Wednesday, May 10, 2017

 किसानों की नहीं सुनोगे तो भूखों मरोगे
--प्रियंका वरमा महेश्वरी


किसान! आज की ज्वलंत समस्या। हर जगह उसी की चर्चा, मीडिया, सोशल मीडिया सब जगह। बस उस पर बहस और राजनीति...। उधर किसान परेशान और बेहाल है और उनकी स्थिति ऐसी है कि वो आत्महत्या को अंतिम विकल्प मान बैठा है। ये समस्या कोई आज की नही है करीब 21 सालों से चली आ रही है। 2015 में मौसम की मार की वजह से पांच लाख किसान बर्बाद हो गये। कुछ दूसरी परेशानियां भी जुड़ी हुई हैं किसानों के साथ जैसे जरूरत के वक्त कर्ज का उपलब्ध ना होना, भूजल का स्तर गिर जाने की वजह से सिंचाई के लिए पानी का न मिलना, बिजली की सुविधा का ना होना या मंहगा होना, उर्वरक खाद,कीटनाशक का मंहगा होना, फसलों के लिए बाजार का ना होना, समय पर दाम ना मिलना ये। एक समस्या ये भी आती है कि किसान कर्ज तो ले लेते हैं पर समय पर किस्त नही भर पाते हैं, ऐसी स्थिति में वो कर्ज लेने से कतराते हैं और इन समस्याओं त्रसित होकर वो शहर की ओर पलायन करटे हैं । 2015 में आलू की पैदावार काफी अच्छी हुई थी लेकिन मौसम की मार के चलते और नुकसान न सहन कर पाने की स्थिति में किसानों को आत्महत्या का रास्ता अपनाना पड़ा। नुकसान की भरपाई के लिए केन्द्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने 6000 करोड़ देने की बात कही और कहा कि पहले 50% फसलों के नुकसान पर मुआवजा मिलता था जो अब 33% पर कर दी गई है।
पिछली अखिलेश सरकार ने भी सीधे किसानों से उनकी समस्या पूछी और राहत का आश्वासन दिया लेकिन हुआ कुछ नही वही ढाक के तीन पात किसान बेहाल ही रहा। केंन्द्र से भी कोई मदद नही मिली। ऐसी स्थिति में किसान कहां मदद की गुहार लगाये ? फसल के नुकसान की भरपाई, राहत मुआवजा जैसे आश्वासन देकर किसानों से वोट वसूलने की राजनीति भर की जाती है उसके बाद उनकी कोई पूछ परछ नही होती। कृषि मंत्री राधासिंह मोहन ने  बताया कि 56 फीसदी खेती योग्य जमीन को पानी उपलब्ध नही है। 99 बड़े प्रोजेक्ट जिससे 76 लाख हेक्टेयर जमीन की सिंचाई हो सकती है, 25 वर्षों से लंबित पड़ी है। इन परियोजनाओं पर 50 हजार करोड़ का खर्च आना था। भाजपा सरकार बनने के बाद सकार ने सिंचाईं योजना के तहत नाबार्ड के सहयोग से 20 हजार करोड़ का कापर्स  फंड बनाया लेकिन डेढ़ साल तो सिर्फ योजनाएं बनाने में लग गया । दूसरी समस्या खेती की लागत की, व्यवस्था और वितरण की थी।
फसल बीमा योजना में किसानों को कोई विशेष लाभ नही मिला। अलग-अलग राज्य के अलग-अलग रेट, अलग अनाज के लिए भी अलग रेट। एक सीमा तय थी , जिससे ज्यादा मुआवजा नही मिल सकता था, जो ऋणी किसान थे वो ही इसका फायदा उठा सकते थे। 2016 में दलहन का उत्पादन 1.73 लाख टन की उम्मीद जताई गई जबकि 09 लाख टन की मांग बढ़ी और खपत 2.46 करोड़ टन की है। अब शायद इजाफा हो गया होगा। दाल की बढ़ती हुई कीमतों को रोकने के लिये और उत्पाद बढ़ाने के लिए सरकार ने विदेशों में दाल की खेती "कांट्रैक्ट खेती" की बात रखी थी। कुछ आंकड़े जो  फसलों की पैदावार बताती है...
