Thursday, December 20, 2012

पिटती पुलिस


लखनऊ। पुलिस का खौफ अपराधियों में पहले ही नहीं रह गया, अब जन सामान्य में भी उसका इकबाल घट रहा है। पिछले दस महीनों में प्रदेश के छः जिलों में सात पुलिसवालों पर सरेआम हमले हुए जिसमें चार की मृत्यु हो गई। मेरठ में 7 दिसम्बर को छात्रों के दो गुट्टों में हुए झगड़े को सुलटाने के दौरान पुलिस उपनिरीक्षक आनन्द पाल सिंह को इंजीनियरिंग के छात्र पंकज शर्मा ने गोली मार दी। इससे पहले 15 मई को मेरठ में दिल्ली पुलिस के हेड कांस्टेबिल संजीव और उसके साथी को सरेआम सड़क पर गोली मार दी गई थी, जिसमें संजीव ने मौके पर ही दम तोड़ दिया था।
    लखनऊ में नवम्बर महीने में मुख्यमंत्री की सुरक्षा में तैनात पुलिस उपाधीक्षक की पिटाई सरेआम हो गई थी। लखीमपुर में 29 अक्टूबर को कांस्टेबिल उमेश कुमार को गोलीमार कर हत्या कर दी गई। 24 अक्टूबर को इलाहाबाद के दुबावल गांव में मध्य प्रदेश वायरलेस पुलिस में कार्यरत एक सब इंस्पेक्टर की जमीनी विवाद में गोली मारकर हत्या कर दी गई। बदायूं के नदौलिया गांव में स्वतंत्रता दिवस 15 अगस्त को उस समय गोली मार दी गई जब वह अपराद्दियों का पीछा कर रहा था। 30 मार्च को कानपुर के नौबस्ता थाने के एसओ देवेन्द्र सिंह की पुलिस स्टेशन के भीतर गोली मारकर हत्या कर दी गई। इसी तरह यातायात सिपाही भी आए दिन पिट रहे है। (देखें बाॅक्स)
    पुलिस पिट रही है लेकिन एडीजी कानून-व्यवस्था अरूण कुमार कहते हैं, ये घटनाएं अपराधियों द्वारा नहीं अंजाम दी जा रहीं, बल्कि अचानक घट रही हैं, इन्हें हादसों की तरह देखा जाना चाहिए। फिर भी पुलिस का इकबाल कम हो रहा हैं, सवाल जस का तस है।
पिछले दो महीने में हुए ट्रैफिक पुलिस पर हमले
ऽ    14 दिसम्बर को चैक में कन्वेंशन सेंटर तिराहे पर लाल बत्ती पार करते हुए बाइक सवार विजय कुमार को रोकने पर उसने ट्रैफिक सिपाही पर रिवाल्वर तान दी।
ऽ    11 दिसम्बर को टेढ़ी पुलिया चैराहे पर तैनात दरोगा अम्बिका प्रसाद यादव पर एक इंडिका सवार युवक ने अपनी कार चढ़ाने का प्रयास किया।
ऽ    16 नवम्बर को डालीगंज पुल पर टैªफिक सिपाही राजेश यादव से मंत्री के करीबी दो युवकों ने हाथापाई की थी।
ऽ    9 नवम्बर को शराब तस्कर परमजीत सिंह ने आलमबाग में चेकिंग के दौरान सिपाही को कुचलने की कोशिश की थी।
ऽ    06 नवम्बर को साउथ सिटी पुलिस चेक पोस्ट के पास दो युवकों ने सिपाही राजू निगम पर हमला कर दिया था।
ऽ    02 नवम्बर को निशातगंज पुलिस चैकी के पास ट्रैफिक हेड कांस्टेबिल एचसी कुशवाहा को तीन छात्रों ने पीटा।
ऽ    02 नवम्बर को ही आलमबाग के पास सिटी बस में दो छात्रों ने एटीएस के सिपाही संजय यादव को पीटा।
