Sunday, October 23, 2011

आओ खेलें कूड़ा-कूड़ा...!

लखनऊ। राजधानी कूड़े-कचरे की दुर्गंद्द से बेहाल है। महापौर नारजगी जताते गली-मोहल्ले में घूम रहे हैं। उच्च न्यायालय ने शहर साफ करने के आदेश दिये हैं। आक्रोशित नागरिकों व सफाईकर्मियों मंे रोज झड़पों से लेकर मारपीट तक हो रही है। आधे से अधिक लखनऊ में संक्रामक रोगों और मच्छरों का हमला जारी है। अखबारों ने पहल की, सुझाव-सलाह का सिलसिला जारी भी है। अफसर-सफाईकर्मी कूड़े के निस्तारण को लेकर हलकान है। कूड़ा है कि लगातार बढ़ता जाता है।
    लखनऊ में 6570 मीट्रिक टन कूड़ा निकलता है और 5475 उठाया जाता है। जेएनएनयूआरएम योजना के तहत लखनऊ को 43 करोड़ रूपया मिला उससे कैसा और कितना प्रबन्ध हो रहा है, सारा शहर देख रहा है। इसी कूड़े के प्रबंद्दन के लिए नगर निगम के अफसर, सभासद सिंगापुर की सैर भी कर आए थे। सारी कवायदों के बाद घर-घर से कूड़ा उठवाने के नाम पर 40 रूपया प्रतिमाह का बोझ नागरिकों पर तब डाल दिया गया, जब नगर निगम के चुने हुए प्रतिनिधियों ने सामुहिक विरोध किया। इस योजना के तहत घरों से कूड़ा उठाकर सड़कों पर डाला जा रहा है, नदी किनारे या नदी में फेंका जा रहा है। विशेष सफाई के नाम पर ईद, दशहरा में करोड़ो डकार लिए गये। दीपावली में निकलने वाले कचरे के नाम पर फिर करोड़ों का बजट डकारने की तैयारी होगी।
    नागरिक सुविधाओं से खिलवाड़ आम बात है, लेकिन करदाता को करके बदले बीमारी या मृत्यु बांटना संविधान की किस धारा में लिखा है? बेशक नागरिकों पर भी शहर को साफ रखने की जिम्मेदारी है, लेकिन इसके लिए शहरी प्रबंधन को नागरिक संगठनों, एनजीओं या मोहल्ला सुधार कमेटियों के तहत पहल करनी होगी।
    शायद ही कोई दिन ऐसा जाता होगा जब किसी न किसी इलाके में कूड़े को लेकर आम लोगों का आक्रोश न फूटता हो। आए दिन जनता अपने घर-मुहल्ले के करीब डंपिंग ग्राउंड न बनने देने के लिए आंदोलन करती दिखाई देती है। कूड़ा, सरकार और समाज दोनों के लिए चिंता का विषय बनता जा रहा है। भले ही हम कूड़े को अपने पास फटकने नहीं देना चाहते हों, लेकिन विडंबना यही है कि यह दिन-दूना, रात-चैगुना बढ़ रहा है। औसतन प्रति व्यक्ति 20 ग्राम से 60 ग्राम कचरा रोज निकलता है। इसमें से आधे से अधिक कागज, लकड़ी या प्लास्टिक होता है, जबकि 22 फीसदी घरेलू कबाड़ या घरेलू कचरा होता है। लखनऊ नगर निगम कई-कई किलोमीटर दूर तक कचरे का डंपिंग ग्राउंड तलाश रहा है। इतने कचरे को इकट्ठा करना, फिर उसे दूर तक ढोकर ले जाना कितना महंगा और जटिल काम है। कुल कूड़े का महज पांच फीसदी का भी ईमानदारी से निपटान नहीं हो पाता है। कूड़ा निस्तारण संयंत्र जमीन न मिलने के चलते अब तक नहीं लग सका। राजधानी लखनऊ का 60 फीसदी कूड़ा प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से गोमती में बहा दिया जाता है। कागज, प्लास्टिक, धातु जैसा बहुत सा कूड़ा तो कचरा बीनने वाले जमाकर रिसाइकलिंग वालों को बेच देते हैं। सब्जी के छिलके, खाने-पीने की चीजें, मरे हुए जानवर वगैरह कुछ समय में सड़-गल जाते हैं इसके बावजूद ऐसा बहुत कुछ बच जाता है, जो हमारे लिए विकराल संकट का रूप लेता जा रहा है।
