Sunday, November 6, 2011

साहित्यिक कतरनें

मार्ग दर्शक दुलारे लाल
सन् 1921 की बात होगी। उन दिनों मैं बम्बई में प्रैक्टिस करता था, तभी  मैंने सम्भवतः पहली कहानी लिखकर दुलारे लाल भार्गव को लखनऊ  भेजी। ‘सुधा’ उन्होंने तब निकाली ही थी, एक दिन मुझे उनका पोस्टकार्ड मिला। लिखा था- आपको यदि नागवार न गुजरे तो हम कहानी का पुरस्कार आपको देना चाहते हैं। पाठक मेरी खुशी का अनुमान न लगा सकेेंगे। यह एक ऐसी आमदनी का सीधा रास्ता खुल रहा था, जिसकी मैंने कभी कल्पना भी नहीं की थी। अब तो मैं इसी में खुश था कि मेरी रचनाएं छप रही है। तब तक मैं ‘प्रताप’ कानपुर में ही लेख भेजता था, पर उसने कभी एक धेला भी पारिश्रमिक नहीं दिया था।   
अतः कार्ड का मैने तुरन्त उत्तर दिया कि- ‘पुरस्कार यदि काट न खाये तो मुझे किसी हालत में उसको भेजा जाना नागवार न गुजरेंगा।’’ कुछ दिन बाद ही 5/- रु0 का मनीआर्डर मिला। उस दिन मैंने सपनिक जश्न मनाया और कई दिन तक उन पांच रुपयों का हम लोगों को नशा-सा रहा।
    उसके बाद ही श्री सहगल ने पहले 2/- फिर 4/- रु0 पृष्ठ का निख मुकर्रिर कर दिया और मेरी कहानियां, मेरी एक आंशिक कमाई का जरिया बन गई। मैंने भी अब कहानी ही लिखने की ओर अपना ध्यान दिया। कुछ वर्षाें में श्री सहगल ने सबसे प्रथम ‘लौह लेखनी का धनी’ नाम से अलंकृत किया।
    (‘मुझे लेखक बनाया मेरे पाठकों ने’ -- आचार्य चर्तुसेन शास्त्री से सभार)
विश्वकवि रवीन्द्रनाथ ठाकुर का अभिनन्दन
विश्व कवि गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर 5 मार्च, 1923 को ‘विश्व भारती’ की स्थापना के लिए आर्थिक सहयोग प्राप्त करने के लिये लखनऊ पद्दारे थे। पं0 दुलारे लाल उन दिनों लखनऊ की साहित्यिक गतिविधियों के सूत्रधार थे। गुरूदेव के प्रति उनके हृदय में असीम श्रद्धा थी। उन्होंने ‘विश्व भारती’ के लिए धन एकत्रित करने में सहयोग दिया। इस सम्बन्ध में ‘माधुरी’ में प्रकाशित टिप्पणी के कुछ अंश यथावत् प्रस्तुत है:-
माधुरी-- वर्ष 1, खंड 2, संख्या 3, मार्च 1923
लखनऊ में डाॅ0 रवीन्द्र नाथ ठाकुर
सर्वमान्य साहित्यरथी स्वनामधन्य श्री रवीन्द्रनाथ ठाकुर महोदय 5 मार्च को लखनऊ पधारे। सायंकाल को आपका एक व्याख्यान हुआ। अपने ‘विश्व भारती’ (बोलपुर के शांति निकेतन में स्थापित संस्था) के लिये चंदे की अपील की। अवध के ताल्लुकेदारों की तरफ से राजा सर रामपाल सिंह जी ने आपको 1000/- की थैली अर्पण की।
    7 मार्च की शाम को श्रीयुत् ए.पी. सेन के बंगले पर कवि-सम्राट का अभिनंदन करने का प्रबंध किया गया। स्थानीय हिन्दी सभा के सदस्य, अनेक बंगाली सज्जन और दर्शक उपस्थित थे, प्रथम, बालिकाओं ने हार-चंदन से कवि-सम्राट की संबर्द्धना की। फिर बालक-बालिकाओं ने ‘स्वागतं, स्वागतं, स्वागतं, हे कवि’’। गान से स्वागत किया। ‘माधुरी’ के ‘हिन्दी सभा’ की ओर से अभिनन्दन पढ़ा। फिर कान्य कुब्ज हाई स्कूल के हेड मास्टर पं0 श्री नारायण चतुर्वेदी एम0ए0 ने एक स्वाग कविता पढ़ी। कवि-सम्राट पहले हिन्दी में और फिर बंगला में बोले ।’’
उर्दू के गढ़ लखनऊ में हिन्दी का प्रवेश
उर्दू साहित्य के गढ़ लखनऊ में हिन्दी साहित्य को प्रविष्ट कराने की ही नहीं, उसे अपनी गरिमा के अनुकूल स्थान दिलाने में दुलारे लाल भार्गव की अविस्मरणीय भूमिका रही है। इसके साथ ही उन्होंने उर्दू-हिन्दी का पूर्ण समन्वय भी रखा। यही कारण है कि ‘माधुरी’ में हिन्दी के साथ ही उर्दू साहित्य पर भी अनेक लेख छपते थे, श्री रघुपति सहाय फिराक गोरखपुरी सहित लखनऊ में भार्गव जी के इर्द-गिर्द युवा साहित्यिकों का जमघट रहता और बाहर से पधारने वाले साहित्यकार तथा साहित्य प्रेमियों का निवास-स्थान दुलारे लाल जी का कवि कुटरी ही था।
    आज कदचित् यह आश्चर्यजनक लगे कि आकाशवाणी जब लखनऊ में संस्थापित हुई, तो उसमंे हिन्दी के साहित्यिक कार्यक्रमों की श्रृंखला भार्गव जी ने प्रारंभ की। लखनऊ विश्वविद्यलाय में हिन्दी संस्थापित हुई, तो उसमें हिन्दी के साहित्यक कार्यक्रमों की श्रृंखला भार्गव जी ने प्रारंभ की। लखनऊ विश्वविद्यालय में हिन्दी विभाग की स्थापना के लिए दुलारे लाल जी ने अथक सक्रिय एवं सफल प्रयास किया। व्यक्तिगत स्तर पर ‘माधुरी’ में तर्कपूर्ण लेख प्रकाशित करके उन्होंने इस जनपयोगी कार्य को पूर्ण किया। ये सारे लेख एक स्थान पर एकत्रित किए जाएं। तो लखनऊ विश्वविद्यालय में हिन्दी विभाग का इतिहास स्वतः स्पष्ट हो जायगा किस प्रकार भार्गव जी के सुतर्काें के समक्ष विश्वविद्यालय-प्रशासन को झुकना पड़ा। फिलहाल एक समाचार ‘माधुरी’ के वर्ष 3 खंड 1 संख्या 4 मंे छपा प्रस्तुत किया जा रहा है:-
    ‘‘जब से यह विश्वविद्यालय खुला है तभी से बी0ए0 परीक्षा के लिए हिन्दी, उर्दू, बंगला या मराठी में एक परीक्षा पास कर लेना प्रत्येक विद्यार्थी के लिए अनिवार्य है, परन्तु भारत के अन्य प्रधान विश्वविद्यालयों के समान बी0ए0 की परीक्षा में इतिहास, अर्थशास्त्र, अंग्रेजी, गणित, संस्कृति इत्यादि के समान हिन्दी या उर्दू को एक स्वतंत्र विषय के रूप में अभी तक नहीं रखा गया। कलकत्ता, बनारस, और प्रयाग के विश्वविद्यालयों में तो हिन्दी में एम0ए0 की डिग्री तक प्राप्त की जा सकती है। लखनऊ विश्वविद्यालय की यह कमी यहां के हिन्दी प्रेमी सज्जनों को पहले ही से खटकती थी। इस वर्ष मार्च में इस विश्वविद्यालय के कोर्ट के अधिवेशन में पं0 ब्रजनाथ जी शर्मा ने यह प्रस्ताव उपस्थित किया कि बी0ए0 में हिन्दी और उर्दू भी स्वतंत्र विषय के रूप में हो। इसके समर्थन में उन्होंने एक सारगर्भित, भाषण दिया। कुछ सज्जनों के भाषणों के बाद एक पादरी साहब ने इस प्रस्ताव का बड़े जोरदार शब्दों में समर्थन किया। उसका इतना असर हुआ कि शर्मा जी का प्रस्ताव सर्वसम्मति से स्वीकृत हुआ। यह प्रस्ताव एक सिफारिश के तौर पर था। उसका यहां के आर्ट्स फैकल्टी और एकेडेमिक कौंसिल में पास होना आवश्यक था। इस वर्ष वह इन दोनों सभाओं में भी पास हो गया और आगामी वर्ष से बी0ए0 की परीक्षा के लिए हिन्दी और उर्दू भी ‘स्वतंत्र विषय होंगे। इस सम्बन्ध में एक उल्लेखनीय बात है यह प्रस्ताव पास कराने में सुदूर मद्रास-प्रांत के रहने वाले प्रोफेसर शेषाद्री और डाॅ0 बी0एस0 राम ने बड़ा परिश्रम किया। इनका हिन्दी-प्रेम सराहने योग्य है। हमें लज्जा के साथ यह स्वीकार करना पड़ता है कि इन्हीं सभाओं के कुछ अन्य भारतीय सदस्य ऐसे भी थे, जिन्होंने इस प्रस्ताव के समर्थन में भाषण देना तो दूर रहा, उसके पक्ष में आपना मत तक नहीं दिया। क्या हम आशा कर सकते हैं कि शीघ्र ही लखनऊ विश्वविद्यालय में हिन्दी एम0ए0 की परीक्षा के लिए भी एक स्वतंत्र विषय के रूप में रखी जायेगी।’’
    इस संदर्भ में यह भी लिखना समीचीन और उपयुक्त होगा कि दुलारे लाल जी के पश्चातवर्ती परिश्रम से तत्कालीन संस्कृत विभागाध्यक्ष (बाद में उपकुलपति) डाॅ0 सुबzहमण्यम् ने विषय को स्वतंत्र रूपेण संस्कृत विभाग का ही एक अंग बनाना स्वीकार किया। इस प्रकार हिंदी का लखनऊ विश्वविद्यालय में प्रवेश हुआ और भार्गव जी के अनन्य मित्र श्री बद्रीनाथ भट्ट सर्वप्रथम हिन्दी के प्रथम प्राध्यापक नियुक्त हुए।