ऽ    01 नवम्बर को हजरतगंज में रायल होटल चैराहे के पास दो युवकों ने सिग्नल तोड़ने का विरोध कर रहे ट्रैफिक सिपाही दशरथ प्रसाद की पिटाई की थी।

आज सडे है, लखनऊ गंदा रहेगा

लखनऊ। राजधानी में सफाई अभियान के साथ कूड़ा उठवाने और आवारा जानवरों को पकड़ने में नगर निगम ने पिछले दिनों खासी दिलचस्पी ली। हालांकि इसी बीच पुराने लखनऊ के तोप दरवाजे पर आवारा सांड़ ने एक युवक को बुरी तरह घायल कर दिया। पूरे शहर में दसियों लोग इन साड़ों की दबंगई का शिकार हो रहे हैं। नगर विकास  मंत्री भी बार-बार गंदगी देख नाराज होते हैं। वहीं सफाईकर्मी शहर को गंदा रखने की कसम खाकर आन्दोलन और धरने का सहारा ले मजे कर रहे हैं। 30 लाख की आबादी वाला शहर लखनऊ रविवार और सार्वजनिक अवकाशों को बेहद सुस्त हो जाता है। सरकारी कार्यालयों में अवकाश रहता है। कई प्रमुख बाजार बन्द रहते हैं। सड़कों पर यातायात का दबाव बेहद कम होता है। ऐसे में सफाईकर्मी भी छुट्टी मना लेते हैं। सफाईकर्मियों की छुट्टी का नतीजा शहर के लिए गंदगी का तोहफा हो जाता है। गलियों, सड़कों पर कूड़ा फैला रहता है, तो नालियाँ भरी हुई बजबजा रही होती हैं। आमतौर पर सफाईकर्मी कूड़ा आधा-अधूरा उठाते हैं, नालियों की सिल्ट खाली ही नहीं करते, इसी कारण महज 24 घंटे में शहर कूड़े से पट जाता है। इसमें आवारा जानवर और समझदार नागरिक भारी इजाफा करने में बढ़-चढ़कर कर हिस्सा लेते हैं। ये सभ्य लोग अपने को राजधानी का वाशिन्दा नहीं मानते या सरकारी कर्मचारी आसमान से आएंगे सोंचते हैं? इसी तरह की सोंच के लोग एक बार सरकारी सेवा में आने के बाद काम न करने का जेहाद जारी रखते हैं। पिछले दिनों स्मारकों पर तैनात सफाई कर्मचारियों ने नगर निगम के सफाई अभियान मंे काम करने से न केवल इन्कार किया बल्कि जिस काम के लिए तैनात हैं वह भी बंद करके धरना प्रदर्शन करते रहे, अधिकारियों के खिलाफ नारेबाजी करते रहे। उनका तर्क है कि उन्हें केवल स्मारक व कैम्पस में साफ-सफाई के लिए नियुक्ति किया गया है। यह तर्क उचित नहीं है। इस तरह चुनावों के दौरान चुनावों में काम करने वाले शिक्षक, राज्य कर्मचारी, न्यायिक अधिकारी तर्क दें, तो क्या चुनाव संपन्न हो सकेंगे? स्मारकों में तैनात कर्मियों का काम न करने का एलान अपराध की श्रेणी में रखा जाना चाहिए? इन पर बाकायदा कार्रवाई की जानी चाहिए? यदि राज्य सरकार दण्डात्मक कदम नहीं उठाती तो उच्च न्यायालय को स्वतः इस प्रकरण को संज्ञान में लेकर इन सफाईकर्मियों पर चेतावनी स्वरूप कार्रवाई करनी चाहिए? यूं भी उच्च न्यायालय समय-समय पर स्वतः संज्ञान लेकर राज्य सरकार को शहर में सफाई करने, अतिक्रमण हटाने के आदेश देता आया हैं। इन सवालों को उठाने का मतलब है, अधिकार और कर्तव्य की परिभाषा कौन समझाएगा, कैसे समझाएगा या हम कैसे समझेंगे?
