Sunday, November 6, 2011

प्रगति का पंछी दुलारे लाल

डाॅ. शंभूनाथ चतुर्वेदी
स्वर्गीय पं0 दुलारे लाल भार्गव सर्व प्रथम ‘देव पुरस्कार’ विजेता थे। यह पुरस्कार उन्हें ओरछा नरेश ने ‘दुलारे दोहावली’ पर प्रदान किया था। वैसे तो पुरस्कार से रचनाकर की महत्ता को आंकना गलत होता हैं। सात्र्र और बोरिस पास्तरनाक ने ‘नोब्ल प्राइज’ ठुकराकर अपने कृतित्व को कालजयी बना दिया। भार्गव जी का महत्व उनके कृतित्व के कारण है, ‘देव पुरस्कार’ प्राप्त करने के कारण नहीं। स्वर्गीय भार्गव जी सुकवि तो थे ही, ‘सुधा’ और ‘माधुरी’ जैसी स्तरीय पत्रिकाओं के सम्पादक थे, हिन्दी के प्रथम प्रकाशक और पुस्तक विक्रेता थे तथा कवि-सम्मेलनों के माध्यम से हिन्दी के प्रचारक थे। अपने जीवन की सांध्य-बेला में उन्होंने कवि-कोविद-क्लब की ओर से तत्कालीन भारत की प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी के सम्मान में एक अखिल भारतीय कवि-सम्मेलन और मुशायरे का आयोजन किया था। युवा पीढ़ी के लिए वे एक प्रकाश-स्तम्भ थे। भार्गव जी ने आत्म-परिचय देते हुए लिखा था -
गंगा पुस्तक माल सुधा-माधुरी चाकरी/ करी दुलारे लाल, लाल दुलारे लाल ह्वै।
भार्गव जी ब्रज-भाषा के श्रेष्ठ कवि थे; विशेष रूप से आधुनिक ब्रज-भाषा-काव्य के। उन पर भक्तिकाल और रीति-काल का प्रभाव रहा। इस माने में वे परम्परानुगामी कवि थे। परन्तु केवल परम्परा-पालन से ही हम उन्हें कालजयी रचनाकार की कोटि में नहीं रख सकते। उन्होंने छीजती हुई ब्रज भाषा को पुनः खड़ी बोली के समकक्ष खड़ा कर दिया। उन्होंने अपने दोहों में न केवल प्रेम और श्रृंगार के भावों को भरा, अपितु नूतन-नूतन युग-चेतना के संवहन के लिए भी उन्होंने ‘क्लासिकी’ भाषा का प्रयोग किया। मैं उनकी तुलना केवल बिहारी से नहीं करना चाहता। भार्गव जी प्रगतिकामी रचनाकार थे। उनकी रचनाओं में समसामयिकता के प्रति आग्रह दृष्टिगत होता है। फ्रेंच कवि बोदलेयर के शब्दों में मैं उन्हें वर्तमान यर्थार्थ का शब्द-शिल्पी कह सकता हूं। फाइउल केस्ट्रो के शब्दों में हर रचनाकार का महत्व अपनी समकालीन पीढ़ी के लिए लिखने के कारण होता है। भार्गव जी ने समसामयिक यथार्थ से आंखे मोड़ी। वे युग-चेतना और युग बोध के सशक्त कवि थे। वे सही अर्थों में एक प्रगतिशील और प्रयोगधर्मा रचनाकार थे। ब्रजभाषा के माध्यम से उन्होंने प्रगतिशील विचारों की अभिव्यक्ति की।
    ब्रजबानी घन प्रगति घन देश-गगन बिच छाइ - दियौ दयालु महेन्द्रजू जन-मन मोर नचाइ।
भार्गव जी स्वदेश-प्रेम और राष्ट्रीय चेतना के कवि थे। उन्होंने ‘नवीन’, ‘एक भारतीय आत्मा’ और निराला की भांति देशहिताय अपना जीवन-अर्पित करने का संदेश दिया। जो कार्य अन्य कवियों ने लम्बे-लम्बे गीतों और प्रबन्ध-काव्यों द्वरा किया, वही कार्य दुलारे लाल जी ने एक छोटे से छन्द दोहे को चुनकर किया, और यही उनकी काव्य-प्रतिभा का सबसे बड़ा प्रमाण है। वे भाव-विस्तार के नहीं, अपितु भाव-संहिति के कवि थे। वे स्वतंत्रता और राष्ट्रीयता की भावनाओं के उद्घोषक थे।
झर-सम दीजै देस-हित झर-झर जीवन-दान;
 रुकि-रुकि यों चरसा सरिस देबौ कहा सुजान।
समुचित है, स्वातंत्रय-हित सहि समाज कौ कोप;
 मन मलीन निज अंब के, लावौं आनन-ओप।

