Thursday, March 10, 2016

गृहिणी के मन की बात मेट्रो से.....?


भइया दाल, भात और आलू-टमाटर पर कौन बहस करेगा? यह सवाल किसी ‘होरी’ या ‘घीसू’ ने नहीं मेरे सामने गरीबी की रेखा की तरह फैला दिया और न ही मनरेगा के स्मारक के इंतजार में खड़े ‘झंझटी’ ने उठाया है। यह तो एक शुद्ध भारतीय गृहिणी की उदास निराश लेकिन अहम् पूंछताछ है। उसे न तो किसी आरक्षण की आस है, न ही किसी सब्सिडी की, उसे तो अपनी रसोई में खाना पकाने के लिए सस्ती दर पर गैस सिलेंडर की जरूरत है। उस पर पकाने लिए दाल-चावल, सब्जी-आटे की दरकार है। इस गृहणी के ‘मन की बात’ ‘मेट्रो’ से चलकर कब तक सरकार के दरवाजे तक पहुंचेगी?
    जो लोग कल संवारने में अपनी पूरी ताकत खपा दे रहे हैं और जिनकी अस्थियां तक भारत माता के जयकारे लगाने की बाकायदा कसमें खाने  को तैयार हैं, क्या उनके कानों में भी यह मासूम सवाल सुनाई दे रहा है? या फिर जिस तरह रेल किराये की तुलना सेब, सिनेमा के टिकट से करते हुए उत्तर प्रदेश के खाते में बड़े-बड़े एलान कर दिये गये और पिछले वाले भुला दिये गये, उसी तरह इस पेट का दोजख भरने वाले सवाल को नजरअंदाज कर दिया गया।? क्या केन्द्रीय खाद्यमंत्री के बयान, ‘भारतीय दाल ज्यादा खाने लगे हैं, इसलिए अरहर दाल महंगी हो गई’ को सही मान लिया जायेगा?
    सवाल और भी हैं और उन्हें उठाना भी बेहद जरूरी है। वकील साहबान से किस ‘देशप्रेम’ की प्रेरणां मिल रही है? मेरे चाचा ने मुझे वकील बनाना तय किया था। उसी हिसाब से सपने भी देखे, लखनऊ विश्वविद्यालय के भीतर तक पहुंचाने की कोशिश की लेकिन मैं वकील न बन पाया। आज लगता है शायद ईश्वर ने सही फैसला किया था, क्योंकि जो हिंसात्मक समाचार वकीलों के लिए सुर्खियां पाते रहते हैं, वह मेरी 35 किलो की काया कतई बर्दाश्त न कर पाती। तकदीर ने पत्रकार, वह भी लोगों की जुबानी चिथड़ा पत्रकार बना दिया। यूं तो पत्रकारों को गरियाने का फैशन या चलन जो भी हो काफी बढ़ गया है। कोई दलाल कहता है, तो कोई रंडी। इससे भी मन नहीं भरता, तो गालियों के शब्दकोश का हर पन्ना उछाल देते हैं। मजा इस बात का है कि यही गरियाने वाले अपने दोहरे चरित्र के साथ जीते हुये अपने समाचार/फोटो छपवाने के लिये सौ-सौ जतन करते हैं। इतना ही नहीं तमाम तरह के प्रलोभनों का सहारा लेते हैं। आज के युवा व देशभक्त श्रेणी की पहली पांत के नेता लिपी-पुती महिलाओं को ‘विजटिंग कार्ड’ की तरह साथ में लेकर अखबार के दफ्तरों के चक्कर लगाते देखे जा सकते हैं। इनमें तमाम अपनी खबर छपवाने के लिये फोन करके, कराके काम करना दूभर कर देते हैं। गो कि रंडी के खिताब से पत्रकारों को नवाजने वाले उसी ‘रंडी’ के आगे लार टपकाते नहीं थकते।
    मुझे अपने पत्रकार होने पर नाज है,भले ही मूर्खों की जमात हिंसा पर, हत्या पर या जिंदा जला देने पर ही क्यों न उतारू हो। हां अंतिम बात या चेतावनी कि पत्रकार केवल गांधी या गणेश का शिष्य नहीं रह गया है, अब उसे भी कलम के साथ तमाम आधुनिक संसाधनो की जानकारी है।
    हां! इन दिनों देशप्रेम, देशद्रोह का सवाल पूरे देश के सामने पसरा हुआ है। इस सवाल को खड़ा और बड़ा करने वाले महानुभाव  रोज देशद्रोह जैसा अपराध करते नहीं थकते, कोई बिजली चोरी में लगा होता है, तो कोई टैक्स। इससे भी बढ़कर जमीनों पर कब्जा, पानी, अनाज, दवाई और जीवनदायी सामानों में सरेआम लूट करते हैं। और तो और आदमी की तस्करी जैसे जघन्य अपराध कर रहे हैं। दाल, आलू, प्याज तक की कालाबाजारी करने के साथ मिलावटी खाद्य वस्तुएं सरेआम बेंचते हैं। यह अपराध या देशद्रोह नहीं है? इन अपराधों में कितनों को पकड़ा जा रहा है या कितनों को सजा हो गई?
    इन सारे सवालों से बड़ा सवाल यह है कि यह मुल्क किसका है? बयानबाजों का या भाजपा का या कांग्रेस का या साधू से नेता में बदले जुबानदराजों का या जातियों का, आखिर किसका है यह देश? क्या देश-प्रदेशों में काबिज सरकारों से पूंछकर देशप्रेम करना होगा? क्या मंत्री, अफसर तय करेंगे कि देशवासी अपनी पत्नियों के पास सोने, सेक्स के लिए कब जायेंगे? बगैर पूछे जाने पर बलात्कार का आरोपी माना जायेगा?
    मैं राम प्रकाश वरमा, पत्रकार से पहले भारत का नागरिक होने की हैसियत से सरकारों और तमाम नेताओं से पूंछता हूं, देशप्रेम की क्या परिभाषा है? कौन आता है देशप्रेम के दायरे में? और क्या देश से प्रेम करने के लिये सियासी दलों से प्रमाण-पत्र लेना पड़ेगा?