    गौरतलब है कि पिछले बरस पेयजल और स्वच्छता मंत्रालय ने सफाई और पीने के पानी की व्यवस्था करने में उप्र को फिसड्डी घोषित किया था। ये ऐसे ही नहीं घोषित किया गया बाकायदा प्रदर्शन के आधार पर रैकिंग दी गई थी। लखनऊ तो गंदगी के मामले में काफी लम्बे समय से अव्वल रहा है। इसके पीछे जरूरत से आद्दे सफाईकर्मियों की तैनाती और उसमें भी आधे काम करने आते ही नहीं। इसके अलावा दलित राजनीति ने इन कर्मियों को ‘वोट’ में तब्दील कर दिया है। कमोबेश हर बालिग नागरिक ‘वोट’ में बदलकर मुट्ठियां भींचे हाथ हवा में लहराते हुए इंकलाब जिंदाबाद का नारा बुलंद किये हैं। तो फिर कौन करेगा अपने-अपने कत्र्तव्य?

बंदर भी हैं शोहदे!

लखनऊ। बंदरों की शोहदई और गुण्डई के लगातार बढ़ने से सूबे के लोग बेहद भयभीत हैं। वाराणसी, इलाहाबाद,
अयोध्या, कानपुर, आगरा, मथुरा, गाजियाबाद, विध्यांचल, बलरामपुर, चित्रकूट और नैमिष्यशारण व गोला गोकर्णनाथ आदि जगहों से बंदरों के आतंकी हमलों की भयावह खबरें आ रही हैं। यहाँ आपको बताते चलें कि पिछले दिनों दिल्ली में पूर्व प्रधानमंत्री इंद्र कुमार गुजराल की अंत्येष्टि से लौट रहे भारत के राष्ट्रप्रति प्रणव मुखर्जी को बंदरों के उत्पात के चलते लगे जाम के कारण अपना रास्ता बदलना पड़ा। बंदरों की शोहदई का हाल यह है कि खुलेआम युवतियों से छेड़छाड़ और उनके कोमलांगों में काटकर उन्हें घायल कर रहे हैं। गुण्डई का आलम यह कि छतों पर लगी पानी की टंकियों का पानी प्रदूषित करने के साथ पाइपलाइन तोड़ रहे हैं। बच्चों का काॅलर पकड़ने से लेकर लोगों की हत्याएं तक कर रहे हैं। अपने झुंड में वर्चस्व की खूंखार जंग में अपने ही साथियों की हत्या कर उनके शव यहां-वहां फंेक देते हैं। खुलेआम छतों पर, छज्जों पर मैथुनक्रियारत बन्दर ‘पोर्न स्टारांे’ जैसी हरकतें अंजाम दे रहे हैं, तो युवा पीढ़ी उनके एमएमएस बनाने का खतरा उठाकर रोमांच जीने की ललक में घायल हो रही है।
    लखनऊ के नगराम में गांव केवली के कृष्णपाल बंदरों के दौड़ाने पर छत से गिरकर मर गये। गोसांईगंज के अमेठी में बंदरों ने 65 साल की बानों के घर की कच्ची दीवार गिरा दी जिसके नीचे दबकर वृद्धा बानों की मौत हो गई। मोतीनगर से सटे नेहरूनगर इलाके में बंदरों के झुंड में भयानक जंग देखकर लोगों ने अपने घरों के दरवाजे बंदकर लिये। घंटों बाद जब शान्ति हुई तो लोगों ने घर की छतों पर दो बंदरों के