Sunday, November 6, 2011

अखिल भारतीय गीता -धर्म-सम्मेलन

स्वागताध्यक्ष-दुलारे लाल का भाषण
(कुंभ मेला संवत् 1992, को पूज्यपाद ब्रह्मनिष्ठ स्वामी विद्यानंद जी महराज ने अखिल भारतीय गीता-सम्मेलन का श्रीगणेश, पवित्र त्रिवेणी तट पर किया था। इस प्रथम अधिवेशन के सभापति रचनामधन्य डा0 गंगानाथ झा थे। एक दिन प्रातः स्मरणीय महामना मदनमोहन जी मालवीय महाराज ने भी सभापतित्व का शुभासन सुशोभित किया था। स्वागत-भार ‘सुधा’-सम्पादक एवं हिन्दी साहित्य-युग-प्रर्वतक दुलारे लाल भार्गव को सांैपा गया था, उसी पद से उन्होंने जो संक्षिप्त भाषण दिया था, उसे यहां पुनः प्रकाशित कर रहे हैं। अंत में प्रार्थना (गीत) परम पठनीय है।)
    श्री राधा-बाधा हरनि
        नेह अगाधा-साथ
    निहचल नैन-निकुंज में
        नाचै निरंतर-नाथ।
    नंद-नदं सुख कदं कौ
        मंद हंसत मुख-चंद,
    नसत दंद-छलछदं तम
        जगत जगत आंनद।

मान्य सभापति जी, देश के भिन्न कोनों से आए हुए प्रतिनिध जन तथा उपस्थित सज्जन-वृंद।
    आपका हम स्वागत करते हंै। आप ही लोगों का यह सम्मेलन है। आप लोगों ने ही हमें यह कार्य करने का भार दिया है, अतः हमसे जो कुछ करते बन पड़ा है किया है, आप अब उसे संभालिए।
    अब हम सब मिलकर एक बार गीतापति श्री कृष्ण का आवाहन् और स्वागत करें। वह आवें और अपनी गीता के प्रचार का हमें उपाय बतावें।
    हमें तो अब कुछ कहना ही नहीं। आप लोग इस प्रकार कृपा करके जब यहां आ गए है। तब फिर चाहिए ही क्या हमारे ऋषिकल्प महामहोपाध्याय डा0 गंगानाथ जी झा अपनी इस पैसठ वर्ष की वृ़द्धा और रूग्ण अवस्था में भी हम लोगों को ‘उत्साह’ और ‘योग’ देने आए हुए है। आप गीता के सौम्य आदर्श जीवन के जीते-जागते उदाहरण हंै। आपको देखकर हम लोग अपना जीवन बना सकते हंै। आप जैसे सभापति को पाकर यह अखिल भारतीय गीता सम्मेलन अवश्य सफल होगा, और अपने निष्काम प्रचार और लोक संग्रह का कार्य कर सकेगा।
    हमने झा जी के उपदेशों तथा अनेक जीवन के कार्यो से दो प्रधान बातें सीखी है- पहली यह की गीता को कठिन समझ कर व्र्यथ डरना नहीं चाहिए। वह तो भगवान की मुरली  की ध्वनि के समान मधुर और मनोहर है। भगवान ने बात ही बात में अपने सखा को सर्वश्रेष्ठ ज्ञान सिखाया था। तब वह कठिन कैसे हो सकता है। कृष्णा ने वेद, उपनिषद् आदि की कठिन बातों को सरल भाषा में गाकर अर्जुन को समझाया था, इसी से तो इस शास्त्र को ‘गीता’ कहते है।
    हिन्दुओं के लिये वेद सर्वस्वभूत है; तथापि ज्ञान कांड के लिये उपनिषदों का भी सार रहस्य श्रीमद्भगवद्गीता में प्रतिपादन किया गया है। जैसा कहा जाता है-‘‘सर्वोय-निषदों गावो दोग्धा गोपालनन्दनः पार्थाें वन्सः सुयीभोक्ता दुग्धं गीतामृतः मह्त्।’’ इस उपनिषत्सारभूत गीतामृत पान करके जीवन मरण के द्वंद से विमुक्ति पाकर अमरत्व पद की प्राप्ति की अभिलाषा किसे न होगी? इस देव-दुलर्भ सुधा को वसुधा में सुलभ रूप से उचार करने वाले सज्जन क्यों न अभिनंदनीय समझें जायेगे? यद्यपि उपनिषदों के सारभूत होने के कारण गीता में ज्ञान काड की उत्कर्ष है, तथाति कर्म तथा भक्ति का विवेचन भी अत्यंत मार्मिक है।
    गीता को कठिन समझ कर डरना नहीं चाहिए। गीता का पाठ और प्रचार कठिन काम नहीं।
    दूसरी बात है लोक संग्रह का जीवन। हमारे महामहोपाध्याय जी ने जीवन भर शिक्षा विभाग में कार्य किया। अभी बुढ़ापे में भी विश्वविद्यालय के कुलपतित्व करते रहे, आज दिन भी आप एकेडमी आदि अनेक संस्थाओं में कार्य करते है, पत्र-पत्रिकाओं में लेख लिखते और पुस्तकों की रचना तथा सम्पादन करते है। आप अस्वस्थ है, तो भी हम लोगो के प्रार्थना करते ही गीता-सम्मेलन में योग देने के लिए तैयार हो गए। हम आपके इस लोक संग्रह की वृति पर मुग्ध है।
    हमें आपकी इन दोनो बातों को लेकर गीता-प्रचार के क्षेत्र में उतरना है। हम इसे भगवान की कृपा समझते है, जो ऐसा ऋषि हमें प्रथम अखिल भारतीय गीता-सम्मेलन का सभापति मिला।
    हमारे इस सम्मेलन के संयोजक है वीतराग, लोक संग्रही स्वामी विद्यानंद जी। आपका जीवन भी त्याग और निष्काम लोक संग्रह का जीवन है। आपने इस सम्मेलन द्वारा सभी संस्थाओं, विद्वानों, सन्तों और महात्माओं से प्रार्थना की है कि वे इस काम में सहायता करें, और गीता-प्रचार के काम में कोई किसी का विरोध न करे। आपने इसी उद्देश्य से काशी में ‘गीता-धर्म’ नाम का एक मासिक पत्र निकाला है, उसका उद्देश्य हैै गीता सम्बन्धी समस्त प्राचीन वाड्ंमय का और अपने धर्म तथा प्रकृति का प्रतिपादन और प्रचार। इस पत्र की सबसें बड़ी विशेषता है, किसी का विरोध न करना। हम आशा करते हैं, कि आप लोग अपनी-अपनी सम्मति और सहयोग देकर स्वामी जी के इस लोक संग्रह के काम में सहायता देंगे।
    हमारे लिए यह अपार आनन्द की बात है कि इस तीर्थराज में, त्रिवेणी-तट पर इस साधु-संतांे और विख्यात विद्वानों के विराट् गीता-सम्मेलन में हमें ऐसा स्वागत करने का कार्य मिला।
 युधिष्ठिर ने यज्ञ किया था, आप लोग सब जानते है, गीतापति भगवान कृष्ण ने सबका स्वागत करने और चरण धोने का भार अपने ऊपर लिया था। यह भी गीता ज्ञान यज्ञ है। इसका स्वागत अध्यक्ष तो गीता पति जैसा पुरूष ही होना चाहिए, पर यह माननीय संयोजक श्री स्वामी जी महाराज की, मंत्री श्री आचार्य जी की तथा कार्यकारिणी की कृपा है, और हमारा सौभाग्य है, जो हमें यह सेवा करने को मिली।
    हम तो यही कहकर चुप बैठ जाते है कि इस गीता-यज्ञ और सम्मेलन में स्वागताध्यक्ष श्री कृष्ण जी हैं। हम तो निमित मात्र बनकर यहां खड़े हंै, आइए अब हम सब मिलकर उन्हीं गीता-गायक, ज्योतिर्मय, घनश्याम, बंशीधर, दीनदयाल श्री कृष्ण भगवान का आवाहन् करें, जिसमें यह अपने ढंग का अभूतपूर्व सम्मेलन सुचारू रूप से सफल हो--

प्रार्थना गीत
स्वागत! स्वागत! सुज समामिलित सुरस सुधा सरसाए,
गुन-गाहक! गीता-गुन-गन की गौरव गुनि-गुनि गाए।
ज्योतिरमय! जगि जगन ज्योति में करू अंग जग-मग जगमग;
भगति-सकति मरू रग-रग पग-पग होत जनन डग-डगमग।
जन घनश्याम ! जु सरस दरस कौं पाप-ताप तपि तरसें;
धाॅय धाॅय धधकत, धरहरि-हित धाय  धरम-रस बरसें।
बंसीधर! धर अधर बांसुरी मंजु मधुरी सरसें;
‘रूनझुन-रूनझुन‘ धुनि-सुनि मन मुन उनमन जन-गन हरसें।
दीनदयाल! दया दीनन द्रवि दीजै, दीनन दरसें;
तन-मन-धन-जन-जीवन अरपन करि प्रिय प्रभु-पद परसें।

