टलों पर जारी है। जाहिर है, डाॅक्टर साहबान नाराज भी हैं। बाकायदा धमकियां भी दे रहे हैं। गुस्ताखी माफ हो! डाॅक्टर साहब आपकी लिखावट (राइटिंग) भी कम खतरनाक नहीं है।
    आपके लिखे पर्चों को कई बार फार्मेसिस्ट भी नहीं पढ़ पाते, फिर उन्हें पढ़ने के लिए मरीज को मेडिकल कालेज में दाखिला लेना पड़ेगा? यह लंतरानी या महज आरोप नहीं है। कुछ समय पहले नोएडा के स्प्रिंग मेडोज हास्पिटल में डाॅक्टर साहब के लिखे दवाई के पर्चे के फार्मेसिस्टांे द्वारा पढ़े न जा सकने के कारण एक तीन साल के बच्चे की जान चली गई थी। उस बच्चे के परिवारीजनों ने राष्ट्रीय उपभोक्ता फोरम में वाद दायर किया था जिससे बतौर इंसाफ परिवारीजनों को 17.5 लाख रूपये का मुआवजा मिला था।
    भारत में हर दिन डाॅक्टरों द्वारा लगभग 40 लाख से अधिक रोगियों को दवा के ऐसे पर्चे लिखे जाते हैं जिन्हें फार्मेसिस्टों द्वारा पढ़े जाने में दिक्कते आती हैं। हालांकि इससे मरीजों को कोई नुकसान पहुंचा या कोई मृत्यु हुई की खबर की सही जानकारी नहीं है। अमेरिका में डाॅक्टरों की खराब लिखावट से लगभग सात हजार लोग हर साल मरते हैं और 1.5 मिलियन लोग गलत दवाएं खाकर रिएक्शन का शिकार होते हैं। मुंबई में डेढ़ महीना पहले क्वालिटी कौंसिल आॅफ इंडिया और फोरम फाॅर इनहैशमेंट आॅफ क्वालिटी इन हेल्थ केयर के संयुक्त प्रयास से हुई एक बैठक में डाक्टरों की खराब लिखावट पर चिंता व्यक्त की गई। इस बैठक में मेडिकल रिप्रसेन्टेटिव, मेडिकल एसोसिएशन व कई स्वयं सेवी संस्थाओं (एनजीओ) ने भाग लिया।
    इसमें आम राय हुई कि एक अभियान चलाकर अस्पतालों व डाॅक्टरों से कहा जाय कि डाॅक्टर रोगियों को दवाई के पर्चे अंग्रेजी के ‘कैपिटल लेटर्स’ में लिखें। यह लिखावट साफ होगी और हर कोई आसानी से पढ़ सकेगा।
    इसी तरह दवा की कम्पनियाँ अपनी दवाईयों की पैकिंग में उपयोग संबंधी निर्देश (इंस्ट्रक्शन्स फाॅर यूज) के पर्चे रखते हैं। वे इतने छोटी लिखावट (स्माल फाॅन्ट) में छपे होते हैं कि उन्हें आतिशी शीशे (मैग्नीफाइंग ग्लास) से भी नहीं पढ़ा जा सकता। बुजुर्गों के लिए तो वह पर्चा पढ़ना नामुमकिन है।
    ऐसे हालात में नागरिकों को भी अस्पतालों में व प्राइवेट प्रैक्टिस करने वाले चिकित्सकों से अपील करनी होगी कि वे रोगियों को जो ‘नुस्खा’ लिखें वह ‘कैपिटल लेटर्स’ में लिखें तो डाॅक्टर साहबान क्या इस खबर को पढ़कर भी नाराज होंगे? या साफ-साफ लिखना शुरू कर देंगे।


मेरे परिवारीजन हंै लखनऊवासी

कांग्रेस में शामिल डी.के. शर्मा ने कहा-
