Sunday, October 23, 2011

जीवित माता-पिता की पूजा!

बाराबंकी। माता-पिता की उपेक्षा के इस दौर में पुत्रों द्वारा उनकी पूजा-अर्चना का समाचार हैरत में डालने वाला है। लेकिन है यह पूरी तरह सच। खबर के मुताबिक पितृपक्ष की चतुर्दशी के दिन जनक जननी सम्मान समारोह का आयोजन पारिजात युवक समिति द्वारा सफदरगंज में समिति के कार्यालय में पिछले तेरह वर्षों से किया जाता है। यह वृद्धजनों के प्रति युवाओं में प्रेम के नये पाठ का संदेश है।
    समिति कि यह परम्परा गांव-गांव फैल रही है। अपनी संतान से जिंदगी के आखिरी पड़ाव में मिलने वाला सम्मान बुढ़ापे में मजबूत संबल बन रहा है। हालांकि यह प्रथा वैदिक रीति-रिवाज से कुछ अलग हटकर है। सामान्यतया पितृपक्ष में पुत्र दिवंगत माता-पिता को हर वर्ष याद कर श्राद्ध आयोजित करता है और उनके प्रति कृतज्ञ होता है, वहीं इस परंपरा के तहत जीवित तौर पर माता-पिता का विधि-विधान से पूजन किया जाता है। समारोह में करीब ढाई-तीन सौ तक की संख्या में माता-पिता के साथ उनका कुटुंब शामिल होता है।
समारोह का खर्च सब मिलजुलकर उठाते हैं। समिति भी अपना योगदान करती है। पुत्र माता-पिता के लिए पांच नए कपड़े उनकी पसंद के पकवान व अन्य खाद्य सामग्री की व्यवस्था करते हैं। माता-पिता की विधि-विधान से आरती कर चरणों में पुष्प अक्षत अर्पित उनका वंदन करते हैं। इस परंपरा का निर्वहन करने वाले पुत्रों का कहना है, माता-पिता देव की तरह पूजन-अर्चन व संतानों द्वारा क्षमा याचना करते देख फूले नहीं समाते हैं। उनके चेहरे पर ऐसी खुशी आती है जो शब्दों में व्यक्त नहीं की जा सकती।

सब्जियों की तस्करी!