‘वाग्देवी के दुलारे लाल’

बसन्त लाल ‘विशेष’
‘जाने बिनु न होय परतीती, बिन परतीति होय नहिं प्रीती’
बिना प्रदर्शन (परिचय) के प्रभाव नहीं होता, लोग मजाक बनाते हैं। हमारी बातों को अतिश्योक्ति मान लेते हैं। इसीलिए कहना ही पड़ता है-
ललकत ललचत लाल की, लखन लालिमा लाल।
गंगा पुस्तक माल, सुधा-माधुरी, चाकरी करी दुलारे लाल।

भार्गव जी विशिष्ट साहित्यकारों की नजर में -
बाबू जगन्नाथ दास ‘रत्नाकर’
‘माधुरी’ तथा ‘गंगा’ पुस्तक माला’ के संपादक, हमारे मित्र श्री दुलारे लाल जी भार्गव ने ‘बिहारी रत्नाकर’ को प्रकाशित करने में बड़ा उत्साह प्रदर्शित किया और इसके संशोधन में बहुत बड़ी सहायता दी।
पं0 कृष्ण बिहारी मिश्र -मिश्रबंधु’
आपसे हिन्दी का उपकार हुआ और हो रहा है। वैसा भारतेन्दु हरिश्चंद्र के पश्चात केवल इने-गिने महानुभावों द्वारा हो सका है। आशा है कि आगे चलकर आप हिंदी का विशेष हित कर सकेंगे। ‘दुलारे-दोहावली’ आपकी उत्तम तथा श्रेष्ठ कृति है।
आचार्य महाबीर प्रसाद द्विवेदी
बहुत-सी महत्वपूर्ण तथा मनोरंजक पुस्तकें ‘गंगा पुस्तक माला’ के माध्यम से प्रकाशित कर हिंदी साहित्य की अभिवृद्धि में विशेष सहायक हुए। उनके पुस्तक प्रकाशन का यह क्रम यदि इसी तरह चलता रहा तो निश्चय ही भविष्य में यह अभिवृद्धि अधिकाधिक होगी।
महाकवि सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’
लखनऊ जैसे उर्दू के गढ़ में हिंदी का विशाल स्वरूप समक्ष रखकर जन-जागरण की रूचि बदलने में दुलारे लाल जी अग्रणी है। उनकी हिंदी सेवाओं का मूल्य निर्धारित करना मेरी शक्ति से परे है। यह कोई साधारण बात नहीं है।
शेक्सपियर की शैली में कोई जन्मजात महान होते हैं और महत्ता के भारवाहक बना दिए जाते हैं।
ैवउम ंतम इवतद हतमंजए ैवउम ंबीपअम हतमंजदमेे ंदक ैवउम ींअम हतमंजदमेे जीतनेज नचवद जीमउण्श्   
भार्गव जी कुशल, कुशाग्र कलाकार तुल्य उन आलोचकों से प्रंशसा पाने को अधीर हो उठते थे, जो हर किसी की रचना पर श्लाधा के पुल नहीं बांधता। जैसे- डाॅ. रामचन्द्र शुल्क, आचार्य चतुरसेन शास्त्री, मिश्रबंधु, आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी, बाबू जगन्नाथ दास ‘रत्नाकर’, पं0 अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’, डाॅ. राम शंकर शुक्ल ‘रसाल’, पं0 नाथू राम शंकर शर्मा ‘शंकर’, डाॅ0 गंगानाथ झाॅ, डाॅ0 धीरेन्द्र वर्मा, फिराक गोरखपुरी आदि।
    नीति काय कला के क्षेत्र में स्वस्थ विचारों को भार्गव जी विशेष महत्व देते थे। उन्हीं के शब्दों में -Highest quality not in quantity
‘अधिक चले जो बीर न होई’
महाकवि निराला ने लिखा है- आप थोड़ा, किंतु अच्छा लिखने की नीति के कायल हैं।
‘पर-हित सरिस धर्म नाहिं’
विचारों से भार्गव जी हिन्दी तथा जनमानस की सेवा निरन्तर 68 वर्षों तक अटूट मनोबल के संग करते रहे। कहते थें यह हमारा कत्र्तव्य है, इससे हमें आनन्द मिलता है कि लोग हमसे फायदा उठाकर लाभ लें। हमारे नाम सम्बन्धों, सम्पर्काें से उपयुक्त लाभान्वित हो सके।
‘बिना अध्ययन जीवन शून्य है’
    काम कम हो या न हो, तो मनोवैज्ञानिक या आध्यात्मिक ग्रंथों का अध्ययन कर, उनके उच्च विचारों व आदर्शो को अर्जित करो।
    वे अपनी बातों को जोरदार शब्दों में बार-बार कहते थे। उनका कहना था- ‘सुन लो, समझ लो समझाने की पद्धति यदि पक्ष में हो, हितकर हो। अवश्य ग्रहण करो अन्यथा विचार कर त्याग दो अवश्य कुछ न कुछ शिक्षात्मक या प्रेरणाप्रद रहेगी।
‘सादा जीवन उच्च विचार’
जीवन का परम लक्ष्य था, जो उनकी दिनचर्याओं से सहज ही मिलता है। 78 वर्ष की आयु में 8-10 घण्टे नित्य साइकिल चलाना, बिना ऐनक अध्यवसाय करना तथा निरोगी रहना आदि। जीवन के अंतिम दौर में वे एक पुष्ट साहित्य ‘ब्रजभाषा रामायण’ जनमानस को भेंट करना चाहते थे। हार्दिक अभिलाषा साधनों की तंगी, मानसिक परेशानी तथा पारिवारिक गृह-विवाद के मध्य उलझ कर अपूर्ण रह गई।
जीवन का स्वर्णिम शिखरः भार्गव जी के जीवन में 22 से 44 वर्ष की अवस्था की अवधि स्वर्णिम थी। इसी मध्य उन्होंने सभी ऐतिहासिक  महत्वपूर्ण कार्य किए तथा साहित्य की विशिष्ट सेवा कर जनमानस को असमंजस में डाल दिया। जिससे वह समकक्ष साहित्यिकों, व्यवसायिकों में प्रतिस्पर्धा के स्रोत बने। यही नहीं छिद्रान्वेषी लोगों ने तरह-तरह के आरोप उन पर लगाये।
प्रकाशन के दौरान लेखकों, कवियों को प्रोत्साहन: प्रसिद्ध साहित्यकार अमृत लाल नागर ‘धर्मयुग’ के एक लेख में लिखते हैं कि निराला के खर्चों की कोई सीमा न थी। वे बहुत ही उदार प्रकृति थे, अपने खर्चों की चिन्ता न करते थे।
अंतिम जीवन के दौर, सामिप्य का एक संक्षिप्त परिचय: उन्हीं की मधुर वाणी में ‘जाने क्या बात है? सुबह 9 से 11 के मध्य नींद काफी आती है। सुस्ती आती है। ऐसा ही चतुरसेन शास्त्री के साथ भी होता था, उन्हें भी इसी वक्त नींद आती थी यद्यपि वे काफी जल्द कम उम्र 68 वर्षों में परलोक सिधारे।
    महात्मा गांधी भी बीच-बीच काम करते-करते जब थक जाते, सो जाया करते थे। ऐसा शयद थकान की वजह से होता था। ठीक उसी तरह 77-78 वर्षों में हमे भी जब थकान अनुभव होती है, या बढ़ जाती है। तो अक्सर बैठे-बैठे नींद आ जाती है। 5 मिनट (थोड़ी देर) के लिए सो लिया करता हूँ। जिससे काफी शिथिलता भी दूर होती है।
        क्या पता था? उनकी वाणी में अटूट सत्यता है, यद्यपि वे 22 वर्ष, और जीना चाहते थे। निश्चय ही वे जीवन की कलह से विक्षिप्त हो थककर टूट गए। एक युग को अपने साथ ले गए वह था- ‘दुलारे-युग’
डाॅ0 पीताम्बर दत्त बड़थ्वाल के शब्दों में-- ‘आप सचमुच बाग्देवी के दुलारे लाल है। ऐसे मानीषी युगप्रवर्तक के चरणांें में श्रद्धा-सुमन अर्पित हैं।

उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचंद के पथ-प्रदर्शक

बंसतलाल
    हिन्दी जगत् में लोगों का प्रलाप है कि भार्गव जी ने साहित्यकारों का शोषण किया तथा परिवारी जनों के साथ अत्याचार किया। कुछ प्रमाण इन अनर्गल आरोपों को असत्य सिद्ध करेंगे तथा भार्गव जी के साहित्यकारों के पोषक होने का प्रमाण देंगे।
उपन्यास-सम्राट मुंशी प्रेमचंद के पत्रों के संग्रह सन् 1930 द्वारा प्रमाणित होता है -
1.    रंगभूमि के लिए 1800/ रु0 दुलारे लाल जी ने दिये और संग्रहों के लिए सौ दो सौ मिल गये।
2. ‘काया-कल्प’, ‘आजाद-कथा’, ‘प्रेमतीर्थ, ‘प्रेम-प्रतिमा’, ‘प्रतिज्ञा’ मैने खुद छापी पर अभी तक मुश्किल से 600/ रु0 वसूल हुए हैं और प्रतियाँ पड़ी हुई हैं।
3.    फुटकल आमदनी लेखों से शायद 25/ रु0 माहवार हो जाती है; मगर कभी इतनी भी नहीं होती। मैं अब इस ओर ‘माधुरी’ के सिवा कहीं लिखता ही नहीं।
4. 800/रु0 में रंगभूमि और प्रेमाश्रम का अनुवाद दे दिया था। कोई छापनेवाला न मिलता था।
प्रेमचन्द पर किये गये आक्षेपों का निराकरण

