Monday, December 5, 2011

shradhanjali

..... तो खबर बन गये
संवेदना के लिए शब्दों की तलाश, खासकर किसी मित्र की मृत्यु के बाद दो शब्द लिखने के लिए शब्दों की तलाश करने में कई बार आंखों के आगे सब कुछ धुंधला जाता है। ऐसे धुंधल के में टी.वी. पत्रकार ए.के. वाॅट के निधन के समाचार की पट्टी टेलीविजन के पर्दे पर बार-बार आ रही थी। यह पट्टी फिल्म अभिनेता देव आनंद की मृत्यु के समाचार के साथ ही चल रही थी। कई बार देखने और गौर से पढ़ने के बाद खबर का सच सुन्नकर गया। इससे ठीक एक दिन पहले 3 दिसंबर को अपने साथी पत्रकार एम.ए. हफीज की मृत्यु का समाचार सुन चुका था।
    देव आनंद से वाॅट का याराना तो दूर कहीं कोई दुआ सलाम भी नहीं थी। फिर भी उसने आखिरी रास्ते के लिए देव आनंद को सहयात्री चुना? वह भी खबर बनकर! गो कि आखिरी खबर तक अपने पेशे के लिए ईमानदार रहे ए.के. वाॅट। खबर बनाने का मौका फिसला तो खबर बन गये।
    वाॅट भी देव साहब की तरह जिंदादिली से खबरों की दुनिया में छाये रहे। वे दूरदर्शन से रिटायर हो गए थे, फिर भी संविदा पर काम करते रहे, खबरें बटोरते रहे और प्रसारित कराते रहे। उनके मन में एक अच्छा अखबार निकालने की योजना खदबदा रही थी। वे जब भी मिलते तो ‘प्रियंका’ देखकर कहते, ‘यार तू कैसे इसे निकाल ले रहा है? मैं भी आता हूँ एक दिन तेरे साथ बैठता हूँ, मुझे बताना क्या गुर है।’ लेकिन वह अखबार निकालने के गुर जानने कभी नहीं आया और अब तो वह खुदाई करिनूमों की रिपोर्टिग पर .....! परमात्मा से साक्षात्मकार के बाद जाने कब खाली होगा। खाली होगा भी कि नहीं....! मित्र अगली मुलाकात तक के लिए प्रणाम!









शोकसभा हुई
लखनऊ। वरिष्ठ पत्रकार ए.के. वाॅट का हृदयगति रूक जाने से रविवार, 4 दिसंबर, 2011 को उनके आवास पर व एम.ए. हफीज का लंबी बीमारी से शनिवार की सुबह हृदयगति रूक जाने के बाद सिविल अस्पताल में निधन हो गया। दोनों पत्रकारांे ने अपने जीवन में खबरां की निष्पक्षता व सत्य का साथ कभी नहीं छोड़ा।
    ‘प्रियंका’ हिन्दी पाक्षिक कार्यालय में दोनों पत्रकारों को श्रद्धांजलि देने के लिए शोकसभा हुई।

Sunday, November 6, 2011

कवि कोविद क्लब के जन्म-दाता की आरती

श्री दुलारे लाल भार्गव
की कतिपय कविताएंः समयानुसार
मैं तो आरती उतारूं श्री दुलारे लाल की।
श्री दुलारे लाल की, श्री दुलारे लाल की।।
        मै तो.........................
सुकवि दुलारे लाल की, ब्रजभाषा प्रतिपाल की;
जिनकी दोहावली बनी है बिंदी हिन्दी भाल की।
श्री दुलारे लाल की, श्री दुलारे लाल की।।
        मै तो...........................
हिंदी कवियों के निर्माता, हिंदी के गौरव विख्याता;
हिंदी भाषा के संरक्षक कुंजी कोष विशाल की।
श्री दुलारे लाल की, श्री दुलारे लाल की।।
        मै तो...........................
‘कवि-कोविद-क्लब‘ जीवनदाता, छन्द अलंकारों के ज्ञाता
सत्य धर्म के परम पुजारी, सज्जनता जय-माल की।
श्री दुलारे लाल की, श्री दुलारे लाल की।।
        मै तो...........................
संत संग संतो की चर्चा, ध्यान आचरण ईश्वर अर्चा;
कविता की अविरल सुर सुरिता भक्ति सुरभि सुरमाल की ।
श्री दुलारे लाल की, श्री दुलारे लाल की।
मैं तो आरती उतारूं श्री दुलारे लाल की।।
लखनपुरी के लाड़ले दुलारे लाल की।।
भव्य अवध की वन स्थली ता में त्वं अभिराम।
शुद्ध भारती परिग्रही शत-शत तुम्हें प्रणाम।।
--गिरिजा देवी ‘निर्लिप्त‘-- 