गोरखपुर। सब्जियों की तस्करी सुनकर लोगों को हैरानी हो सकती है। जबकि खुलेआम नेपाल के रास्ते चीन तक भारतीय सब्जियां जा रही हैं। इसी तरह चीन से सब्जियों के साथ बहुत कुछ आता है। सब्जियों की कीमतों में बढ़ोतरी के पीछे बाढ़ के साथ तस्करी का बड़ा हाथ है आलू और प्याज की कीमतों में इस कदर बढ़त ने आदमी की रसोई में सिर्फ नमक का विकल्प छोड़ा है। मजे की बात है प्याज के निर्यात पर पिछले दिनों सरकार ने प्रतिबंध भी लगा दिया था, फिर भी खुदरा बाजार में प्याज 24-25 रूपए से 30 रूपए प्रतिकिलों तक बिक रहा है। हालांकि नया प्याज बाजारों में आने वाला है।
    सोनौली, ठूंठीबारी (महाराजगंज), रूपईडीहा (बहराइच), धनगढ़ी (लखीमपुर), पचपेड़वा (बलरामपुर), नेपाल सीमाओं पर, सर पर व साइकिलों पर सब्जियों का बोझ लादे नेपाल जाते सैकड़ों भारतीयों को देखा जा सकता है। इसी तरह हजारों ट्रकों, मिनी ट्रकांे, टेम्पों को सब्जियां लादे नेपाल में प्रवेश करते देखा जा सकता है। इनमें तमाम ट्रक चीन सीमा तक जाते हैं। यही हालात बिहार, उत्तराखण्ड, पश्चिम बंगाल, राजस्थान, पंजाब सीमाओं पर भी कमोबेश हैं। नासिक का प्याज, पूर्वांचल की भिण्डी, तरोई, लौकी, गोभी, आलू, उत्तराखण्ड का टमाटर, भुसावल का केला सहित तमाम सब्जियां व देशी लहसुन बगैर निर्यात लाइसेंस के नेपाल, चीन, पाकिस्तान, बांग्लादेश के बाजारों में रोज पहुंचता है, बिकता है।
    प्रदेश में बार-बार लौटती बारिश से बढ़ा नदियों का क्रोध लगातार सब्जियों की आपूर्ति में बाधक बना, जिससे भी कीमतों में भारी इजाफा हुआ। लौकी-कद्दू, तरोई जैसी साधारण सब्जियां खरीदने में मध्यमवर्ग घबरा रहा है। दशहरे के बाद दीपावली पर्व की दस्तक ने बाजार में नई सब्जियों की आवक जरूर बढ़ाई है, लेकिन उनके भाव आसमान छू रहे हैं। लोग बाग छोला, राजमा, काला चना, आलू से काम चलाने को मजबूर हैं। यह हालात अकेले उत्तर प्रदेश या भारत में हों ऐसा भी नहीं है। चीन, पाकिस्तान, बांग्लादेश में भी कुछ ऐसे ही हालात भारी बारिश ने बना दिये हैं। इन देशों के थोक व्यापारियों में भारतीय सब्जियों के प्रति हमेशा से लगाव रहा है, क्योंकि वे हाथ के हाथ महंगे दामों में बिक जाती हैं। जहां भारतीय सब्जियां चोरी छिपे विदेशी बाजारों में पहुंचती हैं, वहीं इन्हें नियति भी किया जाता है। पिछले साल अक्टूबर में पाकिस्तान को सब्जियां निर्यात की गईं थी। इस साल भी वेलफेयर एसोसिएशन आॅफ होलसेल वेजीटेबल्स मार्केट्स, कराची ने भारतीय सब्जियों का आयात करने के संकेत दिये हैं। जबकि भारतीय सब्जी थोक व्यापारी संघ बहुत कुछ उत्पादक संघ के साथ मिलकर पहले ही प्याज, आलू के साथ फलों का निर्यात करने में लगा है। यदि नई सब्जियां भी त्योहारी सीजन में पाकिस्तानी बाजारों में भेजी जाएंगी तो भारतवासियों को दीपावली में बेहद कीमती सब्जियां खरीदनी पड़ेंगी। एक अनुमान के मुताबिक यह कीमतें 75 से सौ फीसदी तक बढें़गी।
    गौरतलब है बाढ़ के कारण जिन बाजारों में प्रतिदिन सब्जियों के ढाई-तीन सौ ट्रक आ रहे थे, वहीं आजकल भी महज पांच-सात सौ ट्रकों की ही आमद है। जबकि आमतौर पर हजार-बारह सौ ट्रक रोज आते थे। इसके पीछे सब्जी उत्पादक जिलों से तस्कर सीधे सब्जियां खरीदकर अपने साधनों से ऊंची कीमतों पर सीमा पार भेज रहे हैं। गो कि तस्करी से, निर्यात से जैसे भी हो, भारतीय सब्जियां विदेशी खाएंगे।

Monday, October 10, 2011

SERVEY FOR C.M. U.P.

२०१२ में  उ.प्र .का मुख्य मंत्री    कौन होगा ?
मायावती 
अखिलेश यादव 
राजनाथ सिंह 
नया चेहरा
गठबंधन का मुख्यमंत्री  
अपना मत दें - editor.priyanka@gmail.com  