देश की आजादी के लिए ही उन्होंने जातिभेद दूर करने का संदेश दिया। सुधारवादी दृष्टिकोण को भी उन्होंने इसीलिए अपनाया था।
जाति-पांति की भीति तो प्रीति-भवन में नाहिं;
एक एकता-छतहिं की छांह मिलत सब काहिं।

उन पर गांधीवादी विचारधारा का प्रभाव था। गांधी जी के नव-जागरण आन्दोलन से वे प्रभावित हुए। गांधी जी के प्रभाव के कारण ही भार्गव जी की कविता में भावात्मक एकता की भावना दृष्टिगत होती है। भार्गव जी निराला को उन दिनों प्रोत्साहन दे रहे थे, प्रेमचन्द उन के सह-सम्पादक थे। इसीलिए न केवल उन्होंने अन्य रचनाकारों को देशहित प्रेरित किया, अपितु स्वयं उनके दोहों में देश-प्रेम की भावना प्रकाशित हुई। गांधी के नव जागरण के आन्दोलन को उन्होंने अपने दोहों का वण्र्य-विषय बनाया। उन्होंने गांधी जी की तुलना शिवाजी से भी की। गांधी के अतिरिक्त अपने दोहों में उन्होंने सरोजिनी नायडू के योगदान की प्रशंसा भी की। दुलारे लाल जी में एलियट द्वारा बताये गये ‘इतिहास-बोध’ का अभाव न था। इसीलिए वर्तमान को जगाने के लिये उन्होंने अतीत का सहारा लिया।
सिव - गांधी दोई भए बांके मां के लाल;
उन काटे हिन्दुन-दुख इन जग-दृग-तम-जाल।
भारत सरहि सरोजनी गांधी-पूरब-ओर;
ताकि सोचति ह्वैहै कबै प्रिय स्वराज्य रवि-भोर।

भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने ‘निज भाषा’ के साथ ‘निज अर्थ’ की स्वतंत्रता पर बल दिया था। भार्गव जी का रचनाकार भी एक ओर भाषा-समृद्धि की ओर प्रयत्नशील था, तो दूसरी ओर आर्थिक आत्मनिर्भरता का संदेश भी जन-समाज को दे रहा था।
पर-राष्ट्रन-अरि चोट तैं धन स्वतंत्रता - कोट;
तटकर -परकोटा बिकट राखत अगम, अगोट।
हिन्दी-द्रोही उचित ही तुव अंगरेजी नेह;
 दई निरदई पै दई नाहक हिन्दी देह।

    मैं बताना चाहता हूं कि महाप्राण निराला, भार्गव जी के सम्पर्क में आकर साहित्य के क्षेत्र में अमर हुए। निराला जी प्रगतिवादी कवि थे। ‘भिक्षुक’, ‘वह तोड़ती पत्थर’ और ‘कुकुरमुत्ता’ रचनाओं में उनका प्रगतिवादी स्वर सुनवाई पड़ता है। निराला और भार्गव जी का घनिष्ठ सम्बन्द्द था। भार्गव जी ने भी अपने दोहों में शोषण की कहानी कही। उन्होंने भी आर्थिक वैषम्य पर प्रकाश डाला। भाषा में असमानता होते हुए भी निराला और भार्गव जी दोनों की रचनाओं में दलित वर्ग के प्रति संवेदना प्राप्त होती है।
मिलत न भोजन, नगन तन मन मलीन;
पथ-बासु, निरधनता-साकार लखि, ढारत करुनहु आंसु।

    छायावादी कवि प्रसाद की रचनाओं को प्रकाशित करने का श्रेय भी भार्गव जी को प्राप्त है। उन्होंने ‘कामायनी’ को धारावाहिक रूप से छापा। ‘जनमेजय का नागयज्ञ’ नाटक भी गंगा पुस्तक माला से छपा। प्रसाद जी अपने उपन्यास ‘कंकाल’ में प्रगतिवादी थे और ‘लहर’ की कविताओं में भी। ‘लहर’ के एक गीत में उन्होने श्रम-विश्राम के सम-विभाजन का स्वर बुलन्द किया था।
श्रम-विश्राम क्षितिज वेला से जहां सृजन करते मेला से।

श्रम-विश्राम का यही संतुलन दुलारे लाल के काव्य में प्राप्त होता है। वे इसी आधार पर धरा को स्वर्ग बनाना चाहते थे।
काम, दाम, आराम कौ सुघर समनुबै होइ;
 तौ सुरपुर की कल्पना कबहुं करै न कोइ।