क्षत-विक्षत शव और तमाम खून के छींटे देखे। चारबाग रेलवेस्टेशन पर तो और बुरा हाल है, यात्रियों से खाने पीने का सामान छीन लेना विरोध करने पर काट लेना आम हैं। प्लेटफार्म पर ट्रेन का इंतजार करने वाले यात्रियों में महिलाओं की बड़ी सांसत है। उन्होंने खाने-पीने का सामान खोला नहीं कि बन्दर हाथ से छीनकर भाग जाते हैं। इसी तरह मंदिरों और घरों की छतों पर छीना-झपटी के साथ शोहदई जारी हैं। गणेशगंज में एक मकान की छत पर बच्चे खेल रहे थे, अचानक बंदरों का झुंड आ गया, बच्चे डरकर भागे, एक बच्चा पीछे रह गया। एक मोटे से बन्दर ने लपक कर उसका काॅलर पकड़ लिया। बच्चा बेहद डर गया, बमुश्किल वह छुटकारा पा सका। ऐसे ही ऐशबाग में छत पर कपड़े सुखाने आई एक युवती को बन्दरों के झुंड ने घेर लिया, वह डरकर बेहोश हो गई। होश आने पर उसने अपने कपड़े कई जगह से फटे व अपने शरीर पर काटे जाने के घाव पाये। यही हाल आगरा के कलेक्ट्रेट परिसर में है, जहां वकील, पैरोकार से लेकर दुकानदार तक हलकान हैं। इनकी हरकतों को कैमरे में कैदकर स्थानीय अखबारों ने छापा भी है। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के नवीन छात्रावास परिसर में घुसकर बंदरों का शरारती झुंड छात्राओं को काफी समय से परेशान कर रहा है। उन्हें दौड़ा कर काटने, उनके कपड़े फाड़ने जैसी हरकतें करते हैं। छात्राएं अपने कमरों को बन्द रखती हैं, फिर भी ये शोहदे लगातार उन्हें डराते रहते हैं।
    युवतियों को परेशन करने, उन्हें काटने की घटनाओं के बीच हैरतनाक खबरें भी हैं कि यदि कोई युवती उन्हें खाने-पीने का सामान देती है तो उसे चुपचाप लेकर ये चलते बनते हैं। कई बार बंदर इन युवतियों को दुलराते हुए भी देखे गए हैं। हाल ही में स्विट्जरलैण्ड में नयूचाटेल विश्वविद्यालय की बायोलाॅजिकल टीम ने दक्षिण अफ्रीका के लोस्कोप बांध नेचर रिजर्व में जंगली वेर्वेट प्रजाति के बंदरों के छह समूहों के अध्ययन के दौरान पाया कि ये बंदर महिलाओं के प्रति आकर्षित होते हैं। यदि कोई महिला इन बंदरों को किसी काम के लिए प्रेरित करे तो उसे ये बेहतर ढंग से समझते हैं। यह निष्कर्ष पत्रिका कार्यवाही की रायल सोसायटी बी में वर्णित है।
    युवतियों को शोहदों से बचाने के लिए ‘उप्र सरकार ने ‘वूमन पाॅवर लाइन’ तो उच्चतम न्यायालय ने गाइडलाइन तय की है, लेकिन इन बंदरों की शोहदई, गुण्डई से निजात दिलाने के लिए कौन फैसला लेगा?