दुलारे दोहावली एक परिचय

लोकनाथ द्विवेदी ‘सिलाकारी’
कविवर पं0 दुलारे लाल जी भार्गव की इस श्रेष्ठ रचना ‘‘दुलारे दोहावली’’ में सब मिलाकर दो सौ आठ दोहे है- (1) गणेश प्रार्थना (2) राधा कृष्ण विनय (3) रमापति विनय (4) मातृ-भूमि वन्दना (5) कवि धर्म (6) वीर रस के लिए कवि प्रार्थना (7) कला और (8) सरस्वती वन्दना। इसके बाद मुख्य ग्रंथ प्रारंभ होता है। इन दोहा रत्नों को कवि ने यत्र-तत्र बिखेर कर रखा है।
    दुलारे दोहावली जिस रचना प्रणाली पर लिखी गई है, उनके अनुसार यह साहित्य शस्त्र की दृष्टि से एक ‘‘कोण’’ है, जिसमें 208 दोहे रत्न यत्र-तत्र अपने ही आप में पूर्ण रहकर अपनी कमनीय कांति प्रदर्शित कर रहे है। साहित्य - शस्त्र में विवेचकों ने एैसे ‘‘पद्म रत्नो’’ को ‘‘ मुक्तक‘‘ कहा है। पत्रात्मक काव्य के प्रधानतया दो भेद हंै। (1) प्रबन्ध-काव्य (2) मुक्तक-काव्य। प्रबंध-काव्य में कवि एक विस्तृत कथानक का आश्रय लेकर काव्य-रचना करने के लिए एक विशाल क्षेत्र चुन लेता है। उसे काव्य को एक विस्तृत क्षेत्र में यथास्थान भर देने की पूर्ण स्वतंत्रता रहती है। उसका काम अमिधा से निकल जाता है, और कथानक की रोचकता के कारण उसमें मनोरमता रहती है। मुक्तक कार का क्षेत्र बहुत ही सर्किण रहता है, उसी में उसको अपना संपूर्ण कथानक ध्वनि से गंभीर अर्थ -पूर्ण शब्दों में, झलकाना पड़ता है। जहां प्रबंध-काव्य में छंद श्रंृखला संबद्ध रहने के कारण आगे-पीछे के पद्यों का सहारा लेकर अपनी रचना कर सकते है, वहाँ मुक्तक-छंद को स्वंतत्र रूप से एकाकी रहकर अपना गौरवपूर्ण प्रबन्ध के सामने स्थापित करना पड़ता है। इसीलिए खंड काव्य, महाकाव्य आदि लिखने की अपेक्षा मुक्तक लिखना महत्वपूर्ण है।
    यह सत्य है कि मुक्तक की रचना काव्य-कला कुशलता का चरम आर्दश है। एक पूरे प्रबंध(ग्रंथ) में कवि को विस्तृत कथानक का आश्रय लेकर रस स्थापना का जो कार्य करना पड़ता है, वही कार्य एक छोटे से मुक्तक में कर दिखाना विलक्ष्य काव्य रचना सामथ्र्य की अपेक्षा रखता है। कथानक का विस्तृत वर्णन न करके अर्थात् उसका आश्रय न लेकर एक छोटे से छंद में इतना रस भर देना कि अगली-पिछली कथा का आश्रय लिए बिना ही उसके आस्वादन से तृप्त हो जाय, सचमुच में आसाधरण प्रतिभा का काम है। एक ही स्वतंत्र पद्य में विभाव, अनुभव और संचारी भावों से परि-पूर्ण रस का सागर लहराना, एक सम्पूर्ण आख्यायिका को थोड़े से ध्वन्यात्मक शब्दों में भर दिखाना, कथन-शैली में एक निराला बाँकपन एक निराला चमत्कार पैदा करना, उपमान उपमेयों द्वारा समान दृश्य दिखलाकर भावसाधम्र्य अथवा भाव-वैधम्र्य के आलंकारिक वेश को सजाना और सबके ऊपर दो देश-काल-पात्र के अनुकूल, स्वाभाविक प्रवाहमयी, अलंकारिक और मुहावरेदार, अर्थमयी, नपीतुली, भावानुकुल प्रांजल भाषा का सहज-सुकुमार प्रयोग करना सचमुच भारी क्षमता का काम है। मुक्तक की रचना प्रधानतया व्यंग-प्रधान उत्तम-काव्य में होती है। मानव स्वभाव का सूक्ष्मातिसूक्ष्म विश्लेषण करना और प्रकृति पर्यवेक्षण एवं प्रकृति की अनुभूति के साथ गहन से गहन निगूढ़ रहस्यों का उद्घाटन करना मुक्तकों की रचना का आर्दश होता है। पं0 पद्मसिंह शर्मा ने ठीक ही लिखा है-
‘‘मुक्तक की रचना कविता शक्ति की पराकाष्ठा है। महाकाव्य, खंड काव्य या आख्यायिका आदि में यदि कथानक का क्रम अच्छी तरह बैठ गया, तो बात निभ जाती है। कथानक की मनोहरता पाठक का ध्यान कविता के गुण दोष पर नहीं पड़ने देती है। कथानक कथा-काव्य में हजार में दस-बीस पात्र भी मार्के के निकल आए, तो बहुत है। कथानक की सुन्दर सघटना, वर्णनशैली की मनोहरता और सरलता आदि के कारण कुल मिलाकर काव्य के अच्छेपन का प्रमाणपत्र मिल जाता है। परंतु मुक्तक काव्य की रचना में कवि को गागर में सागर भरना पड़ता है। एक ही पात्र में अनेेक भावों का समावेश और रस का सानिध्य सन्निवेश करके लोकोत्तर चमत्कार प्रकट करना पड़ता है ...... इसके लिए कवि का सिद्ध सारस्वतीक और वश्यवाक् होना आवश्यक है। मुक्तक की रचना में कवि को रस की अक्षुण्णता पर पूरा ध्यान रखना पड़ता है, और वही कविता का प्राण है।
(सतसई संजीन भाष्य भू0भा0) 
यद्यपि यर्थाथ में रसमय काव्य ही काव्य है, पर कुछ ऐसे काव्य भी लिखे जाते है, जो नीति एवं धर्म आदि के उपदेश को प्रधानतयः प्रतिपादित करने वाले होते है। इनमें वसुधा रस का अभाव रहता है। सुभाषित मात्र इनमें रहता है, जिसमें केवल वास्वैदरध्य का चमत्कार होता है। मुक्तक भी इस पर बहुतायत से लिखे जाते है। ऐसे सूचित प्रधान मुक्तकों की रचना नीति और धर्म आदि के उपदेश देने के उददेश्य से की जाती है। इनमें भी कथन शैली का बाॅझ-पन और शब्द-चमत्कार का समावेश होना आवश्यक होता है, क्यांेकि इनके बिना सुचि प्रदान उषम मुक्तक नही रखें जा सकते। रस को छोड़कर अन्य काव्याँको का समुचित समावेश इनमें अत्यन्त संक्षेप में करना पड़ता है।
    काव्य की अभिव्यत्ति सर्वोत्कृष्टतया व्यंग में होती है, इसलिए अनेक साहित्य रीति ग्रंथकार महापति विवेवकों ने व्यंग प्रधान काव्य को श्रेष्ठता दी है। बहुत से आचार्य और आगे बढ़ गए है, इसकी अभिव्यत्ति के लिए भी सबल होने के कारण ध्वनिमय व्यंग को काव्य की आत्मा घोषित किया है। इस प्रकार की रस-ध्वनि-पूर्ण काव्य रचना करने वाले ही महाकवि कहलाते है। यह व्यंग में ध्वनि से उसी प्रकार झलकता है, जिस प्रकार अंगना का लावण्य उसके शरीर से। धुरंधर काव्य मर्मज्ञ आनंदबर्द्धनाचार्य लिखते है--
    प्रतीयमान पुनरन्वदेव,
धरूत्वाषित वाणीषुँ महाकवीनाम्;
    यतत्प्रसिद्धवयवातिरिक्त,
विभाति लावण्यभिवांगनामु।।