गांव में ‘होरी’ तो मजूर ही है..!


दिल्ली सरकार के ताजा बजट में किसानों के भले का बड़ा हल्ला है। गरीब की जिंदगी में सुख भरने का व रसोई में सस्ती गैस पहुंचाने का ढोल बज रहा है। सच इससे परे है। किसान को कर्ज देकर क्या फायदा, जब उसके खेत में फसल ही नहीं होगी। खेती-किसानी का सच देखिये।
1- गांवों में बिजली है नहीं ।
2-सिंचाई के लिये पानी है नहीं।
3-खाद बीज ,डीजल की मारामारी है।
4-फसलों की सुरक्षा बीमा के नाम पर कम्पनी ठगी पर उतारू।
इन सबकी हकीकत पर गौर करिये, आम तौर पर बिजली आपूर्ति का कोई मानक तय नहीं, कागजो, बयानों में जो भी हो यथार्थ में दो घंटे भी नहीं मिलती बिजली। यही हाल पानी का है, नलकूपों (जहां हैं) से 110रु0 व ट्यूबवेल (डीजल) से 150रु0 प्रति घंटा की दर से मिलता है।
    चारो तरफ दाल के महंगे होने का हल्ला है उसकी उपज कम होने का रोना है, मगर सच से कोई भी रूबरू नहीं होना चाहता। किसान अरहर या कोई और दाल कैसे बोये अपने खेतों में जब खड़ी फसल नीलगाय के झुंड किसान की आंखों के सामने बर्बाद कर देते हैं। किसान उन्हें मार नहीं सकता , उनका शिकार नहीं किया जा सकता ऐसे में इनकी संख्या लगातार बढ़ती जा रही है।
    यहां बताना जरूरी होगा कि नीलगाय कृषि क्षेत्र में रहती है जहां हिंसक जानवरों का आना लगभग न के बराबर होता है लिहाजा उनको कोई संकट नहीं होता। शिकारी भी परमिट लेकर नीलगाय का शिकार करने में दिलचस्पी नहीं लेते क्योंकि उन्हें कोई लाभ नहीं मिलता। वन्य संरक्षण अधिनियम के अनुसार शिकार की गई नीलगाय सरकारी संपत्ति होगी जिसे गड्ढा खोदकर दबा देना होता है। उससे भी बड़ी समस्या उसे गाय मानने की है जबकि वैज्ञानिक रूप से यह गोवंश में नहीं आती है। अब रही कर्ज की बात तो किसान का खून परधान से लेकर बैंक तक बेदर्दी से पीते हैं।
    इसके लिये किसी गवाही की जरूरत नहीं, रोज आत्महत्या करते किसान और बैंकों के खातों में दर्ज किसानों के नाम चढ़ी रकम काफी है। ऐसे में गांव,किसान,गरीब का भला कैसे होगा? मजबूरन किसान मजूर हो जा रहा है या पलायन कर शहरों में रहकर छोटे-मोटे काम करने को मजबूर है।

