Monday, September 17, 2012

यू.पी. में कचरे पर पशु रोमांस शो!

लखनऊ। पर्यटन के मानचित्र पर सूबा उप्र के महानगरों व राजधानी को कचरा, कुत्ता, सांड, बंदर, मच्छर, अंधेरे और बीमारों के लिए दर्ज किया जा रहा है। यही वजह है लखनऊ आगरा, मथुरा, इलाहाबाद, श्रावस्ती, अयोध्या, चित्रकूट, वाराणसी जैसे शहरों में विदेशी-देशी पर्यटक लगातार घट रहे हैं। इससे जहां राजस्व घट रहा है, वहीं रोजगार चैपट हो रहा है। सरकारी कर्मचारी निठल्ले और भ्रष्ट हो रहे हैं। शहरी हलकान और बीमार होकर अपनी मशक्कत की कमाई से बने सरकारी अस्पतालों में द्दक्के खा रहे हैं। नई पीढ़ी सेक्स के सारे करतबों का प्रशिक्षण खुली सड़कों पर पा रहे हैं। और जिम्मेदार नगर निगम के पार्षद, अधिकारी अपनी कमाई के संसाद्दन तलाशते हुए गुण्डई पर अमादा है। महापौर कोरे बयानों के जरिए अपनी पीठ अपने ही हाथ से थपथपाने और माला पहनने में व्यस्त हैं। नगरों का विकास करने वाले मंत्री जी नाराज हैं। आखिर कौन सुनेगा सूबे के आदमी की किल्लतों भरी चीख?
    गौर करने लायक है कि आगरा में कूड़ा उठानेवाली ठेकेदार कंपनी अल्ट्रा अर्बन इन्फ्राटेक के मुखालिफ नागरिकों का आक्रोष इतना बढ़ा कि नगर निगम को खुद आगे आना पड़ा फिर भी कूड़ा नहीं उठाया जाता। सिल्ट और जूता कारखानों का कचरा शहर के पर्यावरण में जहर घोल रहा है। इसी को देखते हुए पिछले दिनों उच्चन्यायालय के आदेशानुसार 40 जूता कारखानों को शहर के रिहायशी इलाकों से बाहर जाने का नोटिस प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने दिया है। बावजूद इसके नागरिक आन्दोलित तो सफाईकर्मी आनन्दित। ऐसे ही हालात वाराणसी, इलाहाबाद में भी है। अयोध्या, चित्रकूटद्दाम और श्रावस्ती कचरे और आवारा जानवरों से त्रस्त है। गंगा-सरयू में स्नान का सारा पुण्य कचरे-कुत्तों को दान करने वाले भक्तगण बेहद दुखी हैं। हाल ही में पितरों के श्राद्ध शुरू होने वाले हैं और इन तीर्थ नगरियों में सड़ांध, संक्रामक रोग और पशु आतंक पैर फैलायें है। ऐसे हालातों में कैसे होगा पिण्डदान और श्राद्धकर्म?
    राजधानी की अंधेरी सड़कों-गलियों पर सिल्ट-कूड़ा फैला पड़ा है। सांड-कुत्तों की सेक्सक्रिया के कार्यक्रम मुफ्त में देखने के साथ नागरिकों के घायल होने का सिलसिला जारी है। पिछले दिनों एक पार्षद अपने समर्थकों के साथ निजी सफाई व्यवस्था के ठेकेदार कंपनी पाॅवर सिक्योरिटी का ठेका रद्द होने से नगर निगम अद्दिकारियों से मारपीट कर बैठे। वहीं सफाई कर्मचारी संविदा पर रखे जाने के बाद भी काम न करने पर हटाए गये तो धरना-प्रदर्शन कर बैठे। ऐसे तमाशे रोज देखने-सुनने में आते हैं। पूरे शहर में सफाईकर्मी काम करने से परहेज करते हैं। जहां काम करने की गलती करते हैं, वहां घर-घर से वसूली करते हैं। पैसा वसूलने के बाद आंखें अलग दिखाते है। हद तो यह कि कूड़ा-उठाने को कहने पर बवाल काटने की धमकी तक देते हैं। गए महीने मोहनलालगंज सीएचसी में तैनात अधीक्षक के सफाईव्यवस्था दुरूस्त करने को कहने पर कर्मचारियों के हिमायती ड्राइवर ने उन्हें काट डालने की धमकी दे डाली। इनकी धमकियों को हकीकत में बदलते भी राजधानीवासी कई बार देख चुके हैं और आज भी ओमनगर में देखी जा सकती है। ऐसा नहीं है कि गंदगी-कचरे के लिए अकेले नगर निगम/सफाईकर्मी ही जिम्मेदार हैं, नागरिक भी जिम्मेदार है। सामाजिक संगठन और भ्रष्टाचार का हल्ला मचानेवाले भी जिम्मेदार हैं। बाबा/अन्ना के कार्यकर्ताओं को खस्ताहाल शहरी सेवा कोई मुद्दा नजर नहीं आती?