    असल में, कचरे को बढ़ाने का काम समाज ने ही किया है। अभी कुछ साल पहले तक स्याही वाला पेन होता था, उसके बाद ऐसे बालपेन आए, जिनकी केवल रिफिल बदलती थी। आज बाजार में ऐसे पेनों का बोलबाला है जो खत्म होने पर फेंक दिए जाते हैं। बढ़ती साक्षरता दर के साथ ऐसे पेनों का इस्तेमाल और उसका कचरा बढ़ता गया। तीन दशक पहले एक व्यक्ति साल भर में औसतन एक पेन खरीदता था और आज औसतन हर साल एक दर्जन पेनों की प्लास्टिक प्रति व्यक्ति बढ़ रही है। इसी तरह शेविंग-किट में पहले स्टील या पीतल का रेजर होता था, जिसमें केवल ब्लेड बदले जाते थे और आज ‘इस्तेमाल करो और फेंको’ वाले रेजर रोज कचरा बढ़ा रहे हैं। हमारा स्नानागार और रसोई तो कूड़े के बड़े उत्पादक बन गए हैं।
    कुछ साल पहले तक दूध भी कांच की बोतलों में आता था या फिर लोग अपने बर्तन लेकर डेयरी जाते थे। आज दूध तो दूध, पीने का पानी भी कचरा बढ़ाने वाली बोतलों में मिल रहा है। मेकअप का सामान, डिस्पोजेबल बर्तन, पोलीथीन की थैलियां, पैकिंग की पन्नियां वगैरह कचरा बढ़ा रहे हैं। ऐसे ही न जाने कितने तरीके हैं, जिनसे हम कूड़ा-कबाड़ा बढ़ा रहे हैं। घरों में सफाई और खुशबू के नाम चलन ने भी अलग किस्म के कचरे को बढ़ाया है। सबसे खतरनाक कूड़ा तो बैटरियों, कंप्यूटरों और मोबाइलों का है। इसमें पारा, कोबाल्ट और न जाने कितने किस्म के जहरीले रसायन होते हैं। एक कंप्यूटर का वजन लगभग 3.15 किलोग्राम होता है। इसमें 1.90 किग्रा सीसा, 0.693 ग्राम पारा और 0.04936 ग्राम आर्सेनिक होता है। शेष हिस्सा प्लास्टिक होता है। इसमें से अधिकांश सामग्री ‘सड़ती-गलती’ नहीं है और न ही जमीन में जज्ब हो पाती है। ये सारे जहर मिट्टी की गुणवत्ता को प्रभावित करने और भूगर्भ जल को जहरीला बनाने का काम करते हैं। ठीक इसी तरह का जहर बैटरियों और बेकार हो चुके मोबाइलों से भी उपज रहा है। भले ही अदालतें समय-समय पर फटकार लगाती रहती हों, लेकिन अस्पतालों से निकलने वाले कूड़े का सुरक्षित निपटान लखनऊ और अन्य नगरों से ले कर छोटे कस्बों तक में लापरवाही भरा है। कूड़ा अब नए तरह की आफत बन रहा है। सरकार उसके निपटान के लिए तकनीकी उपाय और दूसरी कोशिशें कर रही हैं लेकिन असल में कोशिश तो कचरे को कम करने की होनी चाहिए न कि उससे खेलने की। कचरा-नियंत्रण और उसके निपटान को एक विषय के तौर पर स्कूलों में पढ़ाया जाना भी जरूरी है। हर किसी को कूड़ा यहां-वहां फेंकने से परहेज करना होगा। कूड़ा प्रबंधन के लिए मोहल्ला स्तर की कमेटियों का गठन होना चाहिए। सिविल सोसाइटी के ठेकेदारों को कूड़े के भ्रष्टाचार पर भी पहल करनी चाहिए। कूड़ा प्रबंधन को लेकर जनजागरण अभियान चलाए जाने की आवश्यकता है।

डाकिया डाक नहीं लाया