लखनऊ। जनसेवी और लोकप्रिय श्री दिनेश शर्मा सेवानिवृत महाप्रबंधक लखनऊ जल संस्थान अपने तमाम साथियों के साथ कांग्रेस मुख्यालय माल एवेन्यू के ठसाठस भरे मैदान में उ.प्र. कांग्रेस कमेटी की प्रदेश अध्यक्ष डाॅ0 रीताबहुगुणां जोशी के समक्ष पिछले दिनों कांग्रेस पार्टी में शामिल हुए। श्री शर्मा को कांग्रेस पार्टी में शामिल कराने वाले प्रदेश कांग्रेस के ज्वाइनिंग प्रभारी श्री सुरेश चन्द्र वर्मा ने उनकी सराहना करते हुए उन्हें कांग्रेस के लिए बेहद उपयोगी बताया।
    इस अवसर पर कांग्रेस कार्यकर्ताओं और श्री शर्मा के समर्थकों को सम्बोधित करते हुए प्रदेश अध्यक्ष डाॅ0 रीता बहुगुणां ने कहा कि कांग्रेस परिवार में शामिल हो रहे श्री डी.के. शर्मा लखनऊ के लिए अन्जान चेहरा नहीं हैं, वे जनकल्याण से सम्बन्धित महत्वपूर्ण विभाग जल संस्थान में महाप्रबंधक रहे हैं। इस पद पर रहते हुए वे लखनऊ की जनता से सीधे जुड़े रहे हैं। जल ही जीवन है के नारे को सार्थक करते हुए लखनऊ नगरवासियों को जहां निर्बाध जलापूर्ति देते रहे, वहीं संकरी गलियों तक अपनी पहुंच बनाए रहे, जिससे जनसामान्य को पेयजल सम्बन्द्दी कोई परेशानी न होने पाये। साथ ही अपने अधीनस्थ अधिकारियों व कर्मचारियों से महज मुखिया नहीं वरन दोस्ताना संबंधों ने श्री शर्मा को जल संस्थान में बेहद लोकप्रिय बना रखा था।
    लोकप्रियता के मामले में धनी श्री शर्मा की सराहना करते हुए डाॅ0 बहुगुणां ने कहा कि उन्होंने लगभग 6 साल तक लखनऊवासियों के बीच सेवाभाव से गुजारे हैं। वे आज यहां कांग्रेस पार्टी की नीतियों से प्रभावित और देश के भविष्य युवा नेता श्री राहुल गांधी जी से प्रेरित होकर कांग्रेस की सदस्यता ग्रहण कर रहे हैं। उनकी भावना है जनसेवा। हमें उम्मीद है कि वे और उनके समर्थक आजीवन जनता के हितों के लिए संघर्ष करते रहेंगे, पार्टी में उनका, उनके साथियों का हार्दिक स्वागत है।
    श्री डी.के. शर्मा के कांग्रेस पार्टी में शामिल होने के समर्थन में जहां कांग्रेस मुख्यालय तालियों की गड़गड़ाहट और जिन्दाबाद के नारों से गूंज उठा, वहीं उनकी लोकप्रियता का उपहार नगर निगम चुनाव प्रत्याशियों को प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष ने खुले दिल से यह कहकर सौंपा कि लखनऊ में महापौर पद पर चुनाव लड़ रहे डाॅ0 नीरज वोरा सहित सभी कांग्रेस के पार्षद प्रत्याशियों के लिए श्री शर्मा भारी लाभकारी साबित होंगे।