गरीबी का फैशन फुटपाथ पर!


लखनऊ। राजधानी की फुटपाथों पर पड़े नंग-धड़ंग बेसुध शरीर हों या हाथ पसारे रिरियाते जिन्दा ‘स्लम डाॅग्स’, इनकी ओर देखने वाला कोई नहीं। हजारों-हजार की संख्या में खुले आसमान के नीचे फुटपाथों पर जाड़ा, गर्मी, बरसात की मार झेलते मैले-कुचैले इंसानों की कौम स्थानीय पुलिस व दबंगों को रंगदारी देने और उनकी लातखाने को मजबूर हैं। इन्हीं मजलूमों में भारी जेबों वाले बेगैरतों की भी खासी संख्या है।
    लखनऊ के दिल हजरतगंज व मुंह चारबाग में इन फुटपाथियों को कई किरदारों में देखा जा सकता है। इसे गरीबी का फैशन शो भी कह सकते हैं और इसके डिजाइनर हैं, उप्र सरकार, उसकी पुलिस व तथाकथित नवधनिक गौर से देखिएगा तो कोई रोटी के लिए डिवाइडरों पर बैठा है, तो कोई हाथ फैलाये रूपया दो रूपया पाने का गीत गा रहा है। कोई कारों को साफ करके मेहनत करने में लगा है। कई देह-व्यापार से लेकर तमाम तरह के आपराधिक द्दंद्दों में व्यस्त हैं। कोई आॅटो/होटलों तक ग्राहक लाने की मशक्कत में लगा है, तो कोई अखबार/पत्रिकाएं, पानी/रेवड़ी, कई तो खाली जुबान और हाथ के कमाल से रोटी की जुगाड़ में लगे हैं। इनमें से कोई भी सरकार के द्वारा दी जाने वाली सुविधाओं के किसी रजिस्टर में दर्ज नहीं है। हां, वोटर कार्ड और मोबाइल फोन आधे से अधिक के पास मिल जाएंगे।
    राजधानी के हर इलाके में इस जमात का डेरा है। पुरातत्व संरक्षित इमारतों, पार्कों, बस-रेलवे स्टेशनों, मंडियों के अलावा गोमती तटबंधों/घाटों, मंदिर/ मस्जिद/गुरूद्वारों/मजारों/विद्दायक निवासों के आस-पास इन्हें रात को सोते देखा जा सकता है। यह गांवों से शहर आए हुए बेरोजगार लोगों की भीड़ के साथ मूल शहरियों की जमात है। पिछले महीनों में नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे की एक रिपोर्ट में उप्र के पांच महानगरों में झुग्गी-झोपड़ी  मेें रहनेवालों के आंकड़ों के साथ उन्हें बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं दिए जाने के प्रयासों का जिक्र था। सर्वे के अनुसार लखनऊ में 8.2 प्रतिशत, आगरा में 9.67 प्रतिशत, वाराणसी में 12.54 प्रतिशत, इलाहाबाद में 12.72 प्रतिशत व कानपुर में 14.5 प्रतिशत के करीब लोग झोपडि़यों में रहते हैं।
    सरकारी दावों में ही स्वास्थ्य सेवाओं की कलई खोली गई है, प्रदेश में दस में से एक बच्चे को बेहतर चिकित्सा सुविद्दा नहीं मिलती जिससे वे पांच साल का जीवन भी नहीं पाते। मात्र 15.3 फीसदी बच्चों को टीकाकरण की सुविधाएं हासिल हैं। 16.3 फीसदी नवजातों को चिकित्सा सेवाएं हासिल हैं। कुल पचास फीसदी बच्चे कुपोषण का शिकार हैं। 74 फीसदी लोग खून की कमी का तो 41 फीसदी कुपोषण का शिकार हैं। ये आंकड़े साबित करते हैं कि सरकारी योजनाओं का लाभ गरीबों और गरीबी की लाइन में जबरन घुस कर खड़े लोेगों को कितना मिलता है। आंकड़े तो कागज पर लिखे भर हैं, हकीकत में शहरों में एक बड़ी भीड़ बेघरों/बेरोजगारों, मंदबुद्धियों, भिखारियों और मुस्टंडों की बढ़ रही है। यह सूबे का बदसूरत चेहरा भर नहीं बल्कि रोटी की छीना झपटी का सच्चा आइना है।