लखनऊ। डाक समय से नहीं बंटती या उसके जिम्मेदार कैसे उसे मंजिल तक नहीं पहुंचने देते? जीपीओ व आरएमएस डाकघरों में पत्र डालने वाले आमतौर से यह मानते हैं कि डाक 24 से 48 घंटों में मंजिल तक पहुंच जाएगी। जबकि यह सच नहीं है। अखबार/पत्रिकाएं तो आमतौर पर मंजिल पर नहीं पहुंच पाते। यहां एक घटना के जिक्र से बहुत कुछ साफ होगा।
    लखनऊ से छपने वाले एक साप्ताहिक समाचार पत्र ने अपनी 33 ग्राम की एक प्रति में पचास पैसे मूल्य का डाक टिकट लगाकर दो सौ प्रतियां आरएमएस के डाक बक्से में डाल दी। चैबीस घंटों बाद समाचार-पत्र के कार्यालय में एक डाक बाबू का फोन आया कि आपकी डाक रोकी जा रही है। क्योंकि इसको भेजने के लिए अलग से व्यवस्था है। उसमें पंजीकरण कराकर ही भेजें। गौरतलब है कि बगैर पंजीकरण समाचार-पत्र उचित मूल्य के डाक टिकट लगाकर भेजने का प्रावधान है। यही बात दोहराने पर बाबू द्वारा डाक जब्त करने या वापस मंगाने की बात की जाती रही। गौरतलब है कि समाचार पत्र का डाक पंजीयन पहले से था, तय तारीख निकल चुकी थी। इसी कारण दुगने मूल्य का डाक टिकट लगाकर साधारण डाक से प्रेषण किया जा रहा है, बाबू को बताया गया फिर भी कुतर्क करने पर समाचार-पत्र के प्रकाशक ने जब उस बाबू को बताया कि यह अखबार का दफ्तर है, जहां आपने फोन किया हैं, आपकी बात रेकार्ड भी हो सकती है। तब उसने तुरंत फोन काट दिया और डाक भी वितरण के लिए निकाल दी। और केवल निकाल ही नहीं दी बल्कि त्वरित सेवा में पहुंचाने की व्यवस्था भी की। तभी 24 घंटों में प्रदेश भर में समाचार -पत्र की प्रतियां बंट भी गई। इसी तरह एक मासिक पत्रिका के साथ भी किया गया था। नई प्रकाशित होने वाली पत्रिका का डाक पंजीकरण तब नहीं हो पाया था। उसके संपादक को अपनी पत्रिका वहां से वापस लानी पड़ी थी।
    इससे भी अलग पंजीकरण के तहत भेजे जाने वाले समाचार-पत्रों की तमाम प्रतियां समय से तो छोडि़ए बंटती ही नहीं। यह आरोप नये नहीं है। आम आदमी भी डाक समय से न मिलने के आरोप लगाता रहता है। यही वजह है आज लोगों की पहली पसन्द कोरियर सेवा हो गई है। आज डाक सेवा से बेहतर कोरियर सेवा का कारोबार अरबों रूपयों का हो गया है।
    डाक विभाग ने पिछले महीने इन आरोपों को नकारते हुए बताया था कि 95 फीसदी डाक समय से बंटती और पहुंचती है। देरी का कारण लोगों का घर पर न मिलना होता है। यह विभाग द्वारा कराये गये सर्वेक्षण का नतीजा बताया गया था। जबकि सच यह नहीं है। ग्रामीण इलाकों की बात छोडि़ये राजद्दानी में 24 घंटों में साधारण डाक नहीं बंट पाती। पर्व-त्योहारों पर तो और दयनीय हालात हो जाते हैं। भले ही सर्वेक्षण या अन्य तर्कों के जरिये आरोपों को खारिज किया जाये, लेकिन तमाम सुधारों के दावों के बावजूद डाक सेवा सुस्त और भ्रष्ट आचरण की गिरफ्त में दिखाई देती है।

अमीर मायावती के पास 87.27 करोड़

लखनऊ। बसपा सूबे के सभी सियासी दलों में सबसे अमीर पार्टी है। उसकी मुखिया और सूबे की मुख्यमंत्री भी अन्य दलों के नेताओं के मुकाबले सबसे रईस हैं। वे आजकल स्वच्छता अभियान पर हैं। अपने दल के विधायकों, सांसदों के लिए आदर्श मानी जाने वाली मायावती मौजूदा समय में 87.27 करोड़ से अधिक की संपत्ति की मालिकन है।