    श्री डी.के. शर्मा पार्टी में शामिल होने के तुरंत बाद शहर में चुनाव प्रचार करते देखे गये। वे महज डाॅ0 वोरा के लिए नहीं वरन् पार्षदों के लिए भी सड़कों पर वोट मांगते देखे गये। पांच दिनों तक चुनाव प्रचार में लगे श्री शर्मा के चेहरे की मुस्कान और सौम्यता तपता सूरज भी नहीं छीन सका। डाॅ0 नीरज वोरा के समर्थन में विधानसभा मार्ग पर वोट मांगते हुए ‘प्रियंका’ संवाददाता से उन्होंने कहा कि, ‘यह मेरी काम करने की क्षमता, अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचने और कांग्रेस पार्टी से लखनऊवासियों का सीद्दा संवाद बनाए रखने का पहला कदम भर है। लखनऊवासी तो हमारा परिवार हैं और परिवार के दुःख-सुख, आपदा और प्रसन्नता के हर क्षण में मैं उनके बीच बना रहना चाहता हूँ। आप जानते हैं कि इस परिवार से हमेशा मुझे स्नेह मिला है, मैं उस प्यार को नहीं भुला सकता।’
    श्री डी0के0 शर्मा ने परशुराम ब्राह्मण जनकल्याण समिति के प्रदेश अध्यक्ष, अखिल भारतीय लोकाधिकार संगठन के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष, दैनिक समाचार-पत्र ‘जनकदम’ के सलाहकार सम्पादक के साथ ही मदन मोहन मालवीय इंजीनियरिंग कालेज गोरखपुर के पूर्व अध्यक्ष, उ0प्र0 जल सम्पूर्ति अभियंता संघ के प्रदेश अध्यक्ष, वाराणसी जल संस्थान में महाप्रबंद्दक, लखनऊ जल संस्थान में सचिव तथा महाप्रबंधक आदि विभिन्न पदों तथा विभिन्न समाजसेवी संगठनों के विभिन्न पदों पर रहकर जनता की सेवा की है।
    इस मौके पर श्री शर्मा के साथ कांग्रेस की सदस्यता ग्रहण करने वालों में मुख्य रूप से श्री गंगा प्रसाद तिवारी, श्री योगेन्द्र तिवारी, श्री संदीप मिश्र, श्री कौशलेन्द्र प्रताप सिंह, श्री सुभाष श्रीवास्तव, श्री अजीत कुमार बसवाल, श्री कुशमेश मिश्र, श्री विवेक मिश्र, श्री सौरभ तिवारी, श्री मुरलीधर त्रिपाठी, श्री कीर्ति शुक्ल, श्री मनीष गुप्ता, श्री छवि किशोर त्रिपाठी, श्री आलोक मिश्र, श्री मनीष अवस्थी, श्री विनय शंकर चतुर्वेदी, श्री शैलेन्द्र कुमार शुक्ला, श्री ब्रजेन्द्र त्रिपाठी, श्री ब्रजेन्द्र भट्ट, श्री नरवीर सिंह, श्री मनीष रस्तोगी, श्री हीरा लाल, श्री राहुल सचान, श्री आनन्द कुमार, सुन्दर लता भाटिया सहित सैकड़ों लोग शामिल रहे। वहीं विधायक डाॅ0 मुस्लिम, प्रदेश कांग्रेस के कोषाध्यक्ष श्री एस.सी. माहेश्वरी, प्रदेश मंत्री श्री राज बहादुर, पूर्व एमएलसी श्री सिराज मेंहदी, पूर्व विधायक श्री श्यामकिशोर शुक्ल, वरिष्ठ नता श्री सुबोद्द श्रीवास्तव, शहर कांग्रेस कमेटी लखनऊ के कार्य0 अध्यक्ष श्री बोधलाल शुक्ल, श्री एस.जे.एस. मक्कड़, श्री राजेन्द्र बहादुर सिंह, श्री अरशी रजा, श्री के.के. शुक्ला, सै0 हसन अब्बास, श्री मेंहदी हसन आदि वरिष्ठ नेतागण मौजूद रहे।

नकली पानी, नकली खाना

जागो भइया... जागो भइया... जागो...