मुंशी जी की रंगभूमि तथा थैंकरे के ‘वैनिटी फेयर’ के साम्य को श्री अवध उपाध्याय ने सरस्वती के सन् 26 के अंकों में ‘गणित के समीकरणों, द्वारा प्रमाणित करने की चेष्ट की थी। प्रेमचन्द्र ने ‘अपनी सफाई’ में इसका स्पष्टीकरण स्वयं कर दिया था। फिर भी वह लेखमाला निकलती ही रही थी। बाद में, श्री रुद नारायण अग्रवाल ने एक विस्तृत लेख द्वारा श्री उपाध्याय के आरोपों का पूर्णतः खंडन किया था।
    उपाध्याय जी के आरोप
1.    एक से अधिक नायक-नायिकाओं का समावेश।
2.    वैनिटी-फेयर की अमेलिया, रंगभूमि की सोफिया से, जिसमें कुछ भाग ‘वैनिटी फेयर’ के दूसरे नारी पात्र रेबेका का भी है, काफी मिलती-जुलती है।
3.    रेबेका का, संभवतः सोफिया के साम्य से बचे हुए अंश का, इंदु के साथ साम्य है।
4.    जार्ज आसवर्न का विनय से साम्य है।
श्रीमती गीतालाल एम0ए0पी0एच0डी0:
रंगभूमि पर थैकरे के ‘वैनिटी फेयर’ का प्रभाव उसके नाम के चुनाव अथवा विस्तृत पट की दृष्टि से पड़ा है। पर नारी पात्र्रों पर तो अवश्य नहीं है।
    इसी प्रकार एक लेख से शिलीमुख ने प्रेमचन्द्र की ‘विश्वास’ कहानी को हालकेन के ‘एटर्नल सिटी’ पर पूर्णतः अवलम्बित बताया था (सुद्दा 10/27), यह कहानी पहले ‘चांद’ में छपवायी थी। फिर ‘प्रेम-प्रमोद’ नाम कहानी-संग्रह में उसने पहली कहानी का स्थान पाया, शिलीमुख का कहना था कि ‘एटर्नल सिटी’ एक उपान्यास है और ‘विश्वास’ एक कहानी, इसलिए प्रेमचंद की रचना उस पर अवलम्बित होने पर भी तर्कयुक्त और संगत नहीं हो सकी है, बल्कि विकृत और अविश्वास हो गई है। इस लेख के साथ ही ‘प्रेमचंद जी का प्रतिवाद’ शीर्षक से, सुधा-संपादक श्री दुलारे लाल भार्गव के नाम, प्रेमचंद का पत्र भी छपा था। उन्होंने ‘शिलीमुख’ के आरोपों को इन शब्दों में स्वीकार किया था।
    ‘‘प्रिय दुलारे लाल जी!
    हमारे मित्र पं0 अवध उपाध्याय तो ‘कायाकल्प’ को ‘एटर्नल सिटी’ पर आधारित बता रहे थे। मि0 शिलीमुख ने उनको बहुत अच्छा जवाब दे दिया। मैं अपने सभी मित्रों से कह चुका हूं कि ‘विश्वास’ केवल हालकेन रचित ‘एटर्नल सिटी’ के उस अंक की छाया है। जो वह पुस्तक पढ़ने के बाद मेरे हृदय पर अंकित हो गया।... छिपाने की जरूरत न थी और न है। मेरे प्लाट में ‘एटर्नल सिटी’ से बहुत कुछ परिवर्तन हो गया, इसलिए मैंने अपनी भूलों और कोताहियों को हालकेन जैसे संसार-प्रसिद्ध लेखक के गले मढ़ना उचित न समझा। अगर मेरी कहानी ‘एटर्नल सिटी’ का अनुवाद, रुपांतर या संक्षेप होती, तो मैं बड़े गर्व से हालकेन को अपना प्रेरक स्वीकार करता। पर ‘एटर्नल सिटी’ का प्लाट मेरे मस्तिष्क में आकर न जाने कितना विकृत हो गया है। ऐसी दशा में मेरे लिए हालकेन को कलंकित करना क्या श्रेयकर होता?.... फिर भी मेरी कहानी में बहुत कुछ अंश मेरा है, चाहे वह रेशम में टाट का जोड़ ही क्यों न हो?- ‘प्रेमचंद’

    साहित्यकाराों के आरोप-प्रत्यारोप को साहित्य का कीचड़ करार कर वास्तविकता को भार्गव जी ने सन् 1924-25 में परखा उचित दाम व गर्व के साथ सम्मानित कर ‘रंगभूमि’ ‘काया-कल्प’ जैसे सशक्त उपन्यासों को हिन्दी जगत की अमूल्य निधि बनाया। इतना ही नहीं मुंशी जी के अन्य उपन्यासों का भी यथावत् महत्वपूर्ण प्रकाशन व सम्पादन, गंगा पुस्तक माला के माध्यम से किया तथा ‘सुधा’, ‘माधुरी’ मासिकों में महत्वपूर्ण स्थान देकर उच्चतम कोटि ‘उपन्यास सम्राट’ घोषित कराने की प्रमुख पहल की, इसे नकारा नहीं जा सकता-