(ध्वन्यालोक)
‘‘महाकवियों की वाणी में काव्य अर्थ एक ऐसी चमत्कार वस्तु है, जो अंगना के अंग मे हस्तपादादि प्रसिद्ध अवयवों के अतिरिक्त लावण्य की तरह चमकती है।’’
दुलारे-दोहावली के मुक्तक
इस प्रकार के मुक्तक और वे भी रस ध्वनि और भावानुगामिनि उत्कृष्ट काव्य-भाषा से युक्त, दुलारे-दोहावली में, यत्र-तत्र बिखरे हुए देख पड़ते है। यद्यपि ऐसा जान पड़ता है कि दोहावली में आदि से अंत तक कोई क्रम नही है, क्योंकि प्रत्येक पद्य मुक्तक होने से स्वतंत्र है, फिर भी विषय विचार की दृष्टि से दुलारे दोहावली में क्रम है, जो ध्यान से देखने पर मालूम हो जायगा। दोहावली के ये दोहे भाषा और भाव की दृष्टि से परमोत्कृष्ट हुए है। ‘सूक्ति’ के दोहे भी बड़े चुटीले और अनूठे काव्य के उदाहरण है। उनमें भी कथन शैली के तीखेपन के साथ माधुर कसक पूर्ण बांकपन पाया जाता है। इस दोहावली को सूक्ष्म तथा गहन दृष्टि से देखने पर गागर में सागर दिखलाई पड़ने लगता है। इतने विषयों को, इतने थोड़े में, इतने अनूठे ढंग से, सरल काव्य में लिखना और उनमें भी एैसा कुछ लिख जाना, जो बड़े-बडे़ विद्वान व्यक्ति भी न लिख सके थे, सचमुच असाधरण प्रतिभा का काम है। हमारे दोहावलीकार ने ऐसा ही किया है।
गागर मे सागर
इस एक ही छोटे काव्य कोष में इतना भर देना यह सिद्ध करता है कि इसके पूर्व  रचयिता ने बहुत कुछ देखा-भाला है, और उसका हृदय असंख्य अनुभूतियों का आगार बन चुका है। इसमें कवि ने जिस विषय को उठाया है, उसका बड़ा ही सच्चा, अनुभूत, हृदयग्राही और भावभायी चित्र, अत्यंत मनोरम, भावानुगामिनी भाषा में उपस्थित कर दिया है। सजीव कल्पना मूर्तियों द्वारा शाश्वत प्रकृति अंतरग और बहिरंग का रमणीय वर्णन साहित्य शस्त्रानुमोदित उत्कृष्ट कवि कौशल से करने में दुलारे-दोहावलीकार को अभिनंदनीय सफलता मिली है। विशुद्ध भारतीय भावनाओं को मानव प्रकृति को ग्राह, विशद कलात्मक रीति से उपस्थित करने में कवि का कौशल देखते ही बन पड़ता है। इस काव्य-कोष में ऐसे अनमोल मुक्तक रत्न हंै, जिनका मूल्य आंकना बडे़-बड़े जौहरियों का ही काम है। इसमें कवि का प्रकृति-पर्यवेक्षण और विशाल अनुभव स्पष्टतया परिलक्षित होता है।
दोहावली के बहुदर्शिता
स्मरण रहे, केवल पद्य लिखने लगना ही कविता करना नही है। कवि का संसार ज्ञान बड़ा विस्तृत होता है। वह मनुष्य स्वभाव का पारखी होता है। उसकी दृष्टि के सम्मुख प्रकृति का रहस्य खुल जाता है। उसकी कल्पना मत्र्य से स्वर्ग और स्वर्ग से मत्र्य तक अबाध गति से विचरण करती है। दुलारे-दोहावली के प्रणेता को अनेक कलाओं और शास्त्रों की जानकारी हमें आश्चर्यचकित करती है।
    इस दोहावली में व्याघिन का मृग को शेर से मारना और जाल में रखकर ले जाना, चंद्रमा के सम्मुख कमल का संकुचित हो जाना, अडि़यल घोड़े को लगाम खीचतें रहने एवं चाबुक चलाते रहने पर भी एक ही स्थान पर अड़े रहना, चंद्रोदय से कुमुदिनी का विकसित होना, चरसे से पानी का रूक रूककर जल देना, झरने का अविश्रांत प्रपात, पराजित नृपति का भागना और दुर्ग में पनाह लेना, आकाश से तारों का टूट कर गिरना और अमंगल की सूचना देना, बंशी डालकर मछली को फंसाना, कूंची चला कर पट पर चित्र चित्रित करना, चकमक पर लोहे की चोट देकर सूत में आग झाड़ना, बरसते हुए बादल को चीरकर ऊपर चढ़ जाना स्वास्थ्य का सम्पूर्ण सुखों का एकमात्र साधन होना, आत्मज्ञान से ‘‘ सर्व खल्विद ब्रम्ह’’ के भाव की प्राप्ति होने पर शाश्वत आनन्द, चुगल-खोरों की काली करतूत, झंझावात से उपवन का नाश, हवा से तरू का उखड़ जाना, खस की टट्टी से लुओं का शीतल-मंद-सुगध होना, रजनी-गंधा का रजनी में ही सुवास देना, अंबर-बेलि से तरू का शुष्क होना, मटके में मछलियों का कूदना और फंसना अंध-बिंदु के सामने पड़ने पर कोई भी वस्त्र का दिखलाई देना, हीरे की बहुमूल्यता उज्जवलता और कठोरता, बिना तार के तार से समाचारों का चुपचाप जाना और आना, मूर्छित स्वर्ण का कुरंड कण से आबदार बनना, भूकंप सुदृढ़ गढ़ का ढह जाना, आयात पर तट कर लगाकर देश की आर्थिक दशा को सुधारना, ज्वार से सिंधु में बाढ़ आना, शत्रु के प्रबल आक्रमण से भय- विह्वल हो नारियों का व्रत-रक्षणार्थ जौहर करना, छली ठगों का मूचर््िछत कर छलना, डाल पर झूला डाल कर पटली पर झूलना, तंत्री का रूधिर राग रागना, आतिशी शीशी का आँच खाकर भी यथापूर्व रहना, कर्ण का दान, भामाशाह त्याग त्रिशंकु की गति, हरिशचन्द्र की सत्यप्रियता, संध्या-समय पथिक का भटियारी के यहां विश्राम, संपूर्ण नगर के दीपकों का बिजली से जल उठना ब्रम्ह होकर अहंकार खो बैठना, आत्मसमर्पण करने वालों का समर्पण केतु दिखलाना, जल अति का घूम-घूमकर चपलता से एक ही ओर तैरना आदि-आदि अनेक वर्णन हैं, जिनसे कवि के व्यापक ज्ञान और पाँडित्य का परिचय प्राप्त होता है।
दोहावली में काव्यांग
दुलारे दोहावली में अनेक काव्यांगांे के बहुत ही आकृष्ट और विशुद्ध उदाहरण पाए जाते है। यहां कुछ का उल्लेख करना अप्रासंगिक न होगा। निम्नलिखित उदाहरणों से कवि का काव्य-रीति का मार्मिक ज्ञाता होना सूचित होता है। निम्नलिखित उद्धरणों में लाक्षणिक पद्धति का मनोमोहक चमत्कार दर्शनीय है--
पर्वानुरागांतगर्त अनुढ़ा की अभिलाषा दशा--
गुरूजन लाज लगाम, सखि सखि हू निदरि।
टरत न प्रिय मुख ठाम, अरत अरीले दृग-तुरग।
कलहांतरिता:
नाह-नेह-नभ तें अली, टारि रोस कौ राहु
प्रिय मुख चंद दिखाई प्रिय, तिय कुमदिनि बिकसाहु।
व्य-संधि:
नख-सिख देस लायौ चढ़न, इत जोबन-नरनाह
पदीन चपलई उत लई, जनु दृग-दुरग पनाह।
विरह-निवेदन
झपकि रही, धीरै चलौ, लेहु दूरि तें प्यार,
पीर-दब्यौ दरके न उर-चंुबन ही के भार।
प्रवत्स्यत्पतिका
तन-उपवन सहिहै कहा, बिछुरन-झंझावत,
उरयौ जात उर-तरू जबै चलिबे ही की बात।।
आगतपतिका:
मुकुता सुख अंसुआ भए, भयौ ताग उर प्यार,
मन-सूई ते गूंथि जनु, देति हार उपहार।
रूपकातिशयोक्ति-अलंकार
खिलैं अनेक सुभग सुमन, सुमन न नेक पत्याय,
अमल कमल ही पै मधुप, फिरि-फिरि फिरि मंडराय।
व्यतिरेक:
दमकति दरपन दरप दरि, दीपशिखा दुति देह,
वह दृढ़ इकदिसि दिपत, यह मृदु दस दिसनि स-नेह।
मैनंे-ऐन तव नैन, सौहें सरसिज-से सुभग,
ए बिकसित दिन-रैन, वे बिकसित बस दिवस हीं।
तेज तुरंग तुरंग तैं, इतौ कि दुसतर माप,
वह मारंै आगै बढ़ै, यह भागै द्रुत आप।
असंगति:
लरै नैंन, पलकें गिरैं, चित तरपैं दिन-रात,
उठैं सूल उर, प्रीति-पुर अजब अनोखी बात।
उत्प्रेक्षा:
कढि़ सरतें द्रुत दै गई, दृगनि देह-दुति चैंध,
बरसत बादर-बीच जनु, गई बीजुरी कांैध।
दोहावली में अलंकार:

दुलारे-दोहावली में वैसे तो अनेक अलंकारों का वर्णन है, और खूब है, परन्तु कविवर दुलारे लाल का पूर्ण कौशल रूपक अलंकार के उत्कृष्ट वर्णनों में परिलक्षित होता है। स्मरण रहे, उपमा की अपेक्षा रूपक अलंकार का निर्वाह कठिन होता है। इसमें भी परंपरित सावयव सम अभेद रूपक लिखना तो पूर्ण कवित्व-सामथ्र्य की अपेक्षा रखता है। प्रस्तुत दोहावली में कविवर न सावयव सम अभेद रूपक अलंकार की पूर्ण छटा अनेक दोहों में बड़े ही कौशल से छहराई है। किसी विष्रय को उठाकर उसके उचित भाव-साधन्र्य का दूसरा सावयव दृश्य उपस्थित कर उनमें आदि से अन्त तक सम अभेद रूपक का निर्वाह कर ले जाना विलक्षण प्रतिभा, प्रबल कल्पना और व्यापक ज्ञान के साथ-साथ सरस अनुभूति का परिचायक है। अब तक रूपकों की अनुपम छटा के लिए बिहारी-सतसई की ही सर्वापेक्षा अधिक प्रसिद्ध और सम्मान है। पर दुलारे-दोहावली के उत्कृष्ट रूपकों की परंपरित सावयव सम अभेद रहने की काव्य चातुरी देखकर अब विवश होकर यही कहना पड़ता है कि उत्कृष्ट रूपकों की दृष्टि से दुलारे-दोहावली के दोहे बिहारी सतसई के दोहो का सफलता से मुकाबला करते है। वैसे दो-चार रूपक यहां देखिये--
हृदय कूप, मन रहंट, स्मृति-माल माल, रस राग,
बिरह बृषभ, बरहा नयन-क्यौं न सिंचै स्मर बाग?
जोबन-बन बिहरत नयन-सर, सों मन-मृग मारि-
बांधति व्याधिनि केसिनि, केसन-पास संवारि।
नाह-नेह-नभ तें अली, टारी रोस कौ राहु-
प्रिय-मुख-चंद दिखाहु प्रिय, तिय-कुमुदिन विकसाहु।
चितन्वकमक पै चोट दै, चितवन-लोह चलाइ-
हित-आगो हिय-सत् मैं, ललना गई लगाई।
रही अछूतोद्वार-नद छुआछूत-तिय डुबि,
सास्रन कौ तिनकौ गहति क्रांति-भंवर सौं ऊबि।
यौरप-दुःशासन निठुर, खींचत लखि निधि चीर-
जन्मभूमि-कृष्ण करी ‘‘मोहन’’ अभय-शरीर।
दंपति-हित-डोरी खरी, परी चपल चित-डार,
चार चखन-पटरी अरी, झांेकनि झूलत मार।
चख-चर चंचल चार मिलि, नवल-बयस-थल आय-
हित झंपान ते चित-पथिक स्मर-गिरि देत चढ़ाय।