Thursday, August 11, 2011

सावन में आए हरि शंकर

पांच अगस्त किसी मांगलिक पर्व की बेला भले ही न हो, लेकिन पृथ्वी के एक बड़े भू-भाग पर हर-हर महादेव का जयघोष अवश्य गंूजता है। हरि स्मरण यानी भगवान शंकर की स्तुति और सावन की मस्ती। आदमी के मन में तीर्थ के पुण्यलाभ का अहसास। एक ओर महादेव के जलाभिषेक की श्रद्धा, दूसरी ओर मानव को जल का उपहार। दोनों ही मानव जीवन की अमूल्यता। सावन की बरखा जहां धरती को उपजाऊ बनाती है, वहीं युवाओं के मन में मस्ती की हिलोरें पैदा करती है। भाई के प्रति बहनों में अनुराग की ऊर्जा देती है। पुत्र माता-पिता को कांधों पर उठाए भोले बाबा के दरवाजे ले जाते श्रवण कुमार के भाव भी इसी सावन में देखने को मिल जाते हैं। सावन में ब्याही बेटियां अपने मायके आकर वात्सल्त्य जीती हैं। गो कि सावन जीवन की खिलखिलाहट है। मानव मन के लिए तीर्थ है। इसी सावन के महीने में 71 साल पहले 5 अगस्त को ईश्वर ने गोरखपुर की धरती पर एक हस्ताक्षर किया था। जिसे देश-दुनिया पं0 हरिशंकर तिवारी के नाम से जानती है।
    नाम के अनुरूप ही भोले बााब सा स्वभाव। दसियों भस्मासुरों को आशीष देने के बाद भी होठों पर निश्छल मुस्कान। कोई राग नहीं, द्वेष नहीं। यही भावना उनके वसुधैव कुटम्बकम यानी पूरे समाज को ही अपना परिवार मानने की इच्छा और क्षमता को उजागर करती हैं। मैं एक लम्बे समय से उनका सानिध्य पाने का गौरव पा रहा हूं। मेरे स्मृति के पुस्तकालय में कई संग्रह हैं। इन्हीं में से एक का जिक्र हर बरस उनके जन्मदिन पर कर जाता हूँ। जन्मदिन पर मुबारक बाद देना या प्रणाम करना जीवन में नई ऊर्जा भरने के समान है। करोड़ों-अरबों लोग इसे महज औपचारिक या मौज-मस्ती के पर्व भर तक सीमित कर देने के ‘हैप्पी बर्थ डे’ के इर्द-गिर्द केक पर सजी मोमबत्तियां फूंक कर ताली बजाते, खाते-पीते अघा जाते हैं। दरअसल वे भी ‘बर्थडे ब्वाय’ या ‘बेबी’ को जीने के लिए नई ऊर्जा देने का ही काम करते हैं।
    पंडित जी पांच अगस्त दो हजार ग्यारह को 71 बरस पूरे करके 72वीं चौखट में प्रवेश कर गए। उनका जन्मदिन मनाने जैसा कोई आयोजन कभी नहीं होता। इस दिन भी उनकी दिनचर्या में कोई बदलाव नहीं होता। रोज की तरह उनका गाय, भैंसे, कुत्तों का दुलराना और कसरत के बाद अखबार देखने का नियम नहीं टूटता। न ही आमजन से मिलने और उनसे बतियाने का क्रम बिखरता। तिस पर विलक्षण तो यह कि उनके अगल-बगल बिखरी खास-ओ-आम की भीड़ का आधा फीसदी भी नहीं जानता कि आज उनका जन्मदिन है। वे कभी जताते भी नहीं। हर बरस ‘प्रियंका’ के पन्नों पर उनके जन्मदिवस पर जहां उनकी कुछ बातें हो जाती हैं, वहीं कुछ भूले-बिसरे क्षण भी उजागर हो जाते हैं।
    1992 में प्रियंका वर्षगांठ समरोह में देर से आए पंडित जी देर तक रहे। उनके इंतजार में कई लोग बेताब थे, तो कई को समरोह खत्म होने की जल्दी। उनमें मंत्री जी व आइएएस भी थे। जब वे आए तो सबसे पहले उन्होंने अपने देर से आने के लिए क्षमा मांगी। अपने सम्बोधन में दोबारा खेद जताया। ‘प्रियंका’ को महज समाचार-पत्र नहीं वरन जागरूकता का प्रहरी बताते हुए उन्होंने उसमें छपी एक खबर की ‘हेड लाइन’ पढ़कर सुनाते हुए कहा, ‘ यही विशेषता मुझे यहां तक खींच लाती हैं। सच तो यह है कि अखबार वे ही अच्छे और सच्चे लगते हैं जिनमें अपने आस-पास की अनुभूति हो।’ पंडित जी के जन्मदिन पर ‘प्रियंका’ का यह विशेष अंक उनके लिए नहीं उनके स्वजनों के लिए छपता है। वही उसे पूरे आनन्द से पढ़ते हैं। वहीं इस अंक के जरिए प्रणाम भी करते हैं। ईश्वर पंडित जी को दीर्घायु करें। सादर प्रणाम।

लखनऊ में महादेव ही... महादेव

¬ त्रयम्बकम् यजामहे सुगन्धि पुष्टि वर्धनम्।   उर्वारूकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्।।