चावल---.(2015-16) (2016-17)
                 91.31.      93.88

कुल दलहन..  (2015-16)
                           5.54
(2016-17)
    8.7
मक्का.... (2015-16) (2016-17)
          .          15.24.     19.3

तिलहन... (2015-16)
                    16.59
(2016-17)
   23.36
कुल खाद्यान्न... (2015-16)
                            124.01
(2016-17)
  135.03
ये सिलसिलेवार बात इसलिए हो रही है क्योंकि आज की सरकार हो या पिछली सरकार हो उससे किसानों को कोई फायदा नहीं मिला बल्कि नई सरकार के वादों से उम्मीद लगाये किसान नोटबंदी की मार से दोहरा हो गया। प्रधानमंत्री ने करीब 14 करोड़ किसान परिवारों पर सीमित प्रभाव पड़ने की संभावना व्यक्त की लेकिन नकदी की समस्या का समाधान नही किया। प्रधानमंत्री ने घोषणा की कि जिन किसानों ने रबी की फसल के लिए जिला सहकारी बैंको से और प्राथमिक कृषि सहकारी समितियों से कर्ज लिया हो उनको 1जनवरी से 60 दिन के ब्याज का भुगतान नही करना होगा। लेकिन इसका विशेष लाभ नजर नही आया क्योंकि दिये गए फसल सत्र में कुल कर्ज का करीब 70% किसानों द्वारा अनुसूचित वाणिज्य बैंको से लिया जाता है और महज 30%  डीसीसीबी, पीएसीएल और क्षेत्री ग्रामीण बैंको से लिया जाता है। 2016-17 में केन्द्र सरकार ने 9,00,000 करोड़ रूपये कृषि ऋण दिये जाने का लक्ष्य रखा जिसमें वाणिज्यिक  बैंकों का अधिकतम हिस्सा है। केन्द्र सरकार ने ऋण के भुगतान की सीमा 2 महीने की बढ़ाई लेकिन इस सुविधा से किसानों से बहुत लाभ नही हुआ। सत्र मे यदि किसान एक लाख का कर्ज लेता है तो 7% की दर से पूरे साल का ब्याज 7000 होता है और दो महीने के ब्याज की माफी 1200 आयेगी जो कि बहुत मामूली है। प्रधानमंत्री ने अपनी दूसरी घोषणा मे कहा कि नाबार्ड को किसानों को क्रेडिट व कर्ज देने के लिए 2016-17 वित्त वर्ष में 20,000 करोड़ रूपये की सुविधा देंगे। 40 प्रतिशत से ज्यादा किसान संस्थागत क्रेडिट व्यवस्था से अलग है। किसानों को सस्ती दरों पर कर्ज देने के लिए 21000 करोड़ रूपये की वित्तीय सहायता उपलब्ध कराई गई थी लेकिन 1990 के बाद से कृषि क्षेत्र मे संस्थागत ऋण की हिस्सेदारी 40% के करीब स्थिर है और हालात सुधरे नही है। प्रधानमंत्री ने कहा कि 3 करोड़ किसान क्रेडिट कार्डों को रूपे में बदल दिया जायेगा ताकि किसान आसानी से कैश निकाल सके लेकिन नोटबंदी के दौर में बैंक और एटीएम नगद निकासी की सीमा निर्धिरित रहने के कारण किसान इसका फायदा नही उठा सका। कैश में खाद और बीज खरीदनें उनको परेशानी हुई। घर में रखे गल्ले को ही बीज की तरह उपयोग में लिया। सूखा, ओलावृष्टि की मार सहते जो किसानआत्महत्या कर रहे हैं वो 39% कर्जदार थे और नुकसान भरपाई का मुआवजा भी नही मिला था। ये अब तक पिछले दो सालो की बात है अब वर्तमान समय की बात करते हैं करीब 45% या इससे ज्यादा भी हो सकता है किसानों ने आत्महत्या की। इन भूमिपुत्रों पर सियासी राजनीति चलती है। बैंको, सूदखोरों से बचने के लिए और अपनी जमीन खो जाने के डर से गरीब किसान के पास आत्महत्या के अलावा कोई रास्ता नही बचता है। भाजपा पर वरूण गांधी ने किसानों की आत्महत्या के आंकड़े छिपाने का आरोप लगाया । आंकड़ों में 7500 किसानों के आत्महत्या करने की बात कही गई जबकि लगभग 50,000 किसानों ने आत्महत्या की है। झारखंड के किसान टमाटर की खेती से बहुत परेशान हुए। टमाटर की बिक्री के लिए खरीदार नही मिल रहा था और खेती के लिए किसानों ने 40 हजार कर्ज भी लिया था नतीजा किसान खुद ही अपनी खेती नष्ट करने लगे। करोड़ों के टमाटर रोड पर फेंक दिये गये। अब कर्ज चुकाने के लिए किसान मजदूरी की तलाश मे शहर की ओर पलायन कर रहा है।
इधर तमिलनाडु के ऊपर भी संकट गहराया .... हर रोज करीब 100 किसान मौत को गले लगा रहे थे। राज्य द्वारा दी जाने वाली आर्थिक सहायता नही के बराबर रही। एक अनुमान के मुताबिक यह राज्य के आर्थिक इतिहास का सबसे खराब वित्तीय वर्ष है। जिन मुफ्त सौगातों के बारे में सरकार ने वायदे किये थे उसके लिए पैसों की जरूरत होती है..। बहरहाल तमिलनाडु का किसान जंतर मंतर पर अपना भाग्य आजमा कर निराश हुआ है । करीब 21 सालों से किसान तकलीफ झेलता आ रहा है मदद के नाम फर मामूली राहतें और सियासी वायदे मिलते हैं उसे।
*
किसान को बुआई के समय से ही डर लगने लगता है। समय से बीज नही मिलता है, जो मिलता है उसमें नकली ज्यादा होता है। कमीशन के चक्कर में गुणवत्ता पर ध्यान नही दिया जाता है।
*
सिंचाईं के नाम पर किसानों को समय से पानी नही मिलता। सरकार के भारी भरकम दावे और व्यवस्था सिर्फ कागजों पर ही देखने को मिलती है।
*
बुंदेलखंड में दो साल से सूखे की मार झेल रहे किसानों को न तो बिजली मिली और न ही नलकूप चले, न बिजली बिल माफ हुआ और न ही बिजली सस्ती हुई।
*
कभी सूखा, कभी बेमौसम बारिश से फसलों को नुकसान हुआ और उस नुकसान का मुआवजा अभी तक किसानों को नही मिला। किसानों को सियासी मुद्दा बनाया जाता है लेकिन उनकी पीड़ा को कोई समझना नही चाहता।
*
कानपुर और फरूखाबाद के अलावा आलू की मंडी कही नही है। आलू से बनने वाली चीजों के कारखाने बंद हो गये हैं या है ही नही। ऐसे में उत्पादित आलू की खपत मुश्किल हो जाती है, नतीजा किसानों को औने पौने दाम में बेचना पड़ता है। यही हाल गन्ने की फसल का है समय पर भुगतान नहीं और कोई खुली मंडी ना होने से किसानों ने गन्ना उत्पादन बंद कर दिया ,लोगों के रोजगार बंद हो गये।