आज प्यार, कल बलात्कार?

जिंदा और भावुक आदमी जिस महिला से प्रेम करता है, क्या उससे बलात्कार कर सकता है? सालों दैहिक सुख का आनंद उठाने के बाद दोनों में मन-मुटाव के कारण अलगाव हो जाता है, तो क्या मर्द बलात्कार का अपराधी होगा? आये दिन हो रहे बलात्कारों में क्या सत्य तथ्यों पर जांच हो रही है? सवाल तो और भी हैं, लेकिन इन तीन प्रश्नों के उत्तर में कई अदालतों में समय-समय पर उचित फैसले आ चुके हैं। बावजूद उसके मोमबत्ती मार्च, निकम्मी सरकार हाय-हाय... और विरोध की सियासत का हलक फाड़ दबाव पीडि़तों को इंसाफ दिला पाता है? अधिकांश मामलों में बेगुनाह जेल जाते हैं? जिस नाबालिग छात्रा के बलात्कार को लेकर अखबार से लेकर दसियों संगठन व विपक्ष के नेता विधानसभा के भीतर तक हंगामा मचाये हैं, उसमें जांच के नाटकीय पहलुओं पर बड़ी बारीकी से जांच हो रही है। असल तथ्यों को बेहद चालाकी से तमाम दबावों के चलते नजरअंदाज किया जा रहा है? पहले दिन पुलिस ने ही बताया, अखबारों में छापा गया, ‘छात्रा अपनी साईकिल चलाकर अकेली जानकीपुरम से हजरतगंज होती हुई घटनास्थल की ओर जाती देखी गई।’ फिर गुमशुदगी की शिकायत का बार-बार जिक्र? पुलिस उस ओर जांच क्यों नहीं कर रही कि वह लड़की अपने घर से स्कूल जाने के लिए निकली, लेकिन स्कूल न जाकर घटनास्थल तक अकेली आई तो किसके बुलावे पर और क्यों? बस यहीं सवाल उठाता है कि क्या महज खानापूरी की जा रही है?
    लंदन की हाकी खिलाड़ी अशपाल कौर ने भारतीय हाकी कप्तान सरदार सिंह पर बलात्कार का मुकदमा पिछले दिनों लुधियाना में दर्ज कराया। उनके अनुसार चार साल पहले उनकी सगाई सरदार से हुई थी और वे इस दौरान शारीरिक संबंधों के साथ रहे जिसके नतीजे में एक गर्भपात भी कराना पड़ा। अब सरदार सिंह पर बलात्कार का मुकदमा? धोखाधड़ी के कारणों की या वायदाखिलाफी की जांच अवश्य होनी चाहिए। ऐसे ही पिछले महीने लखनऊ के पीजीआई थाने में एक युवती का मामला आया है, सालांे साथ रहे, गर्भपात कराया अब यौन शोषण का मुकदमा? जब आपसी सहमति नहीं होगी तो सालों बलात्कार संभव है? वह भी बगैर बंधक बनाये?
    यहां बताते चलें कि उच्च न्यायालय दिल्ली ने 10 अगस्त 2010 में एक मुकदमें में फैसला दिया था, ‘लिव-इन में एक पार्टनर कभी भी बिना किसी कानूनी परिणाम के रिलेशनशिप से बाहर जा सकता है और उनमें से कोई भी धोखा देने के नाम पर एक दूसरे की शिकायत दर्ज नहीं करा सकता। इसी न्यायालय ने आगे कहा है, ‘जब दो वयस्क एक साथ रहना चाहते हैं तो इसमें अपराध क्या है? इसे अपराध करार नहीं दिया जा सकता।’ इसी तरह वेलूस्वामी-पचैया अम्माल केस में महिला का दावा था कि वेलू ने दो साल तक उसे पत्नी की तरह रखा बाद में उसे छोड़ दिया। 12 साल बाद अम्माल ने अदालत में अर्जी देकर गुजारा भत्ते की मांग की जिस पर निचली अदालत ने पचैया को पांच सौ रुपये माहवार गुजारा भत्ता देने का आदेश दिया। जिसके खिलाफ वेलू उच्चतम न्यायालय गया, जहां 21 अक्टूबर 2010 को फैसला दिया गया, यदि कोई व्यक्ति किसी महिला को रखता है, उसे यौन इच्छाओं की पूर्ति/नौकरी करने के एवज में वह धन देता है तो ऐसे संबंध को हमारी राय में वैवाहिक प्रकृति के संबंध नहीं माना जा सकता।’ इतना ही नहीं उच्चतम न्यायालय में जस्टिस के.एस. राधाकृष्णन की अध्यक्षता वाली खण्डपीठ ने 22 नवंबर, 2013 में एक मुकदमें में फैसला दिया, ‘लिव-इन- रिलेशनशिप में रहना न कोई अपराध है और न ही पाप’। इसी तरह, लिव-इन-रिश्तों के आधार पर महिला को गुजारा भत्ते का अधिकारी भी नहीं माना। ऐसे दसियों परिस्थितिजन्य मुकदमों का हवाला दिया जा सकता है। लिव-इन-रिलेशन में रहकर दोनों प्राणी दैहिक सुख उठाते हैं, फिर मनमुटाव या अलगाव के हालात मंे मर्द बलात्कारी कैसे हो सकता है? साफ-साफ कहें तो आज प्यार हुआ राजी-खुशी समर्पण हुआ। कल महिला बलात्कार का मुकदमा कैसे दर्ज करा सकती है? इस सवाल पर गम्भीरता से सामाजिक बहस की जरूरत है।

शामियाने तले जनाना बंदोबस्त...!