मेरे अग्रज

-ज्योति लाल भार्गव
ज्येष्ठवर दुलारेलाल भार्गव जी का जन्म माघ शुक्ल 5, संवत 1956 को, बसंत पंचमी के दिन, लखनऊ में हुआ था। पूज्य पिता प्यारेलाल की प्रथम संतान होने के नाते संपूर्ण  नवल किशोर रेजिडेंस, जहां हमारा एक प्रकार से संयुक्त परिवार में निवास था, प्रफुल्लित हो उठा। पूज्य पितामह मुंशी प्रयाग नारायण व नवल किशोर रायबहादुर वंशोद्धव सभी शाखाओं के अभिभावक एवं प्रद्राय प्रश्रय थे। लक्ष्मी उन पर कृपालु थी, जिसका वरद्हस्त किंचित हम पर भी था। उन्होंने बड़े लाड़ से नाम रखा ‘दुलारे’ हो गया दुलारे लाल। पूज्य पिता एक प्रकार से इंजीनियर थे। उनकी क्षमता एवं कार्य कुशलता से लखनऊ में सर्वप्रथम, निजी प्रयास से नवल किशोर रेजीडेंस विद्युत प्रकाश से जगमगा उठा। पुरानी ‘फोर्ड’ मोटर के मालिक भी प्रथमतः वही थे।
    दुलारे लाल जी की शिक्षा-दीक्षा सर्व सुलभ सुविधाओं के मध्य राजसी ठाठ से हुई। वे अत्यन्त मेधावी छात्र थे। मैट्रिक में, अंग्रेजी में प्रांतभर में सर्वप्रथम आने के कारण, उन्हें ‘नेस्फील्ड स्कालरशिप’ मिली। इस रूपये को वह अपने निर्धन सहपाठियों को सहायतार्थ वितरित कर देते थे। उस समय हमारे बाबा, पिता, चाचा आदि सब उर्दू-फारसी में शिक्षा प्राप्त थे। परिवार में प्रथम बार दुलारे लाल जी, मुंशी विशन नारायन आदि की पीढ़ी में हिन्दी का प्रवेश एवं पठन पाठन हुआ। इस सन्दर्भ में पितामह प्रयाग नारायण एवं मातेश्वरी श्रीमती रामप्यारी की विशेष प्रेरणा थी। भाभी गंगा देवी ने कुछ ही समय साथ रहकर हिन्दी की पौध दुलारे लाल जी के हृदय में रोपित की और, वह आई0सी0एस0 की परीक्षा भूल कर पत्नी के दिवंगत होने पर, तन-मन से हिन्दी सेवा में लग गए।

गंगा पुस्तकमाला का प्रारम्भ
सन् 1917 में दुलारे लाल जी ने अपनी सहधर्मिणी गंगादेवी के नाम पर ‘गंगा पुस्तक माला’ को स्थापित करके अपनी प्रथम कृति ‘हृदय-तरंग’ प्रकाशित की। प्रथमतः ‘भार्गव’ पत्र निकालकर, बाद में ‘भार्गव’ पत्रिका का सम्पादन-भर सम्भालकर उन्होंने परम-पिता परमेश्वर से प्रार्थना की।
घनश्याम, गुणधाम हरे,
करें हमें सुखधाम हरे।
मन में भव्य भक्ति भर दें,
तन में भव्य शक्ति कर दें।

    इस आरंभकालीन पद ने उनका पग-पग पर समर्थन किया।
    दुलारे लाल जी जब 21 वर्ष के नवयुवक थे तब ‘गंगा पुस्तक माला’ से लगभग एक दर्जन पुस्तकें प्रकाशित कर चुके थे। इन सुसम्पादित, सुसज्जित प्रारंभिक प्रकाशनों ने हिन्दी को नया आयाम देना शुरू कर दिया था। फलतः श्रावण शुक्ल 77, शुभ तुलसी-संवत् (1979 वि0) ता0 30 जनवरी, 1922 ई0 को ‘माधुरी’ का जन्म हुआ। दुलारे लाल जी भार्गव और रूप नारायण पाण्डेय इसके संयुक्त सम्पादक थे।
    निःसंदेह ‘माधुरी’ को सर्वश्रेष्ठ लेखकों व कवियों का जो सहयोग मिला, वह दुलारे लाल जी के सानुरोध निरंतर आग्रह का ही चमत्कार था। उन्हें सर्वश्री मैथिलीशरण गुप्त, हरिऔध और देवीदत्त शुक्ल से आशीर्वाद भी प्राप्त होता रहा।
प्रतिभाओं की पहचान: उस समय के साहित्यकार साधक थे; निर्धन रहकर भी वे लगन से लेखन-कार्य करते थे। ‘माधुरी’ की यह विशेषता रही है कि उसने नवयुवक लेखकों को भरपूर प्रश्रय दिया, उनको प्रोत्साहित किया। इस वर्ग में नवयुवक ‘निराला’, ‘पंत’, भगवतीचरण, गोविन्द बल्लभ पंत, इलाचन्द्र जोशी आदि आते हैं। निराला जी की कविता ‘जूही की कली’ आचार्य द्विवेदी ने वापस कर दी थी। श्री बख्शी जी ने एक अन्य कविता को, समझ में न आने के कारण, छापने से इनकार कर दिया था। तब आचार्य शिव पूजन सहाय ने दुलारे लाल जी को लिखा कि वह निराला जी की सहायता करें। फलस्वरूप ‘माधुरी’ के अप्रैल 1923 के अंक में निराला जी की कविता ‘अधिदास’ प्रथम पृष्ठ पर प्रकाशित हुई। इस प्रकार दुलारे लाल जी ने उन्हें उच्च साहित्यिक महाराथियों के समकक्ष विराजमान कर दिया।
    इन प्रतिभाओं की पहचान में आज के वे अधिकांश मूर्द्धन्य साहित्यकार आते हैं, जिनकी तरूण भाषा को सुधारकर, ‘माधुरी’-‘सुधा’ में प्रकाशित किया गया तथा उनके चित्र छाप कर उन्हें हिन्दी जगत के समक्ष समुपस्थित किया। आज ये ही साहित्यकार अपने प्रथम प्रदाता को भूलें बैठे हैं; वे जान-बूझकर उस युग के प्रवर्तक की सेवाओं को विस्मृति के गढ़ में डालने का प्रयास कर रहे हैं। विधि की विडम्बना।
मुक्त हस्त व्यय: दुलारे लाल जी स्वभावतः दयालु, सहृदय और दूसरों के दुःखों से द्रवित हो जाने वाले व्यक्ति थे। वे सब की सहायता को सदा तत्पर रहते थे। जिस किसी साहित्य-सृजन में लगे लेखक या कवि ने आर्थिक सहायता की याचना की, उसकी उन्होंने (यदाकदा धनाभाव होने पर भी) मदद की। अनेक नवोदित साहित्यकार वृति की तलाश में आए और ‘माधुरी’, ‘सुधा’ के सम्पादकीय विभाग में सहकारी नियुक्त कर लिए गए, चाहे आवश्यकता हो चाहे न हो। कदाचित् ही कोई कथाकार, उपन्यासकार अथवा कवि हो, जिसकी प्रथम कृति या पुस्तक को गंगा पुस्तक माला में न गूंथा गया हो। पारिश्रमिक भी उस समय के अनुरूप यथेष्ठ दिया गया। आज भी किसी एक ग्रंथ पर 2,000/- रु0 का पुरस्कार प्राप्त करना दुर्भभ है; उस काल में 2000/- रु0 वाला धनी समझा जाता था। यह वह समय था जब हिन्दी पुस्तकों की बिक्री नगण्य थी। फिर भी ‘माला’ की प्रकाशन गति निरंतर बढ़ती गई; परिवार का निजी धन व्यय करके भी वस्तुतः यह पोषण था; शोषण नहीं।
‘सुधा’ का प्रकाशन: दुलारे लाल जी घोर राष्ट्रवादी थे। टण्डन जी, लाल बहादुर शास्त्री जी, रफी साहब आदि का उनसे प्रगाढ़ नित्य का सम्पर्क था। ‘माधुरी’के माध्यम से उन्होंने कांग्रेस का खुलकर समर्थन किया था; यह भी एक कारण था। फलस्वरूप दुलारे लाल जी और रूपनारायण पाण्डये ‘माथुरी’ से अलग हो गए। उन्होंने पुनः संयुक्त सम्पादकत्व में ‘सुधा’ को श्रावण 305 तुलसी संवत (1984 वि0) के दिवस जन्म दिया। प्रथम अंक में दुलारे लाल जी ने लिखा: ‘‘अब हम ‘सुधा’ को भी हिन्दी-संसार की सबसे उत्कृष्ट, उपयोगी और लोकप्रिय पत्रिका बनाने की चेष्टा करेंगे। हमने अपना निजी प्रंस-गंगा फाइन आर्ट प्रेस भी कर लिया है। चित्रकला के विशेषज्ञ चित्रकार तो हमारे यहां पहले ही से थे।’’
    ‘सुधा’ को प्रथम अंकसे ही समस्त मुर्द्रन्य साहित्यकारों का सहयोग मिला। विविध विषयों से विभूषित ‘सुधा’ न केवल साहित्यिक, वरन् पारिवारिक पत्रिका बन गई। उसकी ग्राहक संख्या 6000 से ऊपर हो गई। हिन्दी मासिक साहित्य में यह अभूतपूर्व था। एक अंक की तो, अत्याधिक मांग होने के कारण, पुनः मुद्रण कराना पड़ा है। प्रशस्त्रियों एवं सराहनाओं का ढेरा लग गया। विश्व प्रसिद्ध डाॅ0 सर जार्ज ग्रियर्सन ने लिखा:- ‘दुलारे लाल जी उत्तरीय भारत में ‘सुधा’ जैसे उच्च कोटि की पत्रिका के सम्पादक की हैसियत से सुप्रसिद्ध है’’
सम्पादकाचार्य दुलारे लाल भार्गव: ‘सुधा’ छपाई-सफाई ले-आउट एवं अभिकाव्य में सर्वश्रेष्ठ थी। उस समय जो तिरंगे चित्र उसमें प्रतिमास छपे, वे न केवल कला की दृष्टि से, बल्कि मुद्रण-कला के दृष्टिकोण से भी अनुपम थे। ‘सुधा’ में प्रफरीडिं़ग और भाषा के गठन पर विशेष ध्यान दिया जाता था। आचार्य शिवपूजन सहाय हेड प्रूफ-रीडर थे और ख्याति-प्राप्त पं0 गौरीशंकर द्विवेदी उनके सहयोगी। अन्तिम प्रूफ व भाषा संशोधन दुलारे लाल जी की कुशलता लेखनी से होता था। क्या मजला कि एक भी अशुद्धि या भूल रह जाए। फार्म के छपते-छपते भी, भूल पकड़ी जाने पर, मशीन रूकवा कर संशोधन करा दिया जाता था। पं0 रूपनारायण पाण्डेय भाशा की शुद्धता एवं प्रांजलता के तथा, दुलारे लाल जी शैली, वर्तनी एवं विराम-चिन्हांकल के लिये उत्तरदायी थे। निराला जी ने लिखा था: - ‘‘माधुरी के सम्पादन से सम्मानित आप लोगों की योग्यता ‘सुद्दा’ में और चमकी है, मैं निस्संदेह कहंूगा ‘सुधा’ प्रथम संख्या से ही प्रथम श्रेणी की पत्रिका बन गई। आपका अध्यवासाय संचालन शक्ति तत्परता और सौदर्य ग्राहिक आदि प्रशंसनीय हैं।
आचार्य शिव पुजन सहाय जी ने लिखाः
सुस्वर लहरी प्लावित वह पुण्य प्रदेशः सुधा वहां लहरा रही है।
सद् गं्रथो का सम्पादन - प्रकाशनः  
अपने जीवन काल में दुलारे लाल जी ने लगभग 700 गं्रथों का सम्पादन प्रकाशन किया। हिन्दी में यह एक मानक है। उन्होने कतिपय गं्रथों के सम्पादन में अभूतपूर्व परिश्रम किया। और अपनी अनन्य क्षमता प्रतिभा का प्रदर्शन किया। ‘रंगभूमि’ के लेखन प्रकाशन में उन्होने विशेष रूचि ली।
दुलारे लाल जी का सर्वश्रेष्ठ सम्मानित ग्रंथ ‘‘बिहारी रत्नाकर’’ है। जिसमें एक वर्ष से भी अधिक समय लगा। नेस्फील्ड स्कालरशिप प्राप्त दुलारे लाल जी ने अपने  व्याकरण ज्ञान का ‘बिहारी रत्नाकर’ के सम्पादन में भरपूर उपयोग किया है। इस सुसम्पादित ग्रंथ में कामा, कोलन, सेमीकोलन, कोष्टक, बड़ा कोष्टक डैश आदि के इस्तेमाल की अद्भुत छटा है। हिन्दी के किसी ग्रंथ में आज तक इतना कौशल पूर्ण सम्पादन नही हुआ। 700 दोहों के शुद्ध रूपांकन में वह और रत्नाकर जी घण्टों विचार विमर्श करते रहते थे तभी ग्रंथ शुद्ध छप सका। रत्नाकर जी सदैव दुलारे लाल जी को इस क्षमता की दाद देते थे। इस सुसम्पादित ग्रंथ के बारे में डा0 सर जार्ज ग्रियर्सन ने लिखा हैः
‘‘माला (सुकवि माधुरी माला) की इस शुभ पुस्तक के प्रारंभ के लिये प्रकाशक तथा प्रधान सम्पादक (दुलारे लाल) बधाई के पात्र है। आशा है, और ग्रंथ भी, जो इस माला में गूंथे जायेगें, विद्धता में इसी दर्जें के होेंगे।
    संक्षेप मे हम निस्संदेह कह सकते है कि सर्वश्री प्रेमचन्द्र, निराला, मिश्रबधु, वृन्दावन लाल वर्मा, गोविंद वल्लभ पंत, कौशिक आदि सैकडो़ लेखकों व कवियों एवं महावीर प्रसाद द्विवेदी सरीखे सम्पादकों की कृतियों पर दुलारेलाल जी की अनुभवी सम्पादन-कला की दृढ़ छाप हैं। अशुद्धियों से रहित ‘माधुरी-सुधा’ एवं सैकड़ो पुस्तकांे की छपाई-सफाई-मुद्रण में अनन्य, हिन्दी साहित्य को दुलारे लाल जी की अनुपम भेंट है। वस्तुतः दुलारे लाल जी हिन्दी के सर्वकालीन सम्पादकाचार्य कहे जा सकते है।

कवि सम्मेलनांे व साहित्यिक गोष्ठियों की परम्परा के जनकः श्री दुलारे लाल जी कवि सम्मेलनों एवं काव्य गोष्ठियों के बेहद शौकीन थे। कराची से लेकर लाहौर तक, कलकत्ता से लेकर गुरूकुल कांगड़ी तक, उन्होने सैकड़ांे कवि सम्मेलनो एवं गोष्ठियों का सभापत्वि किया होगा। फरवरी 1937 में उन्होनें यू0पी0 इण्डस्ट्रियल एवं एग्रीकल्चर एक्जिवीशन में सर्वप्रथम अखिल भारतीय कवि सम्मेलन का आयोजन किया। इसमें अनेक देशी नरेश एवं अवध के राजा तथा लगभग 67 मूर्द्धन्य कवि उपस्थित थे। 3000 से ऊपर भीड़ सुसज्जित पण्डाल में घंटों कवियों का काव्य-पाठ होता रहा। इतने विशाल स्तर पर कवि-सम्मेलन फिर कभी न हुआ। उत्तर प्रदेश शासन में दुलारे लाल जी भार्गव और मुझे (मंत्री, कवि-सम्मेलन) को एक-एक शासकीय ‘सनद’ प्रदान की। 1972 में दुलारे लाल जी प्रधानमंत्री श्रीमती इन्दिरा गांधी को रवीन्द्रालय में आयोजित कवि सम्मेलन में ले आये। वे आधा घंटे के लिए पधारी थीं, परन्तु उत्सुकता और दिलचस्पीवश लगभग डेढ़ घंटा बैठी रहीं।
वस्तुतः उस जमाने में ‘कवि कुटिर’ हिन्दी साहित्यकारों का तीर्थ-स्थल था, और दुलारे लाल जी उनके केन्द्र बिन्दु थे।
कला पारखी दुलारे लालः
दुलारे लाल जी कला -पारखी थे। ‘माधुरी’ के प्रकाशन में उन्होनें चित्रों के समावेश पर अधिक ध्यान दिया, सभी प्रदेशों से उच्चकोटि के चित्र मंगाकर प्रकाशित किये। ‘माधुरी’-‘सुधा‘ के प्रत्येक अंक में तीन-तीन रंगीन, चित्र छपते थे। हिन्दी पत्रिकाओं के लिए यह अभूतपूर्व था। राय कृष्णदास ने इस विषय में दुलारे लाल जी को अनेक बधाई पत्र लिखे अनेक चित्र भी मांग कर प्रकाशनार्थ भेजें। सुप्रसिद्ध चित्रकार मुहम्मद हकीम को रू0 150 मासिक पर रखा। वे नित्य नए चित्र बनवाते रहते थे। ‘सुधा’ में चित्रकला पर गंभीर लेख प्रकाशित होते थे, विशेषकर डा0 हेमचन्द्र जोशी (बर्लिन) द्वारा लिखित। उनके द्वारा लिखित फ्रेंच चित्र कला के गत 100 साल, ऐतिहासिक कृति है।
चित्रों पर कविताः
बिहारी लाल के दोहों पर बाद में अनेक चित्र बने हैं। परन्तु दुलारे लाल जी ने यह परंपरा सबसे पहले कायम की। चित्र बन जाने पर दोहे लिखे और खूब लिखे। बिना चित्र देखे इनके दोहों को पढ़कर समक्ष चित्र खिंच जाता है, हमारे सामने समां बंध जाता है।
काव्य प्रतिभा के धनीः
दुलारे लाल जी के काव्य पर अन्यत्र विश्लेषणात्मक लेख दिए गए है। वें आशु-कवि तो न थे, परन्तु चलते-फिरते कविता रचने में पटु थे। काशी में द्विवेदी मेला में उन्होंने जो कतिपय दोहे तुरन्त रचकर सुना दिए, उनकी सराहना उपस्थित साहित्यकारों ने तुरन्त ही की; वे खिल उठे। कलकत्ता में भी हिन्दी साहित्य सम्मेलन के सुअवसर पर नाहर म्यूजियम के संस्थापक श्री पूरन चंद नाहर, दुलारे लाल जी और रत्नाकर को म्यूजियम अवलोकनार्थ ले गए थे। उस समय दुलारे लाल जी ने तत्काल एक दोहा रचकर सुनायाः
    सत साहित्य सुधांसु-सुधि,
        कलित कला कुमुदेस-
    उमगत ‘पूरन चंद’ लखि,
        ‘रत्नाकर‘ उर देस।