भाषा
    दुलारे दोहावली की भाषा प्रौढ़ साहित्यिक ब्रजभाषा है। स्मरण रहे, प्राचीन काल ही से साहित्यिक ब्रजभाषा में अत्यंत प्रचलित फारसी, बुंदेलखंडी, अवधी और संस्कृत के तत्सम शब्दों का थोड़ा-बहुत प्रयोग होता रहा। ब्रजभाषा के किसी भी कवि की भाषा का बारीकी से अध्ययन करने पर उपर्युक्त बात का पता सहज ही चल सकता है। कुछ प्राचीन कवियों ने तो अनुप्रास और यमक के लिए भाषा को इतना तोड़ा-मरोड़ा है कि शब्दों के रूप ही विकृत हो गये हैं। यद्यपि दोहावलीकार ब्रजभाषा के निर्माता सूर, बिहारी, आदि कवीरवरों द्वारा अपनाए गए बुन्देलखंडी, अवधी और फारसी के अत्यन्त प्रचलित शब्दों का बहिष्कार करना अनुचित मानते है, पर उन्होनें प्रायः ब्रजभाषा के विशुद्ध रूप को ही अपनाया है। दूसरी प्रान्तीय हिन्दी-बोलियों अथवा फारसी के शब्दों का आपने इने-गिने दस-पांच स्थलों पर ही, जहां उचित समझा है, प्रयोग किया है। आपने अत्यन्त प्रचलित अंग्रेजी शब्दों का भी दो-चार दोहों में प्रयोग किया है, परन्तु ऐसे स्थलों में प्रस्तुत अंग्रेजी शब्द वे है, जिनके पर्यायवाची शब्द हिन्दी में नहीं मिलते, और जिन्हें आज जनता भली भांति समझती है। जैसे-
शासन कृषि तै दूर, दीन प्रजा-पंछी रहै,
सासक-कृषकन क्रूर, आर्डिनेंस-चंचै रचै।

इसमें आर्डिनेंस का प्रयोग ऐसा ही हुआ है। एक और भी उदाहरण दर्शनीय है, जिसमें प्रचलित अंग्रेजी शब्दों के प्रयोग द्वारा कविवर श्री दुलारे लाल ने ‘‘भाषा-समक‘‘ अलंकार रखा है-
सत इसटिक जग-फील्ड लै जीवन हाकी खेलि,
वा अनंत के गोल मैं, आतम बालहिं मेलि।