    भार्गव जी के काव्य का यही स्वर अन्ततः मानवतावादी बन जाता हैं। प्रसाद ने मानवतावाद के लिये महाकाव्य ‘कामायनी’ की सृष्टि की। दुलारे लाल जी ने अपनी ‘दोहावली’ में मानवतावादी स्वर अभिव्यक्त की है।
मानव-मनाव एक हैं यामें रंच न भेद;
सत-सिव-सुन्दर वेद यह यहै पुकारत वेद।

    भार्गव जी एक सोद्देश्य रचनाकर थे। उनका कलादर्श आचार्य शुक्ल और मैथ्यू आॅर्नोल्ड की भाँति था- जीवन-सम्पृक्ति का स्वर ‘दुलारे दोहावली’ में सर्वाधिक सशक्त है। सम्भवतः इसीलिए ‘बिहारी सतसई’ से प्रभावित होने के बावजूद भी वे ‘शुद्ध कला’ के पक्षधर नहीं बने। उन्होेंने रीतिकालीन कवियों के समान केवल चमत्कार प्रदर्शन कला का लक्ष्य नहीं माना। कला और जीवन को सम्बद्ध करने का स्वर उनमें विशेष रूप से उपलब्ध होता है। शिल्पी (शब्द-शिल्पी) भी जीवन को समृद्ध करता है, यह कथन बंगला के सुप्रसिद्ध कथाकार शंकर का उनके उपन्यास ‘रूप तापस’ में है। भार्गव जी ने जीवन पर छाप छोड़ने वाली कला का वरण किया था।
कला वहै जो आन पै आपुनि छाँड़ै छाप ज्यों गंधी के गेह में गंध मिलति है आप।
भार्गव जी ने ‘प्रयोगवाद’ से पहले नये प्रयोग किये थे; यद्यपि ये प्रयोग ब्रजभाषा में किये गये थे और उनका लक्ष्य था आध्यात्मिकता का प्रचार करना।
सत-इसटिक जग फील्ड लैं जीवन-हाकी खेलि
वा अनंत के गोल मैं आतम बालहिं मेल।

(लेखक लखनऊ विश्वविद्यालय में प्रोफेसर हैं।)