प्रेमचन्द से मेरी पहली भेंट - दुलारे लाल जी भार्गव
प्रेमचन्द्र ने हमें लिखा ‘हमारे पास जरिया मास नहीं है।’
    यद्यपि इससे पूर्व वे उर्दू तथा गल्प लिखा करते थे। उनका प्रारम्भ में एक ‘सोजेवतन’ विद्रोहात्मक उपन्यास छप चुका था। जमाना-सम्पादक दयानारायन निगम से निकटस्थ थे, परन्तु 1923 के मध्य काफी अस्त-व्यस्त थे।
    हमने उन्हें लखनऊ आने तथा गंगा पुस्तक माला के सम्पादक-मंडल में शामिल होने का आमंत्रण दे दिया। अतिशीघ्र वे लखनऊ आकर मुझसे मिले। मैंने उन्हें कुछ काम देने हेतु ‘बाल-विनोद-वाटिका’ का सम्पादक नियुक्त किया तथा रहने हेतु मेक्सवेल प्रेस, लाटूश रोड की इमारत के पीछे हिस्से, जिसे अपने प्रेस हेतु ले रक्खा था। अस्थाई रूप से 60 रु0 मासिक पर प्रबंध कर दिया। काफी समय प्रारंभ में वे वहीं रहे, फिर गणेशगंज चले गये।
    ‘बाल विनोद वाटिका’ के अन्तर्गत काफी उच्चकोटि का बालोपयोगी साहित्य निकलता था। इसके अतिरिक्त भी प्रसिद्व काव्य मर्मज्ञों विद्वानों के साहित्य का सम्पादन तथा ‘सुधा’ सम्पादन कार्य में भी हमें सहयोग दिया। वे केवल हमसे 100/- मासिक लिया करते थे। सन् 24-25 में करीब दो वर्ष हमारे साथ रहे। सन् 24 में ही हमने उनकी सर्वोत्कृष्ट कृति रंगभूमि भी छापी। वे लिखते तो अच्छा थे, भाषा गलत होती थी। हिन्दी-उर्दू मिश्रित, उसे शुद्ध कर देता था। हर बात की काफी इतिवृत्तात्मक और शुलभ शैली में लिखते थे, जिनका जन-साधारण पर प्रभाव पड़ा।
    इसके बाद वे सन् 25 के अंत में बनारस चले गये थे। अधिक पैसा मिलने से फिर सन् 27 में ‘माधुरी’ में आ गये। 3-4 वर्ष, सन 30 तक वहां कार्यरत रहे। अधिक पैसे का सदुपयोग न कर सके। बाद में उन्हें मदिरा आदि का शौक हो गया था, यद्यपि वे कभी मेरे सामने न पीते थे। जबकि निराला, सामने ही खोलकर पीने में मशगूल हो जाते थे। वे आदर के पात्र थे। ‘माधुरी’ कार्यालय में तो वे समय पर नित्य 10 बजे प्रातः आ जाते थे। यही स्थिति पं0 कृष्ण बिहारी की भी थी कि वे कार्यालय काम पर 10 बजे नित्य ही आ जाते थे। जबकि पं. रूपनारायण पाण्डेय जी का कोई समय निश्चित न था। कभी 12 बजे आते थे, तो कभी 1-2 बजे।
    मैंने सुना है कि प्रेमचन्द फिल्म में 700) रु0 मासिक कमाते थे। सन् 37 सितम्बर में हमारे पास आए थे। जैसा उन्होंने हमारे चित्रकार हकीम मोहम्मद खां को बताया- भार्गव जी के पास मैं यहां इलाज कराने आया था। पर वे नहीं हैं, नहीं तो कुछ सहूलियत मिलती।’ अतएव वे 32 नं0 में चित्रकार महोदय के साथ ही ठहरे। फिर मोहन लाल सक्सेना, जो उस समय प्रमुख राजनीतिक थे, से मिले। उन्होंने मदद से इन्कार कर दिया, कहा- मैं इस तरह की उलझन में पड़ना नहीं चाहता। बाद में यहां से जाकर 8 जुलाई को उनका स्वर्गवास हो गया- जिसका निश्चय ही हमको मालूम पड़ने पर बेहद सदमा सा रहा कि हमारा एक महकता सितारा हमसे दूर हो गया। हम मदद कर भी सहयोगी न बन सके।
    उन्हें शिखर पर पहुंचाने का श्रेय ‘सुधा’, ‘माधुरी’ परिवार तथा उर्दू में जमाना-सम्पादक दयानरायन निगम को है। प्रेमचन्द ने यह स्वीकारा है कि ‘हंस’ और ‘जागरण’ के प्रकाशन से हमें दो-सौ मासिक का घाटा होता रहा है।

अभिनव बिहारी श्री दुलारे लाल भार्गव

राम प्रकाश वरमा
    ब्रजभाषा सैकड़ों वर्षों तक अधिकांश भारतवर्ष की राष्ट्रभाषा और काव्य भाषा के पद पर सिंहासनारूढ़ रही है। इस भाषा में सूर, बिहारी, देव आदि अनेक कवियों ने अपनी रचनाएं लिखकर इसे इतना परिपूर्ण बना दिया है कि इसे शिक्षित वर्ग द्वारा बहिष्कृत करने पर अपमान का बोध होता है। आधुनिक काल में हमने खड़ी बोली को (स्टैन्डर्ड) मर्यादित भाषा मान लिया है, और इसका विस्तार हरिऔध, पंत, गुप्त आदि अनन्य कवियों ने किया है। परन्तु ब्रजभाषा का सर्वथा परित्याग प्राचीन हिन्दी काव्य-ग्रन्थों का परित्याग होगा। आधुनिक काव्य में सनेही जी, रत्नाकर जी, सिरसजी, उमेश जी तथा पं0 दुलारे लाल जी आदि कवियों ने अपनी रचनाओं से अलंकृत करके ब्रजभाषा को मृतप्राय होने से उबार लिया है। परन्तु खेद के साथ यह कहना पड़ता है कि आज अनेक व्यक्ति हिन्दी साहित्य से ही विमुख होते जा रहे हैं। अश्लील साहित्य का प्रचार-प्रसार बढ़ता जा रहा है। ऐसे ही कुछ व्यक्तियों ने धारणा बना ली है कि हिन्दी भाषा अन्य भाषाओं से तुच्छ है। ये लोग न तो हिन्दी साहित्य का अध्ययन करना चाहते हैं और न हिन्दी साहित्य विशारदों और विद्वानों से उसके विषय में जानकारी प्राप्त करते हैं। आज अधिकांश व्यक्ति पढ़ लिखकर उच्च पद पर आसीन होना चाहते हैं। अपना देश क्या है? अपनी भाषा क्या है? इससे उन्हें कोई सरोकार नहीं।
    किसी देश या जाति को जीवित रखने में भाषा और साहित्य कहां तक सहायक है, इसे जानने के लिए हिन्दी के प्राचीन साहित्य का अध्ययन आवश्यक है। हिन्दी के समान विशाल साहित्य अन्य प्रान्तीय भाषाओं में होना दुर्लभ हैं क्योंकि इसमें ही तो हिन्दू-जाति के गत 900 वर्षों के उत्थान तथा पतन का भावनामय वर्णन अंकित है।
    ब्रजभाषा हिन्दी की प्रधान शाखा है, और इसी में हिन्दी का गौरवपूर्ण साहित्य है। इसी भाषा में अनेकानेक महाकाव्य हैं, जो सर्वथा प्रसंशनीय हैं। इनमें सैकड़ों विद्वान और प्रतिभाशाली महाकवि हुए हैं, मीरा, सूर, केशव, मतिराम, बिहारी, रहीमदास, सेनापति और हरिश्चन्द्र आदि। कवि बिहारी लाल हिन्दी संसार के सर्वश्रेष्ठ कलाकार हैं, ‘बिहारी सत्सई’ लिखकर अटल कीर्ति उपलब्ध की है।
    दोहा हिन्दी जगत में इतना प्रचलित रहा है कि कभी-कभी अपढ़ स्त्रियों, निरक्षर कृषकों के मुख से सुना गया है। सतसई के दोहों तथा तुलसी कृत रामायण के विषय में कहा जाता रहा है कि ऐसी कृति आगे सम्भव न होगी। परन्तु आधुनिक हिन्दी काव्य सर्जक ‘माधुरी’, ‘सुधा’ के सम्पादक स्व0 आचार्य पं0 दुलारे लाल जी भार्गव द्वारा रचित ‘दुलारे दोहावली’ बिहारी सतसई के टक्कर की 1932 में बताई जा चुकी हैं। लोगों की द्दारणा मिथ्या साबित हो चुकी है। उसकी कुछ बानगी यहां प्रस्तुत है:-
तिय-रतननि हीरा यहै, यह सांचै ही सौर।
जेती उज्जल देहि-दुति, तेतो हियो कठोर।।
हरी-हरी प्रिय बंसरी, बहरावति बर-बैन।
हामी भरि नाहीं करति, हंसति तरेरति नैन।।