दोहावली की भाषा में बोलचाल की स्वाभाविक और जबांदानी का चमत्कार सर्वत्र दर्शनीय है। पद-मैत्री का भी सौष्ठव है। अनुप्रास, श्लेष और यमक का बड़ा ही औचित्यपूर्ण, रसानुकूल, सुन्दर प्रयोग किया गया है। माधुर्य, प्रसाद और ओज की अनेक दोहों में निराली छटा आ गई है। यहाँ स्थानाभाव के कारण भाषा-सौन्दर्य के विषय में अधिक न लिखकर मैं दोहावली के शब्दालंकारो की छटा की कुछ झलक दिखलाता हूं-
अनुप्रास
संतत सहज सुभाव सौं सुजन सबै सनमानि-
सुधा-सरस सींचत स्रवन सनी-स्नेह सुबानि।
कियौ कोप चित-चोप सौं-आई आनन ओप,
भई लोप पै मिलत चख, लियौ हियौ हित छौप।
स्याम-सुरंग-रंग-करन-कर रग-रग रंगत उदोत,
जग-मग जगमग, डग डगमग नहिं होत।
गुंजनिकेतन गंुज-जुत हुतौ कितौ मनरंजन,
तुजं-पुंज सो कुंज लखि क्यों न होय मन रंज।
नंद-नंद सुख-कंद कौ, मंद हंसत मुख-चंद,
नसत दंद-छलछंद-तम जगत जगत-आनन्द।।
यमक
बस न हमारौ, करहु बस, बस न लेहु प्रिय लाज,
बसन देहु, ब्रज मैं हमैं, बसन देहु ब्रजराज।
बार बित्यौ लखि, बार झुकि बार बिरह के बार,
बार-बार सोचति-कितै कीन्हीं बार लबार।
खरी सांकरी हित-गली, बिरह-कांकरी छाइ-
अगम करी तापै अली, लाज-करी बिठराइ।
हृदय-सून तै असत-तम हरौ, करौ जौ स्न-
स्न-भरन के हित झपटि झट अवैगो स्न।।
श्लेष
विषय-बात मन नाव कौं भव-नद देति बहाइ,
पकरू नाव-पतवार दृढ़़,चट लगिहै तट आइ।
मन-कानन मैं धंसि कुटिल, काननचारी नैन-
मारत मति-मृगि मृदुल, पै पोसत मृगपति-मैन।

(लेखक वरिष्ठ साहित्यकार हैं)

श्री दुलारे लाल भार्गव की कतिपय कविताएं:समयानुसार

 (1)
यदि भृगु-कुल को सतत समुन्नत लखना चाहें,
बुद्धि, वीर्य, बल केतु बंधुओं, रखना चाहें,
विद्या, कला प्रचार विभव में भरना चाहें,
कलह द्वेष-तम मिटा मोदमय करना चाहें,
तो नभ-सम अनंत, गिरि-सम अटल प्रेम परस्पर अनुसरें,
तज मन्सर-मद, रख दृढ़ एकला वंशोन्नति साधन करें।
(जनवरी 1919)
(2)

वियोग के आंसू
(Sonnet के ढंग पर एक प्यारे दोस्त की मृत्यु पर लिखित चतुर्दशपदी। हिन्दी में लिखित प्रथम Sonnet)
सिंची सहज स्व-स्नेह सलिल से अधखिली
    कली कलित असमय में ही मुरझा गई।
अमल अमोल, सुडौल रत्न की चमक हो
    गई विलीन कालिमा उस पर आ गई।
क्रीड़ा करते हुए बीच बादलों के
    चारू चंचला क्षणिक छटा दिखला गई।
वारि, बंूद छोटी-सी समय-समुद्र में
    खो अपना आकार सगस्त, समा गई।
कोमल कलरव करने वाले कीर को
    सकल - कठं-स्वर सुधा सुमधुर वृथा गई।
आशा के विस्तीर्ण क्षेत्र पर, था जहां
    जरा उजेला, घोर अंधेरी छा गई।
हां। आते ही याद अतुल सुख की घड़ी
    लग जाती आखों से आंसू की झड़ी।
(एप्रिल 1919)
(3)
सिवा, मधुर मधु, तिय-अधर-माधुरी धन्य।
पै नव-रस साहित्य की यह माधुरी (‘माधुरी’ सोद्देश्य) अनन्य।
बस न हमारो, करहु बस, बस अब राखहु लाज,
बस न देहु, ब्रज मैं हमैं बसन देहु ब्रजराज।
(महाकवि देव के कवित के आधार पर)
(जुलाई 1922)
(4)
सज्जन और दुर्जन
स्वावलंब, समदर्षिता, स्वाभिमान, सम्मान,
सुरूचि, सत्य, सेवा सतत सज्जन की पहचान।
अहम्मन्यता, आंतरिक, अहंकार, अज्ञान,
द्वेष, दंभ, दुर्भति दुर्जन की पहचान।
(जनवरी 1923)
(5)
सिंधु मथै सुर ही लही नैकु जु सतजुग मांहि,
सहज सुलभ सोई सुधा सवै समय सब कांहि।
(सुधा सोद्देश्य)
मुरली, मोहन मुंह लागी, अनुचित-उचित न चेति,
आयु पियत मुख-संसि सुधा, पै औरन जिय लेति।
(अगस्त 1927)
(6)
यौवन-प्याला
(गीत चतुर्दशदी)