साहित्य का देवता दुलारे लाल भार्गव

महाकवि सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’
जब जीवन के मुक्त आकाश में अविराम अलक्ष्य बहते हुए देह के किसी मेघ-खंड से सूर्य की एक उज्जवल किरण बंध जाती, वह भी अपने आलोक-पथ को किसी अलक्ष्य शक्ति के प्रभाव से छोड़कर मेघ के स्नेह-सजल हृदय में शांति लेती-विश्राम करती है, उसी समय कल्पना का इंद्रजाल इंद्रधनुष के रंगों में प्रत्यक्ष होता है। रंगों की एक दूसरी ही सृष्टि संसार के रंग-मंच के लोग मनोहर यवनिका के रूप में खुली हुई देखते हैं। हमारे मित्र, ‘माधुरी’ के भूतपूर्व तथा ‘सुधा’ के वर्तमान प्रधान सम्पादक और गंगा-पुस्तकमाला के संपादक और अध्यक्ष पं0 दुलारे लाल जी के जीवन में ऐसा ही शुभ संयोग हुआ था। आज उनके यश के प्रभात-काल का पद्म मध्यान्ह की मरीचियों से प्रखर, पूर्ण-विकसित, हिन्दी की दसों दिशाओं को अपनी अमंद सुगंध से परिप्लावित कर रहा है।
    मित्रवर पं0 दुलारे लाल जी के जीवन की धारा की, उनके परिवार में प्रचलित प्रथा के प्रतिकूल उर्दू से हिंदी की तरफ बहाने का श्रेय एकमात्र उनकी धर्मपत्नी स्वर्गीया श्रीमती गंगादेवी को है। इन विदुषी साध्वी महिला को ईश्वर-प्रदत्त जैसा अपार सौंदर्य मिला था, वैसे ही अनेक गुण भी इनकी प्रकृति के मृदुल सूत्र में पिरो दिए गए थे। तिरोधान के पश्चात् अपने पति की आभा में मिलित होकर यह हिन्दी का इतना बड़ा उपकार करंेगी, यह किसी को पहले स्वप्न में भी मालूम न था। ‘गंगा-पुस्तक माला’ इन्हीं के नाम से संस्थापित की गई है। अतः इनकी जीवनी का संक्षिप्त अंश दे देना हम यहां आवश्यक समझते है।
    इनका जन्म श्रीमान् फूलचंद जी भार्गव ई0ए0सी0 के यहां हुआ था। यह हिन्दी बहुत अच्छी जानती थीं, और संस्कृत तथा अंग्रेजी का भी इन्हें ज्ञान था। शिक्षा के साथ ही साथ गृह-कार्यो में भी यह अत्यंत कुशल थीं सीना-पिरोना आदि नारियों के लिए उपयोगी ललित कलाएं भी वह जानती थीं। इन्हें संगीत का भी ज्ञान था। सबसे बढ़कर ईश्वरी उपहार जो इन्हें मिला था, वह इनकी सुकुमार प्रकृति थी। छोटी अवस्था में ही श्रीयुत् दुलारे लाल जी के साथ इनका शुभ विवाह विपुल आयोजन तथा उत्साह के साथ हुआ। लखनऊ में भार्गव कुल के सुप्रसिद्ध स्वर्गीय पं0 प्यारे लाल जी के ज्येष्ठ पुत्र होने कारण श्रीयुत् दुलारे लाल जी के विवाह में खासतौर पर कुल योजनाएं की गई थीं। स्वर्गीया सौभाग्यवती श्रीमती गंगा देवी ने यहां, इस उर्दू के अजेय दुर्ग में आकर देखा, लखनऊ हिन्दी के प्रवेश से रहित है। विशेष रूप से उनका परिवार तो उर्दू की प्रतिष्ठा के पीछे और भी बुरी तरह से पड़ा हुआ है- नवलकिशोर प्रेस की पुस्तकों तथा अखबारों के प्रकाशन का भारत वर्ष में प्राधान्य हो रहा है। श्रीमती गंगा देवी की आंखें यह सब देखकर हिन्दी की दुर्दशा पर चुपचाप कुछ अमूल्य मोती गिराकर रह जाती थी। वह हताश नहीं हुईं। अपने पति के हृदय में हिन्दी की आशा की किरण अपने-सुकुमार प्रयत्नों से उन्होंने रोपित कर दी। श्रीयुत् दूलारे लाल जी ने उस छोटी सी 16 वर्ष की अवस्था में ही अपनी जातीय सभा की मुख-पत्रिका ‘भार्गव पत्रिका’ का सम्पादन-भार उठाया और इस प्रकार हिन्दी की सेवा के लिए दत्त-चित्त हो गए। पर गंगादेवी को अपने उपदेशों के सुफल देखने का अवकाश न मिला। वह स्वर्गीय ज्योति जिस कार्य के लिए पृथ्वी पर उतरी, उसका श्री गणेश कर 2-3 वर्ष ही पति के साथ रहकर इस संसार को त्यागकर अपने पति की आत्मा में लीन हो गई।