    विधानसभा से लेकर विधान परिषद तक बसपा के विधायक, नेता और मंत्री करोड़पति व अरबपति है। पिछले दस वर्षों में इनकी संपत्ति में तेजी से इजाफा हुआ है। वह भी बिना किसी फैक्ट्री व कंपनी के। बसपा के 201 विधायकों में 51 करोड़पति हैं और विधान परिषद में 52 विधायक करोड़पति हैं। विधानसभा व विधान परिषद में मिलाकर जहां सीएम मायावती सबसे अमीर विधायक हैं, वहीं राजनीतिक दलों के मामले में बसपा के बाद दूसरे नंबर पर सपा, तीसरे पर भाजपा और चैथे पर रालोद और कांग्रेस के विधायक करोड़पति हैं। विधान परिषद में मुख्यमंत्री मायावती के बाद बसपा के ही मनीष जायसवाल दूसरे नंबर के अमीर हैं। उनके पास लगभग 36 करोड़ रूपए की संपत्ति है। टाॅप टेन सूची में बसपा के आठ और सपा के दो विधायक हैं। तीसरे स्थान पर बसपा के ही अरविंद कुमार त्रिपाठी के पास 20 करोड़, प्रशांत चैधरी 18 करोड़, मनोज अग्रवाल नौ करोड़, अशोक कटियार सात करोड़, मोहम्मद इकबाल सात करोड़, डाॅ. संतराम निरंजन के पास चार करोड़ से ज्यादा की चल-अचल संपत्ति है।

माया का माया जाल टूट रहा है

सूबे की समूची राजनीति चुनावी मिशन-2012 की कवायद में व्यस्त है। सत्तादल पत्थरों की सजावट और पार्कों को खूबसूरत बनाने के कार्मों से फुर्सत लेकर अपने दल में घुस आये अपराधियों को निकाल बाहर करने, अफसरों को मनमाफिक कुर्सियों पर बैठाने के साथ चिट्ठी-पत्री लिखने और उप्र भर में घूम-घूमकर मतदाताओं को रिझाने में लगा है। विपक्ष खासा जोश में है। समाजवादी पार्टी का क्रांतिरथ अपने युवा प्रदेश अध्यक्ष को लेकर समूचे प्रदेश में अपने आक्रमक तेवरों के साथ दौड़ रहा है। भारतीय जनता पार्टी की कलह की तमाम खबरों के बाद भी चुनावी रथ उप्र के शहर-कस्बों में अपने मतदाताओं के बीच पहुंच रहा है। कांग्रेस के युवा महासचिव और नई पीढ़ी के चहेते राहुल गांधी बगैर किसी रथ के पूरी तरह सक्रिय हैं। और इस चुनावी समर में उतरने वाले उम्मीदवार अपने सपनों, अपनी अकांक्षाओं के इस पड़ाव पर अपने सत्कर्मों की थाती लेकर गांव-गलियारे-शहर से लेकर पार्टी दफ्तर तक दौड़ लगा रहे हैं। कुछ के सपने उपलब्धियों के नये आकाश छूने के हैं, तो कुछ इस हौसले के साथ मैदान में उतरना चाह रहे हैं कि उन्हें अपनी पिछली निराशाओं को धोना है। वहीं तमामों की निराशा के द्रोहीरथ बगावत की रास थामे दौड़ने को बेताब है। लेकिन चुनाव-2012 महज हार-जीत या आशा-निराशा बांटने वाली कचेहरी भर नहीं है, बल्कि सत्तादल से परेशान, हलकान आदमी की उम्मीदों, आवश्यकताओं पर खरा उतरने वाली सरकार को चुनने का आम यज्ञ है।