था छलक रहा यौवन प्याला, पीना जब मैने शुरू किया,
कुछ होश न था, परवाह न थी, सब भय था मैने भुला दिया।
    गलती करती हूं ध्यान न था;
    बस किसी बात पर कान न था।
सब सखी-सहेली गई हार, शिक्षा उनकी वह व्यर्थ हुई,
उस रात स्वर्ग में नए-नए रचने में खूब समर्थ हुई।
    पर रहें घूट जब दो बाकी,
    जा चुकी कहीं नटखट साकी।
संगी सब चलने वाले थे, था बुझने को तैयार दिया,
सब हाय! हाय!! क्या किया!! सोेंचकर कांप अचानक उठा हिया।
    वह मस्ती मेरी हुई चूर,
    वे स्वर्ग जा पडें़ कहीं दूर।
मैं छुई मुई सी लज्जित थी कहती थी --‘‘ प्यारे प्राण प्रिया’’,
इस रूप ज्योति ने आ चुपके इतने में मुझे उबार लिया।
(फरवरी 1962)
(7)
(भारत माता)
देहु देस- हित झर-सरिस झर-झर जीवन-दान,
चरस-सरिस रूकि-रूकि कहा देत निपट नादान।
(नवम्बर 1933)
(8)
बार-बित्यौ लखि, बार झुकि बाल बिरह के बार-
बार-बार सोचति-‘कितै कीन्हीं बार-लबार।
(जुलाई 1934)

(9)
देव पुरस्कार प्रदान किए जाने के अवसर पर तत्काल लिखित दोहे--
मम कृति दोस भरी खरी, निरी निरस जिय जोई--
है उदारता शबरी, करी पुरस्कृत सोई।
आलोचकों के प्रति
संतत मद हूं ते अधिक पद को मद सरसाइ;
वाहि पाइ बौराइ, पै याहि पाइ बौराइ।

तो भी
जे पद-मद की छाकु छकि बोले अटपट बैन,
सोउ जन कृपा करें, भरें नेह सों नैन।
(फरवरी 1935)
(10)
राष्ट्र भाषा
भाषा-जागृति ते जगत निद्रित राष्ट्र-समाज
सहित-जागृति में बसति भारत-मुकति स्वराज
प्रेम, संगठन,एकता भाषा ही सो होय;
जागृति बिन भाषा-प्रगति करत न जग में कोय।
(1939)
(11)
ज्योति प्रवाह
मोह-रजनि में सजनि, जब तम भय होत उछाह;
मानस में तब कीजिए जगमग जोत-प्रवाह।
(12)
राधा गगनांगन मिलै धरापति सों धाय;
पलटि आपुनो पंथ पुनि धारा ही ह्नै जाय।
(फरवरी 1964)

अखिल भारतीय गीता -धर्म-सम्मेलन

स्वागताध्यक्ष-दुलारे लाल का भाषण
(कुंभ मेला संवत् 1992, को पूज्यपाद ब्रह्मनिष्ठ स्वामी विद्यानंद जी महराज ने अखिल भारतीय गीता-सम्मेलन का श्रीगणेश, पवित्र त्रिवेणी तट पर किया था। इस प्रथम अधिवेशन के सभापति रचनामधन्य डा0 गंगानाथ झा थे। एक दिन प्रातः स्मरणीय महामना मदनमोहन जी मालवीय महाराज ने भी सभापतित्व का शुभासन सुशोभित किया था। स्वागत-भार ‘सुधा’-सम्पादक एवं हिन्दी साहित्य-युग-प्रर्वतक दुलारे लाल भार्गव को सांैपा गया था, उसी पद से उन्होंने जो संक्षिप्त भाषण दिया था, उसे यहां पुनः प्रकाशित कर रहे हैं। अंत में प्रार्थना (गीत) परम पठनीय है।)
    श्री राधा-बाधा हरनि
        नेह अगाधा-साथ
    निहचल नैन-निकुंज में
        नाचै निरंतर-नाथ।
    नंद-नदं सुख कदं कौ
        मंद हंसत मुख-चंद,
    नसत दंद-छलछदं तम
        जगत जगत आंनद।