    ‘‘गंगा-पुस्तकमाला’ में आज हिन्दी की सेवा के जो सुफल प्रत्यक्ष हुए हैं, इसकी लता उन्हीं गंगादेवी के स्नेह के जल से सींची हुई है। उनकी कल्पना से निकली हुई श्रीयुत् दुलारे लाल जी के सतत परिश्रम से बढ़ती हुई इस ‘गंगा-पुस्तकमाला’ में आज 108वां पुष्प पिरोया जा  चुका है।  जिसके आनन्द का उत्सव मानाने के लिए हिन्दी के प्रमुख साहित्यिक आज यहां-गंगा फाइन आर्ट-प्रेस में एकत्रित हैं। इस माला का पहला पुष्प था माला के अध्यक्ष मालाकार श्री दुलारे लाल जी की लिखी हुई ‘हृदय-तरंग’ पुस्तक, जिसका समर्पण उन्होंने अपनी प्राणाधिक स्वर्गीया सहधर्मिणी को, उनकी उस प्रेरणा की याद दिलाते हुए, किया है। ‘गढ़-कुंडार’ इसका 108 वां पुष्प है। इस माला में हिन्दी के लब्ध प्रतिष्ठ बड़े-बड़े प्रायः सभी महान, लेखक आ गए हैं। आचार्य पं0 महावीर प्रसाद जी द्विवेदी की लिखी हुई ‘सुकवि-संकीर्तन’, ‘अद्भुत-आलाप’, ‘साहित्य-संदर्भ, कवि सम्राट पं0 श्रीधर पाठक का ‘भारत-गीत’, समालोचक-प्रवर ‘मिश्रबंधु’-लिखित ‘हिन्दी नवरत्न’, ‘पूर्व-भारत’, ‘मिश्रबन्धु-विनोद’, आदि, कवविर श्रीयुत् जगन्नाथदास रत्नाकर’, बी0ए0 का लिखा हुआ ‘बिहारी-रत्नाकर’ उपन्यास-सम्राट श्रीयुत् प्रेमचन्द जी की लिखी हुई ‘रंगभूमि’, ‘कर्बला’, ‘प्रेम-द्वादशी’, ‘प्रेम-पंचमी’, ‘प्रेम-प्रसून’ आदि, समालोचक-प्रवर पं0 कृष्ण बिहारी जी मिश्र बी0ए0, एल0एल0बी0 की लिखी हुई ‘देव-बिहारी’, प्रसिद्ध औपन्यासिक आयुर्वेदाचार्य श्रीयुत् चतुरसेन जी शास्त्री की लिखी हुई ‘हृदय की परख’ ‘हृदय की प्यास’, लोकप्रिय औपन्यासिक पं0 विश्वम्भर नाथ जी शर्मा कौशिक की लिखी हुई ‘माँ’ और ‘चित्रशाला’, कविवर पं0 सत्यनारायण जी पांडेय की कविताओं का संग्रह ‘पराग’, नवीन सुन्दर साहित्यिक पं0 विनोद शंकर जी व्यास की लिखी हुई ‘तूलिका’, पुरस्कृत कवि श्रीयुत् गुलाबरत्न जी बाजपेयी ‘गुलाब’ की ‘लतिका’ आदि, डाॅ0 प्राणनाथ विद्यालंकार का ‘इंग्लैण्ड का इतिहास’, बद्रीनाथ जी भट्ट की ‘दुर्गावती’ ‘हिन्दी’, पं0 गोविन्द बल्लभ पंत जी की ‘राजमुकुट’, ‘वरमाला’, श्रीयुत् भगवान दास केला का ‘भारतीय अर्थशास्त्र’, प्रो0 दयाशंकर दुबे का ‘विदेशी विनिमय’ तथा और-और सुप्रसिद्ध साहित्यिकों की लिखी हुई उत्तमोत्तम रचनाएं इस माला में पिरोई गई है। इतना बड़ा हिन्दी का प्रकाशन, इतने थोड़े समय में, आज तक किसी भी कार्यालय से नहीं हुआ। इन अमूल्य पुस्तकों के द्वारा श्रीमान दुलारे लाल जी ने हिन्दी की जो सेवा की है, उसका मूल्य निर्धारित करना मेरी शक्ति से बिल्कुल बाहर है। पहले ‘माधुरी’ का अपने योग्यतापूर्वक सम्पादन किया, अब उसी के जोड़ की अपनी पत्रिका ‘सुधा’ का सम्पादन- प्रकाशन कर रहे हैं। ‘माधुरी’ और ‘सुधा’ में बराबर आप नवीन लेखकों को प्रोत्साहित करते रहे हैं। कितनी ही महिला लेखिकाएं तैयार की। बराबर नवीन लेखकों के चित्र छाप कर उनका उत्साह बढ़ाते गए। यह काम हिन्दी की किसी भी पत्रिका में नहीं रहा। ‘सुधा’ में जिन-जिन लेखकों के चित्र निकले हैं, दूसरी प्रतिष्ठित पत्रिकाएं अब भी उनके चित्र निकालना अपनी मर्यादा की प्रतिकूलता समझती है। दूसरे प्रांतों के उनसे भी गए-बहे लोगों का बड़ी श्रद्धा से वहां परिचय दिया जाता रहा है। पर अपने प्रांत के प्रतिष्ठित लोगों का सम्मान करते हुए उनका दम ही रूक जाता है। इस प्रोत्साहन - कार्य में दुलारे लाल जी का स्थान सबसे पहले है। अन्यत्र सभाओं में निमंत्रित होकर प्रतिवर्ष हिन्दी के नवीन साथियों को पदक पुरस्कार आदि दे-देकर आप बढ़ावा देते रहते है। यह सब आपके हिन्दी प्रेम का ही पवित्र परिणाम है। लखनऊ जैसे उर्दू के किले में इस तरह का हिन्दी का विशाल प्रसाद खड़ा कर देना कोई साधारण-सी बात नहीं थीं। इसके लिए कितना परिश्रम तथा कितना अध्यवसाय चाहिए, यह मर्मज्ञ मनुष्य अच्छी ही तरह समझ लेंगे।
    श्री दुलारे लाल जी का जन्म हुआ था, बसंत पंचमी को, उनका विवाह भी बसंत पंचमी की रात को हुआ। ‘गंगा-पुस्तक-माला’ का प्रकाशन भी बसंत पंचमी के दिन आरम्भ हुआ और आज इस माला के 108 वंे जय-पुष्प की पूर्णता भी होती है बसंत पंचमी के दिन, ईश्वर से प्रार्थना है कि वह माला को 1008 पुष्पों से सजाकर हिन्दी के ऐसे उदार सक्षम कार्यकर्ता की कीर्ति को अन्य देशों में भी सादर समम्यपर्ति करें- श्रम तथा साधना अपना पुरस्कार प्राप्त करें। (सन् 1928 की बसंत पंचमी पर श्री भार्गव जी के जन्मदिन व ‘गढ़कुंडार’ के विमोचन समारोह में श्री निराला जी द्वारा दिया गया भाषण)