पूरन चन्द और रत्नाकर जी बहुत हंसे। दुलारे लाल जी ने अपने बारे में लिखा है;
    चहत न धन, मान, सुख
        मुकति ध्यान हूं नाहि;
    उर उमंग जब-जब उठत,
        उकति उदित कहि जाहि।

अपने अंतिम 10 वर्षो में वे रामायण दोहों में लिखने की योजना साकार कर रहे थे। उन्होंने बहुत से दोहे लिख भी लिए थे, जिन्हें वे बड़े चाव से सुनाते थे। खेद है, अव्यवस्थित चित होने के कारण वे इस शुभ कार्य की पूर्ति न कर सके। उनके लिखे वे सुन्दर दोहे भी परिवार-जनों के अधिकार में पड़े विनिष्ट हो रहे है।
काश, इन्हें प्रकाश में लाया जाता। क्या सुयोग्य श्रीमती जी इस ओर ध्यान देंगी।
अंतिम कालावधिः
    दुलारे लाल जी का अंतिम समय कुण्ठा, निराशा, साहित्यकारों की अकृतज्ञता-जनित क्षुद्रता में व्यतीत हुआ। परिवार-जनों ने व्यापार को शिथिल कर दिया और उनकी योजनाओं को आगे न बढ़ाने दिया। वह भावुक और अततः धार्मिक हो उठे। संत कृपाल सिंह का उन पर प्रभाव पड़ा। वे अनहद नाद सुनने लगे। इन दस वर्षों का पूरा समय उन्होने परोपकार तथा बीसियों नवयुवकों को सहायता, सहारा एवं प्रोत्साहन में व्यतीत किया। उनके हित वे मीलों साइकिल पर अथवा पैदल चले जाते थे। उनके प्रभाव से अनेक नवयुवक आज भी सरकारी सेवाओं व अन्य धंधों में लगे हैं। उस समय उन्होने जो दार्शनिक व धार्मिक दोहे लिखे वे स्तुत्य है, यथा-
राधा गगनांगन मिलै धारापति सौं धाय,
पलट आपुनों पंथ पुनि धारा ही ह्नै जाय,
महान दुखः और पश्चाताप की बात है कि हम उस महान आत्मा का समादर न कर सके, आज भी परिवार के लोग, बंधु-बांधव एवं साहित्यकार उनके प्रति कर्तव्य से अचेत हैं। क्या इस घोर व्यथा का परिमार्जन होगा?
हमें उनके अन्तिम संदेश को साकार करना है, उनके अधूरे स्वप्नों को पूरा करना हैं
    समुझि धरम करि करन,धरि
        न फल-चाह मन माँह,
    दिवस-रात तरू देत ज्योै,
        प्रभा, अेधरी छाँह।

श्री दुलारे लाल भार्गव

 - ठाकुर प्रसाद सिंह
हिन्दी के नवीन साहित्य से परिचित होने के क्रम में मेरा परिचय ‘गंगा पुस्तक माला’ तथा उसके यशस्वी व्यवस्थापक श्री दुलारे लाल भार्गव से बचपन में ही हो गया था। दुलारे लाल जी के सम्बन्ध में कितने ही कहानियां और प्रवाद तभी सुनने को मिले थे फिर भी हिन्दी के प्रकाशन क्षेत्र में उनकी सेवाओं की विशिष्टता का जादू मेरे ऊपर बना हुआ था, वैसे ही उस समय हिन्दी के प्रसिद्ध रचनाकारों की रचनाओं के प्रकाशन का श्रेय भी श्री दुलारे लाल भार्गव को ही था।
    लखनऊ के विषय में मेरे मन में कई तरह के सपने थे लेकिन मैंने अपने प्रारभिंक जीवन में सोचा तक नहीं था कि मुझे अपनी जिन्दगी का लगभग आधा हिस्सा लखनऊ में बिताना पड़ेगा। लखनऊ मेरे लिए उस समय तक श्री दुलारे लाल भार्गव, श्री यशपाल, श्री अमृत लाल नागर और श्री भगवती चरण वर्मा का नगर था तथा जहां नये लेखकों का एक बड़ा समुदाय निवास करता था। एकाएक लखनऊ आने का निश्चय किया और एक दिन दो कमरों के एक मकान में आकर लखनऊ का निवासी हो गया। प्रारंभिक व्यस्तता कम होने पर धीरे-धीरे लखनऊ से परिचय बनने लगा और तभी अमीनाबाद पार्क में हनुमान जी के मंदिर के निकट फुहारे के पास में नए सिरे से श्री दुलारे लाल भार्गव के परिचय में आया। तब तक उनका प्रकाशन उखड़ चुका था और स्वयं भार्गव जी प्रकाशन के व्यस्त जीवन से विश्राम ले चुके थे। 1937-38 में अखिल भारतीय हिन्दी साहित्य सम्मेलन के अधिवेशन के समय जिस दुलारे लाल भार्गव को देखा था, यह भार्गव जी उसकी छाया मात्र थे फिर भी उनकी आंखों में पुरानी चमक कुछ हद तक बनी हुई थी। समय और परिस्थितियां आदमी को क्या से क्या बना देती हैं, भार्गव जी इसके प्रत्यक्ष उदाहरण थे। मेरे साथ वे वहीं घास पर बैठ गए और धीरे-धीरे उनका आत्म विश्वास लौट आया। वे संस्मरण की दुनिया में खो गए और फिर काफी देर तक वहीं रहे। मैंने जानबूझ कर उन्हें छेड़ा नहीं। मुझे उनको सुख से वंचित करने का साहस नहीं हुआ। उनके पास कुल मिलाकर सुखद संस्मरण ही बचे थे, मुझे उनके स्वप्नलोक से खींच लाने का कोई अधिकार नहीं था।
    ‘दुलारे दोहावली’ के कितने ही दोहे उन्होंने सुनाये तथा रस लेकर उनके संदर्भ से मुझे परिचित करवाया। फिर वे देव और बिहारी को लेकर उठानेवाली स्पर्धा पर आ गये। बहुत सी बातें मुझे पहले से ही मालूम थीं पर उनके मुंह से उन्हें सुनने का सुख कुछ और ही था।
    लखनऊ उर्दू का गढ़ था पर श्री दुलारे लाल जी ने लखनऊ में ही हिन्दी प्रकाशन की मार्यादा स्थापित करके हिन्दी की ऐतिहासिक सेवा की थी। यह बात उन्हें बताने पर वे चुप हो जाते थे तथा उनकी आखें स्वप्न देखने लगती थीं। लेखकों के प्रति उनके व्यवहार को लेकर तरह-तरह की रचनाएं होती हैं पर सच तो यह है कि उनके कारण ही लेखकों की एक बड़ी संख्या प्रकाश में आयी। श्री वृन्दावन लाल वर्मा, श्री निराला तथा प्रेमचन्द उनकी लेखक मण्डली के महत्वपूर्ण सदस्य थे, जिनकी कितनी ही महत्वपूर्ण रचनायें श्री दुलारे लाल जी ने प्रकाशित की। प्रेमचन्द जी उनके साहित्यिक सलाहकार भी थे। उनके अतिरिक्त कितने नये लेखक उनके सम्पर्क में आये, जिनकी प्रारम्भिक कृतियां श्री भार्गव ने साहस के साथ प्रकाशित की। उदय शंकर भट्ट, कृष्णानन्द गुप्त, प्रताप नारायण श्रीवास्तव, चतुरसेन शास्त्री, सहित यह सूची बहुत लम्बी हो सकती है।
    उस समय सरकारी खरीद का कोई प्रश्न ही नहीं था। भार्गव जी ने अपने  अध्यवसाय से अपना प्रकाशन विकसित किया था तथा पूरे देश में स्थायी ग्राहकों की एक बड़ी संख्या खड़ी की थी। सच पूछिए तो ब्रिटिश प्रकाशनों की पद्धति का अनुसरण करके उन्होंने बिल्कुल अपनी तरह से ‘गंगा पुस्तक माला’ का गठन किया था। बड़े ही आत्म-विश्वास से उन्होंने कितने ही साहसपूर्ण प्रयोग किये थे और उन्हें काफी हद तक सफलता भी मिली थी।
    आज हिन्दी पूरे देश की राजभाषा है, तथा उत्तर प्रदेश की तो यह भाषा है ही। हर प्रकार के राजकीय संरक्षण की घोषणा के बाद भी लखनऊ में हिन्दी प्रकाशक नाम की कोई चीज कहीं दिखायी नहीं पड़ती। पाठ्य पुस्तकों की छपाई का बाजार गर्म है। पर अच्छी साहित्यिक पुस्तकें छपनी कब ही बन्द हो चुकी हैं। लखनऊ ही क्यों, इलाहाबाद, वाराणसी और आगरा की स्थिति कुछ खास अच्छी नहीं है। सारे प्रकाशक दिल्ली में केन्द्रित हो गये है, सारे साहित्यकार दिल्ली में एकत्र होकर धन्य हो रहे हैं, ऐसी हालत में श्री दुलारे लाल जी के कार्य का महत्व और उभर कर सामने आता है।
    श्री दुलारे लाल जी को उनकी स्थिति का लाभ भी कम नहीं मिला। ‘दुलारे दोहावली’ को ‘देव पुरस्कार’ मिलने पर हिन्दी जगत में विरोद्द प्रतिक्रियाएं हुईं तथा लेखक दो खेमों में बंट गये, पर जानने वाले जानते हैं कि उन्होंने यह पुरस्कार साहित्यिक महारथियों के विरोध के बावजूद प्राप्त करके दिखा दिया था। हरिऔध जी की प्रसिद्ध रचना ‘प्रिय प्रवास’ की तुलना में प्राप्त इस पुरस्कार का महत्व और भी बढ़ जाता है।
    श्री दुलारे लाल जी के प्रयत्न से लखनऊ में जो साहित्यिक वातावरण बना था वह बाद में बना नहीं रह सका। आज लखनऊ मासिक पत्रिकाओं, प्रकाशनों तथा साहित्यिक संस्थाओं की दृष्टि से जैसा सूना है उसे देखकर श्री दुलारे लाल जी का युग हिन्दी का स्वर्ण युग ही लगता है।
    लखनऊ में रहते समय श्री भार्गव जी के साथ कितनी ही बार देर तक बातें करने का अवसर मिला। कभी-कभी वे मेरे कार्यालय में मुझसे मिलने आते और न मिलने पर चिट पर एक दोहा लिखकर चले जाते, ऐसी चिटें खोजने पर अभी भी मेरे पास मिल जायेंगी। बाद के वर्षों में एक साइकिल लिए सड़कों पर चलते उन्हें देखकर क्लेश होता था। वे किसी न किसी के साथ अक्सर रास्ते में मिल जाते और रास्ते पर ही खड़े-खड़े वर्तमान से सरक कर भूत की गोद में चले जाते थे।
    श्री दुलारे लाल जी के कृतित्व का सही मूल्यांकन होना अभी शेष है। लखनऊ की नयी पीढ़ी ने यह उत्तरदायित्व अपने कंधों पर उठाया, यह शुभ संकेत है।
(लेखक साहित्यकार व सूचना निदेशक उ.प्र. हैं)