‘तो मुलाहिजा हो... ‘सीन-सीनरी पुराने डिरामे की। लाइट फोकस सही। हुक्का-तमाखू चालू। जो पके लपूस हैं सो लिहाफ-दुलाई ओढ़े बैठे हैं। जवान-बांके की बात अलग। छापे का तहमद लगाये, बीड़ा दबाये, सुरमा जमाये, मूंछ की नोक पे गोंद लगाये घड़ी के दस बजा रहे हैं, खामखाही में बेफजूल खिलखिला रहे हैं। शामियाने तले जनाना बंदोबस्त अलग है। दूर-दूर से निगाहों का कनक्सन चल रहा है। इधर से होली की मुबारिक गयी, उधर से डेढ़ आँख भर जवाब आया।’ पहचाना अक्षरों के इस हुरियार को...? अजी जनाब ये हैं अपने मिर्जा के लंगोटिये के.पी. सक्सेना, ‘खेल पोरस और सिकंन्दर का’ के शब्दबेधी मंच पर।
    ‘अब जरा इन्हें भी पहचानिये, बरगद का वह पेड़, पक्षियों में बड़ा लोकप्रिय है। बेरोजगार कौवे, अखाड़े तथा बहाने की तलाश में निकले लड़ाकू तीतर, स्कूल जाती चिडि़यों को घूरने के इरादों वाले आवारा चिड़े, किसी खाये-पिये सेक्रेटरी से तृप्त तोते, गोल-गोल आँखें मटकाती-फुदकती मैनाएं सभी शाम होते इस बरगद पर बैठ जाते हैं।...... आना सार्थक हो जाता है, दो-चार डालों पर घूमघाम करके पूरे शहर के समाचार पेड़ बैठे प्राप्त हो जाते हैं।.....कबूतर बेचैन हो उठा। उसने एक उदास उड़ान भरी.... पोर्च पर से गुजरते हुए उसने देखा चपरासी बांस पर झाडू बांध रह थे। एक झटके में घोसला उछल गया है और अंडे टूट गये हैं।’ नहीं... पहचाना.....‘राजनीति और कबूतर के अंडे’ एक सांस में पढ़ते हुए पीड़ा भरे व्यंग्य के साथ हास्य के रंग-बिरंगी शब्दों की चादर तले भाई ज्ञान चतुर्वेदी ने कोई पैंतीस बरस पहले ‘धर्मयुग’ (होली-विशेषांक) के पन्ना नंबर सोलह पर हिन्दी के पाठकों के साथ मन भर होली खेली है।
    उस वक्त टाइम्स आॅफ इंडिया की पत्रिका ‘धर्मयुग’ के संपादक होते थे बड़े भाई धर्मवीर भारती जी और उनके सहायकों में गणेश मंत्री व मनमोहन सरल। यह वह दौर था जब ‘करंट’ हिन्दी साप्ताहिक के आखिरी पेज पर हरिशंकर परिसाई जी के तीखे तंज धमाल मचाकर अखबार बन्द होने के साथ छपना लगभग बंद हो चुके थे और ‘धर्मयुग’ को छपते हुए बत्तीस बरस बीत गये थे। ‘धर्मयुग’ देशभर की हिन्दी पट्टी की सबसे प्रिय पत्रिका थी। विदेशों में भी इसके पाठक पत्रिका की सिलाई खोलकर उसके पन्ने आपस में बांटकर पढ़ते थे।