हिन्दी के श्राद्धपर्व पर हिन्दी पत्रकारिता का पिण्डदान


हिन्दी और हिन्दी पत्रकारिता के कर्मकांडी श्राद्धपर्व के माहौल में हिन्दी बोलने पर जुर्माने की सजा! हिन्दी का पिण्डदान करने सरकारी अय्याशों के साथ ‘कामसू़़त्र’ की नई विधा तलाशने का सपना संजोए हिंदी पुत्रों के विदेश जाने का शुल्क बस पांच हजार! देश में रोमन लिपि में लिखी हुई हिंदी का पाठ करके या फेसबुक पर हिन्दी के पुरखों का तर्पण करते हुए अंग्रेजी को एक आंख दबाकर सच्चे प्रेमी होने का दावा मुफ्त में बरकरार। हिन्दी की साहित्यिक पत्रकारिता के शंकराचार्यों की पालकियां भी अपने-अपने मठों से निकल कर प्रेमचंद, निराला, आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी की परिक्रमा कर चंदे-धंधे जुगाड़ लेंगी और श्राद्ध पर्व का समापन हो जाएगा बगैर यह जाने, बांचे कि अरबी-फारसी, उर्दू, अंग्रेजी के मजबूत किलों को हिन्दी के किन महारथियों की क़लम ने ध्वस्त किया था? हिन्दी पत्रकारिता के किस पितामह ने अपना सर्वस्व होम किया था। चंदनामों के आगे घंटा-घडि़याल बजा उनकी आरती का सस्वर पाठ शायद रोजी-रोटी का इंतजाम कर देता हो, लेकिन नई पीढ़ी को तो अज्ञानता के प्रदूषण का शिकार बना रहा है। तभी तो ताजादम पत्रकारों की पीढ़ी ‘माधुरी’ पत्रिका का प्रकाशक ‘गंगा-पुस्तक माला’ और प्रेमचंद को ‘माधुरी’ का सम्पादन करने लखनऊ आने को लिखने की भूल कर बैठती हैं।
    लखनऊ में हिन्दी पत्रकारिता के भीष्म पितामह आचार्य पं. दुलारेलाल भार्गव ने हिन्दी की कीर्ति पताका तब फहराई जब फारसी, उर्दू और अंग्रेजी आम भाषा थी। सबसे पहले उन्होंने सन् 1923 में ‘माधुरी’ का प्रकाशन अपने चाचा विष्णु नारायण भार्गव के साथ किया। इसके साथ ही लाटूश रोड स्थित अपने निवास से गंगा-पुस्तक माला प्रकाशन संस्था की शुरूआत की थी। इस संस्था में लाल बहादुर शास्त्री, निराला, आचार्य चतुरसेन शास्त्री, गोपाल सिंह नेपाली, इलाचन्द्र जोशी, प्रेमचन्द, मिश्रबंधु जैसे दिग्गज भार्गव जी के सहयोगी रहे। सन् 1927 में ‘सुधा’ मासिक पत्रिका का प्रकाशन शुरू किया, इसमें उनके सहयोगी थे पं0 रूप नारायण पाण्डेय, इसके सह सम्पादक रहे प्रेमचन्द। एक सौ बीस पृष्ठ की पत्रिका में तीन-चार रंगीन चित्र छपते थे। उन्होंने तुलसी संवत् की शुरूआत की। प्रेमचन्द ‘गंगा-पुस्तक माला’ से प्रकाशित ‘बाल-विनोद वाटिका’ पत्रिका के सम्पादन से भी जुड़े रहे। उनका यादगार उपन्यास ‘रंगभूमि’ भार्गव जी के सम्पादकत्व में ही