केतकी वरमा
लखनऊ। सावन भर भोले बाबा महादेव की पूजा अर्चना कर जीवन में सुख-शान्ति की कामना करने वाले भक्तों की भीड़ मनकामेश्वर मंदिर, कोनश्ेवर मंदिर या बुद्धेश्वर मंदिर में अधिक रहती हैं। बुद्धेश्वर महादेव का मेला हर बुधवार को पूरे सावन भर मंदिर के पास लगता है। मोहान रोड पर बने इस प्राचीन मंदिर का जीर्णोद्वार पूरी तरह हो गया है। इस मन्दिर के शिवलिंग को गुप्तकालीन माना जाता है। मन्दिर के पिछली ओर एक सरोवर का खण्डहर भी है, जहां वीरवर लक्ष्मण के स्नान करने की बात कही जाती हैं। इससे इस तीर्थ की महिमा आंकी  जा सकती है। ग्रामीण और अपढ़ जन इसे ‘बुद्धेसुरन’ कहकर पुकारते हैं। मंदिर में यूं तो हर बुधवार खासी भीड़ होती हैं, लेकिन सावन में यहां भक्तों का तांता देखा जा सकता है। कहते हैं बरसात में लगने वाले मेले में आने के लिए भक्तों को एक उफनाते हुए नाले को पार करने में दिक्कतें होती थी। महादेव की एक भक्तिन धनिया महरी ने उस नाले पर पुल बनवा दिया था, जो आज भी है और धनिया महरी पुल के नाम से जाना जाता है।
    लखनऊ में गोमती नदी के बाएं तट पर मन की सभी इच्छाओं को पूरा करने वाले मनकामेश्वर महादेव का शिव मन्दिर है। शिव मन्दिर मे डालीगंज पुल से होकर जाया जा सकता है। यह बेहद प्राचीन शिवालय है। राजा हिरण्यधनु ने अपने शत्रुओं पर विजय प्राप्त करने के उल्लास में इस मंदिर का निर्माण कराया था। मंदिर के शिखर पर 23 स्वर्णकलश थे। दक्षिण के शिव भक्तों और पूर्व के तारकेश्वर मन्दिर के उपासक साहनियों ने मध्यकाल तक इस मंदिर के मूल स्वरूप में बनाए रखा था। आज के भव्य मंदिर का निर्माण सेठ पूरन शाह ने कराया।
    गोमती नदी के कुड़िया घाट (कौण्डिन्य घाट) के पास कौण्डिन्येश्वर महादेव मन्दिर है, जिसे कोनेश्वर मन्दिर व आम बोलचाल में कोनेसुरन शिवाला कहा जाता है। इस मंदिर के खण्डित शिवलिंग की प्राचीनता और महिमा से भक्तगण बेहद प्रभावित हैं। हर सोमवार मेले जैसा वातावरण रहता है।
    रकाबगंज से नक्खास जाने वाली सड़क नादान महल रोड पर अहाता कमाल जमाल के पास सिद्धनाथ महादेव मंदिर है। इस मंदिर का शिवलिंग काफी समय तक भूमिगत रहा। यहां शिवलिंग की लाट धरती में बहुत अधिक गहरी है, जो चांदी से मढ़ी है। बाबा सिद्धनाथ की ताम्रवर्णी गुप्ताकलीन मूर्ति पर अर्ध्य जल की धार से एक गढ़े का चिन्ह सा बन गया है। शिवालय में पंचदेवोंपासना का निर्वाह होता है। यहां विशाल त्रिशूल और धवलनंदी देखने लायक हैं।
    रानी कटरा मोहल्ले में 9वीं सदी से पहले की सहस्त्रलिंग प्रतिमा वाला बड़ा शिवाला है। इसका निर्माण कश्मीरियों द्वारा दोबारा कराया गया है। यहां के ठाकुरद्वारे में शिव-पार्वती की मूर्तियां हैं। आगे चौपटिया जाते समय खेतगली में छोटा शिवाला है, जिसे 12वीं सदी में सांस्कृतिक संक्रमण के बाद दोबारा पांच सौ दस बरस पहले निर्मित कराया गया था। किंवदंती है कि उस समय इसका अरधा जब दक्षिण उत्तर किया जाता था तो वो अपने आप घूमकर पूरब पश्चिम हो जाता था।
    अलीगंज में जागेश्वर मन्दिर है जो पहले अहिबरनपुर में आता था। इसे कल्लनमल व्यापारी ने बनवाया था। वे शिवभक्त होने के साथ अलीगंज हनुमान मंदिर के निर्माता जाटमल के सम्बन्धी थे।
    लखनऊ के उत्तर में इटौंजा के पूर्व में महोना में बाबा गंगागिरी आश्रम में समाधियां हैं इन सभी समाधियों पर शिवलिंग हैं। कहते हैं यहां बाबा गंगागिरी ने जीवित समाधि ली थी। यहीं एक पक्का तालाब है और उसी के पास मन्दिर है। यहां के दुखहरण द्वार पर गुप्तकालीन चौखट लगी है। इस शिवाले के भक्तों में बड़े राजा रईसों का नाम आता है।