    इसी होली विशेषांक में होली; मंगलाचरण पर ‘ब्लफ़ाय नमः ब्लफ़ मास्टराय नमः’ जपते गोपाल प्रसाद व्यास की लंतरानी, तो भंग भवानी की किरपा प्राप्त विनोद शर्मा ‘खर्चा खुराक जानवरान’ की आर्थिक नवलकथा बांच रहे हैं। राजनीति से ऊब गये देशपांडे, ‘कहां तक बखान करें अपनी इस ऊब का?’ औ ‘गुलमुहर तेल ‘रवीन्द्रनाथ त्यागी के साथ सुरेशकांत ‘गांधी जी के बंदरों पर फिल्म’ की होलियाना शूटिंग में गांधी बाबा से लौ लगाये हैं। बीच मंे ‘मेरी कारः मेरा हाहाकार ‘मचाये सुरेन्द्र शर्मा की चार लाइना भी हंै। ऐसे में काव्य संध्या का आयोजन न हो तो भला हारियारों को भौजाई-लुगाई का फरक भूलने का मौका कैसे मिलेगा। शैल चतुर्वेदी की ‘शादी भी हुई तो कवि से, भगवान जाने किस्मत में क्या बदा है, भागवान के लिए बैठ जाइए। बैठने के पांच सौ रूपये दिलवाइए का नारा बुलंद करते पूरी एक सौ पचहत्तर गलियों में गुम होने की धमकी देते हुल्लड़ मुरादाबादी के ऐन बगल में ‘रिटायर्ड कवियों के गोरखधंधे बनाम होली के फंदे’ का भूगोल सुधारने माणिक वर्मा, मधुप पाण्डेय के ठीक नीचे कपड़ों पर पचास प्रतिशत छूट पढ़ती सरोजनी प्रीतम मौजूद हैं। गजब हो गया... ओम प्रकाश आदित्य एकदम ऊपर आश्वासन का जर्दा, भाषण की सुपाडि़यां चभुलाते’ नेता का नख शिख वर्णन’ करते दिख रहे हैं। सुरेन्द्र तिवारी ‘इक पीली-सी चिडि़या की फागुनी भविष्यवाणी’ सुना रहे हैं। होली के हंसगुल्ले भी हैं। हरीश नवल के ‘मिलना डिग्री का चमन लाल को’ के साथ शंकर पुंणतांबेकर का ‘परीक्षा प्रसाद’ भी रवींद्र भ्रमर की ‘इसी होली में’ मौजूद है।
    ‘रूप फागुनी-धूप फागुनी’ हो और ‘होली हाथी पर सवार’ दिखे तो ‘कुछ रंगीन यादें’ औ... ‘काशी की होरी के रंग खूब छनी भंग’ तो ‘आजु रंगीली होरी’.... ‘होली दारागंज की’ ‘फागैं बुंदेली रंग बोरीं, खेलैं रस की होरी’ के बीच ‘हलके रंग, गहरे रंग, के साथ महादेवी जी भी महिलाओं की दशा-दुर्दशा पर चिंतित दिखाई देती है। बिना शिवानी जी के बेटे की बारात के संस्मरण और अमृतलाल नागर के उपन्यास ‘खजन नयन’ के अंश एवं दब्बू जी के कार्टून कोने के जिक्र के ‘धर्मयुग’ का यह होली-विशेषांक पूरा नहीं होता। महिलाओं ने भी ‘होली पर थोड़ी लिबर्टी’ ली हैं। गो कि होली की भरपूर मस्ती छनी है, बुजरूग से लगाये जिनका तन नहीं अटता चोली में उन्होंने  भी बड़े गहरे घोले है रंग, इस होली की ठिठोली में ‘धर्मयुग’ के रंगीन-संगीन पन्नों पर।