देश के पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में यूपी सरकार ने सिर्फ चुनावी ढोल बजाया। उ.प्र. में 4.5 करोड़ युवा मतदाता है। सरकार ने लैपटाप, टैबलेट, स्मार्ट फोन बाटने की बात की लेकिन किसानों की दुर्दशा पर कोई बात नही। पंजाब और उत्तर प्रदेश में कृषि से जुड़े मतदाताओं की संख्या काफी बड़ी है। राजनीतिक दलों ने किसानों के लिए कर्ज माफी का लोभ लुभावन वादा किया। विशेषज्ञों के मुताबिक कर्ज माफी से छोटे किसानों को लाभ नही होता  है। इसका सबसे ज्यादा फायदा अपेक्षाकृत बड़े किसानों को होता है। छोटे और सीमांत किसान की तो बैंकिंग तंत्र तक पहुंच ही नही होती है। इस तरह के फैसले से बैंकिंग प्रणाली को नुकसान होता है। किसान कर्ज माफी के बजाय समय पर कर्ज मिल जाये उसे ज्यादा महत्व देता है। कर्ज माफी किसानों के हक मे स्थाई उपाय नही है। किसानों की ऋणमाफी को लेकर एसबीआई की चेयरमैन अरूंधती भट्टाचार्य ने आपत्ति जताई, उन्होंने कहा कि किसानों की मदद तो हो लेकिन ऋण का अनुशासन बना रहना चाहिये। उनका कहना था कि कर्ज माफी जैसी योजनाओं से बैंक और कर्जदार के बीच जो एक अनुशासन बना रहता है वो बिगड़ता है।
नोटबंदी की अवधि पूरी होने पर प्रधानमंत्री ने किसानों के लिये बड़ी घोषणाएं की। सोसायटी कोआपरेटिव कर्ज पर किसानों को छह महीने का ब्याज माफ किया। नाबार्ड को 21,000 करोड़ के अलावा सरकार 20,000 करोड़ देगी।5 करोड़ किसान कार्ड कही भी खरीद बिक्री के लिये रूपे कार्ड में बदलेंगे लेकिन अभी तक जमीन पर कही कुछ होता नही दिख रहा है। पिछले साल की तरह इस बार भी सरकार किसानों को राहत देने की बात कर रही है। आदित्यनाथ योगी ने सत्ता मे आते ही छोटे और सीमांत किसानों का कर्ज माफ करने का फैसला लिया। 1 लाख रूपये तक का फसली कर्ज माफ कर दिया गया। हालांकि यह उनके पीएम का चुनावी वादा था जिसे योगी जी ने पूरा किया लेकिन इस सबके बावजूद किसानों को कर्ज माफी से कोई ठोस लाभ मिलने के आसार नही दिखते । राज्य की ऋणग्रस्तता पिछले पांच साल में काफी बढ़ गयी है। कर्ज माफी का निर्णय राज्य पर अतिरिक्त भार बढ़ायेगा। करीब 36,000 करोड़ से अधिक कर्ज माफ करने की बात कही गई है लेकिन सिर्फ फसल के लिए लिया गया कर्ज ही कर्ज नही है बल्कि ट्रैक्टर, पम्पसेट और भी खेती से जुड़ी हुई चीजों पर लिया गया कर्ज भी तो कर्ज ही है फिर भी सराहनीय कदम है बशर्ते फलीभूत हो |
80
लाख मीट्रिक टन गेहूं खरीद की बात सरकार के लिए एक चुनौती से कम नही है क्योकि बीते पांच सालों में सिर्फ एक बार ऐसा हुआ कि जब गेहूं की सरकारी खरीद लक्ष्य से ज्यादा हुई और उसका श्रेय शासन और खाद्य विभाग के अधिकारियों को गया। खुद खाद्य विभाग के अधिकारियों का मानना था कि बड़े लक्ष्य को पाने  के लिए सरकार को मजबूत कदम उठाने होंगे। गेहूँ को दूसरे प्रदेशों में जाने से रोकना होगा, भुगतान की व्यवस्था पर जोर देना होगा ताकि किसान "सरकारी खरीद केंद्र" की ओर आकर्षित हो। खरीद के बाद अनाज को रखने की व्यवस्था सुचारु होनी चाहिये। किसानों की तकलीफों को सियासी मुद्दा बनाने के बजाय उनके हितों को ध्यान मे रखा जाये तो भी वो राहत महसूस करेगा। उ.प्र. में करीब 2.5 करोड़ किसान है। 85% छोटे और सीमांत किसान है। 77 लाख किसानों ने कर्ज लिया है और इसमें से 55 लाख छोटे किसान है। 70% कृषि लोन बैंको व कोआपरेटिव क्षेत्र से लिया जाता है। कोआपरेटिव बैंक से लोन कम ही मिलता है। एक रिपोर्ट के अनुसार 72 फीसद आत्महत्या करने वाले किसान छोटे और गरीब हैं। जिनके पास दो हेक्टेयर से भी कम जमीन है। छोटी जमीन होने के कारण उन्हें  मंहगा बीज, कीटनाशक, मजदूरी तक का मंहगा खर्च कर्ज लेकर ही उठाना पड़ता है। अगर उसके बाद प्राकृतिक आपदा आ गई तो किसान के लिए मुसीबतो का अंबार खड़ा हो जाता है। कर्ज की मार से दबा और उसे ना चुका पाने की स्थिति में वो आत्महत्या की ओर अग्रसर होता है।


ग्रामीण भारत दिन प्रतिदिन हाशिये पर जा रहा है। आजादी के बाद के दशक में जहां कृषि, नेशनल जीडीपी में लगभग 55% की भागीदारी निभाती थी, आज किसानों की तादाद बढ़ने के बावजूद 14 से15 फीसदी तक सीमित है। वर्तमान "मूल्य निर्धारण नीति" से अब तक किसानों का भला नही हो पाया है. अब इस नीति को हटा कर "आय नीति" की जरूरत महसूस होने लगी है। फसलों की बुआई से लेकर अंतिम प्रक्रिया तक का आई लागत का ही आंकलन न होना भी इस प्रक्रिया त्रुटि है। जिसका सीधा असर  किसानों पर पड़ता है।
कृषि विभाग के आंकड़ो के मुताबिक साल 2016-17 में शासन की तरफ से जिले में सोलर  पंप लगाने का लक्ष्य दिया गया था जो अधर में है | गर्मियों के शुरू होते ही अग्निकांड की घटनाएं बढ़ने लगती हैं अधिकतर अग्निकांड की घटनाओं में विद्युत महकमें की लापरवाही सामने आ रही है। विद्युत महकमें में न तो बजट का अभाव है और न तारों का, फिर भी समय से ग्यारह हजार वोल्टेज लाइन के तार क्यों नहीं बदले गए। जिसके चलते गिरते तारों से जिले के विभिन्न स्थानों पर सैकड़ों बीघा गेहूं की फसल किसानों की जल कर राख हो रही है। इसकी शिकायत मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से कर जांच कराई जायेगी। आम आदमी व पीड़ित किसान रोना रो रहे हैं कि उनके खेतों के ऊपर गए हाईटेंशन तार को दुरूस्त रखा गया होता तो शायद अग्निकांड नही होता। प्रतिवर्ष जर्जर तारों को बदलने के लिए पावर कारपोरेशन की तरफ से बजट मुहैया कराया जाता है। बावजूद इसके विभागीय अधिकारी कुंभकर्णी नींद सो रहे हैं। बदहाली और आत्महत्या की ओर जाते किसानों की परेशानी को दूर करना तो दूर..आश्वासन तक नही..। अगर समस्याओं का समाधान नहीं होगा तो किसान कहां जायेगा ? उससे भी बड़ा सवाल हम कहां जायेंगे क्या खायेंगे ?