    चुनावी यज्ञ में दौड़ते रथों-सारथियों के उत्साह पथ पर अपने तेज -तर्रार संवाददाताओं की टीम को भी सूब के मतदाओं का रूझान जानने समझने का जिम्मा सौंपा। संवाददाताओं ने शहरी-ग्रामीण, लैंगिक, आयु या राजनीति के पूर्वाग्रहों से अलग सीधी और साफ-साफ बात करने की कोशिश हर आयु, जाति-वर्ग वाले मतदाता से की और जो नतीजे निकलकर सामने आये हैं, उनकी माने तो सत्तारूढ़ बसपा का एनेक्सी से बाहर का रास्ता देखना निश्चित है। इसके पीछे मुख्यमंत्री की कार्यशैली के साथ कथनी और करनी का अंतर मुख्यरूप से उभरकर सामने आया है। पत्थरों, मूर्तियों, पार्कों से प्रेम के अलावा केन्द्र सरकार को समर्थन के साथ उससे टकराव का दिखावा, अपराधियों को संरक्षण और चुनावों की आमद पर उनसे रिश्ते तोड़ना, विपक्ष के भ्रष्टाचार के आरोपों के अलावा संगठन में बाहर से आये लोगों का पलायन भी बड़ी वजहें है। सरकारी कर्मचारी खफा हैं, अंदरखाने नौकरशाह मौके का फायदा उठाने की फिराक में है। इसके सुबूत समीक्षा बैठकों में वरिष्ठ अधिकािरयों के बदले सुरों का ऊंचा होते जाने में देखे जा सकते हैं, शिक्षक, पुलिस की नाराजगी, मुसलमानों-सवर्णों का गठजोड़, ब्राह्मणों का मोहभंग और पिछड़ों में सपा के द्वारा चलाया जा रहा अभियान सत्तादल को उप्र के सिंहासन से नीचे उतारने में बड़ी भूमिका निबाहेगा। नाराजगी की और भी कई वजहें सामने हैं, उनमें वफादारों से गैरकानूनी काम कराने और उसका पूरा फायदा उठाने के बाद उन्हें दूध में मक्खी की तरह निकाल बाहर करना भी एक बड़ा कारण है। जातिगत वोटों में भी सेंध लगने के आसार साफ दिखाई दे रहे हैं। रूझानों में महिलाओं, दलितों का उत्पीड़न, बाढ़ग्रस्त क्षेत्रों में 25 लाख की आबादी की दुर्दशा, विकास के नाम पर किसानों का उत्पीड़न युवाओं की अनदेखी और अपने ही कार्यकर्ताओं को दुत्कारना भी विरोध स्वरूप उभर कर सामने आया है।
2007 के आंकड़ों पर गौर करें तो 30.43 फीसदी वोट पाकर 206 सीटों पर काबिज होने वाली बसपा 2009 के लोकसभा चुनावों में महज 27.42 फीसदी वोटों पर सिमट गई। 304 विधानसभा सीटों पर उसका प्रदर्शन बेहद खराब रहा। 2011 की सर्दियों की दस्तक के साथ नये बनाए गये जिलों की कलह और संगठन से निकाले गये बाहुबली मंत्रियों, विधायकों, सांसदों के विरोधी स्वर बसपा के लिए नये और मजबूत अवरोद्द खड़े करेंगे। याद रखने लायक है, बसपा ने पिछले चुनाव में 170 अपराधिक छविवालों को चुनाव मैदान में उतारा था, उनमें 70 जीत गए थे। आज यह सूची 71 के अंक पर है। और उनमें कई जेल में है। इसी तरह उनके मुस्लिम व दलित मतदाताओं के आर्थिक व शैक्षिक स्तर की हकीकत को जोर-शोर से प्रचारित किया जाएगा। इसके अलावा उनकी अपनी भव्य कोठियों के निर्माण के साथ अकूत संपत्ति के मामले भी उन्हें कष्ट देंगे। इस सबाके हवा देने मंे विपक्ष से अधिक अन्ना टीम आगे होगी। सर्वेक्षण के नतीजे साफ कहते हैं कि माया की सेवानिवृति की तारीख तय हो गई है। विपक्षी दलों में सपा के प्रचार अभियान और सूबे की सड़कों पर दौड़ते क्रांति रथ के आस-पास जुटने वाली भीड़ को नजरअंदाज भले ही नहीं किया जा सकता, लेकिन मतदाताओं में मुलायम सिंह यादव के युवा बेटे में कोई खास दिलचस्पी नहीं झलकती। मुसलमान वोटों पर अम्बेडकरनगर जनपद के एक वरिष्ठ नागरिक और जनता दल के सक्रिय सदस्य रहे सज्जन की सुनिए, ‘हेमवती नन्दन बहुगुणा अपने साथ हमेशा दिल्ली की जामा मस्जिद के इमाम अब्दुल्ला बुखारी को साथ लेकर मुसलमानों को रिझाने के लिए घूमते थे। उन्हें इसका कितना नफा-नुकसान हुआ उससे सारी सियासी जमात वाकिफ है, लेकिन बंद कमरे में बहुगुणां जी से मैंने पूंछा, ‘इमाम साहब को आप हमेशा क्यों साथ ले लेते हैं? उनका जवाब था, ‘हाथी हमेशा बारातों की शोभा बढ़ाता है और ध्रुवीकरण में वोटों की खेप ढोने के भी काम आता है।’ हालांकि उस हाथी से कितना नुकसान हुआ, वह लोकदल तक आते-आते बहुगुणा जी को बाखूबी अहसास हो गया था। ऐसा ही एक चेहरा मुलायम सिंह के साथ भी है, उससे होने वाला नुकसान 20 मई 2012 को सामने आ जाएगा।’
    इससे भी आगे मुलायम का भाजपा प्रेम जग जाहिर है। 2009 के लोकसभा चुनावों में कल्याण सिंह की दोस्ती के चलते सपा के सभी 12 मुस्लिम उम्मीदवार चुनाव हार गये थे। 2012 के लिए चार पुराने भाजपाई जिन्हें कट्टर हिंदूवादी माना जाता है, को सपा से टिकट दिया गया है। इनमें दो मौजूदा भाजपा विधायक हैं। इन चारों का विरोध पार्टी में खूब हो रहा है। पार्टी के भीतर आजम खां और राष्ट्रीय उपाध्यक्ष रशीद मसूद की तकरार से सभी वाकिफ हैं। जहां तक आजम खां की बात करें तो वे अपनी साख लोकसभा चुनावों में जयप्रदा की जीत के साथ गंवा चुके हैं। मुलामय सिंह मुसलमानों से माफी मांगने के बाद एक नहीं चार भाजपाई चेहरों के साथ मुसलमान वोटों को मतदान केन्द्रों तक कैसे लायेंगे? मुलायम का अपराधी छवि वाले बाहुबलियों से प्रेम जगजाहिर है। 2012 में चुनावों के लिए भी जूही सिंह को टिकट दिया गया है, जो पूर्व मुख्य सचिव अखंड प्रताप सिंह की पुत्री हैं और जिन्हें आइएएस एसोसिएशन ने महाभ्रष्ट चुना था। वे जेल से लौटने के बाद भ्रष्टाचार के मुकदमों का सामना कर रहे हैं। बावजूद इसके यह सच है कि अखिलेश यादव युवा चेहारा हैं, भीड़ उन्हें मुलायम सिंह का बेटा मानकर देखने सुनने उमड़ रही हैं, लेकिन उनमें कितने साइकिल पर मुहर लगा सकते हैं? उसके अलावा इस बार पार्टी के पास स्टार प्रचारक चेहरे भी नहीं है। संजय दत्त, मनोज तिवारी, जयाप्रदा, जया बच्चन, अमिताभ बच्चन सभी अमर सिंह के साथ पार्टी से दूर हो गये। मुलायम का स्वास्थ्य भी कठोर परिश्रम की इजाजत नहीं देगा, तब क्या शिवपाल सिंह, आजम खां और अखिलेश यादव सपा को बहुमत दिलाने में कामयाब होंगे? वह भी तब, जब लोहिया के समाजवादी आदर्शों से सपा का कोई लेना-देना नहीं रह गया।
    भारतीय जनता पार्टी अपनी अंतरकलह में उलझी आत्मबल तक गंवाये एक सैकड़ा सीटों के आस-पास जूझने के मंसूबे पर काम कर रही है। इसकी गवाही पिछले दिनों दिल्ली में हुई राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में प्रदेश अध्यक्ष सूर्य प्रताप शाही द्वारा जीत सकने वाली 80-82 सीटों का आंकड़ा रखा जाना है। हालांकि राष्ट्रीय अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री राजनाथ सिंह