सेल! सेल!! सेल!!! सेल!!!! बोलो बच्चा खरीदोगे

नई दिल्ली। कोख से लेकर कब्र तक बाजार में खुले आम बिक रही है। मुर्दा बिक रहा है, जिन्दा बिक रहा है। बीबी बिक रही है। मियां बिक रहा है। बच्चा बिक रहा है। खरीदने वालांे की भीड़ भी बढ़ रही है। एक साल के बच्चे की कीमत 50 हजार, तो चार महीने के मुस्कराते बच्चे की कीमत एक लाख.... क्या ज्यादा है? और जो अभी पेट में है उसकी कीमत दो लाख। गर्भ में आने वाले की कीमत तीन से पांच लाख के बीच मोल-भाव में जो तय हो जाय।
    राजधानी दिल्ली के तैमूरनगर, न्यू फ्रेंड्स काॅलोनी के पास ओखला की रहीमा ‘बच्चा उद्योग’ का जाना-पहचाना नाम है। अंग्रेजी अखबार ‘दि संडे गार्जियन’ ने हाल ही में एक खबर छापी है कि, रहीमा अपने आस-पास के इलाके के बड़े-बड़े घरों में घरेलू नौकरानी के साथ दाई (बच्चा पैदा कराने वाली नर्स) का काम करती है। उसका दावा है कि उसने यह काम 15 साल की उम्र से शुरू किया था और अब तक पांच हजार बच्चे पैदा कराने में उसकी भूमिका रही है। कई बार तो उसे एक ही रात में तीन से चार औरतों को अस्पताल तक पहुंचाने की मदद करनी पड़ी। वह उन औरतों की खास मददगार है जो गर्भधारण नहीं कर सकतीं और जो गरीबी की मार झेल रही हैं। उसका कहना है जो औरत न खुद अपना पेट भर सकती है, न ही अपने बच्चे को पाल सकती है उसकी मदद करती हूँ। दस दिन से जिस औरत के पेट में अन्न का एक दाना न गया हो, उसका बच्चा बीमार हो और उसे उचित देखभाल की जरूरत हो तो कोई उस बच्चे को गोद लेकर 50 हजार रूपये देकर उनका जीवन बचा ले वह भी कानून का पालन करते हुए तो क्या गलत है? ऐसे ही उसके पास कोख में पल रहे बच्चों और किराये की कोख में पाले जाने वाले बच्चों के साथ जरूरतमंद औरतों की खासी लिस्ट है। उसके ताल्लुकात राजधानी के तमाम प्राइवेट नर्सिंग होमों से हैं जहां वह आगरा, जयपुर तक से आने वाली लड़कियों को गर्भधारण कराने व उनके बच्चों को गोद दिलाने व विदेशी दम्पत्तियों को किराए का गर्भ दिलाने का काम धड़ल्ले से कर रही है। उसे अपने काम के खतरों से भी कोई भय नहीं है। उसका कारोबार महंगे सेलफोन के जरिए खूब फल-फूल रहा है। उसके एक कमरे के मकान के दरवाजे पर ग्राहकों और जरूरतमंद औरतों की आवाजाही देखी जा सकती है।
    यह कोई पहली खबर नहीं है। ऐसी खबरें आए दिन छपती रहती हैं। इससे पहले ‘संडे टेलीग्राफ’ अखबार ने छापा था कि ब्रिटिश दम्पत्तियों के लिए भारत ‘बच्चा फैक्ट्री’ बनकर उभर रहा है। उस खबर में दावा किया गया था कि पिछले साल अकेले दो हजार ब्रिटिशर्स ‘सरोगेसी’ के लिए भारत आए थे। जबकि देश में किराए की कोख से पैदा होने वाले बच्चों की संख्या डेढ़ करोड़ हो सकती है। यहां बताते चलें कि ब्रिटेन में किराए की कोख पर प्रतिबंध है। एक अनुमान के मुताबिक गुजरात, महाराष्ट्र, दिल्ली आंध्रप्रदेश में हजारों आईवीएफ क्लीनिक ‘बेबी फैक्ट्री’ के नाम से जाने जाते हैं। इनमें अकेले हैदराबाद में 250 तो दिल्ली में अनगिनित नर्सिंग होम इस धंधे में लिप्त है।