श्री दुलारे लाल भार्गव- कैलाश नाथ कौल
श्री दुलारे लाल भार्गव 1920-30 ई0 में हिन्दी के सम्पादकों और प्रकाशकों की अगली लाइन में थे। उन्होंने पहले लखनऊ के नवल किशोर प्रेस से प्रकाशित मासिक पत्रिका ‘माधुरी’ का सम्पादन किया और फिर खुद ही अपनी मासिक पत्रिका ‘सुधा’ का प्रकाशन और सम्पादन किया। उनकी ब्रज भाषा में लिखी ‘दुलारे दोहावली’ पर देव पुरस्कार दिया गया था। श्री भार्गव जी से मेरे सम्बन्ध उस समय कायम हुए,जब 1929 ई0 में मैंने लखनऊ जिले में ग्राम सुधार के लिए गंगा प्रसाद मेमोरियल हाल में चरखा प्रचारक संघ कायम किया था। उसी मौके पर, प्रेमचन्द जी और उनके खानदान वालों से भी मेरा सम्बन्ध कायम हुआ। कुछ ऐसा हुआ कि श्री भार्गव से  मेरा सम्पर्क बढ़ता ही गया और हम लोग भिन्न-भिन्न कामांे में लगे थे। लेकिन ऐसा लगता था कि हम दोनों एक ही काम कर रहे हैं। इसकी एक वजह यह हो सकती है कि हम दोनों ने जो काम लिया था, उसको दिलोजान से कामयाब बनाने की लगन थी। मैं मुख्तलिफ काम करता हुआ देश से बाहर चला गया और जब वापिस आया तो ऐसा लगा कि हम जैसे कभी अलग न हुए हों। उन्होंने सिर्फ हिन्दी साहित्य की सेवा ही नहीं की, बल्कि ऐसे बहुत से हिन्दी प्रेमियों को भी पनाह दी जो हिन्दी साहित्य की सेवा के दौरान अपनी जीविका चलाने के लिए मुसीबत में फंसे हुए थे। उनका मुस्कराता हुआ चेहरा अभी तक मुझको याद हैं।
(लेखक भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पं0 जवाहर लाल नेहरू की पत्नी के सहोदर हैं व राष्ट्रीय वनस्पतिउद्यान के निदेशक रहे हैं)