लखनऊ। सूबे की बड़ी पंचायत (विद्दानसभा) में नकली देशी घी का मामला गूंजने के बाद भी मिलावटखोरों और नकली सामान बनाने-बेचने वालों की सेहत पर कोई फर्क नहीं पड़ा हैं, न ही सरकारी अमले पर। गरमी अपने चरम पर है और खाने-पीने के सामानों में मिलावट अपने चरम पर है। दूध, दही, मट्ठा, घी, पनीर, खोया, तेल, चाय पत्ती के अलावा शैम्पू, फेसक्रीम व नमकीन सहित अन्य खाद्य सामग्रियों में मिलावट का धंधा जारी है।
    मजे की बात है कि गली-गली घूमकर फेरीवाले कुल्फी, आइसक्रीम, नमकीन बेचते पूरे प्रदेश में दिख जाते हैं। दूध, दही, पनीर, खोया, खुलेआम बिकता है। हर एक किलोमीटर पर गोश्त, मुर्गे काटकर बेचे जा रहे हैं। मछली सड़क किनारे बेची जा रही हैं। इनमें से कोई भी खाद्य सुरक्षा मानकों को नहीं मानता। बड़ी-बड़ी मिठाई की दुकानों में फ्रीजर में रखी मिठाइंया, लस्सी आदि दो-तीन दिन पुराना होना आम बात है। नकली कोल्डड्रिंक बेचे जाने से भी इंकार नहीं किया जा सकता। याद दिलाते चलें पिछले अप्रैल महीने में शहर के सीतापुर रोड पर हल्दीराम के प्रमुख वितरक एस0आर0 सेल्स कारपोरेशन के गोदाम पर एफडीए की टास्कफोर्स और पुलिस ने छापा मारकर गोदाम में मौजूद 5,33, 570 रूपए कीमत के माल को सीलकर दिया था। इस नमकीन में ट्रांस्फैट नामक तत्व के अधिक मात्रा में उपयोग किये जाने की शिकायत थी। ट्रांस्फैट से हृदयघात का खतरा बढ़ता है।
    शहर के हर मोड़ पर पूड़ी-खस्ता, छोला-भटूरा भंडारों व दूध-दही, लस्सी बेचनेवालों को बोलबाला है। इन सभी में खाने वाले सोडे को बेखटके मिलाया जाता है। कहीं-कहीं तो कपड़ा धोने वाले सोडे का इस्तेमाल होता है। सोडे का इस्तेमाल छोला जल्दी पकने व पूड़ी-खस्ता-भटूरा फूलने के लिए किया जाता है। भीषण गरमी में दूघ को फटने से बचाने के लिए दूध में सोडा मिलाया जाता है। दूध में पानी और आरारोट मिलाना तो आम बात है। ऐसे ही अन्य खाद्य सामग्रियों में भी धड़ल्ले से मिलावट जारी है। पेट्रोल-डीजल, रसोई गैस भी मिलावट से अछूते नहीं है।
    जिला प्रशासन और खाद्य सुरक्षा विभाग के अधिकारी व नगर स्वास्थ्य अद्दिकारी होली, दिवाली तेल, घी, दूध खोया आदि की दुकानों पर छापा मारकर कर्मकांड करके अपनी दक्षिणा का इंतजाम कर वापस अपने ठंडे-गरम दफ्तरों में समा जाते हैं। सरकार ने मिलावटखोरों की बढ़ती सक्रियता को देखते हुए इस पर रोक लगाने के लिए वर्ष 2006 में खाद्य सुरक्षा मानकीकरण अधिनियम पास किया। इसमें खाद्य पदार्थों में मिलावट रोकने  के लिए ढेरों नियम बनाए गए हैं, इन नियमों को मिलावटखोर और अद्दिकारी दोनों ही ठेंगा दिखा रहे हैं। सरकार को अकेले नकली देशी घी नहीं वरन् सभी खाद्य सामग्रियों की निगरानी के साथ पीने के पानी की शुद्धता की जांच के कड़े कदम उठाने चाहिए, नहीं तो आगामी महीनों में अस्पतालों की ओपीड़ी से लेकर बिस्तरों तक में बीमारों की गिनती करना मुश्किल होगा।