के बहुमत की सरकार बनाने के मेहनतकश दावे तब और ध्वस्त होते दिखाई देते हैं, जब उमा भारती व संजय जोशी अब तक न तो कोई करिश्मा दिखा सके हैं, न ही पार्टी में नई ऊर्जा भर सके, उल्टे भीतरी कलह का सामना कर रहे हैं। कल्याण सिंह का चेहरा भी भाजपा को डराने में कामयाब है। स्वाभिमान यात्रा भी कोई करिश्मा नहीं कर पा रही है। ऐसे हालात में पार्टी अपने पुराने चोले को धारणकर बसपा की ओर देख सकती है।
    कांग्रेस के चेहरे की बदसूरती पिछले कई बरसों से यथावत है। उसे धोने, पोछने और निखारने में लगे राहुल गांधी की साख को बट्टा लगाने में यूपी वाले भइया आगे-आगे हैं। अभी तक पार्टी अपने उम्मीदवारों पर, समझौते या गठबंधन पर कोई मजबूत फैसला नहीं ले सकी है। राहुल गांधी के तमाम प्रयासों को गुटबाजी व राष्ट्रीय फलक पर कांग्रेस पर लगते आरोप निष्क्रिय करते रहे हैं। हालांकि कांग्रेस दफ्तर से खबर आई है कि राहुल के रोड शो संपर्क रथ के जरिये फिर से हांेगे। इसकी शुरूआत पश्चिमी उप्र से होने की बात कही जा रही है। इसके पीछे भट्टा परसौल आंदोलन की सफलता को रखा जा रहा है। सर्वेक्षण टीम को कांग्रेस के पक्ष में जो रूझान मिले हैं वे महंगाई, भ्रष्टाचार और आपसी कलह से परे आश्चर्यजनक रूप से उम्मीदों भरे हैं। कई क्षेत्रों में कांग्रेस के युवा चेहरों आर.पी. एन. सिंह, जितिन प्रसाद के नामों पर, तो कई जगहों पर बेनीप्रसाद वर्मा, रीता बहुगुणां पर, तो कई विधानसभा क्षेत्रों में नये चेहरों पर उम्मीदें जताते मतदाता जोश में हैं। वहीं कुछ अपशकुनी संकेत भी मिले जो बताते हैं कि कांग्रेस की राह आसान नहीं है, लेकिन यह कहा जा सकता है कि कांग्रेस के पास खोने के लिए कुछ नहीं है, उसे सिर्फ पाना है, जीतना है, जबकि बसपा, सपा की प्रतिष्ठा दांव पर है, तो भाजपा को अपनी सीटें बचाये रखने की फिक्र सता रही है। छोटे दलों का अपना समीकरण अपने क्षेत्रों में कम-ज्यादा रहने के संकेत है। रह गई अन्ना टीम के विरोध की बात तो वह समय के गर्भ में है।
नई सरकार, नया चेहरा
ऽ    क्या उत्तर प्रदेश का विकास पिछले साढ़े चार सालों में हुआ है?
    हां 20    नहीं 70    बाकी कह नहीं सकते
ऽ    पार्कों मूर्तियों व नये जिलों के बनने से प्रदेशवासियों को लाभ हुआ हैं?
    हां 25    नहीं 60    बाकी पता नहीं
ऽ    राज्य सरकार के कार्यों से किस तबके का सबसे अधिक फायदा हुआ?
    धनी 60    निर्धन 10    मध्यम वर्ग 22   
    बाकी पता नहीं
ऽ    सबसे अधिक चिंता का मसला?
    बेरोजगारी 10    महंगाई 30    भ्रष्टाचार 32   
    कानून व्यवस्था 26    धार्मिक जातिगत समस्याएं 2
ऽ    प्रदेश की गलियों में महिलाएं सुरक्षित हैं?
    हां 12    नहीं 68    पता नहीं 20
ऽ    मौजूदा सरकार में दलितों पर अत्याचार कम हुए?
    हां 35    नहीं 59    पता नहीं 6
ऽ    वर्तमान सरकार में आपराधिक छवि वालों का बोलबाला रहा?
    हां 58    नहीं 27    पता नहीं 14
ऽ    क्या बसपा सरकार अपने वायदों पर खरी उतरी?