स्मृति के सुमन

(पद्मभूषण)  डाॅ0 रामकुमार वर्मा
श्री दुलारे लाल भार्गव- जब इस नाम का स्मरण आता है तो आधुनिक हिन्दी साहित्य का एक सम्पूर्ण युग साकार हो उठता है। स्वामी कार्तिकेय केवल रण-कुशल ही नहीं, देवताओं की सेना का संचालन करने में भी प्रवीण थे, उसी प्रकार श्री दुलारे लाल स्वयं कवि और पत्रकार ही नहीं थे, अनेक कवियों और लेखकों को साहित्य-क्षेत्र में अग्रसर करने की क्षमता भी रखते थे। मुझे ज्ञात है, उनकी ‘कवि-कुटीर’ में कितने ही कवि और लेखक उनके समीप रह कर प्रेरणा और स्फूर्ति ग्रहण करके यशस्वी हुए है।
    श्री दुलारे लाल के प्रथम दर्शन मुझे आज से 55 वर्ष पूर्व सन् 1925 में कानपुर में हुए थे। वहां श्रीमती सरोजनी नायडू के सभापतित्व में इंडियन नेशनल कांग्रेस का अधिवेशन होने जा रहा था। तभी श्री दुलारे लाल भार्गव ने वहां अखिल भारतीय हिन्दी कवि सम्मेलन का आयोजन किया। उस समय मैं इलाहाबाद विश्वविद्यालय में बी0ए0 का विद्यार्थी था। कविताएं लिखने लगा था और कवि-सम्मेलनों में उत्साह से कविताएं पढ़ता भी था। दारागंज के पं0 लक्ष्मीधर बाजपेयी के अनुरोध से मैं भी श्री भार्गव द्वारा आयोजित अखिल भारतीय कवि-सम्मेलन में भाग लेने के लिए कानुपर गया। देखा कि एक वृहत् पंडाल में दूर-दूर से आये हुए कवि एकत्र हुए हैं। श्री दुलारे लाल भार्गव के दर्शन हुए, मध्यम कद के सुदृढ़ व्यक्तित्व के पुरुष (जिनके तेजस्वी मुखमंडल से साहित्यिक गरिमा की किरणें विकीर्णित हो रही हैं) कवि-सम्मेलन का संचालन कर रहे हैं। सभापति के आसन पर पं0 अयोध्या सिंह उपाध्याय-समीप ही श्री जगन्नाथदास रत्नाकर, श्री बालकृष्ण शर्मा नवीन और कितने ही लब्ध प्रतिष्ठ कवि थे जिनसे पं0 लक्ष्मीधर बाजपेयी ने मरा परिचय कराया। मैंने भी बड़े उत्साह से काव्य-पाठ किया। श्रोताओं से प्रशंसा प्राप्त हुई। दुलारे लाल जी बहुत प्रसन्न हुए। इसी क्षण से मैं उनका कृपा-पात्र हो गया। समय बीतता गया और हिन्दी पत्रकारिता का युग समुन्नत होता गया। श्री दुलारे लाल भार्गव ने लखनऊ से ‘सुधा’ मासिक पत्रिका का सम्पादन आरंभ किया और उसका साहित्यिक स्तर इतना शिष्ट, कलापूर्ण और मर्यादित रखा कि हिन्दी साहित्य का बड़े से बड़ा लेखक और कवि उसमें अपनी रचना के प्रकाशन से गर्व का अनुभव करता था। अपने स्नेह के कारण दुलारे लाल जी ने मुझसे भी ‘सुधा’ में कविताएं भेजने का आग्रह किया और मैंने बड़े उत्साह से उनके आग्रह की पूर्ति करते हुए अनेक रचनाएं ‘सुधा’ में प्रकाशनार्थ भेजी। परिणाम यह हुआ कि आधुनिक छायावादी कवियों में उन्होंने मेरा नाम सम्मान के साथ सम्मिलित कर ‘सुधा’ में प्रकाशित किया।
    यह तो मेरे काव्य जीवन का मंगलाचरण था। इसके बाद का इतिहास और भी रोचक है। हिज हाइनेस श्रीमान सवाई महेन्द्र महाराजा वीर सिंह देव (ओरछा नरेश) ने सन 1934 में दो हजार मुद्रा वार्षिक का ‘देव पुरस्कार’ स्थापित किया था जो वर्षा काल से ब्रज भाषा और खड़ी बोली काव्य के सर्वश्रेष्ठ नवीन ग्रन्थ पर दिया जाता था। सन् 1935 में यह पुरस्कार ‘‘निर्णायकों’’ द्वारा लखनऊ निवासी श्रीयुत् पंडित दुलारे लाल भागर्व जी को उनके ‘‘दुलारे दोहावली’ नामक उत्तम ग्रंथ के कारण समर्पित किया गया।’’
    मैंने जब दुलारे लाल जी को इस पुरस्कार पर बधाई दी तो उन्होंने मुझसे आग्रह किया कि अगले वर्ष सन् 1936 में यह पुरस्कार खड़ी बोली काव्य पर दिया जाने वाला है, इसलिए मैं अपनी कविता की कोई नयी पुस्तक पुरस्कारार्थ केशव साहित्य परिषद ओरछा राज्य को भेज दूं। उसी वर्ष मैं कश्मीर यात्रा पर गया था और अपने कश्मीर -प्रवास में मैंने प्रकृति सौन्दर्य पर 44 कविताएं लिखी थीं। भार्गव जी का परामर्श पाकर मैंने उन 44 कविताओं का संग्रह ‘चित्रेरखा’ नाम से चांद प्रेस, इलाहाबाद से प्रकाशित कराकर पुरस्कार के लिए भिजवा दिया। चार महीने बाद सूचना मिली की खड़ी बोली का दो हजार रुपयों बाला ‘देव पुरस्कार’ निर्णायकों द्वारा ‘चित्ररेखा’ पर घोघित किया गया हैं, श्री दुलारे लाल भार्गव ने तुरन्त ‘द्वितीय देव पुरस्कार विजेता’ शीर्षक देकर मेरा ‘चित्र सुधा’ में प्रकाशित किया। काव्य-क्षेत्र में उनके उत्साह-दान का यह फल था।
    मेरे हिन्दी विभाग के अध्यक्ष डाॅ0 धीरेन्द्र वर्मा श्री दुलारे लाल जी के सहपाठी थे। उनसे मिलने के लिए दुलारे लाल जी प्रायः इलाहाबाद आया करते थे। एक बार सन् 1936 में वे इलाहाबाद आये और डाॅ0 धीरेन्द्र जी से मेरे सम्बन्ध में पूछा। धीरेन्द्र जी ने एक विद्यार्थी को साथ कर दिया और वे मेरे निवास स्थान साकेत पर चले आये। उनके आने से ही हर्ष-विभोर हो गया। मैंने उनका यथोचित स्वागत सत्कार किया और उनका कार्यक्रम जानना चाहा। उन्होंने कहा कि सिर्फ तुमसे मिलने आया हूं। मैं तुम्हारी एक पुस्तक ‘गंगा-पुस्तक माला’ में छापना चाहता हूं। कोई काव्य-संग्रह या लेख संग्रह हो तो उसे मुझे दो। मैं तुरन्त छापूंगा।’
    उस समय मैं अपना एकांकी संग्रह ‘पृथ्वीराज की आंखे’ तैयार कर रहा था। उसकी पाण्डुलिपि उन्होंने देखी और देखकर कहा कि ‘‘हिन्दी साहित्य की यह एक नयी विधा है। इसे मैं ले जा रहा हूं। फौरन छाप दूंगा ‘ऐसा कहकर उन्होंने मेरे एकांकियों की पाण्डुलिपि अपने बैग में रख ली।’ एक महीने बाद उन्होंने ‘पृृथ्वीराज की आंखे’ का प्रकाशन किया और पुस्तक के आरंभ में स्वयं एक ‘वक्तव्य’ लिख -........ ‘एकांकी नाटकों का हिन्दी में यही सर्वश्रेष्ठ संग्रह है। इनमें से किसी भी नाटक में अश्लीलता नहीं है, इसलिए यह संग्रह सरलता से विद्यार्थियों के लिए पाठ्य पुस्तक के रूप में रखा जा सकता है। कहना न होगा कि साहित्यिक दृष्टि से सुन्दर एकांकी नाटकों का निर्माण सबसे पहले रामकुमार जी ही ने किया है। इस क्षेत्र में पथ प्रदर्शक का पद आप ही का है।’’ आदि।
    ‘पृथ्वीराज की आंखे’ के प्रकाशन के बाद मेरी रूचि एकांकी लेखन में अधिकाधिक होती गयी और मैंने शताधिक एकांकियों की रचना कर डाली। एकांकी लेखन में भी श्री दुुलारे लाल भार्गव की प्रेरणा सर्वोपरि रही है।
    धीरे-धीरे दुलारे लाल जी से आत्मीयता बढ़ती गयी। जब कभी मैं लखनऊ जाता था तो उन्हीं के पास ठहरता था और उनका प्रेम-पूर्ण आग्रह ऐसा होता था कि हफ्ते, डेढ़ हफ्ते से पहले वे मुझे इलाहाबाद न आने देते। उनके परिवार से भी अपनापन बढ़ता गया और उनके भाई श्री मोती लाल, ज्योति लाल, आंेकार, सोहन मुझे अपने परिबार के स्वजन जैसे ही हो गये। दुलारे लाल जी के अनेक पत्र मेरे पास आते जिनमें वे मुझसे लखनऊ आने का आग्रह करते। मेरे साहित्य लेखन पर भी उनका विश्वास बहुत दृढ़ हो गया था।
    उनका 28.11.74 का एक पत्र है जिसमें अपने परिवार का समाचार लिखने के बाद वे लिखते हैं ...... मेरे भाई-भतीजे समझना नहीं चाहते या समझ नहीं पाते एक मासिक पत्र निकालना है, यदि आप अपना टेलीफोन नम्बर लिख देने की कृपा करें तो मैं आपसे आवश्यक बातें कर लूं।
    साहित्य का काम हम और आप कैसा कर सकते हैं, यह आप खूब जानते है। यह समझाना है किन्तु श्रीमान डालमिया जी और श्री शांति प्रसाद जैन और रमा जी जैन को भी मिलकर समझा देना है।
शुभचिंतक - दुलारे लाल
दुःख है कि उनकी यह आकांक्षापूरी नहीं हो सकी।
    इलाहाबाद के व्यवसायी श्री निरंजन लाल भार्गव उनके फूफा थे। वे एक बार यहां इलाहाबाद आये। निरंजन लाल भार्गव के चार सिनेमा भवन है। शायद उन्होंने दुलारे लाल जी से सिनेमा देखने के लिए कहा। लेकिन दुलारे लाल जी अकेले कैसे सिनेमा देखते। उन्होंने तुरन्त मुझे एक दोहा लिखकर भेजा:- प्रियवर रामकुमार जू, कब ऐहो मो पाहिं।
आवो तो हम आज मिलि, संग सिनेमा जांहि।। - दुलारे लाल
    मैं तुरन्त निरंजन लाल भार्गव जी के स्थान ‘गोविन्द भवन’ गया और दुलारे लाल जी के साथ सिनेमा देख कर उनके साथ खाना खाकर घर लौटा।
    मैंने ऊपर ‘दोहे’ की बात कही है, ‘गंगा पुस्तक माला’ के 151 वें पुष्प के रूप में जब ‘दुलारे दोहावली’ प्रकाशित हुई तो हिन्दी संसार में जैसे दुलारे-युग का प्रादुर्भाव हो गया। ‘सुधा’ में प्रकाशित होने वाले चित्रों के नीचे परिचायक पंक्तियां दोहों के रूप में लिखकर दुलारे लाल भार्गव ने विशेष ख्याति अर्जित कर ली थी। बाद में दोहों की निरन्तर रचना के रूप में ‘दुलारे दोहावली’ तैयार हो गयी जिसे अनेक निर्णायकों ने हिन्दी साहित्य सम्मेलन के मंगला प्रसाद परितोषिक के लिए भी संस्तुति किया। यह सर्वमान्य है कि ‘दुलारे दोहावली’ की मधुरता आधुनिक हिन्दी में ब्रज भाषा की धरोहर समझी जानी चाहिए।
    आज दुलारे लाल भार्गव नहीं है। मैं उनकी पवित्र स्मृति में अपनी श्रद्धांजलि समर्पित करता हूं।
(लेखक वष्ठि साहित्यकार व इलाहाबाद विश्वविद्यालय में हिन्दी विभागाध्यक्ष भी रहे)