छपा। यह वह समय था जब आजादी के दीवाने फंासी पर झूल रहे थे और अंग्रेज भारत की तस्वीर अपने अनुरूप काफी कुछ बदल चुके थे। शहरों में अंग्रेजियत पूरी तरह पसर गई थी। लखनऊ में ठंडी सड़क हजरतगंज लंदन की डाउनिंग स्ट्रीट का आकार लें रही थी। तांगे-इक्कों का उस सड़क से गुजरना तक अपराध की श्रेणी में आता था। नवाबियत की कब्र पुख्ता हो चुकी थी। लोटे से चुल्लू (दोनों हथेलियों को जोड़कर अंजुरी) में पानी पिलाने वाले पंडित हजरतगंज में पांव नहीं घर सकते थे। ग्रामोफोन से लेकर अंग्रेजी अखबार, थिएटर, कैफे, बिलियर्ड पूल तक की धूम थी। अमीनाबाद जैसे इलाकों में सराय की जगह होटलों ने ले ली थी। ऐसे दौर में पं0 दुलारे लाल भार्गव ने उस नए बनते लखनउवा समाज के आदमी की तबीयत को समझा और उसे ‘सुधा’ से जोड़ा भर नहीं बल्कि उसे कथात्मक साहित्य के जरिए हिन्दी प्रेमी बनाया। उन्होंने भगवती चरण वर्मा, विश्वम्भर नाथ शर्मा ‘कौशिक’, डाॅ0 राम कुमार वर्मा, निराला, प्रेमचंद, अमृतलाल नागर, पंत, को छापा ही नहीं उन्हें समाज में प्रतिष्ठापित भी किया। लखनऊ में कवि सम्मेलनों की परम्परा को उन्होंने ही शुरू किया था। उनके जीवन का अंतिम कवि सम्मेलन चारबाग के रवीन्द्रालय सभागार में बांग्लादेश जन्म के तत्काल बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की मौजूदगी में हुआ था। उनका घर ‘कवि कुटीर’ के नाम से जाना जाता रहा। गंगा-पुस्तका माला भवन के अवशेष आज भी लाटूश रोड (गौतम बुद्ध मार्ग) पर मौजूद हैं। उन्होंने आकाशवाणी लखनऊ में हिन्दी के साहित्यिक कार्यक्रमों की श्रृंखला शुरू की, तो लखनऊ विश्वविद्यालय में हिन्दी विभाग की स्थापना में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया और पहला प्राध्यापक बद्रीनाथ भट्ट को नियुक्त कराया।
    वे महज 16 वर्ष की आयु में ही हिन्दी लेखन, सम्पादन और प्रकाशन से जुड़ गये थे और 20-22 वर्ष की आयु में लखनऊ व आस-पास के इलाकों में प्रतिष्ठित हो चुके थे। ब्रजभाषा के कवियों में उनकी गिनती प्रथम पक्ति में थी। अयोध्या सिंह ‘हरिऔध’ की ‘प्रिय प्रवास’ के मुकाबले उनकी ‘दुलारे दोहावली’ को तब का प्रतिष्ठित पहला ‘देव पुरस्कार’ मिला था। उन्हें आधुनिक बिहारी कहा जाता रहा हैं। वे उस समय हिन्दी जगत की नहीं वरन सभ्य शहरियों की प्रतिष्ठित जमात में शुमार किए जाते थे। उनकी ख्याति उनसे पहले लोगों तक पहुंच जाती थी। साधारण चूड़ीदार पैजामा, अचकन और टोपी में सजा लम्बा-गोरा शरीर सामनेवाले के