    उपर्युक्त उदाहरणों से स्पष्ट हो जाता है, दोहावली में श्रेष्ठ और गम्भीर वर्णनों का आगार है। ‘दुलारे-दोहावली’ के कुछ दोहे तो ‘बिहारी-सतसई’ से भी बढ़कर हैं। इसका ज्ञान, ओरछा नरेश की ओर से प्रदान किये गये प्रथम देव-पुरस्कार (अयोध्या सिंह जी उपाध्याय ‘हरि-औद्य’ द्वारा रचित ‘प्रिय-प्रवास’ के टक्कर में) से होता है।
    काव्य-मर्मज्ञों एवं हिन्दी विद्वानों ने आपको अभिनव बिहारी तक की पदवी दे डाली है। कुछ एक ने तो ‘बिहारी लाल’ तथा ‘दुलारे लाल’ नामों की मात्रा तथा अक्षर की समता को देखकर कह डाला कि सम्भवतः बिहारी का ही पुर्नजन्म श्री दुलारे लाल जी हों।
    राजघराने में पैदा हुए इस लाडले लाल को विज्ञान का बड़ा शौक था। दादा की अभिलाषा थी कि पौत्र आई0सी0एस0 होकर बड़ा अधिकारी बने। पिता की इच्छा थी पुत्र विलायत जाकर विज्ञान का स्नातक होकर लौटे। पर हिन्दी के इस सपूत से तो हिन्दी की सेवा सुनिश्चित थी।
    पं0 दुलारे लाल जी भार्गव का जन्म सम्वत् 1956, नवल किशोर रेजीडेन्स, महात्मा गांधी रोड, लखनऊ में बसंत पंचमी के शुभ-दिन हुआ था। आप स्व0 श्रीमान प्यारे लाल जी भार्गव के ज्येष्ठ पुत्र थे। आपका लालन-पालन धनी-मानी स्व0 मुशी नवल किशोर जी सी0आई0ई0 के यहाँ ही हुआ था। आप प्रतिभाशाली विद्यार्थी रहे। अंग्रेजी में प्रान्त भर में प्रथम आने पर नेस्फील्ड स्कालरशिप मिला। आपका विवाह श्री फूलचन्द जी भार्गव, एक्स्ट्रा असिस्टेन्ट कमिश्नर की सुपुत्री श्रीमती गंगा देवी से 15 वर्ष की अल्प आयु में ही हो गया था। पत्नी का साथ अल्प समय ही रहा था।
    हिन्दी सेवा व्रतधारी सरस्वती पुत्र ने अपने प्रिय मित्र और चाचा श्री विष्णु नारायण जी भार्गव के सहयोग से ‘माधुरी’ निकाली। उसी समय से हिन्दी साहित्य में आश्चर्यजनक परिवर्तन हुआ। जिसका श्रेय आचार्य पं0 दुलारे लाल जी भार्गव को है। ‘माधुरी’ को योग्य हाथों में सौंप कर हिन्दी के इस महारथी ने ‘सुधा’ मासिक पत्रिका को जन्म दिया। यह पत्रिका हिन्दी संसार में अग्रगण्य रही। उस समय ‘सरस्वती’ की हालत नाजुक हो चुकी थी। इसे श्री पदुमलाल पुन्नालाल  जी बख्शी (1920-21 ई0 के ‘सरस्वती’ सम्पादक) ने स्वयं स्वीकार किया। ‘माधुरी’ और ‘सुधा’ के माध्यम से आप महिला लेखिकाओं को प्रोत्साहन देते रहे। नये लेखकों को प्रोत्साहन देकर बढ़ावा देते रहे। जहां स्वयं हिन्दी की सेवा की वहां दूसरों को भी प्रेरित करते रहे, इतनी सेवा अन्यत्र दुर्लभ है। आपका ही एक दोहा सेवा के विषय में उदाहरणार्थ प्रस्तुत है:...
सेवा ही संसार में सब सुख, स्रोत-सुजान, सेइ भानुकुल-भानु-पद भे हनुमान महान।
सेवा ही उनके जीवन का एक अभिन्न अंग बन गई, आखिरी सांसों तक वे हिन्दी की सेवा तथा जन-मानस की सेवा में लीन रहे। हिन्दी साहित्य का ऐसा सच्चा हितैषी बिरले लोगों में ही मिलेगा।
    हिन्दी पुत्र के चरणों में हमारे श्रद्धा-सुमन अर्पित है।