श्री दुलारे लाल भार्गव

श्री श्रीनाथ सिंह
भारतेन्दु हरिश्चन्द्र आधुनिक हिन्दी के पितामह कहे जाते हैं। उनके पश्चात हिन्दी में प्रगति का युग प्रारम्भ हुआ। उसके मूल स्रोत पंडित महावीर प्रसाद द्विवेदी थे। आधुनिक हिन्दी के सृजन, प्रकाशन, विस्तार के उस युग को द्विवेदी-युग कह सकते है। द्विवेदी जी ने आधुनिक हिन्दी को पद्य रचना के क्षेत्र में भी समर्थ बनाया। कविवर मैथलीशरण गुप्त, अयोध्या सिंह उपाध्याय जैसे ख्याति-प्राप्त कवियों को सामने लाने का श्रेय स्वर्गीय द्विवेदी जी को ही है।
    द्विवेदी युग के पश्चात हिन्दी में और भी बड़े पैमाने पर जिस युग का प्रारम्भ हुआ, उसे ‘दुलारेलाल युग’ कहा जा सकता है।
    श्री दुलारेलाल भार्गव ने हिन्दी रचना के क्षेत्र में गद्य-पद्य दोनों के लिए आधुनिक हिन्दी को सक्षम बनाया, परन्तु स्वयं अपनी पद्य रचना में ब्रज भाषा का ही सहारा लिया। उनकी यह पद्य रचना ‘दुलारे दोहावली’ के नाम से प्रसिद्ध हुई। इस पर उन्हें ‘देव-पुरस्कार’ और ‘मंगलाप्रसाद पारितोषिक’ मिला; यह पुरस्कार उस समय के सर्वोत्तम पुरस्कार थे।
    ‘दुलारे दोहावली’ को प्रयाग विश्वविद्यालय के तत्कालीन वाइस चांसलर डाक्टर गंगानाथ झा ने उत्तम काव्य घोषित किया। हिन्दी की पत्र-पत्रिकाओं में इसकी बड़ी चर्चा हुई। समालोचकों ने इस पर बड़े-बड़े लेख लिखे। इसे ‘गागार में सागर’ कहा। महाकवि निराला ने, जो समझते थे कि ब्रजभाषा युग बीत गया है, इसे ब्रजभाषा की सर्वोत्तम कृति कहा अनेक समालोचकों ने स्वीकार किया, कि ‘दुलारे दोहावली’ बिहारी सत्सई से टक्कर ले सकती है।
    यह सब होते हुए भी, यह समझ में नहीं आता कि आधुनिक हिन्दी के लेखन और प्रकाशन के अपने समय के सबसे बड़े प्रेरक श्री दुलारे लाल भार्गव नेे पद्य रचना में दोहे ही क्यों चुने? और उन्हें भी ब्रज भाषा में क्यों लिखा? शायद इसलिए कि आधुनिक हिन्दी में गद्य-पद्य के सृजन, सम्पादन और वितरण में इतने व्यस्त रहते थे कि अपने कवि हृदय की तृप्ति के लिए बहुत थोड़ा समय निकाल पाते थे।
    कविवर दुलारे लाल के व्यक्तिगत परिचय का सौभाग्य मुझे सन 1926 में कानपुर में अखिल भारतीय कांग्रेस महाअधिवेशन के अवसर पर होने वाले अखिल भारतीय हिन्दी कवि सम्मेलन में प्राप्त हुआ। कवि सम्मेलन शाम को सात बजे ही प्रारम्भ हो गया था परन्तु बड़ी रात तक चला। उस समय के प्रायः सभी लब्ध-प्रतिष्ठ कवि इसमें पधारे थे। दर्शक मण्डली भी बहुत बड़ी संख्या में उपस्थित थी। सुप्रसिद्ध हिन्दी कवि ‘सनेही’ कविता पाठ करने वाले कवियों के नाम की घोषणा कर रहे थे और बीच-बीच मे दुलारे लाल अपनी पसन्द के कवियों को स्वर्ण पदक प्रदान करने की घोषणा कर रहे थे। उस समय मैंने इतना ही समझा कि श्री दुलारे लाल भार्गव कोई धन-सम्पन्न व्यक्ति है, जो इस प्रकार स्वर्ण पदकों की वर्षा कर रहे हैं। यद्यपि मैं कांग्रेस के प्रतिनिधि के रूप में कानपुर गया था, तथापि इस कवि सम्मेलन मंे भी अपनी छोटी सी रचना सुनाई। मुझे बड़ा हस्तोत्साह हुआ जब श्रोताओं की गगनभेदी वाह-वाह के बावजूद श्री दुलारे लाल भार्गव ने मेरे लिए एक रजत पदक की भी घोषणा नहीं की। खैर, कवि सम्मेलन के अन्त में श्री दुलारे लाल जी मुझसे मिले और मुझे लखनऊ आने का निमंत्रण दिया।
    श्री दुलारे लाल जी के निकट सम्पर्क में आने का अवसर मैं गंवाना नहीं चाहता था, इसलिए शीघ्र ही समय निकालकर मैंने लखनऊ जाकर उनके दर्शन किए। उनसे मुझे इतना स्नेह और आतिथ्य मिला कि मैं भी अपने आपको कुछ समझने लगा और जब मैं ‘सरस्वती’ का सम्पादक बना तब श्री दुलारे लाल जी से बधाई का पत्र पाकर और भी गर्वित हुआ। उन दिनों श्री दुलारे लाल भार्गव ‘सरस्वती’ के जोड़ की पत्रिका ‘माद्दुरी’ के सम्पादक थे और अपने गिर्द हिन्दी के प्रायः सभी स्वनामधन्य कवियों और लेखकों को इस सीमा तक जमाकर लिया था कि स्वयं मुझे ही ‘सरस्वती’, ‘माधुरी’ के मुकाबले में पिछड़ी हुई सी प्रतीत होने लगी और मुझे अच्छी तरह याद है, इस अभाव को दूर करने के लिए मैंने ‘सरस्वती’ को राजनैतिक मंच पर उतारा।
    पता नहीं क्यों श्री दुलारे लाल भार्गव ने एकाएक ‘माधुरी’ से सम्बन्ध-विच्छेद कर लिया और अपनी ‘गंगा पुस्तक माला’ से ‘सुधा’ नाम की स्वतंत्र साहित्यिक पत्रिका निकाली और हिन्दी जगत में वे अत्यन्त दीप्तिमान नक्षत्र के रूप में चमक उठे। भारत की कृषि और औद्योगिक प्रगति कैसे हो सकती है, इस बारे में मुझे उन्होंने एक बड़ा सा उपन्यास लिखने के लिए कहा, उसके ‘प्लाॅट’ के बारे में उनसे काफी वाद-विवाद के बाद मैंने उसे लिख डाला। हिन्दी में मेरा यह तीसरा उपन्यास था, जो ‘जागरण’ के नाम से ‘गंगा पुस्तक-माला’ से श्री दुलारे लाल जी ने प्रकाशित किया था। छपने के बाद अपने उस उपन्यास को जब मैंने पुनः पढ़ा तब मुझे लगा कि श्री दुलारे लाल भार्गव कोरे प्रकाशक ही नहीं, हिन्दी के  उच्च कोटि के रचनाकार, लेखक और सम्पादक है। मुझे यह भी लगा कि श्री दुलारे लाल पुस्तकों का प्रकाशन व्यवसाय की दृष्टि से नहीं, हिन्दी जगत में घाटा सहकर भी श्रेष्ठ ग्रन्थ प्रस्तुत करने की दृष्टि से करते हैं।