आकर्षण का केन्द्र यूं ही नहीं रहा। उनकी हिन्दी भक्ति, हिन्दू शाक्ति के प्रति निष्ठा का आदर गोरे साहब भी करते थे। उन्होंने ही ‘लखनवी भाषा’ (उर्दू-हिन्दी मिश्रित) को जन्म दिया था। उनके समय को ‘दुलारे युग’ कहा जाता है। उनकी बेचैनी अंतिम समय तक साइकिल के पहियों पर उनके साथ घूमती रही। वे ‘ब्रजभाषा रामायण’ की रचना में लगे-लगे ही 6 सितंबर 1975 को अचानक हृदय गति रूक जाने से स्वर्गवासी हुए थे।
    हिन्दी पत्रकारिता तब से अब तक तमाम करवटें बदल चुकी हैं, लेकिन लखनऊ में ही किसी पत्रकार को साठ लाख की आबादी में शायद ही छह लाख के बीच भी प्रतिष्ठा प्राप्त हो। अखबार हर गली-नुक्कड़ से छप रहे हैं, हजारों-लाखों की प्रसार संख्या के प्रमाण-पत्र थामे विज्ञापन के बाजार में हाथ पसारे खड़े हैं। इन अखबारों के पत्रकारों की क्या हैसियत हैं? कभी आशाराम बापू जैसे ढोंगी थप्पड़ मार देते हैं, तो कभी बाबा रामदेव दुत्कार देते हैं। कभी मामूली डाॅक्टर इंजीनियर लतिया देते हैं। सरकार का अदना सा मंत्री जो कल पहचानों के जंगल में गुम हो जाएगा वो भी हवालात में बंद करा देने की धमकी देकर भगा देता है। आरोप और उद्दंडता के हालात ऐसे कि प्रेस कौंसिल के अध्यक्ष से लेकर चाट के ठेले पर खड़ा शहरी भी मीडिया पर नियंत्रण की आवश्यकता पर जोर दे रहा है। मीडिया लोगों की निजता में अतिक्रमण का दोषी माना जा रहा है, तभी ममता बनर्जी उस पर रिश्वतखोरी का आरोप लगाती हैं, तो आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री मीडिया (खासकर टीवी चैनल्स के संवाददाताओं) से कहते हैं, ‘मैं आपसे क्यों बात करूं जब आप मेरे व मेरी नीतियों के बारे में नकारात्मक खबरें देतें हैं। यदि मैं जिलों में जाकर वहां के पत्रकारों से बात करूंगा तो मुझे व मेरे कामों को घर-घर जाना जाएगा।
    गो कि हिन्दी और हिन्दी पत्रकारिता की दुर्गति का यह दौर हमारा गढ़ा है। हम हैं उद्दंड और लोभी पत्रकारों की जमात। क्या कोई दुलारे लाल भार्गव फिर जन्म लेकर हमें दिशा देने आएगा? या हमें ही अपने हिन्दी पत्रकारिता के पुरखों के लिखे को पढ़कर योगीन्द्र पति त्रिपाठी, अखिलेश मिश्र को तलाशना होगा? कुछ तो करना ही होगा वरना आदमी की पैरोकारी का दम भरने वाली पत्रकारों की जमात ‘काॅरपोरेट गैलरी’ की दलाली करने भर के लिए जानी जाएगी। तो फिर हिन्दी और हिन्दी पत्रकारिता के ‘श्राद्धपर्व’ पर संकल्प लें कि हिन्दी के पुरखों को पढ़ेंगे और उन्हीं के रास्तों को गढ़ेंगे।