भारतीय प्रकाशन-व्यवसाय के कीर्ति-स्तम्भ दुलारे लाल भार्गव

श्री क्षेमचन्द्र ‘सुमन’
प्रथम ‘देव पुरस्कार-विजेता’ एवं हिन्दी के मूर्धन्य प्रकाशक श्री दुलारे लाल भार्गव हमको छोड़कर 6 सितम्बर 75 को चले गए, विश्वास नहीं होता। हिन्दी साहित्य में इतना बड़ी दुर्घटना हो गई और कहीं भी कोई हलचल या चहल-पहल नहीं। न तो कहीं कोई शोक सभा हुई और न किसी हिन्दी पत्र-पत्रिका में यह समाचार ही छपा। कितनें कृतघ्न हैं हम कि जिस व्यकित ने ‘हिन्दी साहित्य’ को विश्व साहित्य के मंच पर प्रतिष्ठित करने का गौरव और यश प्रदान किया, उसके चले जाने पर भी ज्यों-के-त्यों अपने कार्य-व्यापार में इस प्रकार संलग्न रहे, मानो कुछ हुआ ही नहीं।
    सरस्वती के पावन मन्दिर में इतनी बड़ी दुर्घटना से कहीं तो कोई हलचल हुई होती। जिस व्यक्ति ने ‘माधुरी’ और ‘सुधा’ पत्रिकाओं के माध्यम से हिन्दी की साहित्यिक पत्रिकाओं के सम्पादन का नया मानदंड स्थापित किया, जिसने ‘गंगा पुस्तक-माला’ की स्थापना करके हिन्दी-प्रकाशन की दिशा में एक अभूतपूर्व क्रांति की, जिसने हिन्दी मुद्रण क्षेत्र में अपने, गंगा-फाइन आर्ट प्रेस’ से ऐसी-ऐसी मुद्रित पुस्तकें निकाली, जिन्हें देखकर आज भी आश्चर्य तथा कौतूहल होता है; उस दिवंगत आत्मा की स्मृति में दो आँसू भी न बहा सके, विडम्बना ही तो है। जब हिन्दी के लेखक स्वयं पैसा लगाकर अपनी रचनाओं का मुद्रण और प्रकाशन करवाने के लिए लालयित घूमा करते थे, तब श्री दुलारे लाल भार्गव ने उनमें यह चेतना जागृत की थी कि लेखन से भी मनुष्य अपनी आजीविका चला सकता है।
    आज यह कल्पनातीत लगेगा कि सन् 1928 में भी कोई प्रकाशक किसी लेखक को 2100 रु0 की राशि उसकी एक रचना पर दे सकता था। आज इस राशि का मूल्य आँकें तो वह एक लाख से अधिक का बैठेगा। श्री भार्गव जी ने यह साहसिक पहल करके उपन्यास-सम्राट मुंशी प्रेमचन्द का ‘रंगभूमि’ नामक विशालकाय (लगभग 900 पृष्ठ) उपन्यास दो भागों में प्रकाशित किया और प्रत्येक भाग का मूल्य केवल 2.50 रु0 रखा। प्रेमचन्द जी का हिन्दी में मूलतः लिखा हुआ कदाचित यह पहला ही उपन्यास था।
    हिन्दी-जगत को श्री भार्गव जी का आभार मानना चाहिए कि उन्होंने उसे प्रेमचन्द्र जैसा उपन्यासकार दिया। प्रेमचन्द्र ही क्या, यदि भागर्व जी ‘गंगा-पुस्तक-माला’ द्वारा प्रकाशन का यह साहसिक अभियान न छेड़ते, तो आज हिन्दी को श्री वृन्दावन-लाल वर्मा, भगवती चरण वर्मा, विश्वम्भर नाथ शर्मा, चतुरसेन शास्त्री, गोविन्द बल्लभ पंत, सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’, रूप नारायण पांडेय, बेचन शर्मा ‘उग्र’, बदरी नाथ भट्ट, प्रताप नारायण श्रीवास्तव और चण्डी प्रसाद ‘हृदयेश’ जैसे उपन्यासकार, नाटककार, कवि और कथाकार  कैसे प्राप्त होते? यहां तक कि पुराने साहित्यकारों में बालकृष्ण भट्ट, महावीर प्रसाद द्विवेदी, श्रीधर पाठक, कृष्ण बिहारी मिश्र और ज्वालादत्त शर्मा प्रभूति की अनेक रचनाएं प्रकाशित करने के साथ-साथ उन्होंने समस्त प्राचीन काव्य-साहित्य को सुमुद्रित करके हिन्दी में उपलब्ध करवाया। उस समय की उनके द्वारा प्रकाशित ‘मिश्र बंधु विनोद’, ‘हिन्दी-नवरत्न’, और ‘सुकिव-संकीर्तन’, आदि पुस्तकें पाठकों की साहित्यिक जानकारी बढ़ाने में ‘संदर्भ’ का कार्य करती है। आचार्य चतुरसेन शास्त्री द्वारा लिखित ‘आरोग्य-शास्त्र’ नामक विशालकाय ग्रंथ को प्रकाशित करना भार्गव जी जैसे उत्साही व्यक्ति के ही बूते की बात थी। वह ग्रंथ मुद्रण, साज-सज्जा और सामग्री की दृष्टि से आज भी अपना सानी नहीं रखता।