    गुजरात के शहर आनंद को दूध उत्पादन में जहां अव्वल दर्जा हासिल है, वहीं किराए की कोख (ैनततवहंबल) के मामले में दुनिया की राजधानी कहा जाने लगा है। यहां अमेरिका, ब्रिटेन, आस्ट्रेलिया, कनाडा, जापान, इसराइल, फिलीपीन्स, टर्की, जर्मनी, आइसलैण्ड आदि से निःसंतान दम्पत्ति आते हैं और किराए की कोख खरीद कर अपना बच्चा ले जाते हैं। इस छोटे से शहर की ख्याति किराए की कोख को लेकर इतनी हुई कि नेशनल जियोग्राफिकल टीवी चैनल ने इस पर एक डाक्यूमेंट्री फिल्म ‘द वाॅम्ब आॅफ दि वल्र्ड’ बना डाली है।
    किराए की कोख के कारोबार में यहां के एक नर्सिंग होम ने बाकायदा एक तीन मंजिला हास्टल बना रखा है, जहां गर्भवती महिलाओं को रखकर उनकी देखभाल की जाती है। कई बार इस हास्टल में एक साथ चालीस-पचास गर्भवती स्त्रियां रहती हैं। यहां किराए की कोख की कीमत 12-25 लाख है, जबकि अमेरिका में 80-90 लाख। वहीं बच्चा जननेवाली गरीब औरत को महज 5-7 लाख मिलता है। कृत्रिम प्रजनन अस्पतालों के जरिये किराए पर कोख लेने, डिंब या शुक्राणु बेचने के धंद्दे में केवल गरीब औरतें ही नहीं वरन् कुंआरी युवतियां भी शामिल हैं।
    गौरतलब है हिंदी फिल्म ‘विकी डोनर’ फिल्म भी इसी मुद्दे को लेकर बनाई गई थी। इसके प्रमोशन के दौरान अभिनेता जाॅन अब्राहम ने स्पर्म डोनेशन पर जब अपनी बेबाक राय जाहिर की थी, तब उनका शुक्राणु मांगने वाली महिलाओं की खासी संख्या सामने आई थी। इससे भी आगे ूूूण्इमंनजपनिसचमवचवसमण्बवउ साइट खूबसूरत बच्चा पाने वालों के लिए पिछले दस सालों से सक्रिय है। इस वेबसाइट के दुनिया भर में लाखों सदस्य हैं। इसी तरह लंदन के एड हाबेन प्रोफेशनल बेबी मेकर के रूप में पूरे यूरोप में प्रसिद्ध हैं। अप्रैल 2012 तक वे 82 बच्चों के पिता बन चुके थे, इनमें 45 बेटियां और 35 बेटे हैं। हाबेन अपना शुक्राणु बेचने के साथ ही बच्चा चाहने वाली महिला के साथ यौन सम्बन्ध बनाने के लिए भी मशहूर हैं।
    भारत में किराए की कोख कारोबार में उप्र व बिहार की महिलाओं की भी बड़ी संख्या है। यह पूरा कारोबार गोद लेने व प्रजनन कानूनों को धता बताकर खुलेआम हो रहा है। दुःख तो इस बात का है कि इसी मुल्क में कन्या-भ्रूण की हत्याएं हो रहीं हैं, तो खुलेआम नवजात कूड़ाघरों, सड़कों पर फंेके जा रहे हैं और दो करोड़ से अधिक अनाथ बच्चे देश की सड़कों पर जीने को मजबूर हैं। इसकी सुध लेने वाला कोई नहीं है और बच्चा बेचने-खरीदने का धंधा फल-फूल रहा है?

इसके बाद भी नया साल मुबारक?