 योगी मुर्दाबाद...जनबली हरिशंकर तिवारी जिंदाबाद !


 गोरखपुर | शहर के आसमान पर सूर्यदेव का क्रोध नीचे जमीन पर हजारों-हजार आदमियों के आक्रोश की मुट्ठियां हवा में लहराती ‘ योगी मुर्दाबाद ‘ के नारे बुलंद कर रही थीं | शहर की हर सड़क से एक जन सैलाब जिलाधिकारी दफ्तर की तरफ भागता जा रहा था | हर शख्स ‘ अपमान का बदला लेकर रहेंगे ‘ ठाने अपनी छाती ताने गुस्साया नजर आरहा था | दरअसल ये अपार जनसमर्थन पूर्वमंत्री हरिशंकर तिवारी के अपमान से आहत होकर नई सरकार और उसके मुखिया से अपनी नाराजगी जाहिर करने को बेताब था | गौरतलब है कि वीरबहादुर सिंह के बाद एक बार फिर यूपी की कमान गोरखपुर के हाथ आई है वह भी गोरखनाथ मंदिर के महंत के हाथ में , लोगों को लगा कि महंत मंदिर से निकल कर समूचे गोरखपुर की सूरत बदल देंगे , यही वजह थी कि योगी आदित्यनाथ जब 25 मार्च को गोरखपुर पहुँचे थे तो पूरा शहर उमड़ पड़ा था। लेकिन सिर्फ एक महीने बाद फिर शहर में लोग उमड़े तो ज़बान पर योगी मुर्दाबादके नारे थे। वहीं दूसरी बार २९ अप्रैल को योगी के स्वागत से उनके हजारों अपने किनारा कर गये | हां , उनके स्वागतकर्ताओं में अपहरण व हत्या आरोपी अमनमणी त्रिपाठी और उसके गिरोह का इजाफ़ा जरूर हो गया | बतादें कि 22 अप्रैल को पूर्व मंत्री और पूर्वांचल में जनसामान्य के ‘बाबा’ और हर वर्ग के समर्थन से ‘जनबली’ की पहचान रखने वाले पं. हरिशंकर तिवारी के आवास (हाता) पर पुलिस ने छापा मारा था। इस घटना के विरोध में तीसरे दिन जिलाधिकारी कार्यालय पर हजारों लोगों ने पं. हरिशंकर तिवारी की अगुवाई में धरना-प्रदर्शन किया | बता दें कि जीवन में पहली बार पं. हरिशंकर तिवारी खुद तपती सड़क पर आगे-आगे जुलूस में पैदल चलते नज़र आए। जबकि पूरे रस्ते पर भारी  पुलिस बल लगा था और कचेहरी परिसर को पुलिस छावनी में तब्दील कर दिया गया था | पुलिस मंच ,माइक , कुर्सियां तक उठा ले गई , बाद में जमीन पर दरी बिछा कर व चंद कुर्सियों के साथ लाउडहेलर का इंतजाम कर धरना जारी रहा | प्रदर्शन में योगी सरकार के खिलाफ जम कर नारे लगे। लोग ब्राह्मणों के सम्मान में हरिशंकर तिवारी मैदान में ’, ‘ बम बम बम शंकर... हरिशंकर ’, पुलिस प्रशासन मुर्दाबाद, ‘ योगी सरकार की गुंडागर्दी नहीं चलेगी नहीं चलेगी ’ , ‘जनबली हरिशंकर तिवारी जिंदाबाद’,’योगी मुर्दाबाद ‘, आदि नारे लगा रहे थे। इस घटना को योगीमयमीडिया ने प्रसारित करने में परहेज बरता | प्रदर्शन में शहर ही नहीं पूरे जिले से व आस-पास के इलाकों से लोगों ने हिस्सा लिया | दलित,मुसलमान , अगड़े-पिछड़े सब एक साथ खड़े दिखे | इस खबर को हर स्तर से दबाने का काम किया गया , जबकि पूर्वांचल की धरती पर हो रहे इस बदलाव की हक़ीक़त वर्चस्व व बदले की राजनीति बयान कर रही है | वहीं पुलिसया कार्रवाई ने योगी सरकार के खिलाफ विशेष रूप से ब्राह्मणों में भारी नाराजगी पैदा कर दी है | इस नाराजगी को पूर्वांचल के परशुराम जयंती समारोहों और सोशल मीडिया में खास तौर से देखा गया | जिन ब्राह्मणों ने अभी दो महीने पहले यूपी में भाजपा सरकार बनवाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी, उनकी नाराजगी पूर्वांचल में एक नए राजनीतिक समीकरण को जन्म दे सकती है।