    लखनऊ के उत्तर पूर्व में कुम्हारावां ब्राह्मणों की बस्ती है। यहां के राजा पृथ्वीपाल की रानी जिन्हें गांव वाले धिराजरानी कहते थे, ने कारसेवन मन्दिर का निर्माण अयोध्या के कुशल कारीगरों से कराया। कहते हैं मन्दिर में जो शिवलिंग है। उसे जंगल में चरवाहों ने देखा था। धिराजरानी इस शिवलिंग को अपनी हवेली के पास प्रतिष्ठापित कराना चाहती थी लेकिन शिव को कोई हिला भी नहीं सका सो वहीं पर मन्दिर बना। शिवरात्रि, कजरीतीज और सावन में आज भी मेले जैसा आयोजन होता है।
    लखनऊ के दक्षिण रायबरेली-लखनऊ सीमा पर सई नदी के तट पर भंवरेश्वर मंदिर है। इस शिवाले को औरंगजेब की फौज ने गिरा दिया था लेकिन जैसे ही मूर्ति पर प्रहार किया तो अरधे के पास से इतने भंवरे निकल पड़े कि फौज इनके आतंक से भाग खड़ी हुई। यहां के शिवलिंग पर उस आघात के निशान आज भी बाकी हैं। इसका वर्तमान निर्माण कुर्री सुदौली के राजा सर रामपाल सिंह की पत्नी रानी गणेश कुंवर ने अपनी किसी मनौती के सन्दर्भ में कराया।
    नगर के पश्चिम में सड़क के बांयी ओर नवाब आसिफुद्दौला के शासनकाल में हरिद्वार से आए बाबा कल्याण गिरी ने यहां मुख्य शिवलिंग स्थापित किया था और मन्दिर का निर्माण राजा भवानी महरा द्वारा किया गया था। अब तो कई मन्दिर बन गए हैं। इन्हीं को कल्याणगिरी मन्दिर कहा जाता है। यहां सावन के अलावा कजरीतीज व शिवरात्रि में मेला लगता है। लखनऊ के काकोरी (कर्कपुरी) के करीब बेता नदी के तट पर नवाब आसिफुद्दौला के दीवान राजा टिकैतराय का बनवाया राज राजेश्वर मन्दिर है। यह शिवाला भारशिवों की परम्परा कान्धे पर जल से भरी कंवर उठाए शिवाराधना का जीवंत प्रमाण है। इटौंजा में रत्नेश्वर महादेव के मन्दिर का निर्माण सन् 1892 में इटौंजा नरेश राजा इन्द्र विक्रम सिंह ने कराया था। यहां शिवरात्रि में बड़ी भीड़ होती है।
    लखनऊ से 25 किलोमीटर दूर मोहनलालगंज में काशीश्वर शिव मन्दिर का निर्माण सिसेंडी के ताल्लुकेदार राजा काशी प्रसाद ने सन् 1860 में कराया था। दोबारा सन् 1926 में उनकी रानी सुभद्रा कुंअर ने भी इसे सुन्दर रूप दिया। इस शिव मन्दिर के साथ आठ कोणों पर आठ शिवाले बने हैं। खास बात यह है कि मन्दिर का द्वारपाल रावण है। यहां शिव दर्शन की बड़ी मान्यता है।
    लखनऊ नगर से मोहान कस्बे के बीच नवलगंज में राजा नवल राय का बनवाया शिवाला अपने शिखर को लेकर बेहद लोकप्रिय है। इसे रचनाधर्मिता के लिहाज से रतन शिवाला भी कहा जाता है। राजा साहब ने एक शिवाला मलिहाबाद में भी बनवाया था, जो आज भी है।
    नवलगंज के पास महाराजगंज है जिसे नवाब वाजिद अली शाह के वित्त मंत्री दीवान राजा बालकृष्ण ने बसाया था। संवत् 1880 में दीवान साहब ने यहां एक भव्य शिव मन्दिर, धर्मशाला व कुआं बनवाया था। इसके शिखर पर पीतल के सिंह और मर्कट बने हैं। द्वार पर कबूतरों का एक जोड़ा बना है।
    लखनऊ के इन सभी शिव मन्दिरांे में सावन, शिवरात्रि, कजरीतीज और हर सोमवार को उत्सव जैसा वातावरण रहता है। सावन में भक्तगण इनकी परिक्रमा लेटकर करते देखे जाते हैं। शिवभक्ति में रचे बसे लखनऊ की गलियों में भी तमाम छोटे शिवाले देखने को मिलते हैं। कई छोटे शिवाले तो सौ से दो सौ बरस पुराने हैं। इन सभी शिव मन्दिरों में आजकल ‘बम भोले’ की गूंज है।