फिर लौटकर आ गया लाॅटसाहबों की झंडाबरदारी वाला नया साल। पुराना वाला आदमी की आत्महत्या से घबराकर विदा हो गया। मगर अशिष्ट ईश्वर की बिरादरी के लम्पट स्वागतम के रतजगे में जनतंत्र-जनतंत्र खेलने में व्यस्त हैं। खबरें छपती हैं, ‘मोहर्रम’ जेल में, अफसरों ने गायब कर दिया भरापुरा गांव, अरे यहां तो पानी लूटा जा रहा है, कर्ज, भूख तो छिपाया ही, उम्र भी सही नहीं बताई, भाजपा को गर्व है कि उसके पास मोदी हैं, उगाही में दो पत्रकार गिरफ्तार।
    वकील साहब गरीब मोहर्रम अली को राजू यादव बनाकर जेल भिजवा देते हैं और अफसरान असलियत जान पाये तो भी 83 दिन तक जेल की सलाखों के पीछे मोहर्रम को रोना कलपना पड़ा। साढ़े बाईस बीघा जमीन का जोतदार कर्ज में डूबा किसान कामता प्रसाद कीटनाशक पीकर मई, 2012 में आत्महत्या कर लेता है। बात विद्दायक तिंदवारी तक पहुंची, उन्हें बुंदेलखण्ड के किसानों की बदहाली का हाल पहले ही मिल रहा था। इस घटना से दुखी विधायक दलजीत सिंह ने सरकार को चिट्ठी लिखी। सरकार के मंत्री ने जवाब दिया कि बुंदेलखण्ड के किसी भी किसान ने भूख या कर्ज से परेशान होकर आत्महत्या नहीं की। यह जवाब सरकारी अफसरों की जांच रिपोर्ट पर आधारित थी। मजा तो यह कि कामता प्रसाद का गांव गोरनपुरवा उप्र के नक्शे से गायब करने का कारनामा भी इन अफसरों ने कर दिखाया। इसी गांव का पानी, पानी माफिया लूट लेते हैं। ठीक ऐसे ही पवई गांव के किसान अमृतलाल की आत्महत्या को भी अफसरान नकार गये। महोबा में सुगिरा गांव के किसान राम कुमार ने 1.80 लाख के कर्ज से परेशान होकर 14 दिसम्बर को फांसी पर लटक कर अपनी जान दे दी। अफसरान चुप? सच को झूठ के ठीहे पर हलाल करने वाले तो अपराधी कहे ही जाएंगे, लेकिन प्रदेश का भरा पुरा, खाया-पिया अघाया विपक्ष जिनमें से किसी के पास मोदी हैं, तो किसी के पास माया, उनमें से किसी ने भी कोई आवाज नहीं उठाई। कोई भी सियासतदां हमीरपुर जाकर सच जानने को बेचैन नहीं हुआ।
    सच की तलाश करने की कोशिश की एक अखबार ने, उसके पत्रकार ने, तभी सामने आया आदमी और जरायम पेशा हुक्मरानों के बीच का तल्ख षड़यंत्र। बस यहीं पत्रकारों की पूरी जमात मुल्जिम के कटघरे की ओर धकियाई जाने लगती है। समूचे मीडिया की विश्वसनीयता दांव पर लगा दी जाती है। उसकी कलम को द्रौपदी सा निर्वस्त्र करने के तमाम दुर्योधनी जतन होने लगते हैं। मगर यहीं एक सवाल मुझे लगातार मथ रहा है। पत्रकार क्यों पांडवों के जुआरी आचरण को अपनाने का लोभ कर बैठते हैं?
    जी.टी.वी. के दो पत्रकारों को जिंदल ग्रुप से उगाही के जुर्म में पिछले साल पकड़ा गया। उन्हें जेल भेज दिया गया। मीडिया पर भरोसे के संकट का ढोल लगातार पीटा जा रहा है। इसके पीछे वही अशिष्ट ईश्वर की बिरादरी के लोग सक्रिय हैं, जो किसी कामता, किसी मोहर्रम को अपना निशाना बनाने के माहिर हैं। ऐसा नहीं है कि दोनों पत्रकार दूध के धुले हैं या उनके कारनामें को अपराध की श्रेणी में नहीं रखा जाना चाहिए। अपराध, अपराध है। उसकी सजा बेशक मिलनी चाहिए, लेकिन असल कुसूरवार कौन है? यह तलाशने और उनको दण्ड देने का काम कौन करेगा?
    क्या वो जिनकी नजर में नब्बे फीसदी भारतीय मूर्ख हैं? या फिर वे जिनके पांवों में चांदी के जूते हैं और दांतों में सोना जड़ा है? इन दोनों में से किसी की भी हिम्मत आज तक कानून का मजाक उड़ाने वाले, उद्दंड भाषा में मुंबई से छपने वाले ‘सामना’ के मुखलिफ आवाज उठाने तक की नहीं हुई?  इसके बाद भी नया साल मुबारक?