धरना-प्रदर्शन में पूरा तिवारी परिवार-पूर्व मंत्री पं. हरिशंकर तिवारी, विधान परिषद के पूर्व सभापति गणेश शंकर पांडेय, पूर्व सांसद भीष्म शंकर तिवारी उर्फ कुशल तिवारी तथा चिल्लूपार के बसपा विधायक विनयशंकर तिवारी शामिल हुए। तिवारी परिवार को बसपा का पूरा साथ मिला और धरना-प्रदर्शन में शामिल होने के लिए प्रदेश अध्यक्ष राम अचल राजभर, विधानसभा मंडल में बसपा के नेता लालजी वर्मा, जोनल कोआर्डिनेटर घनश्याम खरवार भी आए।
गोरखपुर के राजनीतिक इतिहास में यह पहला अवसर था जब तिवारी परिवार किसी आंदोलन में एक साथ सड़कों पर था। काफी उम्र और अस्वस्थ होने के बावजूद पूर्व मंत्री पं. हरिशंकर तिवारी पैदल चल प्रदर्शन करते हुए डीएम कार्यालय पहुंचे और जब तक धरना चला वहां उपस्थित रहे। उन्होंने पत्रकारों से बातचीत में पुलिस की कार्रवाई को अमानवीय बताया। जब उनसे पूछा गया कि किसके इशारे पर कार्रवाई हुई तो उन्होंने कहा कि मीडिया जानता है कि किसके इशारे पर हुई कार्रवाई। पुलिस को आड़े हाथों लेते हुए उन्होंने कहा जो पहले से ही दूसरे जिले की जेल में बंद है उसका नाम रटते हुए पुलिस हमारे घर में घुस जाती है ? शायद पुलिस के पास अपना कोई मजबूत ख़ुफ़ियातन्त्र नहीं है या फिर पुलिस सरकार को धोखा दे रही है |

 गौरतलब है कि २२ अप्रैल की शाम चार बजे एसपी सिटी की अगुवाई में भारी पुलिस बल ने ९८ लाख के एक लूटकांड के एक अभियुक्त द्वारा सोनू पाठक की संलिप्तता बताते हुए उसके तिवारी हाता में रहने की बात मानकर उसकी तलाश में पूर्व मंत्री पं. हरिशंकर तिवारी के धर्मशाला स्थित आवास हाता में छापा मारा था। पुलिस ने वहां से सात लोगों को हिरासत मे लिया जिनमें से अशोक सिंह नाम के व्यक्ति को छोड़ सभी को कुछ देर बाद छोड़ दिया गया। अशोक सिंह का बाद में आर्म्स एक्ट में चालान कर दिया गया। बाद में पता चला कि पुलिस ने जिस सोनू पाठक की तालाश में छापा मारा वह कुछ महीने पहले से बलिया जेल में बंद है। इस घटना से पुलिस की काफी किरकिरी हुई। पुलिस की इस कार्रवाई से संदेश यह गया कि राजनीतिक प्रतिशोध में हाता पर छापा मारा गया। पूर्व मंत्री के बेटे बसपा विधायक विनय शंकर तिवारी ने पुलिस की इस कार्रवाई को राजनीतिक प्रतिशोध की कार्रवाई बताया | गणेश शंकर पांडेय ने कहा कि जो शख्स बलिया जेल में बंद है उसे गोरखपुर पुलिस हाता में खोज रही है। इससे बढ़ कर अकर्मण्यता और क्या हो सकती है। पूर्व सांसद कुशल तिवारी ने कहा कि उत्तर प्रदेश की भाजपा सरकार सत्ता के नशे में चूर है। उसे यह नहीं रास आ रहा है कि गोरखपुर में मोदी लहर के बीच एक सीट पर बसपा का कैसे कब्जा हो गया। बतादें घटना के दो ही दिन बाद जिलाधिकारी व शहर कप्तान हेमराज मीणा का तबादला कर दिया गया | इसी के ठीक बाद दोदिनी प्रवास पर जब मुख्यमंत्री गोरखपुर गये तो सरकारी ताम-झाम के स्वागतियों के साथ कवियत्री मधुमती शुक्ला की हत्या के अभियुक्त  आजन्म कारावास की सजा काट रहे अमरमणी त्रिपाठी के विधायक पुत्र अपनी पत्नी की हत्या व एक ठेकेदार के अपहरण के आरोपी अमनमणी त्रिपाठी भी मौजूद थे | मुख्यमंत्री ने ना ही अमन मणी की मौजूदगी पर उंगली उठाई और ना ही श्री तिवारी के यहाँ हुई पुलिसिया तमाशे पर कोई टिप्पणी की ?

Tuesday, April 11, 2017

गाय , गंगा , गरीबी और राम मंदिर...तो ठीक मगर ठंडे चूल्हों पर ख़ामोशी ?