और वह हीरामन तोता उड़ गया...

प्रियंका पंचायत (संपादकीय)
किसी भी कालजयी रचनाकार का सम्यक् मूल्यांकन उसके जीवन-काल में नहीं होता-तुलसी, निराला और प्रेमचंद का कृतित्व इसका गवाह है। स्वर्गीय दुलारे लाल भार्गव जी की ‘दुलारे दोहावाली’ पर यद्यपि सर्व प्रथम ‘देव पुरस्कार’ दिया गया, परन्तु उनका विरोध भी उनके जमाने में खूब किया गया। किसी ने उन्हें लेखकों का शोषक कहा, (वैसे सही अर्थाें में वे लेखकों के पोषक थे) किसी ने यहां तक कह दिया कि उनके दोहे ‘निराला’ जी लिखा करते थे। परन्तु असलियत यह है कि भार्गव जी में जनम जात काव्य-प्रतिभा थी, जिसे न कोई छीन सका और न छीन सकता है। निराला जी के सम्बन्ध में भार्गव जी कहा करते थे कि लखनऊ-प्रवास काल में न केवल वे उनकी रचनाओं पर उचित राॅयल्टी देते थे, अपितु जैसा खादी का रेशमी कुर्ता वे स्वयं पहनते थे, वैसा ही निराला जी के लिए बनवाते थे। भार्गव जी ने केवल सोलह वर्ष की अल्पायु में ‘भार्गव’ जातीय पत्रिका का सम्पादन किया था, जिसमें उस युग के सुपरिचित रचनाकार मैथिलीशरण गुप्त, अनूप शर्मा और रूपनारायण पाण्डेय की रचनाएं प्रकाशित होती थीं। इससे स्पष्ट है कि भार्गव जी में पत्रिका-सम्पादन की अद्भुत क्षमता थी। ‘सुधा’, ‘माधुरी’ अब भी उनकी कीर्ति की पताकाएं बनी हुई हैं। मुझे यह कहने में किंचित भी संकोच नहीं है कि भार्गव जी ने जिस स्तर की ये पत्रिकाएं निकाली, अब भी दुर्लभ हैं।

    उनके हिन्दी प्रेम का इससे बड़ा उदाहरण क्या हो सकता है कि उन्होंने ब्रिटिश शासन-काल में हिन्दी पत्रिकाओं का सम्पादन किया, पुस्तकें प्रकाशित कीं और नयी पत्रिकाओं को हिन्दी-जगत् के सम्मुख पेश किया। यदि भार्गव जी न होते तो आधुनिक साहित्य न होता। उन्होंने स्वयं ब्रजभाषा-प्रेमी होने के बावजूद छायावाद के प्रमुख कवियों प्रसाद, निराला और पंत की रचनाओं को प्रकाशित किया। लखनऊ में उपन्यास के दो दुर्ग निर्मित करने वाले भार्गव जी ही थे- उन्होंने भगवती चरण वर्मा और नागर जी के प्रथम उपन्यासों को छापा। लखनऊ विश्वविद्यालय में हिन्दी विभाग को खुलावाने का श्रेय भी उन्हीं को था। उन्होंने हिन्दी-विभाग में पं0 बदरी नाथ भट्ट की नियुक्ति कराई और डाॅ0 दीन दयाल गुप्त के शोध-प्रबन्ध के टंकण के लिए ‘टाइप राइटर’ तक का प्रबंध किया। यह बात स्वयं स्वर्गीय डाॅ0 गुप्ता जी स्वीकारते थे।