Tuesday, November 17, 2015

लिफ्ट में शौचालय!

भारत में शौचालय घरों व सार्वजनिक स्थालों पर बनाये जाने के लिए अभियान चलाया जा रहा है। सरकार 12 हजार रूपये प्रोत्साहन राशि देने का प्रचार करने जा रही है। वहीं जापान में सरकार ने पिछले दिनों फैसला लिया है कि वह अपने देश की लिफ्टों (एलीवेटर्स) में शौचालय व पानी की व्यवस्था करेंगे जो आकस्मिक अवसरों पर उपयोग में लाये जा सकेंगे दरअसल पिछले दिनों जापान में 7.8 तीव्रता वाले भूकंप आने के कारण बहुत सारे लोग घंटो लिफ्ट में फंसे रहे और कंपकपाती द्दरती ने उन्हें बाहर निकलने से रोके रखा। कई इलाकों में लोगो ने कई दिन लिफ्ट में गुजारे जहाँ उन्हें पीने का पानी व शौचालय की दिक्कतों का सामना करना पड़ा। मेट्रो न्यूज रिपोर्ट के अनुसार सरकार नष्ट किये जा सकने वाले कार्ड बोर्ड के ढांचे वाले शौचालय और पानी सोख लेने वाले कागज (सोखता) के थैले छोटी जगह में रखने पर विचार कर रही है। एलीवेटर्स एसोसिएशन और इंस्फ्राटक्चर मंत्रालय इसे मूर्तरूप देंगे।