अख़बार के इस टुकड़े को संपादकीय कहकर पुकारा जाता है | इसके माथे पर कलम लिखा है | मै हर पखवारे इसे प्रणाम करता हूं , फिर अक्षरों को संजीदा शक्ल देकर आदमी के सामने लता हूँ , मगर कहीं कोई फुसफुसाहट नहीं होती | इसके बाद भी हर बार, लगातार लिखता जाता हूं | इस आशा में कि शायद लहूलुहान आदमी आदमियत की अदालत में हाज़िर होकर अपनी पेशाब करके सो जाने की समाजवादी आदत का माफीनामा दे देगा | ऐसा नहीं है की मैं (पत्रकार बिरादरी सहित) कोई पाक दामन हूं , खबरों के व्यापारी , शब्दों के सौदागर , सत्ता के चाटुकार , अश्लीलता के प्रचारक और दलाल जैसे न जाने कितने आरोप हैं | वह भी इसलिए कि मेरी सचबयानी उनके लिए किसी विस्फोट से कम नहीं | मैं क्या करूं जब गाय , गंगा और गरीबी के बाद राम मंदिर , तीन तलाक , सूर्य नमस्कार व नमाज़ जैसे भावनात्मक मुहावरे वोटों के गटर में डूबने-उतराने लगते हैं | कानून के नाम पर सरेआम धमकी और टेलीविजन के पर्दे पर महज एक ही जमात के चेहरे राजनीति के चमकते ध्रुवतारे चाणक्य को खम ठोंक कर झुठलाते दिखाई देते हैं | कहने को सरकार नई लेकिन चेहरे वही पुराने , जो कल के लुटेरों के अज़ीज़ थे | मैं क्या करूं जब झूठे आंकड़ों की लोरियां बेचैन कर देती हैं | वायदों की फेहरिस्त इतनी लंबी कि उसे पूरा करने कराने की हठ को मथने में थके और थुलथुलाए सरकारी कारिंदे वातानुकूलित कमरों में भी पसीना पसीना होते हुए भी सच को झूठ के कालीन के नीचे दबाने की फ़िराक में हलकान हैं | सच यह है कि ताजा ताजा गई ३१ मार्च तक उत्तर प्रदेश सरकार ५ लाख करोड़ से अधिक की कर्जदार है | अकेले किसानों की कर्जमाफी पर ९० हजार करोड़ लगभग का बोझ पड़ेगा , लैपटाप, मेट्रो व अगली तमाम योजनाओं के आलावा सातवां वेतन , पेंशन का भी खर्च सामने है | तिस पर केंद्र सरकार ने मदद के नाम पर अंगूठा दिखाना शुरू कर दिया | शायद यही वजह है कि सरकार शपथ लेने के १५ दिनों बाद भी अपनी पार्टी की विजय के जश्न के साथ झाड़ू लगाने , फोटो खिचाने और मुख़्तार अंसारी , अतीक अहमद की जेल बदली में अधिक दिलचस्पी दिखा रही है | जबकि जेलों की सुरक्षा का आइना फर्रुखाबाद जिला जेल में हुवा बंदियों का उपद्रव दिखा गया | १०९० के बाद एंटी रोमियो स्क्वायड की पुलिस टीम पूरी वफादारी के साथ युवाओं पर अपने हाथ साफ करने के साथ फोटो खिंचाने का खास खयाल रख रही है | गोश्त बंदी , शराब बंदी का हल्ला और योग पढ़ाने पर माथा पच्ची | उधर उपद्रवी, शोहदे , अपराधी , फसादी , आतंकी भी अपने सुर्ख़ियों में रहने से बाज नहीं आ रहे | हौसले का आलम ये कि बेजुबान जानवर की हत्या के साथ भाजपा विधायक के घर पर पत्थरबाजी व फसाद अलग, तिस पर तुर्रा ये कि उप्र में दंगे नहीं होने देंगे !
बेहद तकलीफ के साथ लिखना पड़ रहा है रोटी को पत्थर में बदलने से विकास नहीं हो सकता | गाय को गुड़ खिलाकर सूबे के लगभग २.५ करोड़ कुपोषित बच्चों और हर दूसरी एनीमिया ग्रस्त किशोरी को स्वस्थ नहीं किया जा सकता न ही हंगरइंडेक्स में दर्ज आंकड़ों को झुठलाया जा सकता है | भाजपा के नेता ही हल्ला मचाया करते थे कि देश में लाखों टन अनाज सड़ रहा है सरकार गरीबों में इसे बाँट क्यों नहीं देती , अब खुद पहल क्यों नहीं करती ? वह भी तब जब देश व प्रदेश में भाजपा की ही सरकारें हैं | इसके आलावा ‘मन की बात’ में प्रधानमन्त्री जूठन पर चिंता जताते हैं लेकिन सड़ रहे अनाज पर कोई बात क्यों नहीं करते ? और तो और अपवंचित बच्चों के लिए कहीं भी शेल्टर होम हैं न ही स्ट्रीट चिल्ड्रेन की चिंता , बल श्रम व प्राथमिक शिक्षा पर कोई पहल नहीं ? पीने के शुद्ध पानी के इंतजाम , संक्रामक रोगों के रोकथाम पर कोई बयान  नहीं ? राजधानी को साफ सुथरा रखने और गली-कूचों से कचरा उठाने में गजब का भ्रष्टाचार चीन तक की कंपनी को कचरा उठाने की दावत ऐसे में पूरे सूबे की हालत का अंदाज़ा लगाया जा सकता है | बिजली २४ घंटे देने का बयान हर दूसरे दिन  अख़बारों में छपता है मगर भीषण गर्मी में सूबे के ६५ जिलों में औसतन १२-१६ घंटे बिजली फरार रहती है ? महंगाई , रोजगार,किसान की बात पर मंथन के बाद काम होगा, लेकिन डराने धमकाने के पहले यह अच्छी तरह जान लें कि आदमी के घर में चूल्हा आज जलेगा ?