    भार्गव जी कवि-सम्मेलनों की परम्परा के जनक थे। हिन्दी के प्रसार-प्रचार के लिए अपने जीवन के अन्तिम काल तक में वे कवि-सम्मेलनों का आयोजन कराया करते थे। अखिल भारतीय स्तर का अन्तिम कवि-सम्मेलन और मुशायरा उन्होंने श्रीमती इन्दिरा गांधी के स्वागतार्थ रवीन्द्रालय, लखनऊ में आयोजित कराया था। उनकी सबसे बड़ी खूबी यह थी कि वे नई पीढ़ी को आगे बढ़ने का निरन्त प्रोत्साहन दिया करते थे। इस कवि सम्मेलन में वे अध्यक्ष तो बने परंतु सम्पूर्ण आयोजन का प्रबन्ध और संचालन दायित्व शंभूनाथ चतुर्वेदी, राम प्रकाश वरमा, ‘स्वतंत्र’ और संतोष भार्गव आदि को दे दिया। ‘प्रियंका’ सम्पादक के वे ही प्रेरक थे। उन्होंने ही युवा पीढ़ी को अग्रसर किया।
    मुझे याद है कि एक बार जब वे तत्कालीन उप मुख्यमंत्री (अब विधानसभा के स्पीकर) पं0 श्रीपति मिश्र से मिलने गये, तो उन्होंने हाथ जोड़कर कहा, कहिए भार्गव जी क्या काम है?’ भार्गव जी ने उन्हें अपना नाम बताया। उत्तर  में श्रीपति मिश्र जी हंसे और बोले, ‘आपका नाम मैं बचपन से सुनता आया हूं’। जब वे तत्कालीन एडवोकेट जनरल पं0 कन्हैया लाल मिश्र से मिलने गये तो उन्होंने मेरे सामने स्वीकारा, मैं तो आपका क्रिएशन हूं। मिश्र जी का पहला लेख ‘माधुरी’ में भार्गव जी ने छापा था। भार्गव जी बताते थे कि पं0 गोविन्द बल्लभ पंत का मंत्रिमण्डल जब बना तो अपने घर की छत पर उनके सम्मान में उन्होंने आयोजन किया था। भार्गव जी काली मिर्च के समान थे जो चरफरी होती है, परन्तु अत्यन्त गुणकारी। जब वे कहते थे कि स्व0 लालबहादुर शास्त्री उनके परिवार के सदस्य बनकर रहे, तो लोग हंसते थे, परन्तु थी यह वास्तविकता। इसी प्रकार मुंशी प्रेमचन्द्र के वे सही अर्थाें में पोषक थे।

    भार्गव जी कवि थे, सम्पादक थे, प्रकाशक थे और थे हिन्दी के कीर्तिमान पुस्तक-विक्रेता। वे एक ‘मिशन’ को लेकर हिन्दी सेवा में लगे रहे। ‘कवि कुटीर’ उनकी याद में बिलखता है, कवि-कोविद-क्लब का करुण कन्दन आज भी सुनाई पड़ता है तथा ‘गंगा-पुस्तक-माला’ का सूनसान वातावरण उनकी याद में गमगीन नजर आता है। जिस शमा पर अनेक परवाने मंडराते थे, वह बुझ गई। पर क्या वास्तव में? उनकी आत्मा अब भी हमारे पास मंडराती है और हमें उनके अधूरे स्वप्नों को पूरा करने की प्रेरणा देती है। उनकी आंखे मुंदते ही न जाने कितने छात्र-छात्राओं का अध्ययन रुक गया, कितनों को बेरोजगारी का मुंह जोहना पड़ा, गुलजार रहने वाली बैठक बेचैन हो गई। शेरवानी और चूड़ीदार पैजामा पहने, बस्ता बगल में दबाये भार्गव जी कई बार मेरे सिरहाने स्वप्न में ओये हैं- ‘तुमने मेरा कोई काम नहीं किया।’ वे अपने जीवन के अन्तिम दिनों मे ंएक संस्था की स्थापना के लिए प्रयत्नशील थे। इंस्टीट्यूट आॅफ प्रिंटिंग एण्ड टेक्नोलाॅजी की संस्थापना के लिए दिन-रात साइकिल पर दौड़ा करते थे। यह वही भार्गव जी थे जिनकी ‘दुलारी मोटर’ पर कभी कविता लिखी गई थी। वे हमेशा अपने जमाने से आगे की बात सोचते थे, उसे क्रियान्वित करने के लिए सतत् प्रयत्नशील रहते थे। काश! हम उनका अधूरा स्वप्न पूरा कर पाते। एक बार पद्म भूषण पं0 अमृत लाल नागर जी ने कहा था, - ‘‘भार्गव जी के नाम पर म्यूजियम बन जाता तो आधुनिक साहित्य का बिखरा हुआ इतिहास शायद एकत्र हो जाता।’