    हां 22    नहीं 68    पता नहीं 10
ऽ    प्रदेशवासी सपा, बसपा की सरकारों को देख चुके, क्या मतदाता कांग्रेस, भाजपा की ओर बढ़ा हैं?
    हां. 75    नहीं 20    पता नहीं 5
ऽ    युवा मतदाताओं का रूझान किस पार्टी की ओर हो सकता है?
    कांग्रेस 30    सपा 22    बसपा 11   
    भाजपा 17    अन्य 20
ऽ    सोलहवीं विधानसभा में महिलाओं की संख्या बढ़नी चाहिए?
    हां 60    नहीं 32    पता नहीं 8
ऽ    छोटे राजनैतिक दलों के गठबंधन को उप्र विधानसभा चुनाव-2012 में फायदा होगा?
    हां 27    नहीं 69    पता नहीं 4
ऽ    राज्य में सरकार बनाने के लिए बहुजन समाज पार्टी को एक मौका और मिलना चाहिए?
    हां 8    नहीं 90    पता नहीं 2
ऽ    अन्ना हजारे टीम का उप्र चुनाव-2012 में कोई असर होगा?
    हां 30    नहीं 54    पता नहीं 16
ऽ    कल्याण सिंह उप्र विधानसभा चुनाव-2012 में प्रभाव डाल सकते हैं?
    हां 12    नहीं 61    पता नहीं 27
ऽ    पीस पार्टी मंे आपराधिक छवि के लोगों का जमावड़ा उप्र के चुनाव 2012 में कोई फर्क डाल सकेंगा?
    हां 14    नहीं 79    पता नहीं 7
ऽ    वर्तमान सरकार की मुखिया द्वारा आरक्षण व अन्य मामलों पर केन्द्र को लिखी जाने वाली चिट्ठियों से बसपा के वोट बैंक में बढ़ोत्तरी होगी?
    हां 18    नही 69    पता नहीं 13

    नोट: सभी उत्तर प्रतिशत में हैं।



जीवित माता-पिता की पूजा!

बाराबंकी। माता-पिता की उपेक्षा के इस दौर में पुत्रों द्वारा उनकी पूजा-अर्चना का समाचार हैरत में डालने वाला है। लेकिन है यह पूरी तरह सच। खबर के मुताबिक पितृपक्ष की चतुर्दशी के दिन जनक जननी सम्मान समारोह का आयोजन पारिजात युवक समिति द्वारा सफदरगंज में समिति के कार्यालय में पिछले तेरह वर्षों से किया जाता है। यह वृद्धजनों के प्रति युवाओं में प्रेम के नये पाठ का संदेश है।
    समिति कि यह परम्परा गांव-गांव फैल रही है। अपनी संतान से जिंदगी के आखिरी पड़ाव में मिलने वाला सम्मान बुढ़ापे में मजबूत संबल बन रहा है। हालांकि यह प्रथा वैदिक रीति-रिवाज से कुछ अलग हटकर है। सामान्यतया पितृपक्ष में पुत्र दिवंगत माता-पिता को हर वर्ष याद कर श्राद्ध आयोजित करता है और उनके प्रति कृतज्ञ होता है, वहीं इस परंपरा के तहत जीवित तौर पर माता-पिता का विधि-विधान से पूजन किया जाता है। समारोह में करीब ढाई-तीन सौ तक की संख्या में माता-पिता के साथ उनका कुटुंब शामिल होता है।
समारोह का खर्च सब मिलजुलकर उठाते हैं। समिति भी अपना योगदान करती है। पुत्र माता-पिता के लिए पांच नए कपड़े उनकी पसंद के पकवान व अन्य खाद्य सामग्री की व्यवस्था करते हैं। माता-पिता की विधि-विधान से आरती कर चरणों में पुष्प अक्षत अर्पित उनका वंदन करते हैं। इस परंपरा का निर्वहन करने वाले पुत्रों का कहना है, माता-पिता देव की तरह पूजन-अर्चन व संतानों द्वारा क्षमा याचना करते देख फूले नहीं समाते हैं। उनके चेहरे पर ऐसी खुशी आती है जो शब्दों में व्यक्त नहीं की जा सकती।