मान्य सभापति जी, देश के भिन्न कोनों से आए हुए प्रतिनिध जन तथा उपस्थित सज्जन-वृंद।
    आपका हम स्वागत करते हंै। आप ही लोगों का यह सम्मेलन है। आप लोगों ने ही हमें यह कार्य करने का भार दिया है, अतः हमसे जो कुछ करते बन पड़ा है किया है, आप अब उसे संभालिए।
    अब हम सब मिलकर एक बार गीतापति श्री कृष्ण का आवाहन् और स्वागत करें। वह आवें और अपनी गीता के प्रचार का हमें उपाय बतावें।
    हमें तो अब कुछ कहना ही नहीं। आप लोग इस प्रकार कृपा करके जब यहां आ गए है। तब फिर चाहिए ही क्या हमारे ऋषिकल्प महामहोपाध्याय डा0 गंगानाथ जी झा अपनी इस पैसठ वर्ष की वृ़द्धा और रूग्ण अवस्था में भी हम लोगों को ‘उत्साह’ और ‘योग’ देने आए हुए है। आप गीता के सौम्य आदर्श जीवन के जीते-जागते उदाहरण हंै। आपको देखकर हम लोग अपना जीवन बना सकते हंै। आप जैसे सभापति को पाकर यह अखिल भारतीय गीता सम्मेलन अवश्य सफल होगा, और अपने निष्काम प्रचार और लोक संग्रह का कार्य कर सकेगा।
    हमने झा जी के उपदेशों तथा अनेक जीवन के कार्यो से दो प्रधान बातें सीखी है- पहली यह की गीता को कठिन समझ कर व्र्यथ डरना नहीं चाहिए। वह तो भगवान की मुरली  की ध्वनि के समान मधुर और मनोहर है। भगवान ने बात ही बात में अपने सखा को सर्वश्रेष्ठ ज्ञान सिखाया था। तब वह कठिन कैसे हो सकता है। कृष्णा ने वेद, उपनिषद् आदि की कठिन बातों को सरल भाषा में गाकर अर्जुन को समझाया था, इसी से तो इस शास्त्र को ‘गीता’ कहते है।
    हिन्दुओं के लिये वेद सर्वस्वभूत है; तथापि ज्ञान कांड के लिये उपनिषदों का भी सार रहस्य श्रीमद्भगवद्गीता में प्रतिपादन किया गया है। जैसा कहा जाता है-‘‘सर्वोय-निषदों गावो दोग्धा गोपालनन्दनः पार्थाें वन्सः सुयीभोक्ता दुग्धं गीतामृतः मह्त्।’’ इस उपनिषत्सारभूत गीतामृत पान करके जीवन मरण के द्वंद से विमुक्ति पाकर अमरत्व पद की प्राप्ति की अभिलाषा किसे न होगी? इस देव-दुलर्भ सुधा को वसुधा में सुलभ रूप से उचार करने वाले सज्जन क्यों न अभिनंदनीय समझें जायेगे? यद्यपि उपनिषदों के सारभूत होने के कारण गीता में ज्ञान काड की उत्कर्ष है, तथाति कर्म तथा भक्ति का विवेचन भी अत्यंत मार्मिक है।
    गीता को कठिन समझ कर डरना नहीं चाहिए। गीता का पाठ और प्रचार कठिन काम नहीं।
    दूसरी बात है लोक संग्रह का जीवन। हमारे महामहोपाध्याय जी ने जीवन भर शिक्षा विभाग में कार्य किया। अभी बुढ़ापे में भी विश्वविद्यालय के कुलपतित्व करते रहे, आज दिन भी आप एकेडमी आदि अनेक संस्थाओं में कार्य करते है, पत्र-पत्रिकाओं में लेख लिखते और पुस्तकों की रचना तथा सम्पादन करते है। आप अस्वस्थ है, तो भी हम लोगो के प्रार्थना करते ही गीता-सम्मेलन में योग देने के लिए तैयार हो गए। हम आपके इस लोक संग्रह की वृति पर मुग्ध है।
    हमें आपकी इन दोनो बातों को लेकर गीता-प्रचार के क्षेत्र में उतरना है। हम इसे भगवान की कृपा समझते है, जो ऐसा ऋषि हमें प्रथम अखिल भारतीय गीता-सम्मेलन का सभापति मिला।
    हमारे इस सम्मेलन के संयोजक है वीतराग, लोक संग्रही स्वामी विद्यानंद जी। आपका जीवन भी त्याग और निष्काम लोक संग्रह का जीवन है। आपने इस सम्मेलन द्वारा सभी संस्थाओं, विद्वानों, सन्तों और महात्माओं से प्रार्थना की है कि वे इस काम में सहायता करें, और गीता-प्रचार के काम में कोई किसी का विरोध न करे। आपने इसी उद्देश्य से काशी में ‘गीता-धर्म’ नाम का एक मासिक पत्र निकाला है, उसका उद्देश्य हैै गीता सम्बन्धी समस्त प्राचीन वाड्ंमय का और अपने धर्म तथा प्रकृति का प्रतिपादन और प्रचार। इस पत्र की सबसें बड़ी विशेषता है, किसी का विरोध न करना। हम आशा करते हैं, कि आप लोग अपनी-अपनी सम्मति और सहयोग देकर स्वामी जी के इस लोक संग्रह के काम में सहायता देंगे।
    हमारे लिए यह अपार आनन्द की बात है कि इस तीर्थराज में, त्रिवेणी-तट पर इस साधु-संतांे और विख्यात विद्वानों के विराट् गीता-सम्मेलन में हमें ऐसा स्वागत करने का कार्य मिला।
 युधिष्ठिर ने यज्ञ किया था, आप लोग सब जानते है, गीतापति भगवान कृष्ण ने सबका स्वागत करने और चरण धोने का भार अपने ऊपर लिया था। यह भी गीता ज्ञान यज्ञ है। इसका स्वागत अध्यक्ष तो गीता पति जैसा पुरूष ही होना चाहिए, पर यह माननीय संयोजक श्री स्वामी जी महाराज की, मंत्री श्री आचार्य जी की तथा कार्यकारिणी की कृपा है, और हमारा सौभाग्य है, जो हमें यह सेवा करने को मिली।
    हम तो यही कहकर चुप बैठ जाते है कि इस गीता-यज्ञ और सम्मेलन में स्वागताध्यक्ष श्री कृष्ण जी हैं। हम तो निमित मात्र बनकर यहां खड़े हंै, आइए अब हम सब मिलकर उन्हीं गीता-गायक, ज्योतिर्मय, घनश्याम, बंशीधर, दीनदयाल श्री कृष्ण भगवान का आवाहन् करें, जिसमें यह अपने ढंग का अभूतपूर्व सम्मेलन सुचारू रूप से सफल हो--

प्रार्थना गीत
स्वागत! स्वागत! सुज समामिलित सुरस सुधा सरसाए,
गुन-गाहक! गीता-गुन-गन की गौरव गुनि-गुनि गाए।
ज्योतिरमय! जगि जगन ज्योति में करू अंग जग-मग जगमग;
भगति-सकति मरू रग-रग पग-पग होत जनन डग-डगमग।
जन घनश्याम ! जु सरस दरस कौं पाप-ताप तपि तरसें;
धाॅय धाॅय धधकत, धरहरि-हित धाय  धरम-रस बरसें।
बंसीधर! धर अधर बांसुरी मंजु मधुरी सरसें;
‘रूनझुन-रूनझुन‘ धुनि-सुनि मन मुन उनमन जन-गन हरसें।
दीनदयाल! दया दीनन द्रवि दीजै, दीनन दरसें;
तन-मन-धन-जन-जीवन अरपन करि प्रिय प्रभु-पद परसें।