Sunday, August 12, 2012

ग्लोबल फार्मूूले वाला गांधी!

नई दिल्ली। गांधी की सियाह फोटोकाॅपी के स्वराज का सपना रामलीला से जंतर-मंतर होता हुआ लाल किले की प्राचीर पर चढ़ने को बेताब है। यह कोई खमखयाली नहीं है। इसके पीछे देशी ही नहीं विदेशी दिमाग ने भी काफी मशक्कत की है। दरअसल भारतीय जनता पार्टी अपने और अपने समूचे कुनबे राजग के बूते 2014 की चुनावी जंग में फतह नहीं हासिल कर सकती। यह बात राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, उसके सहयोगी संगठन और दुनिया भर में फैले उसके शुभचिंतकों के साथ संघ समर्थक मीडिया व कारपोरेट घराने अब अच्छी तरह समझ चुके हैं।
    इसके अलावा अन्ना टीम के महत्वाकांक्षी सदस्यों के मंसूबे भी परवान चढ़ाने हैं, लिहाजा भाजपा के लिए एक और सहयोगी या भाजपा उसके लिए सहायक हो की योजना को अमल में लाकर अन्ना टीम को चुनावी सियासत में उतार दिया गया।
    गौरतलब है कि अन्ना की समूची टीम में कांग्रेस पार्टी से नाराज लोग अगली कतार में खड़े हैं। हाल ही में सेवानिवृत जनरल वी.के. सिंह भी अन्ना के साथ खड़े हो गये हैं। जगजाहिर है कि वे भी कांग्रेस से खासे नाराज हैं। और कांग्रेस के मुखालिफ माहौल को गरम कर रहे रामदेव जो आजकल अपनी निजी सेना के एक हजार जवानों के घेरे में चल रहे हैं, भी इसी मुहिम का दूसरा चरण भर हैं। हालांकि अमेरिका और ब्रिटेन में भी गैरराजनैतिक संगठनों के आन्दोलनकारी बाकायदा चुनाव मैदान में उतर रहे हैं। पिछले साल वाॅल स्ट्रीट न्यूयार्क पर हुए द्दरना-प्रदर्शन की सुर्खियां शायद ही लोग भूले हों। इसके कार्यकर्ता नाॅथन क्लींमेन और जाॅन थ्राॅटन चुनावी मैदान में उतरने की कसरत कर रहे हैं। इसी तरह लंदन में पिछले साल सेन्ट पाॅल चर्च पर प्रदर्शन करने वाले आन्दोलनकारियों के अगुवा ब्रायन फिलिप्स शहर का उप-चुनाव लड़ रहे हैं और अगले साल होनेवाले चुनावों में अपने उम्मीदवार खड़े करने का मंसूबा बनाए हैं। इससे भी अधिक बातें ब्रिटिश पत्रकार/लेखक जाॅर्ज मांबिट ने अपने काॅलम में लिखी हैं।
    शायद अन्ना और उनकी टीम के लिए उनके पीछे खड़े लोगों को यह ग्लोबल फार्मूला’ सटीक लग रहा हो, लेकिन यहां रामदेव की शक्ल में दूसरा ठाकरे और अन्ना की शक्ल में दूसरा गांद्दी खड़ा कर पाना नामुमकिन है, भले ही वोटों पर जातियों के नाम लिखे हों। सच यह है कि न किसी को व्यवस्था बदलनी है, न भ्रष्टाचार मिटाना है और न ही कालाधन वापस लाना है, यह केवल सत्ता पर कब्जा करने का तमाशा है।

तो अब राजमाता...?

लखनऊ। खबर कोई खास चैंकाने वाली नहीं है, वह भी लखनऊ के राजपाट की, जहां जातीय राजनीति के खरे सिक्के की टकसाल हो। फिर भी है थोड़ी चिहुकाने वाली। राजधानी में मौजूदा सरकार के इकबाल को बुलंद रखने में ‘अंकल-आंटी’ की भरपूर मशक्कत और जाति विशेष की दबंगई कई नौकरशाहों को रास नहीं आई। सो तिकड़म भिड़ा कर राजमाता के दर्शन करने पहुंच गये। ये नौकरशाह एक खास जाति के नौकरशाहों की बढ़ती ताकत और अकड़ फूं से भी खासे परेशान हैं।
    भरोसेमंद सूत्रों के मुताबिक अनिल गुप्ता, प्रमुख सचिव ऊर्जा व आईडीसी कमिश्नर, दीपक सिंघल, प्रमुख सचिव सिंचाई, संजय अग्रवाल प्रमुख सचिव चिकित्सा एवं स्वास्थ्य, एस.पी. गोयल सचिव सिंचाई, राकेश गर्ग प्रमुख सचिव मुख्यमंत्री, राजीव अग्रवाल निदेशक मंडी, महेश गुप्ता कमिश्नर आबकारी, आशीष गोयल मुख्य सचिव के स्टाफ आफिशियल, अर्चना अग्रवाल, कमिशनर खाद्य के पिछले दिनों सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव की पत्नी साधना गुप्ता से उनके निवास पर मुलाकात के चर्चे गरम हैं। यहां गौरतलब है कि ये सारे नौकरशाह साधना गुप्ता की बिरादरी से ताल्लुक रखते हैं। अब देखना यह है कि यह मुलाकात क्या गुल खिलाएगी?