टीवी चैनल से लेकर हर अख़बार में , भाजपा के कद्दावर नेताओं की जुबान पर सिर्फ मिशन २०१९ और राम मंदिर सुर्खरू  हो रहे हैं ? हर कोई राम मंदिर बनाने की जल्दी में है कोई कानून बनाने की धमकी दे रहा है तो कोई अदालत की बात दोहरा रहा है | संत से लेकर नेता तक भूल गये की इसी लखनऊ में केन्द्रीय मंत्री मुख़्तार अब्बास नकवी ८ महिने पहले कह गये थे कि भाजपा के लिए राम मंदिर न कभी चुनावी मुद्दा था न है और न कभी रहेगा | फिर पहले चुनावों में बनाये गये मुद्दों और वायदों की जल्दी क्यों नहीं ? उससे भी बड़ी बात ‘सरकार बनती है बहुमत से और चलती आम सहमती से है’ जुम्ला याद  रखना होगा | बहरहाल प्रजातंत्र की परिभाषा वन्देमातरम् या भारत माता की जयघोष से बदलने का प्रयास बंद करके विकास की ओर मजबूत कदम बढ़ाने ही होंगे |                
ई वो मशीन है जिसका भरोसा.... !        - प्रियंका वरमा माहेश्वरी

चुनाव बीत चुका है और भाजपा की सरकार चार प्रदेशो में काबिज हो चुकी है। चुनाव में हार का सामना करने वाले नेताओं ने....मायावती, अखिलेश, केजरीवाल और हरीश रावत ने ईवीएम  को अब मुद्दा बना लिया है और इसमें छेड़छाड़ होने की संभावना व्यक्त की है। तकनीक और उससे जुड़ी समस्याओं को जब राजनीतिक प्रतिद्वंदिता से जोड़कर देखा जाता है तो समस्या सुलझने के बजाय उलझ जाती है। ईवीएम को संदेह के घेरे में खड़ा किया जा रहा है और उसकी विश्वसनीयता पर शक किया जा रहा है और माकूल जवाब मांगा जा रहा है। केजरीवाल ने तो दिल्ली में होने वाले एमसीडी चुनावों में ईवीएम की जगह बैलेट पेपर की मांग कर दी है। वहीं राज्यसभा में पूरे विपक्ष ने एक स्वर से आरोप लगाये और इसकी जाँच के लिए आयोग या समिति बनाने की मांग की , बसपा की मायावती ने उ.प्र . के चुनाव रद्द करने की मांग कर डाली तो कांग्रेस के गुलामनबी आजाद ने, जब भाजपा की ओर से पंजाब में कांग्रेस की जीत पर सवाल उछाला गया तो आजाद ने कहा की हम पंजाब में दोबारा चुनाव कराने को तैयार हैं आप उ.प्र. में दोबारा चुनाव कराएं | इसके अलावा मध्य प्रदेश में मशीन ट्रायल के समय मुख्य निर्वाचन अधिकारी द्वारा अलग अलग बटन दबाने के बाद भी वीवीपीएटी मशीन से केवल भाजपा के निशान कमल की पर्ची ही निकली जिसे कांग्रेस समेत कई दलों ने पर्याप्त सुबूत माना और आयोग में शिकायत दर्ज करा दी | इस पर आयोग ने भिंड निर्वाचन अधिकारी से रिपोर्ट मांगी है |
गौरतलब है कि चुनावों के दौरान ईवीएम में छेड़छाड़ के मामले पहले भी देखे जा चुके हैं वर्ष 2009 के आम चुनाव में बीजेपी के वरिष्ठ लालकृष्ण आडवानी ने ईवीएम पर संदेह प्रकट किया था और मतपत्रों की पुरानी व्यवस्था की मांग की थी। कुछ दिन पहले महाराष्ट्र नगरपालिका चुनाव में ईवीएम से छेड़छाड़ का मामला सामने आया था। नासिक, पुणे और यरवदा आदि निर्वाचन क्षेत्रों में भी ईवीएम से छेड़छाड़ की बात सामने आयी है और शिकायत भी दर्ज कराई गई है। अब सवाल उठता है कि टेपरिंग - प्रूफ कहलाने वाली ईवीएम में किसी प्रकार की छेड़छाड़ की संभावना हो सकती है क्या? ध्यान दे कि 2010 में अमेरिका के मिशिगन विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने दावा किया कि वो भारत की ईवीएम मशीनों को हैक कर सकते हैं। शोधकर्ताओं ने घर पर बनाई एक मशीन और मोबाइल फोन की मदद से ईवीएम में दर्ज नतीजों को बदलने की क्षमता का प्रदर्शन किया था लेकिन उस वक्त चुनाव आयुक्त टी एस कृष्णमूर्ति ने इस दावे को यह कह कर खारिज कर दिया कि भारत की ईवीएम मशीनों में इतने पुख्ता सुरक्षा प्रबंध किये गये हैं कि उनके साथ कोई छेड़छाड़ नही की जा सकती है। यही नही..अदालतों में भी यह आरोप साबित नही हुए और सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले को खारिज कर दिया था।
आज बीजेपी यूपी, उत्तराखंड, मणिपुर में हुई जीत से खुश है लेकिन अतीत में इसी ईवीएम के खिलाफ आंदोलन चला चुकी है। 2010 में बीजेपी नेता किरीट सोमैया और देवेन्द्र फड़नवीस ने "एंटी - ईवीएम" कहे गए आंदोलन में शिरकत की थी और जिसमें हैदराबाद के इंजीनियर हरी प्रसाद ने यह दिखाया था कि कैसे विभिन्न चरणों में ईवीएम में दर्ज नतीजों को हैक करके फेरबदल किया जा सकता है। और तो और भाजपा नेता जी वी एल नरसिम्हा राव ने एक किताब तक लिख डाली है – ‘ लोकतंत्र खतरे में : क्या हम अपने ईवीएम पर भरोसा कर सकते हैं ‘ |इस पुस्तक की प्रस्तावना में लालकृष्ण आडवाणी ने ईवीएम की भरपूर आलोचना की है | उनके अलावा कई बड़े भाजपा नेताओं ने भी आसमान सर पर उठा लिया था | इन बातों को मद्देनजर रखते हुए राजनीति और दलगत हितों से दूर रहकर सोचना होगा कि क्या वाकई में साइबर हैकिंग बड़ी समस्या है और वह लोकतंत्र में आम जनता की आस्था को डिगा सकती है ?