    कानपुर कांग्रेस के अवसर पर मैंने बृहत् कवि सम्मेलन देखा था, उससे भी बड़े कवि सम्मेलन का लखनऊ में श्री दुलारे लाल जी ने एक आयोजन किया था। यह कवि सम्मेलन यद्यपि लखनऊ विश्वविद्यालय के प्रांगण में हुआ था तथापि आगन्तुक कवियों में अधिकांश श्री दुलारे लाल भार्गव के निवास-‘कवि कुटीर’ में ही ठहरे थे। श्री दुलारे लाल जी की यह ‘कवि कुटीर’ दो प्रांगणों वाला भव्य भवन था जिसमें बड़े-बड़े बरामदे, कमरे, खुली छतें थीं और आधुनिकतम निवास की सभी सुविधायें प्राप्त थीं। इस कवि सम्मेलन के महिला विभाग को संगठित करने के लिए श्री दुलारे लाल भार्गव ने हिन्दी की तत्कालीन कवियत्री सावित्री एम.ए. को आमंत्रित किया था और इस तरह दोनों की साधन-सम्पन्नता, सम्मिलित छवि से यह कवि सम्मेलन-‘छवि-गृह दीप-शिखा जय बरइ’ के समान जगमगा उठा था। इस कवि सम्मेलन ने, सावित्री देवी और दुलारे लाल को इतना करीब ला दिया था कि अन्त में दोनों का अन्तर्जातीय विवाह हो गया। इस विवाह की रोक-थाम में दोनों तरफ के कट्टर परिवार असफल रहे। उसके बाद तो हिन्दी के सभी प्रकार के उल्लेखनीय समारोह में मुझे श्री दुलारे लाल और श्रीमती सावित्री दुलारे लाल के एक साथ दर्शन होने लगे। मैंने देखा कि श्री दुलारे लाल जी ने जहां श्रीमती सावित्री दुलारे लाल के ठाठ-बाट से रहने के लिए समस्त साधन जुटाये थे, वहां स्वयं एक साधारण लेखक और पत्रकार के रूप में रहते थे। दिल्ली में जब भी मैं जाता था दोनों ही मेरा बड़ा स्वागत सत्कार करते थे और उनकी बदौलत मैं नई दिल्ली की सड़कों पर ठाट-बाट से चाहे जहां उनकी मोटर-कार से आ जा सकता था।
    श्री दुलारे लाल भार्गव अब नहीं है तो लगता है कि हिन्दी लेखकों और कवियों का सबसे बड़ा मित्र खो गया है, कदाचित  ही कोई हिन्दी का लेखक अथवा कवि हो जिसे श्री दुलारे लाल जी से मुंह मांगी धन राशि न मिली हो। जो कोई भी लेखक या कवि श्री दुलारे लाल जी से मनचाही रकम नहीं पाता था वह श्री दुलारे लाल जी को अपशब्द तक कह बैठता था, परन्तु उसका जरा भी बुरा न मानकर वे उसको सब प्रकार से तृप्त करने की चेष्टा करते रहते थे। कांग्रेस के क्षेत्र में जहां वे पं0 जवाहर लाल नेहरू, राजर्षि टंडन जी, लाल बहादुर शास्त्री  आदि के निकट सम्पर्क में रहते थे, और वहीं हिन्दी में मैथलीशरण गुप्त, प्रेमचन्द्र, निराला आदि के अच्छे सहकर्मी थे, वहीं धन कुबेरों में सेठ रामकृष्ण डालमिया आदि के निकटतम सम्बन्धी भी थे। परन्तु वे जितने धन सम्पन्न थे उतने ही बड़े निराभिमानी थे, और एक साधारण लेखक और पत्रकार का जीवन उन्हें प्रिय था। दिल्ली-लखनऊ की सड़कों पर वे अपने सम-कालीन लेखकों को सुविधा प्रदान करते थे कि वे मोटर पर ठाट बाट से चलें परन्तु स्वयं बाइसिकिल पर अथवा कभी-कभी तो पैदल ही बहुत दूर तक आते-जाते थे; किंतु जहां भी वे बाईसिकिल पर या पैदल दिखाई पड़ जाते थे वहीं लेखकों, कवियों, विद्यार्थियों आदि का समूह उनके साथ लग जाता था और बिना किसी भेदभाव के सबको अच्छे से अच्छे होटल या रेस्टरां में ले जाकर खिलाते-पिलाते थे। एक बार हम लोग कोई आठ-दस साहित्यकार दिल्ली में दुलारे लाल जी के साथ चल पड़े। वे सबको एक प्रसिद्ध होटल में ले गए। पकवानों की सूची मांगी और सबको दिखलाते हुए कहा-‘‘गाओ जिसको जो पसन्द आए।’’ एक-एक करके अनेक डिशें आने लगी और उनकी समाप्ति पर बैरा जब बिल लेकर आया, दुलारे लाल जी ने बिल हाथ में लेते हुए हम सबसे पूछा-‘‘और कुछ’’ मैंने कहा-‘‘काफी है’’ बैरा बजाए दुलारे लाल जी से पैसे लेने के उल्टे पावों भागा और सबके सामने लाकर काफी भरे प्याले उपस्थित कर दिये। दुलारे लाल जी बहुत जोर से हंसे, बोले ‘‘श्री नाथ सिंह यह तुमने कभी सोचा भी न होगा कि इस होटल वाले हिन्दी साहित्यकारों को ‘काफी’ का श्लेष सिखा रहे हैं।’’
    दुलारे लाल जी साहित्यकारों की लम्बी यात्राएं आयोजित करते थे और कभी-कभी तो सबके लिए रेलगाड़ी का पूरा एक डिब्बा रिजर्व करा लेते थे। एक बार उन के मन में आया, हिन्दी के साहित्यकारों को राजस्थान की वीर भूमि देखनी चाहिये और फिर कोई 30-35 साहित्यकारों की एक बड़ी टोली को राजस्थान के समस्त ऐतिहासिक नगरों के भ्रमण करवाए। उदयपुर में हम सब लोग महाराणा के और कांकरोली में वहां के प्रसिद्ध महन्त के मेहमान हुए। हम सब लोगों ने दुलारे लाल जी की कृपा से नागद्वारा, चितौड़गढ़, हल्दी घाटी आदि इतिहास प्रसिद्ध स्थान देखें।
    श्री दुलारे लाल भार्गव के अनेक संस्मरण हैं जिनको यदि मैं लिखू तो इस लेख का कलेवर बहुत बढ़ेगा अतएव मैं लेख को समाप्त करने से पहले उनके दो-एक संस्मरण यहां सुनाता हूं। राजर्षि पुरुषोत्तम दास टण्डन जब विधानसभा के अध्यक्ष हुए तब श्री दुलारे लाल जी उनके निवास स्थान पर नित्य ही आने जाने लगे क्योंकि दुलारेलाल जी की तरह टण्डन जी भी हिन्दी वालों के लिए आकर्षण के केन्द्र थे। टण्डन जी के पास एक दिन एक आशु कवि ने दुलारे लाल जी पर व्यंग करते हुए एक दोहा सुनाया। दोहा लिखने की प्रेरणा उन्हें बुद्ध देव की मूर्ति से मिली थी, जो टण्डन जी के ड्राइंग रूम में एक मेज पर सजावट के तौर पर रखी थी। बुद्ध देव की मूर्ति के पास ही एक घडि़याल की मूर्ति सजा कर रखी गई थी। आशु कवि ने सुनाया - बुद्ध देव के पास यों, शोभित है घडि़याल, टण्डन जी के पास ज्यों बसे दुलारे लाल
इस पर टण्डन जी ने आपत्ति की तब उस आशु कवि ने अपने उस दोहे को तत्काल सुधारा और कहा - बुद्ध देव की मूर्ति ढिग रखी है बरमाल, टण्डन जी के पास ज्यों बसे दुलारे लाल।
    इस पर सभी लोग बहुत हंसे और दुलारे लाल जी तो और भी अधिक हंसे।
    एक कवि सम्मेलन में दुलारे लाल जी ने अपने दोहे सुनाए परन्तु किसी ने बाह-वाह की ध्वनि न की उसके बाद ही श्रमती सावित्री दुलारे लाल ने अपने कविता सुनाई और उस पर श्रोताओं ने बड़ी हर्षध्वनि की तब उन्हीं आशु कवि महोदय ने यह पद्य सुनाया - होड़ मर्दो में व औरतों में है भारी, मिनिस्टर तक बनने लगी है नारी, एक कविताई बची थी दुलारे लाल के लिए, उसमें भी सावित्री ने बाजी मारी।
    पाकिस्तान पर भारत की विजय के उपलक्ष्य में श्री दुलारे लाल द्वारा आयोजित अन्तिम कवि सम्मेलन मैंने रवीन्द्रालय में देखा। उसके सभापति श्री दुलारे लाल जी स्वयं थे और उसमें प्रधान मंत्री श्रीमती इन्दिरा गांधी उपस्थित थीं। इस कवि सम्मेलन का संचालन और दायित्व ‘प्रियंका परिवार’ ने ही निभाया था।
    दुलारे लाल जी की जन्म तिथि के इस अवसर पर हम श्रद्धा से उन्हें नमस्कार करते हैं और ‘प्रियंका’ का यह अंक निकालने वालों को हार्दिक बधाई देते हैं।
(लेखक हिन्दी साहित्य सम्मेलन के अध्यक्ष व ‘सरस्वती’ के पूर्व सम्पादक हैं)