    भार्गव जी जैसे उदार, मिशनरी तथा सतर्क प्रकाशक यदि हिन्दी में दो-चार और भी होते तो आज हमारी भाषा और साहित्य की दशा कुछ और ही होती। महाकवि सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ जैसे अभूतपूर्व प्रतिभा के धनी साहित्यकार को हिन्दी में प्रतिष्ठित करना भार्गव जी का ही काम है। ‘निराला’ जी की ‘तुम और मैं’ तथा ‘जूही की कली’ आदि रचनाएं ‘माधुरी’ के प्रथम पृष्ठ पर भार्गव जी ने ही छापी थीं। ‘निराला जी’ का पहला कहानी संग्रह ‘लिली’ और सबसे पहला उपन्यास ‘अप्सरा’ भी उन्होंने ही अपनी ‘गंगा पुस्तक माला’ की ओर से प्रकाशित किया था। उन्होने सर्वश्री वृन्दावन लाल वर्मा के ‘कुण्डली-चक्र’ और विश्वम्भर नाथ शर्मा कौशिक के ‘माँ’ उपन्यास को ‘सुधा’ में धारावाहिक रूप में प्रकाशित करके बाद में ‘गंगा-पुस्तक माला’ की ओर से छापा। श्री भगवती चरण वर्मा के ‘पतन’ तथा ‘एक दिन’ नामक पहले दो उपन्यासों को छापने का श्रेय भी उन्हीं को है। ‘माधुरी’ के सम्पादन के दिनों में उनके साथ जहां आचार्य शिवपूजन सहाय, प्रेमचन्द, रूप नारायण पांडेय और भगवती प्रसाद बाजपेयी प्रभूति साहित्यकारों ने कार्य किया था, वहां ‘सुधा’ के सम्पादन के दिनों में श्री सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’, आचार्य चतुरसेन शास्त्री, इलाचन्द्र जोशी, और गोपाल सिंह नेपाली जैसे कवि और साहित्यकार भी उनके सहयोगी रहे थे।
    साहित्य की सेवा उन्हें विरासत में मिली थी। भार्गव परिवार के प्रतिष्ठित प्रकाशक एवं मुद्रक मुंशी नवलकिशोर ने अपने प्रेस के द्वारा हिन्दी तथा उर्दू की 4000 से अधिक पुस्तकें प्रकाशित नहीं कीं, प्रत्युत वहां से ‘माधुरी’ का प्रकाशन करके हिन्दी साहित्य को दुलारे लाल भार्गव जैसा साहसी तथा उत्साही व्यक्तित्व प्रदान किया। वैसे तो छात्र जीवन से ही भार्गव जी में लेखन-सम्पादन की अभूतपूर्व प्रतिभा थी और वे अपने जीवन के सोलहवें वर्ष तक आते-आते ‘भार्गव पत्रिका’ का सम्पादन भी करने लगे थे। ‘माधुरी’ के प्रकाशन ने उनकी प्रतिभा को द्विगणित करने में प्रचुर प्रेरणा प्रदान की। ‘भार्गव पत्रिका’ पहले उर्दू में प्रकाशित होती थी, पर आपने सम्पादन भार ग्रहण करते ही उसे हिन्दी में कर दिया।
    अभी वे नवीं कक्षा में ही पढ़ते थे कि उनका विवाह अजमेर के सुप्रसिद्ध रईस श्री फूलचन्द जी जज की सुपुत्री गंगादेवी के साथ हो गया। वे कुछ समय ही अपने पति श्री दुलारे लाल भार्गव के साथ रह पाई थीं कि 1916 की 19 सितम्बर को अचनाक उनका देहावसन हो गया। इतने थोड़े से समय में ही गंगादेवी ने उर्दू संस्कारों से आक्रांत इस परिवार में हिन्दी के प्रति जो निष्ठा जागृत की, उसी के परिणामस्वरूप प्राणेश्वरी की इच्छापूर्ति के लिए उन्होंने आजीवन हिन्दी की सेवा करने का महान ब्रत किया व उसे अक्षरशः सही चरितार्थ करके दिखा दिया। अपने इस संकल्प की पूर्ति के लिए उन्होंने सन् 1922 में ‘माधुरी’ का सम्पादन प्रारम्भ किया। ‘माधुरी’ के सम्पादन-काल में उन्होंने जहां हिन्दी लेखकों, कवियों और साहित्यकारों का सहयोग लिया वहां अनेक कवि और साहित्यकार भी हिन्दी जगत को दिए। सर्व प्रथम ‘तुलसी संवत्’ का प्रचालन और ब्रज भाषा काव्य की पुर्नप्रतिष्ठा ‘माधुरी’ के द्वारा ही उन्होंने की। यही नहीं, अपितु अनेक कवियों को ब्रज भाषा की रचना करने की ओर उन्होंने प्रवृत किया।
    उन्होंने अपनी पहली पत्नी श्रीमती गंगा देवी की पावन स्मृति को चिरस्थायी रूप देने के लिए ‘गंगा-पुस्तक-माला’ प्रारम्भ कर अपनी पहली काव्य कृति ‘हृदय तरंग’ प्रकाशित की 1927 में इसी दिन ‘सुधा’ पत्रिका को जन्म दिया। ओरछा के हिन्दी प्रेमी अधिपति महाराजा श्री वीर सिंह देव की ओर से प्रारम्भ किया गया दो हाजर रूपये का ‘देव पुरस्कार’ भी आपको इसी दिन ‘दुलारे दोहावली’ पर मिला। इस पुरस्कार की प्राप्ति पर भार्गव जी ने अपने उद्गार एक दोहे में इस प्रकार प्रकट किये थे:-
मम कृति दोस-भरी खरी, निरी निरस जिय जोई;
है उदारता रावरी, करी पुरसकृत सोइ।