ईवीएम के सुरक्षा प्रबंधों को ध्यान में रखते हुए समय - समय पर इसमें बदलाव किये गये हैं। जैसे .. पहले एक ही तरह की ईवीएम मशीन होती थी उसमें दोबारा वोटों की गिनती नही हो सकती थी। फिर दूसरा प्रकार लाया गया जिसमें दूसरी बार वोटों की गिनती संभव थी। साइबर हैकिंग की समस्या को देखते हुए ईवीएम को एक फुलप्रूफ इंतजाम मानना भूल हो सकती है वो भी तब जब लोकतंत्र का सारा दारोमदार चुनावी व्यवस्था पर टिका हो लेकिन हम किसी पार्टी को शक के दायरे में नही ला सकते हैं क्योंकि जरूरी नही है कि हैकर पार्टी विशेष का समर्थक हो। इसलिए संदेह के बजाय इस मुद्दे को गंभीरतापूर्वक लेकर मिल बैठ कर विचार विमर्श करना चाहिये और इससे छुटकारा पाने का मजबूत विकल्प ढूंढना चाहिये।

इससे भी बड़ी बात है ईवीएम को और अधिक भरोसेमंद बनाने के लिए ईवीएम मशीन के साथ वोट का प्रिंट आउट यानी वीवीपीएटी तकनीक लागू करने का आदेश उच्चतम न्यायालय ने दिया जिसकी खानापूर्ति में कई जगह जिला प्रशासन ने उम्मीदवारों के सामने इसका प्रदर्शन भी किया लेकिन वह अधिकांश जगह नहीं लगाई गई | बताते हैं की इसमें भी खामियां हैं , कुल मिलाकर इसे महज विपक्ष का प्रलाप मानकर टालना न्यायसंगत नहीं होगा | मजे की बात है दुनिया के ब्रिटेन , जर्मनी , फ़्रांस , जापान , इटली , नीदरलैंड , सिंगापुर , डेनमार्क , आयरलैंड में ईवीएम का इस्तेमाल नहीं होता | कंम्प्यूटर विज्ञानियों के अलग – अलग मत हैं अधिकतर मानते हैं कि भारतीय मशीनों में आसानी से बदलाव किया जा सकता है | यहाँ बताते चलें कि ईवीएम मशीन का निर्माण इलेक्ट्रॉनिक्स कारपोरेशन ऑफ़ इंडिया ( परमाणु ऊर्जा विभाग का एक उद्यम ) व भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड ( रक्षा विभाग के अधीन ) करते हैं और इसमें इस्तेमाल होने वाली चिप का साफ्टवेयर भी यहीं विकसित किया जाता है ऐसे में इनकी विश्वसनियता पर संदेह करना उचित नहीं होगा | हालांकि कई सियासी दल अदालत की शरण में चले गये हैं सो फैसले का इंतजार लाजिमी है |
चुनव आयोग ने हर बार ईवीएम की सुरक्षा को लेकर साफ – साफ कहा है की यह पूर्णतय: भरोसेमंद है | बावजूद इसके लोगों का विश्वास डिगता दिख रहा है , सोशल मिडिया पर नकारात्मक प्रचार भी भ्रम फैला रहा है और कई तरह के वीडियो भी मतदाताओं का भरोसा तोड़ने में कामयाब हो रहे हैं | इस बीच चुनाव आयोग के पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एस वाई कुरैशी का बयान आया है , ‘ चुनाव प्रणाली में लोगों का विश्वास और भरोसा सर्वोपरि है | ईवीएम के नाम पर इसे खंडित करने की अनुमति किसी को नहीं दी जानी चाहिए | ‘ बेशक यही बात लोग और मीडिया भी कह रहे हैं , इसे यह कह कर हवा में नहीं उड़ाया जा सकता कि कांग्रेस जीती थी या सपा , बसपा जीती थी तब ईवीएम ठीक थी और अब भाजपा जीती तो घालमेल हो गया | भाजपा के मुखिया से लेकर प्रधानमन्त्री तक पारदर्शिता और ईमानदारी के प्रति प्रतिबद्ध हैं तो परम्परा के प्रमाण- पत्र की अवश्यकता क्यों ? उससे भी अहम बात है कि भाजपा चुनाव सुधार की प्रबल हिमायती है और उसने इस ओर कदम भी बढ़ाया है उसे ईवीएम पर खुली बहस करानी चाहिए और विरोध में उठ रहे सवालों के जवाब में जाँच बिठा देनी चाहिए | कुछ ऐसा ही कर्नाटक की सूचना एवं प्रौद्योगिकी मंत्री प्रियंका खड्गे ने ट्विटर पर सुझाया है,’ईवीएम के साथ छेड़  छाड़ को लेकर अटकलों का बाज़ार गरम है इसलिए निर्वाचन आयोग को बेंगलूरू के स्टार्टअप को यह इजाजत देनी चाहिए कि वे ईवीएम के साथ छेड़छाड़ का प्रयास करके यह जांचे कि यह संभव है या नहीं |’ इससे इतर सरकार को और चुनाव आयोग को आधार कार्ड से मतदान कराने पर सोंचना चाहिए  |यहाँ ये बताना भी प्रासंगिक होगा कि हाल ही में विश्व बैंक के मुख्य अर्थशास्त्री पॉल रोमोर ने भी आधार योजना की तारीफ करते हुए इसे ‘ दुनिया की सबसे बेहतर पहचान-पत्र योजना ‘ बताया है |  

सरकारी आंकड़े बताते हैं की देश में आधार कार्ड की संख्या सौ करोड़ पार कर चुकी है और बैंक से लेकर आयकर , गैस , मातृत्व लाभ योजना , आंगनवाड़ी सहित सभी योजनाओं में आधार जरूरी कर दिया गया है तो इसी आधार को मतदान में क्यों नहीं इस्तेमाल किया जा सकता ? सबसे बड़ी बात है कि आदमी की पहली और अहम जरूरत  पैसा है जिसे बैंकों से निकालने के लिए एटीएम कार्ड और कैशलेश के लिए ऑनलाईन इंतजाम तो आधार से ऑनलाईन मतदान क्यों नहीं ? इसमें मतदाता की अँगुलियों के निशान जब तक मेल नहीं खाएंगे तब तक मतदान हो ही नहीं सकेगा और हैकिंग का कोई खतरा भी नहीं होगा | इस पर बहस होनी चाहिए |