    अपने जीवन की सांध्य-बेला में वे जितने अधिक खान-पान के प्रति आग्रहशील थे, उतने ही अभावग्रस्त। सुबह की चाय वे तथाकथित ‘बाहरी लोगों’ के यहां पीते थे। वैसे उन्होंने नीबू की चाय पीने की आदत मेरी डाली, जिससे मैं सर्दी-जुकाम से पीडि़त नहीं रहता। दोपहर का उनका ठंढा और रूखा-सूखा खाना देखकर नेत्रों में अश्रु भर-भर आते थे। घरवालों को पसन्द नहीं था कि ‘बाहर वाले’ आयें। परन्तु सम्बन्ध आन्तरिक होता है। वे बाहर वालों को ही अपने दुख-सुख का भागीदार बनाते थे। घर से वह इस कदर संत्रस्त थे कि जेठ की तपती दोपहरी में भी बाहर घूमा करते थे किसने की उनके स्वास्थ्य की चिन्ता? जिन यातानाओं को उन्हें झेलना पड़ा, उनका उल्लेख न करना ही उचित होगा। लेकिन यह सत्य है कि यदि परिवार वालों ने उन्हें इतनी अधिक पीड़ा न दी होती तो वे संसार से अभी न जाते।
    पत्नी के प्रेम से वंचित, भाइयों के पारस्परिक कलह से त्रस्त भार्गव जी का असामयिक निधन हो गया। जो परिवार के सदस्य उनके शव को कैश कराना चाहते हैं, उनकी उपलब्धियों का श्रेय लूटना चाहते हैं, उन्हीं ने उन्हें प्रताडि़त किया। उस हीरामन तोते के प्रांण उड़ गये। पारिवारिक विरोध उनके लिए बहुत बड़ा ‘टेंसन’ बन गया था। वे अपनी बात समझाने के लिए जोर-जोर से बोलने लगते थे। आज उस गुमशुदा आवाज की हमें तलाश, नयी पीढ़ को उसकी जरूरत है। तुलसी की ये पंक्तियां उनके संदर्भ में बरबस याद आती हैं -
परहित सरिस धर्म नहिं भाई, पर पीड़ा सम नहिं अधमाई।
(डाॅ0 शम्भूनाथ चतुर्वेदी, अतिथि सम्पादक)

बसंत -गीत

महाकवि दुलारे लाल भार्गव
गंध - बलित - मारुत - चलित, ललित कुंज - दल- पुंज।
भरत दलित चित में बहैं कलित बेनु - धुनि - गंुज।।
न आयौ बर बसंत मन-सावन -
कोमल कुसुम -सुमन सरसावन करि प्लावन रस पावन।
कानन मैं वा धुनि को गंुजनि सुनि नहिं परति सुहावन।
बिसरायौ वा मन तन धावन-गुनि प्रान-समीरन-धावन।
मधुकर कंठ न गावन भावतु मंगल - गान लुभावन।
अजहुं ललित, बिरहिन अंखियन मैं छाय रह्यौ जनु सावन।
न आयौ बर बसंत मन- भावन।

प्रणाम! दुलारे युग की स्मृति में प्रियंका का विशेष अंक

हिन्दी पत्रकारिता के पितामह, प्रथम देव पुरूस्कार विजेता, लखनऊ की नवाबी मिट्टी में हिन्दी का विशाल वटवृक्ष लगाने वाले प्रखर साहित्यकार पं0 दुलारे लाल भार्गव की स्मृति में ‘प्रियंका’ ने फरवरी 1981 में उनके 82वें जन्म दिवस पर ‘स्मृति अंक’ का प्रकाशन किया था। इस विशेष अंक में मूर्धन्य साहित्यकारों के आलेख व संस्मरणों के अतिरिक्त कई कवितााएं भी छपी हैं। उसे जस का तस (चित्रों को छोड़कर) दिया जा रहा है।
यहां बताते चलें पं0 दुलारे लाल जी की ‘दुलारे दोहावली’ को श्री अयोध्या सिंह ‘हरिऔध’ जी के ‘प्रिय प्रवास’ की टक्कर में देव पुरूस्कार प्राप्त हुआ था, डाॅ0 राम कुमार वर्मा व श्रीनाथ सिंह के लेखों में उनके द्वारा किये गये आधुनिक हिन्दी के सृजन, प्रकाशन, विस्तार को ‘दुलारे युग’ माना है। ऐसा उस समय मंे ‘निराला, पंत’ सहित सैकड़ों ख्यातिनाओं ने स्वीकार किया है।
नई पीढ़ी को ‘दुलारे युग’ से परिचित कराने के लिए व शोधार्थियों के लिए ‘प्रियंका’ के ‘स्मृति अंक’ को यहां दिया जा रहा है।
राम प्रकाश वरमा
सम्पादक, प्रियंका हिन्दी पाक्षिक