‘दुलारे-दोहावली’ पर पुरस्कार मिलने पर हिन्दी जगत में उन दिनों जो चहल-पहल मची थी, वह भी लोगों की मनोवृत्ति की द्योतक थी। किसी ने उन पर यह आरोप लगाया था कि यह कृति उनकी है ही नहीं, और किसी ने उसकी मौलिकता को प्रश्न चिन्हांकित किया था। इस संबंध में महाकवि निराला की ये पंक्तियां ही भार्गव जी की काव्य-प्रतिभा को परखने का सुपुष्ट प्रमाण है:-
    ‘‘विद्वान समालोचकों का मत है कि बिहारी लाल हिन्दी के सर्व प्रथम श्रेष्ठ कलाकार हैं। उनके बाद आज तक किसी ने भी वैसा चमत्कार पैदा नहीं किया? परन्तु अब यह कलंक दूर होने को है... ब्रज भाषा में अब पहले की सी कविता नहीं लिखी जाती, ‘दुलारे लाल दोहावली’ ने इस कथन को ‘बिल्कुल भ्रम साबित कर दिया।.. कविवर दुलारे लाल जी के दोहे महाकवि बिहारी लाल जी के दोहों की टक्कर के होते हैं, और बाज-बाज तो खूबसूरती में बढ़ भी गए हैं।’’
    श्री भार्गव जी ने जहां भारतेन्दु के बाद धीरे-धीरे सूखती जाने वाली ब्रजभाषा काव्य की माधवी लता को अपनी अभूतपूर्व प्रतिभा से सींच-सींचकर पल्लवित एवं पुष्पित किया वहां ‘सुधा’ ‘माधुरी’ और ‘गंगा-पुस्तक माला’ के द्वारा खड़ी बोली साहित्य की अभिवृद्धि में भी अभूतपूर्व योगदान दिया। हिन्दी-प्रकाशनों को सूरुचि पूर्वक बढि़या मोटी एंटिक पेपर पर कपड़े की जिल्द में छापकर हिन्दी- प्रकाशकों के सामने आदर्श प्रस्तुत करने वाले कदाचित वे पहले ही व्यक्ति थे। हिन्दी के अन्य व्यवसायी प्रकाशकों की भांति जैसी भी पांडुलिपि लेखक से उन्हें मिल गई वैसी ही छाप देने वाले भार्गव जी नहीं थे। उनकी भाषा का एक ऐसा सर्वथा नया मानदंड था कि अच्छे-अच्छे धाकड़ लेखक को भी उनके द्वारा प्रवर्तित ‘वर्तनी’ को मानने के लिए विवश होना पड़ता था। भाषा संबंधी उनकी जागरूकता का लोहा अन्तः आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी को भी मानना पड़ा। उसी बर्तनी के अनुसार उनकी ‘अद्भुत-अलाप’ तथा ‘सुकवि-संकीर्तन’ आदि पुस्तकें ‘गंगा पुस्तक माला’ से प्रकाशित हुई। हिन्दी-प्रकाशन के क्षेत्र में प्रत्येक पुस्तक का ‘राज-संस्करण’ और ‘साधारण संस्कारण’ अलग-अलग तैयार करने वाले कदाचित वे पहले ही व्यक्ति थे। उनका प्रत्येक प्रकाशन देश के कोने-कोने में फैलकर सभी पाठकों और पुस्तकालय तक सस्ते-से-सस्ते मूल्य में पहुंचे इसके लिए उन्होंने ‘पुस्तक-प्रचार’ की योजना भी चलाई थी। बच्चों के लिए सुरुचिपूर्ण साहित्य तैयार करने की दिशा में जहां वे प्रयत्नशील रहे वहां उन्होंने ‘बाल-विनोद’ नामक एक बालोपयोगी पत्र का प्रकाशन करके अनेक लेखक तैयार किये।
    हमारा हिन्दी साहित्य एवं भारतीय प्रकाशन व्यवसाय युगों-युगों तक भी दुलारे लाल भार्गव को न भुला सकेगा।
(लेखक वरिष्ठ साहित्यकार हैं।)